पानी का संकट और सरकार की बेपरवाही

Submitted by Hindi on Tue, 05/24/2011 - 08:43

वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल संकट दूर करने के शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए तो बहुत देर हो जाएगी और मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

जल की समस्या अकेले हमारे देश की ही नहीं समूची दुनिया की है। हमारे देश में अनियंत्रित-अनियोजित विकास, वनों के अंधाधुंध कटान, बढ़ती आबादी, बढ़ता प्रदूषण और कंक्रीट के जंगलों का बेतहाशा बढ़ता क्षेत्रफल जल संकट को और बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। यही वजह है कि गाँवों की बात तो दीगर है, नगरीय क्षेत्रों तक में स्थानीय निकाय अपने निवासियों को पीने का पानी तक मुहैया कराने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यह हालत गाँव, कस्बे, शहर, महानगर, राज्यों की राजधानी सहित देश की राजधानी दिल्ली तक सभी की है अभी तो गर्मियों का मौसम आया भी नहीं है कि महानगरों, नगरों और कस्बों में पीने के पानी के लिए मारामारी शुरू हो गई है।

असलियत यह है कि आज देश का वर्तमान परिदृश्य सूखे से प्रभावित इलाकों के किसी न किसी भाग में लगातार पड़ते सूखे, बाढ़ के पानी के सर्वमान्य न्यायोचित बँटवारे का अभाव, जल स्तर के लगातार गिरने, नदियों और भूजल के बढ़ते प्रदूषण जैसी मुख्य चुनौतियों के कारण निरंतर बढ़ रहे जल संकट का सामना कर रहा है। इससे देश की राजधानी सहित समूचा देश प्रभावित है। दरअसल सबसे बुरी हालत तो जीवनदायिनी कही जाने वाली देश की नदियों की है जो आज 70 फीसद प्रदूषित हैं। केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड भी यह स्वीकार कर चुका है। वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल संकट दूर करने के शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए तो बहुत देर हो जाएगी और मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

यदि समय रहते हम कुछ सार्थक कर पाने में नाकाम रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हम खुद मिट जाएँगे। यह जानते-समझते हुए भी देश का नेतृत्व मौन है। उसे इसकी कतई चिंता नहीं है कि देश में प्रदूषित पानी पीने से हर साल हजारों लोग जानलेवा बीमारियों के शिकार होकर अनचाहे मौत के मुँह में चले जाते हैं। खेद है कि भारत के संविधान के मूल दस्तावेज में भूजल या उससे जुड़े मुद्दों का कोई उल्लेख नहीं है और न ही आजादी के बाद से आज तक भूजल से जुड़ी चुनौतियों और समस्याओं की विकरालता के बावजूद किसी ने भी भूजल को संविधान में जुड़वाने का प्रयास ही किया।

जब तक पानी की एक-एक बूँद का हिसाब नहीं रखा जाएगा और समाज को उसके महत्व के बारे में जानकारी नहीं दी जाएगी व पानी के अपव्यय के मामले में दंड हेतु कानून नहीं बनाया जाएगा, तब तक जल संकट से छुटकारा असंभव है। इसीलिए ऐसे समय में इस संगोष्ठी की महत्ता स्वतः परिलक्षित होती है। सच तो यह है कि जल संकट का सही मायने में समाधान तभी संभव है जब सरकारों का सोच इसके निदान का हो और वह ईमानदारी से इस पर ध्यान दे और कार्य करे। साथ ही हम सब जल के मूल्य को समझें और हम अपनी जीवन शैली पर अंकुश लगाएँ। तब तक जल संकट के निदान की आशा बेमानी ही रहेगी।

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