नदी मेलों के सामाजिक सरोकार

Submitted by Hindi on Tue, 01/17/2012 - 16:46

स्नान व कल्पवास लोगों को जुटाने के माध्यम थे। उन्हें चलन में लाने का यही माध्यम था। कालांतर में नये माध्यम बने। नई संकीर्णतायें भी उभरी। आज मकर सक्रान्ति सिर्फ नदियों में पाप धोने और कचरा बहाने का मौका होकर रह गया है। मानो नदी कोई वाशिंग मशीन हो और संगम एक मलशोधन संयंत्र स्थली। साधू समाज ने भी अब इसे अपनी हैसियत के प्रदर्शन की दिखावट मात्र बनाकर छोड़ दिया है। ऐसे में अब हमारे लिए जरूरी हो गया है कि हम धर्मक्षेत्र के तमाम वैज्ञानिक संदर्भों को जाने और अनुकूल पाने पर पालन करने से चूके नहीं। यही गंगा कार्य है।

निर्विवाद सत्य यह है कि परंपरायें और आस्थायें निराधार नहीं होतीं। खास समय-काल-परिस्थिति-स्थान की जरूरत के अनुकूल इनका निर्माण व उपयोग होता है। प्रत्येक के पीछे कोई न कोई तर्क अवश्य होता है। यदि हमें वह मालूम हो, तो हम तय कर सकते हैं कि हमारे काल व परिस्थिति में वह कितना उपयोगी है। जिसे जाने बगैर अपनाना, अब नई पीढ़ी को स्वीकार नहीं। वह जिज्ञासु है। सिर्फ आस्था की बिना पर सब कुछ स्वीकार करना उसका स्वभाव नहीं। भारत के त्यौहार और उन्हें मनाने के तरीके ग्लोब में भारत की स्थिति व पारिस्थितिकी के हिसाब से तय किए गये हैं। साल भर हमारी नदियों के तट पर कई मेले लगते हैं। रामनवमी, गंगा दशहरा, सावन के सोमवार, कांवर मेला, कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के अलावा और भी कुंभ जैसे कई मौके हमारी नदियों के किनारे अदभुत मेले लेकर आते हैं।.... ऐसे व इतने बड़े मेले जितना बड़ा वर्ल्ड वाटर फेस्टिवल भी नहीं होता। दुनिया का सबसे बड़ा पानी मेला भारत में ही लगता है। हमें जानना ही चाहिए कि उत्तर प्रदेश में गंगा-यमुना-सरस्वती की त्रिवेणी के तट पर क्यों लगता है हर बरस माघ मेला? क्या हैं इसके सामाजिक सरोकार?

माघ मकर दिस जब रवि जाहू।
सब कोई प्रयाग नहाहू।।


माघ के महीने में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करे; तब सभी प्रयाग में स्नान करना चाहिए। प्रयाग यानी दो धाराओं का संगम। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश को हम मकर सक्रान्ति के रूप में जानते हैं। भारत में मकर सक्रान्ति पर्व का मौका होता है। रामचरितमानस की उक्त चौपाई विशेष तौर पर गंगा-यमुना- सरस्वती के इलाहाबाद में होने वाले त्रिवेणी संगम का महत्व रेखांकित करती है। इसी दिन प्रति वर्ष इलाहाबाद के संगम पर माघ मेले का आयोजन होता है। लाखों लोग गंगा और समुद्र की संगमस्थली - गंगासागर में स्नान को विशेष मानकर जुटते हैं। जानते हैं क्यों? माघ से पहले आने वाले पौष का महीने में आकाशीय पिण्डों से निकलने वाले विकिरण, उनकी चाल आदि अनूकूल नहीं होते। इस महीने के पखवाड़ों को ‘मरपख’ कहते थे। ’मरपख’ यानी मृत्यु को लाने वाला पखवाड़ा। वैज्ञानिक भाषा में इन्हें दुष्प्रभाव कहते हैं। अतः इस महीने को शुभ कार्यों के लिए वर्जित बताकर गतिविधियों पर लगाम रखी जाती है। माघ का महीना आते ही इसमें परिवर्तन होता है।

अंग्रेजी महीने के हिसाब से यह दिन सामान्य वर्ष में 14 जनवरी को आता है। इस बार अधिक वर्ष यानी लीप इयर में 15 जनवरी को आया है। अंग्रेजियत के हिसाब से ही नहीं... हिंदुस्तानी हिसाब से भी माघ के दिन शुभारंभ का प्रतीक बनकर आते हैं। हम जानते हैं कि परंपरागत खेती के लिहाज से माघ का महीना फुर्सत का महीना होता है। इस दौरान माघ मेले में एक महीने का कल्पवास होता है। अब खासकर बुजुर्ग लोग कल्पवास में आते हैं। उनके परिवारों के पारंपरिक गुरूजन इस दौरान प्रयाग में प्रवास करते हैं। ऐसा ही प्रवास उधर खेत बो लेने के बाद सावन के फुर्सत के दिनों होता है। पहले बारिश की ऋतु चार माह की होती थी। इसीलिए उसे चौमासा कहते थे। कल्पवास के दौरान कल्पवासी जीवन के बाद के जीवन को सुधारने का उपदेश तो पाते ही हैं; गुरूजन अपने शिष्यों की घर -गृहस्थी की उलझी पहेलियों के समाधान में भी सुझाते हैं।

कलपवासियों के लिए इससे अधिक मूल्यवान मौका वर्ष में और कोई दूसरा नहीं होता। इसी दौरान समाज में सुधार के संस्कार डालने का काम होता था। गुरू आदेश देता था और अपने घर लौटकर उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करता था। इसी मेले में शिष्यों को उनके परिवारों में विवाह, भागवत् व दूसरे सांस्कारिक व कर्मकाण्डी आयोजनों की तिथियां बताई जाती थी। गुरू अपने शिष्य परिवारों में भ्रमण के वर्ष भर के कार्यक्रम बनाता था। सभी शिष्य परिवारों को एक साथ संवाद तथा सामूहिक मिलन का यही माध्यम था। माधमेला। इसी दौरान परिवार में नये सदस्यों के जुड़ने या किसी के बिछुड़ने का रिकार्ड भी गुरूडायरी में दर्ज होता है। जिसे राजस्व विभाग की भाषा में सिजरा भी कहते है। किसी भी पीढ़ी का सबसे प्रमाणिक रिकार्ड ये सिजरा ही रहे हैं।

इलाहाबाद के संगम पर माघ मेले का आयोजनइलाहाबाद के संगम पर माघ मेले का आयोजनचिकित्सा के लोकज्ञान पर काम कर रहे लखनऊ के वैज्ञानिक नरेंद्र महरोत्रा ने एक बार मुझे बताया था कि पहले माघ मेले का आयोजन असल में तो ऋषि वैज्ञानिकों की खोजों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए किया गया था। इस मेले में खासकर कारीगर-दस्तकार घरेलु उपयोग के अपने नये अनुसंधानों को प्रस्तुत करते थे। उनकी उत्कृष्टता पर विमर्श होता था। गुरूजन उन्हें उपयोगी मानकर समाज को अपनाने का आदेश देता था। स्नान व कल्पवास लोगों को जुटाने के माध्यम थे। उन्हें चलन में लाने का यही माध्यम था। कालांतर में नये माध्यम बने। नई संकीर्णतायें भी उभरी। आज मकर सक्रान्ति सिर्फ नदियों में पाप धोने और कचरा बहाने का मौका होकर रह गया है। मानो नदी कोई वाशिंग मशीन हो और संगम एक मलशोधन संयंत्र स्थली। साधू समाज ने भी अब इसे अपनी हैसियत के प्रदर्शन की दिखावट मात्र बनाकर छोड़ दिया है। ऐसे में अब हमारे लिए जरूरी हो गया है कि हम धर्मक्षेत्र के तमाम वैज्ञानिक संदर्भों को जाने और अनुकूल पाने पर पालन करने से चूके नहीं। यही गंगा कार्य है।

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