नीर-क्षीर

Submitted by Hindi on Fri, 04/01/2011 - 12:32
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विकास संवाद द्वारा प्रकाशित 'पानी' किताब

पानी पुण्य है, पानी जीवन का पर्याय है। इसे कमाओ, इसे सहेजो, इसे संभालो, इसे माथे से लगाओ, अन्यथा...पानी का निरादर जीवन को दूभर बना देगा, उसकी अवहेलना जीवन को नर्क बना देगी उसका अपव्यय जीवन की सरसता छीन लेगा उसकी अवहेलना जीवन को पतझर सा उजाड़ बना देगी।

छोटा था, नासमझ, दुनियादारी से बेखबर, चोंचलों से दूर, सहज सरल प्रतिक्रियाओं में लिप्त, चारों तरफ हरे-भरे पत्ते आंखों से सवाल करते थे, गहरे नीले आकाश में खिलखिलाते बादल कल्पनाओं को तरबतर कर जाते थे, बावड़ी में उठती लहरों की गोलाकार आकृतियाँ कौतूहल जगाती थीं, छोटी सी बाल्टी भर पानी की हलचल दिलो दिमाग में ठंडक घोल देती थी। हर वह चीज जो पानी से सीधी जुड़ी थी, अपनी ओर खींचती थी। पानी के प्रति इस सहज, सरल, सीधे चुम्बकीय आकर्षण ने जीवन को सरस बना दिया था। लगता था कि जीवन में अठखेलियाँ करने के लिए पानी के अलावा कुछ नहीं है।

इस बाल सुलभ आकर्षण में पानी की उस ताकत का एहसास कतई नहीं था, जो मनुष्य के जीवन-मरण को निर्धारित करती है। उस समय तो घर के पूजाघर में गंगाजली में रखा अंजूरि भर गंगा जल गुरूर का एहसास कराता था कि हमारे घर गंगा जल भी है। उन दिनों घरों में गंगा जल की मौजूदगी लोगों के बीच सम्मानित करती थी। तांबे के कलश में रखा जल पुण्य के काम में आता था, रोजाना घर में पूजा के बाद कांसे की थाली में भगवान के स्नान ध्यान के बाद बचा पानी चरणामृत हो जाता था, जिसकी एक बूंद का अपव्यय भी पाप समझा जाता था और उसका आचमन पुण्य का सबब होता था। घर में दिन भर उपयोग के बाद बचे पानी के सदुपयोग की हिदायतों को अनदेखा करने का साहस जुटाने की गुस्ताखी करना किसी भी कीमत पर संभव नहीं था।

भूल से भी रत्ती भर पानी भी नालियों में बहाने का मतलब डांट खाना होता था। उसके लिए हिदायतें थीं कि वह पेड़ पौधों पर चढ़ाया जाए। इन सब बातों से जाने अनजाने ही संस्कारों में यह बीज उग आता था कि पानी अमृत है, पानी पुण्य है, पानी जीवन का पर्याय है। इसे कमाओ, इसे सहेजो, इसे संभालो, इसे माथे से लगाओ, अन्यथा...पानी का निरादर जीवन को दूभर बना देगा, उसकी अवहेलना जीवन को नर्क बना देगी उसका अपव्यय जीवन की सरसता छीन लेगा उसकी अवहेलना जीवन को पतझर सा उजाड़ बना देगी। आज जब हम पानी के विज्ञान को बचपन के उस मनोविज्ञान से जोड़कर देखते हैं, तो समझ में आता है कि पानी बचपन को अपनी ओर इतनी मिठास के साथ क्यों खींचता था? उसमें उतनी कशिश क्यों है? शायद इसलिए कि पानी जीवन की सबसे सरल, सीधी आवश्यकता है, जिसका बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। जीवन की संरचना के लिए पंच तत्वों को आवश्यक माना गया है, उनमें मिट्टी, हवा, आग और आकाश के साथ-साथ पानी का उल्लेख भी है। जाहिर है पानी का महत्व हमारे यहां, हमारे शास्त्रों में, हमारी संस्कृति में आदि काल से ही रहा है। शायद इसीलिए हमारे सामाजिक संस्कारों में, दैनन्दिन कार्यों में इसके महत्व को अलग से ही रेखांकित किया गया है। यह उन गिनी चुनी वस्तुओं में शुमार है, जिसके बिना हमारी पूजा अर्चना संभव नहीं है।

पानी को हमारे दिलो दिमाग का हिस्सा बनाने के लिए शायद इससे बेहतर कोई दूसरा उपक्रम नहीं हो सकता था। हम उसकी रक्षा सिर्फ इसलिये नहीं करें कि उसके बिना मनुष्य की जिंदगी दूभर हो जाएगी, बल्कि इसलिए भी करें कि वह प्रकृति के हर आयाम के लिए जरूरी है। लेकिन पानी से जुड़ाव की इस सांस्कृतिक और सांस्कारिक पृष्ठ भूमि का दुखद पहलू यह है कि पानी को पूजने की जो सीख हमें विरासत में मिली है, उसे हम सबने न सिर्फ भूला दिया है, बल्कि उससे उलट व्यवहार करने लगे हैं। पानी के प्रति मनुष्य के क्रूर व्यवहार के दुष्परिणाम सामने हैं। कुँओं बावड़ियों ने जवाब देना शुरू कर दिया है। सिंचाई का रकबा कम होने लगा है। नदियां सूखने के कगार पर हैं।

आज सबसे बड़ी चिंता यह है कि आने वाले वर्षों, में दुनिया पानी की कमी से कैसे निपटेगी? पानी के संकट ने समाज को चिंता में डाल दिया है। पानी की बढ़ती मांग से आम जीवन में तनाव पैदा है। माना जा रहा है कि अगला विश्व युद्ध पानी के बँटवारे को लेकर होगा। ये आंशकाएं भविष्य के गर्भ में छिपी हैं, लेकिन गांव-मोहल्लों में पानी के लिये खून खराबा अब आम घटनाओं में शुमार होने लगा है। इस संदर्भ में आने वाला समय ज्यादा कठिन और कठोर सिद्ध होगा। क्योंकि बूंद-बूंद पानी के लिए लोगों के बीच संघर्ष को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनने से रोकना धीरे-धीरे मुश्किल होता जाएगा। ये परिस्थितियां नहीं बनें, इसके लिए अभी से प्रयास करने होगें। हमें लोगों के मानस को उन परम्पराओं की ओर मोड़ना होगा जिन्हें हम पीछे छोड़ आएं हैं। जीवन में पानी की क्या जगह है? उसके क्या मायने हैं? उसका क्या मर्म है? यह समझाने का वक्त आ गया है कि पानी सृष्टि और जीवन की संरचना का अभिन्न तत्व है और हर हाल में इसकी रक्षा करना हम सबका दायित्व है। हमारे पुरखों की यह कहावत कि ‘बिन पानी सब सून’ सिर्फ शब्दों का समुच्चय नहीं है। इसके पीछे गहरा अनुभव, दीर्घकालीन परम्परा, विश्लेषणात्मक सोच और तथ्यात्मक दृष्टिकोण है। एक कटु सत्य हमें आगाह करता है कि हम आँखें मूंद कर पानी की बर्बादी की अनुमती किसी को नहीं दे सकते क्योंकि पानी के बिना आने वाला कल हमारा नहीं होगा। अभी तक विज्ञान ऐसा आविष्कार नहीं कर पाया है, जो मनुष्य को पानी के बिना जीने का तरीका सिखा सके या सहारा दे सके। विडंबना यह है कि विज्ञान के गुरूर में ही मनुष्य ने प्रकृति के उन सभी अंगों से लगातार खिलवाड़ किया है, जिनसे उसे जीने का सहारा मिलता रहा है।

विज्ञान के प्रति उसके आकर्षण और दोस्ती ने उसे प्रकृति से बेगाना कर दिया, यह बेगानापन दुश्मनी की हदें भी पार कर गया। विज्ञान और प्रकृति के संतुलन के अभाव के नतीजे आज हमारे सामने हैं। हवाओं में दम घोटने का सामान जमा होने लगा है और पीने के पानी की किल्लत सबके सामने है। यदि हम आज नहीं संभले तो कल हमारा नहीं होगा। इसके प्रति जन चेतना की जागृति के लिए सतत अभियान चलाने की आवश्यकता है। मूलतः कवि और फिर पत्रकार पंकज शुक्ला मेरे साथ पिछले दस वर्षों से काम कर रहे हैं। राजधानी भोपाल में पत्रकारिता की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों के बीच उनकी रचनाधर्मिता आज भी बरकरार है। उनकी संवेदनशीलता की परतें आज भी मुकम्मिल और दाग रहित हैं। उनके सरोकार समय और अवसरवादिता की आँच में पिघले नहीं हैं, शायद इसीलिए उनके लिए यह संभव हो पाया है कि वो उन चिंताओं की ओर सबका ध्यान आकर्षित करें, जो आज की महती जरुरत है। एक संवेदनशील रचनाकर्मी ही उस चिंता को अपनी चिंता बनाता है, जो सबकी चिंता होनी चाहिए।

अपनी इस नई किताब में पानी के साथ मनुष्य के अमानवीय व्यवहार ने खुद मनुष्यता के लिए जो संकट पैदा किए हैं, पंकज ने उनकी ओर समाज का ध्यान खींचने की कोशिश की है। उन्होंने पानी के संकट को रेखांकित करने वाली विषय वस्तु को जिस गंभीरता के साथ शब्दों में उकेरा है, वह बरबस ही लोगों के मानस को उद्वेलित करता है। यह उनकी लेखनी की सफलता है कि वो एक चिंता को आम लोगों का सरोकार बनाने में सफल हुए हैं। मुझे विश्वास है कि जिस उद्देश्य को लेकर यह पुस्तक लिखी गई है, उन उद्देश्यों को हासिल करने में उनकी लेखनी कामयाब होगी।

कामना यही है कि उनकी लेखनी का यह प्रवाह सतत् जारी रहे और भोथरी होती समाज की संवेदनाओं को कुरेदने का उनका यह उपक्रम यूँ ही चलता रहेगा।

शुभकामनाओं सहित।

उमेश त्रिवेदी
समूह संपादक
नई दुनिया समाचार पत्र समूह


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