निजीकरण की नीति को बढ़ावा देने वाली ताकतें

Submitted by admin on Tue, 01/21/2014 - 15:41
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मंथन अध्ययन केंद्र
विश्व बैंक की जल संसाधन क्षेत्र रणनीति के मूल में साफ तौर पर जल संसाधन के निजीकरण की रणनीति है। इस रणनीति का मार्च 2002 का मसौदा कहता है “जल और स्वच्छता (के क्षेत्र) में विश्व बैंक समूह का प्रमुख जोर इस बात पर है कि लागत घटाकर और नए सेवा प्रदायकों के प्रवेश को आसान बनाकर गरीबों के लिए सुरक्षित, सस्ती जल-आपूर्ति व स्वच्छता सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित की जाए। एडीबी का अध्ययन जो बात दूसरे देशों के बारे में कहता है, वे भारत पर भी लागू होती है। बेहतर व टिकाऊ सेवा के लिए यह मांग उपभोक्ताओं और सरकार की तरफ से नहीं उठ रही है। बल्कि इसे हवा दे रही हैं ऋणदाता संस्थाएं और ठेकेदार।

भारत सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2002 को पारित नई जल नीति कहती है:

“जहां भी संभव हो, विभिन्न इस्तेमालों के लिए जल संसाधन परियोजनाओं के नियोजन, विकास और प्रबंधन में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ानी चाहिए। निजी क्षेत्र की भागीदारी से से हमें नए-नए विचार लागू करने, वित्तीय संसाधन पैदा करने और कॉरपोरेट प्रबंधन लागू करने तथा सेवा की कार्यकुशलता व उपभोक्ताओं के प्रति जवाबदेही बढ़ाने में मदद मिलेगी। परिस्थिति के अनुसार, जल संसाधन सेवाओं के निर्माण, स्वामित्व, संचालन व हस्तांतरण में निजी क्षेत्र की भागीदारी के विभिन्न मिले-जुले रूपों पर विचार किया जा सकता है।”

इस नीति के विकास की कहानी दिलचस्प है। पिछले साल विश्व बैंक ने अपनी जल संसाधन क्षेत्र रणनीति (WRSS) की समीक्षा शुरू की थी। इसके तहत एक मसौदा बनाया गया था, जो भारत समेत बहुत सी सरकारों को दिया गया। अपेक्षा के अनुरूप, इस मसौदे में जल क्षेत्र के निजीकरण पर काफी जोर दिया गया था। इस मसौदे पर टिप्पणी करते हुए बैंक के भारतीय कार्यकारी निदेशक ने कहा था।

“अनुभव के आधार पर जितनी हो सकती है, इस मसौदे में उससे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निजी क्षेत्र के लिए सोची गई है। आज तो अति विकसित बाजार अर्थ व्यवस्थाओं में भी जल और स्वच्छता के क्षेत्र में सार्वजनिक संस्थानों की प्रमुखता है।...अनुभव बताते हैं कि जल प्रदाय योजनाओं के पूर्ण निजीकरण और रियायतों का अंत अक्सर असफलता में होता है...।”

यह जनवरी 2002 की बात है। अप्रैल आते-आते यह चेतावनी ताक पर रख दी गई और उपरोक्त नीति को मंजूर कर लिया गया। इतना ही नहीं, विभिन्न जल प्रदाय योजनाओं के निजीकरण के लिए बड़े पैमाने पर कोशिश की जा रही है।

वास्तव में विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं व द्विपक्षीय ऋणदाता और ब्रिटेन की डिपार्टमेंट फॉर इंटरनेशन डेवलपमेंट (DFID) जैसी एजेंसियां न सिर्फ पानी बल्कि भारत की समूची अर्थव्यवस्था की निजीकरण के लिए बेशर्मी से दबाव बना रही है।

एशियाई विकास बैंक (एडीबी)


जनवरी 2001 में एडीबी ने अपनी जल नीति पारित की। नीति पानी को “सामाजिक रूप से जरूरी आर्थिक वस्तु” करार देती है। नीति इन लक्ष्यों को सामने रखती है।

1. एडीबी के सदस्य विकासशील देशों में जल क्षेत्र के सुधारों को प्रोत्साहित करना।
2. जल संसाधनों के एकीकृत प्रबंधन को बढ़ावा देना।
3. जल सेवाओं को सुधारना और इनके वितरण के क्षेत्र को बढ़ाना।

नीति के अनुसार, जल सेवाओं के विस्तार का काम स्वायत्त व जवाहदेह सेवा एजेंसियों, निजीक्षेत्र की हिस्सेदारी और निजी-सार्वजनिक साझेसारी के जरिए किया जाएगा।

एडीबी की जल नीति की अन्य महत्वपूर्ण बातें:


1. पानी का पुनर्वितरण ‘पानी के हस्तांतरणीय अधिकारों के बाजार’ के जरिए ‘ऊंचे मूल्य वाले उपयोगों’ की ओर किया जाएगा।

2. (सिचाई और शहरी जल सप्लाई के लिए) जल सेवाओं को सुधारने के मुद्दे पर नीति कहती है कि “सरकारों की भूमिका सेवा प्रदाता से बदलकर नियमनकर्ता की हो जानी चाहिए” और “उम्मीद यह है कि निजी क्षेत्र की पहलकदमियों और बाजारोन्मुख व्यवहार से कार्य निष्पादन और कार्यकुशलता में सुधार होगा।”

इस नीति को लागू करवाने के लिए शर्तों का इस्तेमाल किया जा रहा है। एडीबी का कहना है कि “एडीबी की नीति…(के तहत) नए निवेशों की एक शर्त यह होती है कि जल क्षेत्र में सुधार लागू किए जाएं। एडीबी की सहायता प्राप्त करने के लिए जरूरी होगा कि सरकारें राष्ट्रीय जल नीतियाँ, कानून, संस्थागत सुधार, क्षेत्र समन्वय प्रक्रिया और पानी संबंधी कार्रवाई का एक राष्ट्रीय एजेंडा अपनाएं।”

कहना न होगा कि सुधार का मतलब निजीकरण और व्यापारीकरण है। एडीबी द्वारा दिए गए कई ऋणों से भी यही जाहिर होता है।

डीएफआईडी व अन्य द्विपक्षीय एजेंसियाँ


ब्रिटिश सरकार का अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग उड़ीसा, मध्य प्रदेश व अन्य राज्यों में पानी के निजीकरण के लिए आक्रामक दबाव बना रहा है। ग़ौरतलब है कि ब्रिटेन में कई बड़ी-बड़ी जल कंपनियां हैं, जो विकासशील देशों के बाजारों पर नजरें गड़ाए बैठी हैं।

विश्व बैंक


विश्व बैंक की जल संसाधन क्षेत्र रणनीति (WRSS) के मूल में साफ तौर पर जल संसाधन के निजीकरण की रणनीति है। इस रणनीति का मार्च 2002 का मसौदा कहता है “जल और स्वच्छता (के क्षेत्र) में विश्व बैंक समूह का प्रमुख जोर इस बात पर है कि लागत घटाकर और नए सेवा प्रदायकों के प्रवेश को आसान बनाकर गरीबों के लिए सुरक्षित, सस्ती जल-आपूर्ति व स्वच्छता सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित की जाए।

“इसका एक अहम हिस्सा यह है कि वित्तीय रूप से मजबूत, कार्यकुशल और उपभोक्ता केद्रित जल व स्वच्छता सेवाओं के विकास को बढ़ावा दिया जाए। इसमें शामिल हैं, ...व्यापारोन्मुखी और ग्राहक केंद्रित सेवाओं का निर्माण ताकि सेवाएं निभने योग्य बन सके, सरकार की सामर्थ्य बढ़ाना ताकि वह निजी कंपनियों के साथ सेवा प्रदाय के अनुबंध कर सके; जोखिमों के अनुरूप पारिश्रमिक का संतुलन; जल प्रदायकों की साख बढ़ाना ताकि वे (सुविधाओं के) पुनर्वास, विस्तार और उन्नत बनाने के क्षेत्रों में अरसे से रुके हुए निवेशों हेतु वित्त जुटा सके; औसत दामों को धीरे-धीरे लागत के स्तर पर ले जाना...।”

कुल मिलाकर, निजीकरण का पूरा पैकेज ही है यह। इसी दस्तावेज़ के अनुसार :

“पिछले सालों में एक महत्वपूर्ण बात यह रही है कि जल व स्वच्छता सेवाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए विश्व बैंक व आई.एफ.सी. का समर्थन बढ़ता गया है। इस वक्त विश्व बैंक द्वारा मदद पाने वाली करीब 40 फीसदी शहरी जल व स्वच्छता परियोजनाओं में किसी न किसी रूप में निजी क्षेत्र की भागीदारी है।”

भारत में विश्व बैंक ने जल क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों पर पांच पुस्तकों की एक श्रृंखला निकाली है। ऊपरी तौर पर इन्हें विश्व बैंक, भारत सरकार व कुछ द्विपक्षीय ऋणदाताओं द्वारा जल क्षेत्र की साझा समीक्षा का नतीजा बताया जाता है। शहरी जल आपूर्ति व स्वच्छता और ग्रामीण जल आपूर्ति व स्वच्छता की रिपोर्टें दरअसल इन क्षेत्रों में आमूल बदलाव लाकर इन्हें निजी व व्यापारिक हाथों में दे देने की योजना का खाका हैं।

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