पानी बचाने के लिए आदिवासी करते हैं पाट की खेती

Submitted by Hindi on Sun, 08/16/2015 - 11:40

जिन्हें हम आमतौर पर अशिक्षित और पिछड़ा हुआ समझते हैं, वे कुछ बातों में हमसे भी आगे हैं। एक तरफ हम पढ़े–लिखे समझे जाने वाले समाज के लोग खेतों में सिंचाई के लिए बड़ी तादाद में पानी का अंधाधुंध उपयोग करते हैं। हम करीब 60 फीसदी भू-जल का उपयोग सिंचाई के लिए ही कर रहे है वहीं पौधों तक पानी पहुँचाने के लिए बिजली और डीजल की बड़ी मात्रा में खपत करते हैं लेकिन दूसरी तरफ पीढ़ियों से शिक्षा और विज्ञान से दूर रहने के बावजूद आदिवासी समाज अपने खेतों में सिंचाई के लिए एक ऐसी युक्ति इस्तेमाल करते हैं कि इनके काम को सलाम करने की इच्छा होती है। लगता है कि इनसे हमें अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। यहाँ आदिवासियों के पूर्वजों ने बिना किसी पढ़ाई के अपनी परम्परा और अर्जित अनुभव से वैकल्पिक विज्ञान आधारित प्रणाली विकसित की थी, जो आज भी देखने को मिलती है और इसका अब के वैज्ञानिक दौर में भी कोई सानी नहीं।

मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाके धार, बडवानी, खरगोन, झाबुआ और अलीराजपुर जिलों में आदिवासी किसान आज भी पीढ़ियों की परम्परा से इस्तेमाल हो रही पाट की खेती से पानी का सदउपयोग तो करते ही हैं, देश की बिजली और डीजल भी बचा रहे हैं। निमाड़ का इलाका सतपुड़ा पर्वत शृंखला की ऊँची–नीची पहाड़ियों की ऊसर जमीन का पठारी क्षेत्र है। इन्दौर से करीब डेढ़ सौ किमी दूर बडवानी से 22 किमी चलने के बाद आता है पाटी कस्बा। पाटी एक छोटे पठार पर बसा है। इससे आगे छोटे बड़े पहाड़ों का सिलसिला और उन पर बसे छोटे–छोटे आदिवासी गाँव फलिए। इन आदिवासी फलियों (गाँवों) तक पहुँचने के लिए पैदल ही लम्बा पहाड़ी रास्ता पार करना पड़ता है।

यहाँ तक पहुँचने में ही हम शहर के लोगों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है। हाँफते–हाँफते जान निकलने लगती है। इस पूरे रास्ते पेड़ों का कहीं नामोंनिशान नहीं है। पाटी के इस इलाके में आस-पास कोई बड़ी नदी भी नहीं है। नर्मदा भी यहाँ से बहुत पहले ही छूट जाती है। दूर–दूर तक पानी का कोई सोता नहीं नजर आता। हाँ कुछ पहाड़ी नाले भर जरूर हैं और ये भी बारिश के बाद ज्यादा दिन साथ नहीं देते। ज्यादातर सालों में यह इलाका सूखा घोषित किया जाता है। कुछ कुएँ और नलकूप भी है पर ठंड के दिनों के बाद बहुत कम में पानी बचा रहता है, ज्यादातर सूख ही जाते हैं। बडवानी से यहाँ तक के पूरे रास्ते पहाड़ वीरान और उसर पड़े हैं। बीच–बीच में कहीं छोटे–छोटे खेत दिख जाते हैं।

स्वाभाविक रूप से लगा कि यहाँ तो बारिश के बाद खेती का कोई काम ही नहीं। पानी ही नहीं तो खेती कैसी। सुना भी यही था कि इस इलाके के लोग हर साल बड़ी तादाद में मजदूरी करने मालवा के कई शहरों और कस्बों का रूख कर लेते हैं। हमने साथ चल रहे वहीं के एक आदिवासी युवक गोरख्या से पूछ ही लिया कि यहाँ तो सिंचाई की खेती होती ही नहीं होगी। पर उसने आशा के विपरीत कहा कि नहीं, यहाँ भी सिंचाई होती है हालाँकि बहुत कम पर होती जरूर है। एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ उसकी बात पर। सहज ही जिज्ञासा हुई कि आखिर इन हालातों में ये लोग अपने खेतों को पानी कैसे देते होंगे, जबकि आस-पास न अब तक कोई कुँआ नजर आया था और न ही कोई अन्य साधन।

इस सवाल पर गोरख्या कुछ बोला नहीं। बस मुस्कराभर दिया, फिर बोला खुद ही देख लेना। इसके बाद लम्बे–लम्बे डग भरता हुआ हमसे आगे चलता रहा। पर हमारे मन में जिज्ञसाएँ बढती ही जा रही थी। कैसे और कहाँ से आता होगा यहाँ तक पानी। लम्बा और थका देने वाला इस सफ़र का पहला पड़ाव था पीपरकुंड। यह फल्या बहुत ऊँचाई के पहाड़ों के पार एक दूसरे पहाड़ पर बसा है, यहाँ बाइक से जाने लायक रास्ता भी नहीं है। आखिरकार पाँच घंटे तक कई बडले चढने–उतरने के बाद हम उस गाँव में थे, जहाँ के कुछ टापरे देखते ही हमें सुकून हुआ कि चलो अब आगे नहीं चलना पड़ेगा।

यह एक वन ग्राम है यानी न तो यहाँ बिजली है और न ही कोई सड़क। यहाँ के आठ फलियों को मिलाकर करीब ढाई सौ लोगों की बस्ती है। कुछ दूरी पर घना जंगल है और उसके आस-पास कुछ खेती की जमीनें। यहाँ किसी के पास 3 तो किसी के पास 6 एकड़ तक खेती की जमीन है। ज्यादातर के पास तो अपने खेत भी नहीं हैं।

यहाँ हमारी मुलाकात हुई पहाड़ सिंह से। पहाड़ सिंह हमें अपने खेत पर ले गया तो वहाँ हम यह देखकर दंग रह गए कि कुछ छोटी–छोटी घुमावदार नालियों से रेंगते हुए इस सूखे पहाड़ पर भी पानी छलछलाता यहाँ पहुँच रहा था। पहाड़ सिंह ने हमें बताया कि यह उनका पारम्परिक तरीका है, जिसमें बिना किसी बिजली या डीजल और बिना किसी खास उपकरण के पानी सिर्फ घुमावदार नालियों के जरिये ही सैकड़ों फीट नीचे से पहाड़ों पर चढ़ाया जाता है। पहले थोड़ा ऊपर फिर नीचे फिर थोड़ा ऊपर फिर नीचे इस तरह बहते हुए पानी को गुरुत्वाकर्षण बल से ऊपर की ओर ले जाया जाता है। कई बार तो इसकी दूरी आधा किमी से लेकर डेढ़ किमी तक की होती है। इसी तकनीक को स्थानीय बोली में पाट की खेती कहते हैं। पहाड़ सिंह ने बताया कि इलाके में कई किसान इस तकनीक से अपने खेतों तक पानी पहुँचाते हैं।

यह तकनीक कभी उनके पुरखों ने इस्तेमाल की थी, तब शायद आज की तरह सिंचाई के साधन और बिजली या डीजल आसानी से उपलब्ध नहीं रहे होंगे पर आदिवासी आज भी इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह विज्ञान के उसी सिद्धान्त पर काम करता है जिसमें पहाड़ी नालों में बहते पानी को डाउन स्ट्रीम से अप स्ट्रीम में ले जाया जाता है। हालाँकि यह इतना आसान भी नहीं है पर इन आदिवासियों की जिन्दगी मेहनत से कब घबराती है। बकौल पहाड़ सिंह पहले तो बहुत लम्बी–लम्बी नालियाँ खोदनी पड़ती है फिर इसकी लगातार देखभाल करनी पड़ती है और साल दर साल इसकी गाद भी हटानी पड़ती है। इन सबके बावजूद कई बार नालियों से पानी इधर–उधर बहने लगता है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह तभी तक पानी दे सकता है जब तक कि नाले में पानी हो। यदि नाले का ही पानी किसी कारण से सूख गया तो सारी मेहनत बेकार। इसी तरह कातर फलिए का वेलसिंह भी अपने खेत में करीब एक किमी दूर से नाली लाकर खेती कर रहा है। उसने बताया कि वह और उसका परिवार बीते कई सालों से इसी तरह खेती कर रहे हैं। करीब 20 साल पहले उसके पिता गट्टू साण्डिया ने यह नालियाँ खोदकर पाट तैयार किया था लेकिन बीच में बिजली आ गई तो हमने पाट की खेती बंद करके बिजली से सिंचाई शुरू कर दी। पर बिजली कटौती और भारी भरकम बिल आने से बिजली छोड़ कर एक बार फिर से इसी पद्धति से पानी चढ़ाना शुरू कर दिया है।

गाँव के लोगों ने बताया कि सरकार चाहे तो इसे सहेजकर अन्य क्षेत्रों में भी शुरू कर सकती है। यह सब तरह से निरापद, प्राकृतिक और बिजली, डीजल बचाने वाली परम्परागत पद्धति है। हमारे इको सिस्टम को यथावत रखते हुए ऐसे वैकल्पिक संसाधनों और तकनीकों को सहेजकर इन्हें और परिवर्धित करने की जरूरत है ताकि संसाधन और उर्जा को बचाया जा सके।
 

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