नैनीताल में रोपवे की योजना

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नैनीताल एक धरोहर

ब्रेबरी तक ताँगे द्वारा यात्रा की सुविधा हो जाने के बावजूद अभी भी नैनीताल में आवागमन बहुत आसान नहीं था। स्थानीय मौसमियत का आवागमन पर सीधा असर पड़ता था। बरसात और जाड़ों के दिनों नैनीताल की आवाजाही बेहद श्रमसाध्य एवं तकलीफदेह होती थी। बरसात में भू-धंसाव की घटनाएँ बढ़ जाती थीं। जिससे आवागमन प्रभावित होता था। अगर मौसम अनुकूल भी हो तो भी नैनीताल आने-जाने में बहुत समय लगता था। आवागमन की सनातन समस्या से निजात पाने के लिए मई, 1887 में मिस्टर हन्ना नाम के सज्जन ने यातायात और सामान लाने, ले-जाने के लिए नैनीताल से कालाढूँगी तक रोप-वे के निर्माण का सुझाव दिया। ब्रिटिश प्रशासन ने सैद्धान्तिक तौर पर इस प्रस्ताव पर अपनी प्राथमिक सहमति प्रदान कर दी। 1888 में मिस्टर हन्ना ने रोप-वे के लिए 9900 रुपए की योजना बनाई। 8 अक्टूबर, 1888 को नगर पालिका कमेटी की बैठक में इस योजना को स्वीकृति मिल गई। 30 नवम्बर, 1888 को नगर पालिका के तत्कालीन उपाध्यक्ष जे.ऑकशॉट ने कुमाऊँ के वरिष्ठ सहायक आयुक्त को रोप-वे के लिए स्लीपी हॉल तथा लॉगडेल की जमीन ‘अनिवार्य अधिग्रहण एक्ट-X-1870’ की धारा-12 के तहत 650 रुपए में अधिगृहित करने का प्रस्ताव भेजा। नगर पालिका ने मिस्टर हन्ना से कहा कि वे इस काम का ठेका 10 हजार रुपए में खुद ही ले लें। कहा कि अगर हन्ना चाहें तो इस योजना की अग्रिम धनराशि भी प्राप्त कर सकते हैं। फिर नगर पालिका कमेटी के अधिकारियों ने सम्पूर्ण रोप-वे मार्ग का स्वयं भी मुआयना किया। अन्तिम तौर पर मंजूरी के लिए रोप-वे की योजना को कुमाऊँ के वरिष्ठ सहायक कमिश्नर के पास भेज दिया गया।
 
यह योजना नगर पालिका की सार्वजनिक निर्माण समिति से पहले ही स्वीकृत हो चुकी थी। सार्वजनिक निर्माण समिति ने योजना के व्यवहारिक पक्ष का अध्ययन कर लिया था। सार्वजनिक निर्माण समिति में लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता भी सदस्य होते थे। मिस्टर हन्ना की सहमति पर नगर पालिका का कहना था कि दार्जलिंग में दस हजार रुपए की लागत में एक हजार फीट लम्बी रोप-लाइन डाली गई है, जबकि यहाँ मिस्टर हन्ना दस हजार रुपए में तीन हजार फीट लम्बी रोप-वे बना रहे हैं, वह भी बिना अग्रिम भुगतान के। नगर पालिका कमेटी ने इस योजना के लिए सरकार से नारायण नगर, चोरखेत और सड़ियाताल में जमीन माँगी। 19 जनवरी, 1889 को पी.डब्ल्यू.डी के अधिशासी अभियंता एफ.बी.हेन्सलोव ने मिस्टर हन्ना की रोप-वे योजना पर अपनी विस्तृत आख्या दी।
 
अभी यह मामला कुमाऊँ के वरिष्ठ सहायक आयुक्त के विचाराधीन था। प्रस्ताव के अनुमोदन के बाद जमीन में काम शुरू हो पाता कि इससे पहले हरमिटेज, स्लीपी हॉल और क्रेग कॉटेज के स्वामी कर्नल डब्ल्यू बैरन ने इस आपत्ति पत्र की प्रति सम्पत्ति एजेंट एफ.ई.जी.मैथ्यूज को भी भेजी थी। कर्नल डब्ल्यू.बैरन का कहना था कि उन्होंने हाल ही में हरमिटेज को दो मंजिला किया है। प्रस्तावित रोप उनके बरामदे से दृष्टिगोचर हो रही है, जिससे उनकी निजता भंग होने की आशंका है। पत्र में उन्होंने लिखा कि नैनीताल के ‘बड़े फायदे’ के लिए उनकी सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाना उचित नहीं है। इस मामले में लम्बी लिखा-पढ़ी हुई। मामला प्रोविंसेस के लेफ्टिनेंट गवर्नर तक जा पहुँचा। अंततः नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने कर्नल डब्ल्यू.बैरन और कुंवर रणजीत सिंह की आपत्तियों का संज्ञान लिया। इस बारे में नार्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज एण्ड अवध के सचिव आर.स्मीटन ने कुमाऊँ के कमिश्नर को 18 मई, 1888 को पत्र भेजा। पत्र में कहा गया कि लेफ्टिनेंट गवर्नर किसी भी नागरिक के निजी अधिकारों के हनन के पक्ष में नहीं है। कर्नल डब्ल्यू.बैरन तथा कुंवर रणजीत सिंह की आपत्तियों के मद्देनजर रोप-वे के लिए वैकल्पिक मार्ग खोजा जाए। जिसमें किसी की निजी भूमि नहीं आ रही हो या किसी को भी कम-से-कम नुकसान हो। इसके बाद रोप-वे की यह योजना हवा में ही अटक कर रह गई।
 
1888 में अयारपाटा पहाड़ी के पूर्वी छोर में गैलोवे हाउस के पास भूस्खलन हुआ। इसके बाद भारत के भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के उप अधीक्षक आर.डी.ओल्डहम से अयारपाटा पहाड़ी की भी जाँच कराई गई। 8 दिसम्बर, 1888 को म्युनिसिपल कमेटी की सीमाओं का पुनःनिर्धारण हुआ। 1888 में यहाँ सेंट जोसेफ सेमिनरी की स्थापना हुई। इसे दार्जलिंग से नैनीताल लाया गया। इससे पहले दार्जलिंग में फादर इगलबर्ग इसका संचालन करते थे। सेंट जोसेफ कॉलेज के भवन का उद्घाटन तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर ऑकलैण्ड कॉलविन ने किया। तब यह स्कूल रोमन कैथलिक चर्च इलाहाबाद के नियंत्रण में था। 1892 में फादर फांसिस ने इस स्कूल को चार आयरिश ब्रदर्स को सौंप दिया था। 1905 में ब्रदर हॉलैण्ड ने सेंट जोसेफ सेमिनरी का नाम बदलकर सेंट जोसेफ कॉलेज कर दिया।
 
7 जुलाई, 1888 को कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर जे.आर.रीड ने नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस के लेफ्टिनेंट गवर्नर एवं चीफ कमिश्नर को पत्र भेजकर तालाब के मुख्य निकास और बलियानाले की विशेषज्ञ कमेटी से जाँच कराए जाने का अनुरोध किया। 7 अगस्त, 1888 को लेफ्टिनेंट गवर्नर ने कमिश्नर के अनुरोध को स्वीकारते हुए बलियानाले की जाँच के लिए जे.एस.ब्रेसफोर्ड की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय विशेषज्ञ जाँच कमेटी बना दी। एफ.बी.हेन्सलोव तथा एल.बी.सिमिअन इस कमेटी के सदस्य बनाए गए। कमेटी ने 14 सितम्बर, 1888 को पहली बैठक की। एक अक्टूबर, 1888 को मौके का मुआयना किया। 15 अक्टूबर को कमेटी ने दूसरी बैठक की। इस जाँच कमेटी ने 30 अक्टूबर, 1888 को अपनी जाँच रिपोर्ट लेफ्टिनेंट गवर्नर को सौंपी। रिपोर्ट में कमेटी ने बलियानाले के सुरक्षा कार्यों के लिए 85,100 रुपए, नाले में सहायक एवं पूरक नालों के निर्माण के लिए 54,396 रुपए तथा कार्ट रोड के विस्तार के वास्ते 30,000 रुपए समेत कुल 1,69,496 रुपए की योजना बनाने की सिफारिश की। सरकार ने नगर पालिका को इस मध्ये 1,06,760 रुपए दिए।
 
एक जनवरी, 1889 को भारत सरकार के वित्त एवं वाणिज्य विभाग ने अधिसूचना संख्या-15 के द्वारा ‘स्थानीय निकाय ऋण अधिनियम-1879’ के अन्तर्गत ‘नैनीताल पेयजल एवं सीवरेज योजना’ के लिए दो लाख 30 हजार रुपए का ऋण स्वीकृत किया। योजना के तहत मल्लीताल बाजार के नालों, तल्लीताल बाजार में कुली, सफाई कर्मी और झम्पानी लाइन का निर्माण होना था। इस योजना के तहत मैसर्स डब्ल्यू.जे.विल्सन एवं नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस एण्ड अवध के सुपरवाइजिंग सेनेटरी इंजीनियर ए.जे.ह्यूज द्वारा तल्लीताल बाजार एवं नगर में 21 पानी के स्टैंड पोस्ट के लिए योजना बनाई गई। जिसके तहत शुद्ध पेयजल योजना में 40 हजार, मल्लीताल बाजार के 75 मकानों के सीवर लाइन के वास्ते 20 हजार और नगर में मुख्य सीवर लाइन के निर्माण के लिए 97 हजार रुपए खर्चने का प्रावधान था। इसके अलावा तल्लीताल बाजार के नीचे सफाई कर्मचारियों, कुलियों तथा झम्पानी लाइन बनाने के लिए 27 हजार रुपए व्यय होने थे। नगरपालिका को यह कर्ज दो किश्तों में मिला। डेढ़ लाख रुपए की पहली किश्त 25 नवम्बर, 1891 को तथा एक जून, 1892 को 80 हजार रुपए की दूसरी किश्त मिली। नगर पालिका को यह रकम मय ब्याज 30 साल में चुकता करनी थी।
 
नगर पालिका कमेटी के अवैतनिक सचिव मिस्टर हॉजेस ने अपनी क रिपोर्ट में कहा कि उन्होंने 19 जून, 1889 को अपर बाजार स्थित पानी के स्रोत (पर्दाधारा) के डिस्चार्ज को नापा था। तब इस स्रोत में 104 गेलन प्रति मिनट यानी 1,49,760 गेलन प्रतिदिन स्वच्छ तथा पीने योग्य पानी उपलब्ध था। 24 जून, 1889 की रात हुई भारी वर्षा के कारण कार्ट रोड में जबरदस्त भू-स्खलन हुआ। कार्ट रोड का ज्यादातर हिस्सा भू-स्खलन की भेंट चढ़ गया। परिणामस्वरूप इस सड़क से आवागमन पूरी तरह ठप्प हो गया। सड़क बन्द होने से सेना को बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। 17 जुलाई, 1889 को भारत के क्वॉर्टर मास्टर जनरल ने शिमला से इस बारे में नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस के लेफ्टिनेंट गवर्नर को पत्र भेजा। लेफ्टिनेंट गवर्नर ने भारत सरकार को पत्र भेज कर कार्ट रोड के भू-स्खलन की जाँच भारत के भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण से कराने की सिफारिश की। इस बारे में भारत सरकार के वित्त विभाग के अनुरोध पर भारत के भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 31 अगस्त, 1889 को डिप्टी सुपरिडेंट आर.डी.ओल्डहम को कार्ट रोड एवं बलियानाले की जाँच हेतु नियुक्त किया।
 
11 सितम्बर, 1889 को तत्कालीन सहायक आयुक्त मिस्टर ऑकशॉट ने नैना पहाड़ी को लेकर अपनी जाँच आख्या दी। 14 सितम्बर, 1889 को आर.डी. ओल्डहम ने कार्ट रोड और बलियानाले का मुआयना किया। आर.डी.ओल्डहम ने 21 सितम्बर, 1889 को अपनी जाँच रिपोर्ट सरकार को सौंपी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि तालाब से चार मील आगे यह पहाड़ बेहद खतरनाक स्थिति में हैं। कार्ट रोड, ब्लीक हाउस से तल्लीताल डिपो तक आती है। इसके मध्य पहाड़ में कई दोष हैं। उन्होंने कहा कि बलियानाले से रिचमण्ड हाउस के आउट हाउस तक नई रोड काटी जाए या सुरंग बनाई जाए या फिर दो लाख रुपए खर्च करक नैनीताल से छहमील दूरी से निहाल नदी के उत्तर दिशा से नई सड़क बनाई जा सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस काम में मिस्टर मिडिलमिस की मदद ली जा सकती है। क्योंकि मिस्टर मिडिलमिस को कई देशों में भू-गर्भिक सर्वे करने का अनुभव है।
 
आर.डी.ओल्डहम के सुझावों पर ब्लीक हाउस के आउट हाउस स कार्ट रोड को काटने, बलियानाले की सुरक्षा और सुरंग बनाने आदि कार्यों के लिए 2,14,965 रुपए की योजना बनाई गई। उधर 28 अगस्त, 1889 को नैना पीक की पहाड़ी से एक दर्जन से अधिक विशालकाय पत्थर लुढ़क कर आबादी तक पहुँच गए थे। इस साल कैलाखान की पहाड़ी में भी भू-स्खलन हुआ। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के उपाधीक्षक आर.डी.ओल्डहम ने नैनीताल की पहाड़ियों और बलियानाले के 1889 के भू-स्खलन के बारे में 21 सितम्बर, 1889 को दी एक रिपोर्ट में शेर-का-डांडा पहाड़ी की स्थिति को चिन्ताजनक बताया। कहा कि तालाब की पूर्व दिशा में स्थित हेरी स होटल के पास एक छोटा सा भू-स्खलन हुआ है। आर.डी.ओल्डहम ने नैनीताल की हिफाजत के लिए सावधानी पूर्वक नालों की निगरानी किए जाने की जरूरत बताई। उधर भू-स्खलन से कार्ट रोड अवरूद्ध हो जाने के बाद नगर पालिका कमेटी ने भी 1889 में बलियानाले की सुरक्षा के लिए एक विस्तृत कार्य योजना तैयार कर कुमाऊँ के कमिश्नर कर्नल जी.ई.एरस्काईन को भेजी। कमिश्नर ने 6 अगस्त, 1889 को इसे नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस के सचिव को भेज दिया।
 
सेंट-लू स्थित राजभवन सहित नैनीताल  सुरक्षा व्यवस्था की जाँच को जे.बी.हेन्सलोव की अगुआई में बनी वैज्ञानिकों की कमेटी ने 17 दिसम्बर, 1889 को अपनी रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में जे.बी.हेन्सलोव कमेटी ने कहा कि 1880 के भू-स्खलन के बाद स्नोव्यू की पहाड़ी पर बने राजभवन परिसर की सुरक्षा को लेकर आशंकाएँ एक गम्भीर विषय है। खतरा अवश्य है पर तत्काल राजभवन को दूसरे स्थान पर ले जाने की फिलहाल आवश्यकता नहीं है। कमेटी ने अयारपाटा पहाड़ी में स्थित ‘गैलोवे हाउस’ को असुरक्षित करार दिया। ग्रेग एलाची से झील तक एक नया नाला बनाने की सिफारिश की।

 

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