मरगंगा में दूब

Submitted by HindiWater on Tue, 12/23/2014 - 10:05
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परिषद साक्ष्य, नदियों की आग, सितंबर 2004
एक बार गंगा मैया अपने दोनों बाजू बसे गाँव वालों के उत्पात् से तंग आकर रूठ गई थीं, तो उनकी गोद से निकलने वाली सारी-की-सारी छोटी-बड़ी नदियों के पानी पर कहर छा गया था। सभी धाराएँ सूख गई थीं। तब इन धाराओं को ‘मरगंगा’ कहा गया था। पुराने लोग याद करते हैं कि इस संकट की घड़ी में जयमंगली माता ने ही गंगा मैया को सन्देश भेजकर गाँव वालों की ओर से माफी माँग ली थी और गंगा तक पहुँचने वाली सभी धाराएँ दोबारा जिन्दा हो उठी थीं। घोसवरी से सरमेरा होकर बरबीघा और उसके आगे तक जाने वाली सड़क, जगह-जगह खाँड़ में तब्दील हो गई है। खाँड़ की गहराई नापने के प्रयास कई बार हुए हैं लेकिन हर बार यह प्रयास अधूरा रहा है। अब तो खतरा इस कदर बढ़ गया है कि दिन के वक्त भी कोई चारपहिया गाड़ी इस रास्ते होकर नहीं गुजरती। साइकिल सवार तक इस रास्ते चलना जोखिम मानते हैं।

जहाँ से सड़क पर खाँड़ों का अन्तहीन सिलसिला शुरू होता है, वहाँ से दो-ढाई किलोमीटर पूरब, धनकडोभ से आगे, टाल में जयमंगली माता की पीड़ी अवस्थित है। पीड़ी के पास में ही खड़े हैं, नीम, बड़ और पीपल के पुराने पेड़, जिनके तने बजाहिर मजबूत और दमदार दिखाई देते हैं, लेकिन जिनकी ऊपरी सतह की जड़ों के चारों ओर मिट्टी, कहीं-कहीं, भसक गई है। मिट्टी भसकने मात्र से ही जड़ों के जमीनी रेशे बाहर झाँकने लगे हैं।

जयमंगली माता की पीड़ी पर आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ में आज भी कोई कमी नहीं है। हमेशा की तरह, आज भी वहाँ भक्तों का मेला लगा है। मन्नतें मुरादें माँगने का दौर जारी है।

टालवासी मानते हैं, जयमंगली माता की कृपा होगी, तभी गाँव-जवार में अमन-चैन कायम रहेगा। तभी टाल की मिट्टी नरम होगी, धरती सिंचेगी और फसलें बोई जा सकेंगी।

जयमंगली माता ने नजरें फेर लीं तो टाल की विशाल धरती का आँचल तार-तार हो जाएगा और किसानों की बोरियों के बीज यूँ ही सूखकर बिखर जाएँगे।

टाल के निवासी अच्छी तरह जानते हैं, जयमंगली माता के आशीर्वाद के बिना उनका कोई काम निर्विघ्न नहीं होता। घण्टों-घण्टों की किसानी के बाद उनका माता की पीड़ी पर आ-बैठना केवल माता के लिए उनकी श्रद्धा का सूचक नहीं है। यही तो एक जगह है जहाँ वो भक्ति-भाव के अलावा अपने गिले-शिकवे लेकर भी आते हैं। असीम धैर्य और ममता की मूर्ति, जयमंगली माता उनके सारे गिले-शिकवे सुनती हैं और उन्हें एक नई आशा और उत्साह से भर देती हैं। माता की शरण में आने वाले श्रद्धालुओं की सारी तकलीफें और थकान जैसे एकबारगी मिट जाती हैं और वो तेज-तेज कदमों से अपने टोले-मुहल्ले लौट जाते हैं।

लेकिन माता की इस पीड़ी पर आज जब टालवासियों का हुजूम पहुँचा तो उन्हें चारों तरफ वीरानी और सन्नाटा दिखाई पड़ा। आम दिनों का उत्साह उन्हें आज वहाँ महसूस नहीं हुआ।

सन्नाटे को देखकर, कोई टालवासी भीड़ के बीच से बोला - ‘माता नाराज हैं हमसे। माता ने अपना आशीर्वाद समेट लिया है। तभी तो टाल सूखा पड़ा है। एक बूँद पानी नहीं है वहाँ। भीषण आकाल पड़ने वाला है।’

‘लेकिन क्यों, माता हमसे नाराज क्यों होंगी? हमसे आखिर गलती क्या हुई है? हम तो हमेशा यहाँ माता की पीड़ी पर सिर झुकाते हैं, अपनी विपदा सुनाकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। माता हमसे नाराज कैसे हो सकती हैं?’

‘क्यों नहीं होंगी माता नाराज हमसे?’

भीड़ में शायद सबसे बड़ी उम्र के थे जामुन महतो जो अपनी जबान बन्द नहीं रख पाए। एकदम से पीड़ी से उठकर बदहाल पेड़ों के पास आ गए, और बोले -

‘हालात देखो इन पेड़ों की। हमने इनकी मिट्टी तक खोद डाली है। सारी जड़ें, जो धरती के सीने में धंसी रहती थीं, बाहर-बाहर, नंगी दिखाई दे रही हैं। कितने दिन हो गए, हमने इन जड़ों पर मिट्टी नहीं डाली, इनके तनों को ढँकने का काम नहीं किया। माता को छाँह देने वाले इन पेड़ों की हमने कैसी हालत बना रखी है! बोलो, चुप क्यों हो? ऐसे में माता हमसे नाराज नहीं होंगी तो क्या होंगी?’

जामुन महतो की बात सुनकर भीड़ में सबकी निगाहें पेड़ों की ओर मुड़ गई हैं। हल्की हवाओं के बावजूद पत्तियों में कोई हरकत नहीं है। डालियाँ जो कब से झुकी थीं, अब भी झुकी हैं। मगर उनमें भी जैसे कोई स्पन्दन नहीं रह गया है।

टालवासियों को अचानक नीम, पीपल और बड़ के पेड़ सिमट-सिमट कर छोटे होते महसूस हुए। डालियाँ छोटी होते-होते तने का हिस्सा बनती दिखाई दीं। पेड़ों की ऊँचाई, उनका दायरा एकदम से सिकुड़ता नजर आया। टालवासियों के मुँह से एक साथ लम्बी चीख निकली।

‘माता! हमारी रक्षा करो। हमारी गलतियों को माफ करो। हमने बरसों-बरस इन पेड़ों की जड़ों को मिट्टी नहीं दी। इनके तनों को हमने ढँका नहीं। हमने पाप किया, माता! हमें माफी दो। हम सब तुम्हारी सन्तान हैं, माता! हमारी रक्षा करो।’

जामुन महतो की आवाज रुन्ध गई है।

यकायक, श्रद्धलुओं की भीड़ ने देखा, जामुन महतो पीपल के पेड़ की जड़ों पर पसर गए हैं। अपने दोनों हाथों से उन्होंने जड़ों से बाहर झाँकने वाले रेशों को ढँक लिया है।

देखते-देखते श्रद्धालुओं की पूरी जमात माता की पीड़ी से उठकर पेड़ों के इर्द-गिर्द जमा हो गई है। सबकी आँखें भीग रही हैं। सबके आँसू सूखी जड़ों को सींच रहे हैं!

पुरानी उम्र के टालवासी याद दिलाते हैं, एक बार पहले भी, चालीस साल पीछे, टाल पर ऐसा ही संकट आया था। दो दिशाओं से आने वाले धनाइन और बगदादी नदियाँ माता की नाराजगी के कारण बिल्कुल सूखी रह गई थीं। तीसरी, इनमें सबसे बड़ी नदी, हरोहर भी अपना रास्ता भूल गई थी। तिरमुहान में पानी के तीनों सोते मर गए थे।

पूरे टाल की धरती में दरार पड़ गई थी।

टाल में वैसा अकाल फिर कभी नहीं देखा गया।

टाल के गाँव पानापुर का भी यही हाल हुआ था। उत्तर में हरोहर और पश्चिम में समाय नदी सूनी पड़ गई थी। जमीनदारों की कचहरी भी पूरी तरह सुनसान थी।

उत्तर में हरोहर और पश्चिम दिशा में टाण्टी नदी से घिरे कुसुम्हा के तीनों टोले, जोरपार, डीहपर और घाट कुसुम्हा जल-शून्य हो गए थे। नदी की सम्पूर्ण लम्बाई के दोनों ओर बसे पच्चीसों गाँव के मजदूर-किसान टाल की वीरान धरती देख-देख दहाड़ें मारने लगे थे। पश्चिम में बिरौनी, गगौर और कोयला गाँव, उत्तर में गदवदिया, सरौरा और पाली, पूरब में मुरबरिया, फादिल और ऐजनी गाँव पूरी तरह वीरान थे।

तब टालवासियों को याद है, टाल की तीन-चौथाई आबादी भुखमरी से बचने के लिए पंजाब-गुजरात की मण्डी की ओर पलायन कर गई थी।

उस वक्त भी टालवासियों ने इसे जयमंगली माता की नाराजगी बताया था। और सारे गाँव ने संकल्प लेकर पेड़ों के तने पर मनों मिट्टी डाली थी। फिर खुद प्यासे रहकर, मीलों-मील दूर से लाए गए पानी से पेड़ों को हरा-भरा रखने की कोशिश की थी। तब उनकी कोशिशें माता के आशीर्वाद से फलीभूत हुई थीं। पेड़ों पर पत्तियाँ लौट आई थीं। सूखी नदियों में रातों-रात पानी के सोते फूट पड़े थे।

टालवासियों को अचम्भा था कि पानी का मौसम गुजर जाने पर भी नदियों में ये उछाल किस की कृपा से सम्भव हुआ है। तब बिन-अपवाद तमाम टालवासियों ने जयमंगली माता की पीड़ी पर हफ्तों-हफ्तों पूजा की थी, चढ़ावा दिया था। उन्हें याद है, चढ़ावा देकर लौटते समय अक्सर वो मूसलाधार बारिश में भीग-भीग गए थे।

लेकिन आज, इतने बरसों बाद, टाल की धरती दोबारा सूखी पड़ी है। तमाम दिशाओं से आने वाली नदियों ने अपनी आँखें मूँद ली हैं। टाल के खेत, जहाँ बारह-पन्द्रह फीट पानी उछालें मारता रहता था, आज पानी के स्पर्श को भी तरस रहे हैं। टाल में जंगली घास बेतरह उग आई है। उनमें कीड़े लगना शुरू हो गए हैं। माल-मवेशी भी इस जंगली घास से परहेज करते हैं।

जहाँ तीन-तीन, चार-चार महीने पानी का साम्राज्य होता था और टाल के गाँव टापुओं की तरह दिखते थे, वहाँ अब डीह हों या टीले, उजड़ी बस्तियों का दृश्य उपस्थित करते हैं। गाँव-घर की छोटी-छोटी बच्चियाँ जंगली घास काटकर मुट्ठी भर कमाई को विवश हैं। शादी-ब्याह का मौसम आकर गुजर जाएगा। जाने कितनों के हाथ इस बरस भी पीले होने से रह जाएँगे।

कहते हैं एक बार गंगा मैया अपने दोनों बाजू बसे गाँव वालों के उत्पात् से तंग आकर रूठ गई थीं, तो उनकी गोद से निकलने वाली सारी-की-सारी छोटी-बड़ी नदियों के पानी पर कहर छा गया था। सभी धाराएँ सूख गई थीं। तब इन धाराओं को ‘मरगंगा’ कहा गया था। पुराने लोग याद करते हैं कि इस संकट की घड़ी में जयमंगली माता ने ही गंगा मैया को सन्देश भेजकर गाँव वालों की ओर से माफी माँग ली थी और गंगा तक पहुँचने वाली सभी धाराएँ दोबारा जिन्दा हो उठी थीं।

टालवासी कुछ उन्हीं यादों में खोए थे कि अचानक जामुन महतो ने गमछे से अपने आँसू पोंछते हुए रामू ढाढ़ी को आवाज दी-

‘जयमंगली माता ने हमें माफ कर दिया है, रामू, देख पेड़ की डालियाँ दोबारा अपने तने तक फैल गई हैं और देख पत्तियों में भी हरकत आ गई है। और हाँ, देख आसमान में जिधर-तिधर बादल भी दिख रहे हैं। इस बार टाल छोड़कर कोई बाहर नहीं जाएगा, रामू। माता मान गई हैं। हम सब यहीं रहेंगे। माता की कृपा से बादल बरसेंगे, धरती को जरूरत भर पानी मिल जाएगा। हम अपने बीज उसकी गोद में जरूर डाल देंगे, रामू। देख, कह दे, सारे गाँव को कह दे, कोई बाहरी मण्डियों में नहीं जाएगा। बादल बरसेंगे, रामू। देख, देख माता की पीड़ी पर भी पानी की फुहारें गिर रही हैं।’

टालवासियों ने हैरत-भरी आँखों से जामुन महतो की तरफ देखा। बोलते-बोलते, जामुन महतो अचानक रुक गए हैं। पीपल के तने को देर तक पकड़े उनके हाथ ढीले पड़ गए हैं।

मीलों दूर, मरगंगा की मृत धारा की ऊपरी सतहों पर हरी दूब उग आई है!

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