मखाना पैदावार और बाजार

Submitted by pankajbagwan on Sun, 02/09/2014 - 18:54
बिहार के मिथिलांचल की संस्कृति के मौलिक पक्ष को मजबूत करने में माछ यानी मछली, पान और मखाने का खास योगदान है। जायकेदार, पौष्टिक और औषधीय गुणों वाले मखाने की खेती भले ही दुनिया के अलग-अलग इलाकों में होती हो, पर भारत में मिथिलांचल के मखाने की बात ही कुछ और है।

दुनिया के कई देशों में मखाने की खेती के लिए किस तरह की तकनीकें अपनाई जाती हैं और वे भारत में कैसे फायदेमंद है, इस पर सरकार की कोई नीति या योजना काम नहीं कर पाई है। देश की कुल मखाना खेती का 80 फीसदी भाग बिहार में होता है और यहां सब से ज्यादा खेती मिथिलांचल के सहरसा, सुपौल, दरभंगा और मधुबनी जिलों में होती है।

मखाना पानी की एक घास है, जिसे कुरूपा अखरोट भी कहा जाता है। यह बिहार के उथले पानी वाले तालाबों में बढ़ने वाली घास है। इसके बीज सफेद और छोटे होते हैं, दिसंबर से जनवरी के बीच मखाना के बीजों की बोआई तालाबों में होती है। पानी की निचली सतह पर बीजों को गिराया जाता है। अधिक पानी वाले गहरे तालाब मखाने की खेती के लिए सहीं नही होते, कम और उथले पाली वाले तालाबों में 1 से डेढ़ मीटर की दूरी पर बीज गिराए जाते हैं। एक हेक्टेयर तालाब में 80 किलो बीज बोए जाते हैं।

अप्रैल के महीने में पौधों में फूल लगते हैं। फूल पौधों पर 3-4 दिन तक टिके रहते हैं। और इस बीच पौधों में बीज बनते रहते हैं। 1-2 महीनों में बीज फलों में बदलने लगते हैं। फल जून-जुलाई में 24 से 48 घंटे तक पानी की सतह पर तैरते हैं और फिर नीचे जा बैठते हैं। फल कांटेदार होते है। 1-2 महीने का समय कांटो को गलने में लग जाता है, सितंबर-अक्टूबर महीने में पानी की निचली सतह से किसान उन्हें इकट्ठा करते हैं, फिर उन की प्रोसेसिंग का काम शुरू किया जाता है।

सूरज की धूप में बीजों को सुखाया जाता है। बीजों के आकार के आधार पर उन की ग्रेडिंग की जाती है। उन्हें फोड़ा और उबाला जाता है। उन्हें भून कर तरह-तरह के पकवान, खीर वगैरह खाने की चीज तैयार की जाती है।

पौष्टिक है मखाना


मखाना बहुत पौष्टिक साबित हुआ है। गर्भवती महिलाओं की पाचन शक्ति बढ़ाने और उनकी अन्य बीमारियों की रोकथाम के लिए यह बहुत फायदेमंद है। यह एंटीआक्सिडेंट होता है। इससे सांस, नश, पाचन, पेशाब और शारीरिक कमजोरी से जुड़़ी बीमारियों का उपचार किया जाता है। इसमें किसी तरह के उर्वरक का इस्तेमाल नहीं होता। यह अपने लिए जैविक खाद खुद तैयार करता है। तालाबों में सड़ी-गली फूल पत्ती और वनस्पति से इसे खाद मिल जाती है।

जरूरत बाजार की


मखाने की प्रोसेसिंग और बाजार पर ध्यान दिया गया और कई आधुनिक तकनीकों को तैयार किया गया है। परंतु उत्पादन की सुविधाओं की अभी भी घोर कमी है। मखाने को पानी से निकालने की कोई आधुनिक तकनीक ईजाद नहीं की जा सकी है। अभी भी किसानों को मखाने के बीज निकालने में कठिन मेहनत और अधिक समय देना पड़़ता है। उन्हें फोड़ने में भी ज्यादा वक्त लगता है। फोड़ते समय 25 फीसदी मखाने खराब हो जाते हैं।

बिहार सरकार ने मखाने के उत्पादन की व्यवस्था की है। दरभंगा में 25 एकड़ में राज्य सरकार का एक उद्योग लगाने का प्रस्ताव है। सरकार कोशिश कर रही है कि आधुनिक बुनियादी सुविधाओं को वैज्ञानिक तकनीकी से जोड़ा जाए, इस प्रस्ताव को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। सरकार जाले (मधुबनी) और भारती (दरभंगा) में भी इस तरह के केंद्र स्थापित करने की योजनाओं पर काम कर रही है। पटना हवाई अड्डे के पास केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र में मखाने की प्रोसेसिंग को व्यवस्था की गयी है। इनके अलावा निजी स्तर पर कई प्रयोग किये जा रहे हैं और उन में कामयाबी भी मिली है। एक कारोबारी सत्यजीत ने 70 करोड़ की लागत से पटना में प्रोसेसिंग यूनिट लगाई है। उनका बिहार के 8 जिलों के 4 हजार से भी ज्यादा किसानों से संबंध है। उन्होंने ‘सुधा शक्ति उद्योग‘ और ‘खेत से बाजार‘ तक केंद्र बना रखे हैं। मखाना की पैदावार में इजाफा और बाजार वगैरह के लिए बकायदा नेटवर्क है। मणिगाछी (मधुबनी) के केदारनाथ झा ने 70 तालाब पट्टे पर लिए थे। एक हेक्टेयर के तालाब से वह एक हजार से 15 सौ किलो मखाना का उत्पादन कर लेते हैं।

मिथिलांचल के किसान पहले इसे फायदे की खेती नहीं मानते थे, परंतु अब उन की सोच गलत साबित हो रही है। मिथिलांचल का इलाका बाढ़ वाला इलाका है। वहां तालाबों में सालभर पानी रहता है। जो तालाब पहले बेकार थे अब उन में कारोबार तलाशे जा चुके हैं। अब उनमें समय पर खेती होती है और मखाना मिथिलाचंल के पोखरों, तालाबों से निकल कर देश के अलावा यूरोपीय देशों में भी पहुंच रहा है। अब तो तालाब की खुदाई कर के खेती की जा रही है। परन्तु तालाबों से मखाना निकालने और छिलका उतारने का काम आज भी कठिन है। इसकी आसान तकनीकों की जरूरत है।

उत्पादन की समस्याएं


मखाने को पानी से निकालने में किसानों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अधिक गहराई वाले तालाबों से मखाना निकालने में डूबने का डर रहता है। तालाबों में पानी के भीतर बगैर सांस लिए अधिक से अधिक 2 मिनट रहा जा सकता है। ऐसे में किसानों को बारबार गोता लगाना पड़ता है। समय, शक्ति और मजदूरी पर अधिक पैसा खर्च होता है।

पानी के जीवों में कई जहरीले भी होते हैं। और कई ऐसे विषाणु भी होते हैं, जो गंभीर बीमारियां पैदा कर सकते हैं। किसी तरह के लोशन की व्यवस्था नहीं होने से नुकसान होने का खतरा बना रहता है। मखाना कांटेदार छिलकों से घिरा होता है, जिससे किसानों को और भी कठिनाई होती है। पानी से मखाना निकालने में 25 फीसदी मखाना छूट जाता है और 25 फीसदी मखाना छिलका उतारते समय खराब हो जाता है।

मखाना की खेती आमतौर पर मल्लाह जाति के लोग करते हैं। और उनके अपने तालाब नहीं होते हैं, दूसरी जाति के लोगों में मखाने की खेती की रुचि होने के बावजूद पानी में काम करने की कला नहीं आने के कारण वे सफल नहीं हो पाते, वे पुराने बीजों का इस्तेमाल करते हैं और पोखरों को पट्टे पर व्यापारी को दे देते है, जिसके कारण लाभ कम होता है।

समाधान की उम्मीद


मखाने में उत्पादन की समस्याओं का आधुनिक समाधान खोजना, किसान अधिक से अधिक देर तक पानी के अंदर रहे, इसके लिए उन्हें आक्सिजन सिलेंडर मुहैया कराना होगा। तालाबों की सफाई, जहरीले जीवों से रक्षा, उपचार सुविधा और सुरक्षा दस्ताने का इंतजाम करना होगा, तैरने की ट्रेनिंग दिलानी होगी। पानी की सतह से सौ फीसदी मखाने के बीज निकाले जाएं और छिलके उतारने के दौरान वे बरबाद न हों, इसके लिए वैज्ञानिक तरकीब निकालनी होगी। अपने बाजार तलाशने होंगे। रूरल मार्ट बना कर किसानों को जोड़ना होगा। हाईब्रिड बीज तैयार करने होगें, ताकि उपज बढ़ सके।

संकलन और टाइपिंग - नीलम श्रीवास्तव, महोबा

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