ऑनलाइन लर्निंग से मिलेगी नई दिशा

Submitted by Hindi on Wed, 10/11/2017 - 09:46
Source
नवोदय टाइम्स, 11 अक्टूबर, 2017

विशेषज्ञों ने इन आँकड़ों पर भी फोकस किया है कि देश में हर साल प्रत्येक छात्र पर औसतन 15-20 हजार रुपये खर्च किये जाते हैं। इसके बाद भी देश का सकल नामांकन अनुपात 24 प्रतिशत से कम है, वहीं 53 प्रतिशत स्नातक और 89 प्रतिशत इंजीनियरिंग छात्र बेरोजगार रहने को मजबूर हैं।

ई-लर्निंग को बढ़ावा देने के लिये भारत में विभिन्न संस्थानों द्वारा ऑनलाइन लर्निंग कोर्सेज की शुरुआत की जा चुकी है लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो इस दिशा में सरकार को अभी भी कई महत्त्वपूर्ण सुधार करने की आवश्यकता है। शिक्षा विशेषज्ञों ने ये भी संकेत दिए हैं कि ऑनलाइन शॉर्ट टर्म कोर्सेज और नैनो डिग्री को बढ़ावा देने के साथ ही 2020 तक इस दिशा में कई प्रभावी परिवर्तन देखने को मिलेंगे।

इंटरनेट के बढ़ते प्रचलन से एजुकेशन इंडस्ट्री ने एक बड़े बदलाव की दिशा में आगे बढ़ना शुरू कर दिया है। आज ऑनलाइन लर्निंग एक ऐसे लर्निंग मॉडल का रूप ले चुकी है, जिससे शिक्षकों और छात्रों के लिये एक-दूसरे से जुड़ना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। हालाँकि, कई संस्थानों में कम्प्यूटर और इस पर काम करने वाले शिक्षकों की कमी देखने को मिल रही है। बावजूद इसके विशेषज्ञों का मानना है कि ऑनलाइन लर्निंग, स्मॉल प्राइवेट ऑनलाइन कोर्सेज और मॉक जैसी तकनीक आने वाले समय में शिक्षा के क्षेत्र में नई क्रान्ति लेकर आएगी।

नए परिवर्तन लेकर आएगा 2020 : ‘द ग्रेट अनबंडलिंग ऑफ हायर एजुकेशन’ किताब के लेखक रेयान क्रेग इस बारे में कहते हैं कि जल्द ही छात्र समझ जाएँगे कि अच्छी नौकरी और बेहतर भविष्य के लिये डिग्री की नहीं बल्कि ज्ञान की जरूरत होती है। इसी के चलते आने वाले समय में छात्रों में ऑनलाइन कोर्सेज का महत्त्व बढ़ेगा। यह परिवर्तन कब होगा, अभी यह बता पाना मुश्किल है लेकिन इस बात के संकेत मिलने लगे हैं कि वर्ष 2020 तक इस दिशा में परिवर्तन होने की शुरुआत हो जाएगी।

नैनो डिग्री कोर्सेज को देना होगा महत्त्व : शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार सरकार को डिजीटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये एंटरप्राइज रिसोर्स प्रोग्राम्स शुरू करने की योजना बनानी होगी जिससे डिजिटल डाटा को छात्रों और शिक्षकों के अनुकूल बनाने के संसाधन विकसित किए जा सकें। साथ ही गरीब वर्ग के छात्रों को मोबाइल लर्निंग से जुड़ने के संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। इसके लिये विश्वविद्यालयों और ऑनलाइन स्टार्टअप के साथ आना होगा, साथ ही शॉर्ट डिप्लोमा और नैनो डिग्री कार्यक्रमों को भी बढ़ावा देना होगा। ऐसा करने से ही डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं को सही दिशा प्रदान की जा सकेगी।

बढ़ने लगी है ई-कंटेंट की जरूरत : ऑनलाइन लर्निंग की ओर छात्रों के बढ़ते कदमों के चलते संस्थानों को ई-मैटीरियल, ऑनलाइन कोर्स के कंटेंट, वीडियो और ऑडियो लेक्चर को बढ़ावा देने के लिये डिजिटल कोर्सेज तैयार करने होंगे। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए उडा सिटी आदि ने मर्सिडीज और गूगल जैसी कम्पनियों ने साथ मिलकर छात्रों के लिये ऑनलाइन कोर्सेज तैयार करने शुरू कर दिए हैं। कम्पनियों द्वारा आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस, आई.ओ.एस. या एंड्रॉयड डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में छात्रों को नैनो डिग्री देना शुरू किया जा चुका है।

नहीं हो रहा है शिक्षा बजट का प्रभावी इस्तेमाल : विशेषज्ञों ने इन आँकड़ों पर भी फोकस किया है कि देश में हर साल प्रत्येक छात्र पर औसतन 15-20 हजार रुपये खर्च किये जाते हैं। इसके बाद भी देश का सकल नामांकन अनुपात 24 प्रतिशत से कम है, वहीं 53 प्रतिशत स्नातक और 89 प्रतिशत इंजीनियरिंग छात्र बेरोजगार रहने को मजबूर हैं। यह संख्या उस स्थिति में है, जब देश की 35 करोड़ से ज्यादा आबादी 18-35 वर्ष के युवाओं की है। इन आँकड़ों से साफ है कि आजादी के बाद से अब तक देश में कुल 85 प्रतिशत शिक्षा बजट का इस्तेमाल सही दिशा में नहीं हो पाया है।

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