नदी और मनुष्य

Submitted by Hindi on Fri, 07/03/2015 - 09:36
Source
कादम्बिनी, मई 2015
ऋग्वेद के तीसरे मंडल के तैंतीसवें सूक्त में नदियों और विश्वामित्र के बीच जो संवाद मिलता है वह नदियों और मनुष्य के आदिम रिश्तों की अनोखी व्याख्या है।

.किसी तरह लहरा कर बह रही हैं ये दोनों नदियाँ/सतलज और विपासा/जैसे रास ढीली करते ही भाग चली हों/जोड़ी दो घोड़ियों की/वे उतर रही हैं पहाड़ के नीचे/दो उजली गौओं की तरह/रंभाती हुई चली आ रही हों जो/आतुर अपने बछड़ों को चाटने के लिए।

इन्द्र ने तुमदोनों को साथ बहा दिया है/तुमदोनों भाग चली हो/जैसे सर्राता चला जाता है रथ पर बैठा वीर/साथ-साथ बहती तुम दोनों नदियाँ, भरती हो लहरों में उछाल/और गुँथ जाती हो फिर परस्पर।

मैं आ पहुँचा हूँ/पास उसके विपाशा के/माँ से बढ़कर जो मेरी माँ है/मैं आ पहुँचा हूँ वहाँ जहाँ वह मिलती है सतलज से/वह चली आ रही है मेरी ओर/जैसे गाय चली आ रही हो बछड़े की ओर।

नदियों ने कहा- देवता ने खोली है हमारी राह/मुक्त किया है उसने हम दोनों बहनों को/और हम बढ़ती जा रही हैं आगे/कोई रोक नहीं है/फिर यह ऋषि क्यों सम्मुख है आ खड़ा हमारे?

विश्वामित्र ने कहा- मैं एक बालक/झुकता हूँ तुम दोनों के सम्मुख/मैं माँग रहा हूँ अभय तुम्हीं से ओ उफनाती नदियों!/क्षण भर को तुम दोनों हो जाओ स्थिर।

नदियाँ- वज्रबाहु इन्द्र ने वृत्र को कर के चकनाचूर/खोल दिए हैं हम दोनों के बंधन/देव सविता ने अपनी किरणों के हाथों में हमें भरकर/बढ़ा दिया है आगे इस पथ पर/इसलिए बेरोक बढ़ी जा रही हैं हम/और हमें जाना है फिर उद्गम तक।

विश्वामित्र- ओ निदयों, मैं क्या प्रशंसा करूँ इन्द्र की ?/उसने करके वज्र के प्रहार/अहि असुर को कर दिया छार-छार/खोल दिए फिर पानी के बंद द्वार/जल की धाराओं से धरती को कर डाला आप्लावित।

नदियाँ- हे ऋषि स्वीकार करो नमन हमारा/युग-युग तक गूँजे यह स्तोत्र तुम्हारा/जो तुमने आज यहाँ उचारा/इसे कभी तुम भूल न जाना/देवों की स्तुति में अपनी वाणी की/ ऐसे ही धार बहाना/कहते रहना कथा हमारी/और न कभी हमें सताना।

विश्वामित्र- सुनो नदियों, सुनो तुम बहनों, सतलज और विपाशा!/मैं आया हूँ पास तुम्हारे/इस रथ पर बैठा बड़ी दूर से/तुम कुछ नीचे झुक जाओ/रोक लो अपना यह उफान/मेरे रथ के पहिए की/धुरी बनी रहे जिससे ऊपर/जल के तल पर।

नदियाँ- ओ स्तुतिगायक, सुने हमने ये वचन तुम्हारे/तुम चले आ रहे हो बड़ी दूर से/तुम्हारे लिए झुकती है हम दोनों नीचे और नीचे/जैसे माँ झुकती है अपने नन्हे शिशु के आगे/झुक जाती है जैसे स्त्री/एक पुरूष के आगे।

विश्वामित्र- ओ नदियों! कितनी मंगलमय है बुद्धि तुम्हारी/जैसे तुमने उघाड़ दिए हैं आज/लहरों के ये द्वार/ऐसे ही झुका लिया करना अपनी धार/जब-जब हम पास तुम्हारे आएं/युगों-युगों तक हम भारतवंश की संतानें/यों ही करती रहें पार/तुम दोनों पावन नदियों को/हम समृद्धि के लिए जाते रहेंगे उस पार/सींचती रहें ये नदियाँ इसी तरह खेत हमारे/करती रहें धरा को ये समृद्धिमय/और मेरे रथ की धुरी बनी रहे लहरों के ऊपर यों ही।

(ऋग्वेद मंडल-3, सूक्त-33, रूपांतरः राधावल्लभ त्रिपाठी)

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