पानी के अप्रत्यक्ष निर्यात पर लगे लगाम

Submitted by RuralWater on Mon, 06/27/2016 - 16:47

पानी के अप्रत्यक्ष निर्यात के साथ बोतलबन्द शीतल पेय बनाने वाली कम्पनियाँ जल का प्रत्यक्ष निर्यात भी कर रही हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के अलावा अरब देशों में बोतलबन्द पानी बड़ी मात्रा में निर्यात हो रहा है। 2013 में देश में इस पानी का कारोबार 60 अरब रुपए था, जो अब बढ़कर 150 अरब रुपए का हो गया है। इसमें 22 फीसदी की दर से सालाना इजाफा हो रहा है। शत-प्रतिशत निजी क्षेत्र के सुपुर्द यह धंधा कम लागत और ज्यादा मुनाफे के लिहाज से बेहद आकर्षक है। लेकिन इसका खामियाजा देश कई रूपों में उठा रहा है। देश में चहूँओर भयावह जलसंकट है। महाराष्ट्र को मराठवाड़ एवं विदर्भ तथा उत्तर प्रदेश का बुन्देलखण्ड पानी के जबरदस्त संकट से जूझ रहे हैं। लातूर में पानी रेल से भेजा जा रहा है। शायद देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब क्रिकेट के लिये खेल मैदानों पर खर्च होने वाले पानी और शराब उद्योग की जलापूर्ति बन्द करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पढ़ा है।

हालांकि इस परिप्रेक्ष्य में सकारात्मक नतीजे जरूर नहीं आये, लेकिन कम-से-कम जल की बर्बादी राष्ट्रीय फलक पर रेखांकित तो हुई। इन मुद्दों के बीच पानी के अप्रत्यक्ष, अदृश्य या आभासी निर्यात का मुद्दा लगभग अछूता सा है। जबकि खेती और कृषिजन्य औद्योगिक उत्पादों से जुड़ा यह ऐसा मुद्दा है, जिसकी अनदेखी के चलते पानी का बड़ी मात्रा में निर्यात हो रहा है।

इस पानी को ‘वर्चुअल वाटर’ भी कह सकते हैं। दरअसल भारत से बड़ी मात्रा में चावल, चीनी, वस्त्र, जूते-चप्पल और फल व सब्जियाँ निर्यात होते हैं। इन्हें तैयार करने में बड़ी मात्रा में पानी खर्च होता है। अब तो जिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने हमारे यहाँ बोतलबन्द पानी के संयंत्र लगाए थे, वे भी इस पानी को बड़ी मात्रा में अरब देशों को निर्यात कर रही हैं। इस तरह से निर्यात किये जा रहे पानी पर कालान्तर में लगाम नहीं लगाई जाती है तो पानी का संकट और बढ़ेगा ही?

आमतौर से यह भुला दिया जाता है कि ताजा व शुद्ध पानी तेल और लोहे जैसे खनिजों की तुलना में कहीं अधिक मूल्यवान है, क्योंकि पानी पारिस्थितिकी सन्तुलन बनाए रखने के लिये वैश्विक अर्थव्यवस्था में 20 हजार डॉलर प्रति हेक्टेयर की दर से सर्वाधिक योगदान करता है। इस दृष्टि से भारत से कृषि और कृषि उत्पादों के जरिए पानी का जो अप्रत्यक्ष निर्यात हो रहा है, वह हमारे भूतलीय और भूगर्भीय दोनों ही प्रकार के जल भण्डारों को दोहन करने का बड़ा सबब बन रहा है।

दरअसल एक टन अनाज उत्पादन में 1000 टन पानी की जरूरत होती है। चावल, गेहूँ और गन्ने की खेती में सबसे ज्यादा पानी खर्च होता है। इन्हीं का हम सबसे ज्यादा निर्यात करते हैं। 2015 में 27 लाख टन चावल, 39 लाख टन चीनी और 25.97 लाख टन गेहूँ निर्यात किया गया। कपास की 67 लाख गंठानें निर्यात हुईं। एक गठान में 150 किलोग्राम रुई होती है। सबसे ज्यादा पानी धान पैदा करने में 5389 लीटर पानी खर्च होता है। जबकि इतना ही धान की पैदाबार में लगता है।

पंजाब में 1 किलो धान पैदा करने में 5389 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि इतनी ही धान पैदा करने में पश्चिम बंगाल में करीब 2713 लीटर पानी खर्च होता है। पानी की इस खपत में इतना बड़ा अन्तर इसलिये है, क्योंकि पूर्वी भारत की अपेक्षा उत्तरी भारत में तापमान अधिक रहता है। इस कारण बड़ी मात्रा में पानी का वाष्पीकरण हो जाता है। खेत की मिट्टी और स्थानीय जलवायु भी पानी की कम-ज्यादा खपत से जुड़े हैं। इसी तरह चीनी के लिये गन्ना उत्पादन में बड़ी मात्रा में पानी लगता है। गेहूँ की अच्छी फसल के लिये भी तीन से चार मर्तबा सिंचाई करनी होती है।

इतनी तादाद में पानी खर्च होने के बावजूद चावल, गेहूँ और गन्ने की बड़ी मात्रा में खेती इसलिये की जाती है, जिससे फसल का निर्यात करके मोटा मुनाफा कमाया जा सके। पंजाब व हरियाणा में चावल और गेहूँ तथा महाराष्ट्र में गन्ने का बड़ी मात्रा में उत्पादन निर्यात के लिहाज से ही किया जाता है। हमारे यहाँ यदि पानी का दुरुपयोग न हो तो उपलब्धता कम नहीं है।

भूतलीय जलाशय, नदियों और भूगर्भीय भण्डारों में अभी भी पानी है। इन्हीं स्रोतों से पेयजल, सिंचाई और पनबिजली परियोजनाएँ व उद्योगों के लिये जल की आपूर्ति हो रही है। सबसे ज्यादा 70 प्रतिशत जल सिंचाई में खर्च होता है। उद्योगों में 22 फीसदी और पीने से लेकर अन्य घरेलू कार्यों में 8 फीसदी जल खर्च होता है। लेकिन नदियों व तालाबों की जल संग्रहण क्षमता लगातार घटने और सिंचाई व उद्योगों के लिये दोहन से सतह के ऊपर और नीचे जल की मात्रा लगातार छीज रही है। ऐसे में फसलों के रूप में जल का हो रहा अदृश्य निर्यात समस्या को और विकराल बनाने का काम कर रहा है।

पानी का अप्रत्यक्ष निर्यात न हो इसके लिये फसल प्रणाली में व्यापक बदलाव और सिंचाई में आधुनिक पद्धतियों को अपनाने की जरूरत है। ऐसा अनुमान है कि धरती पर 1.4 अरब घन किमी पानी है। लेकिन इसमें से महज 2 फीसदी पानी मनुष्य के पीने व सिंचाई के लायक है। इसमें 70 फीसदी खेती-किसानी में खर्च होता है। इससे जो फसलें व फल-सब्जियाँ उपजते हैं, निर्यात के जरिए 25 प्रतिशत पानी अन्तरराष्ट्रीय बाजार में खपत हो जाता है।

इस तरह से 1050 अरब वर्ग मीटर पानी का अप्रत्यक्ष कारोबार होता है। एक अनुमान के मुताबिक इस वैश्विक धंधे में लगभग 10,000 करोड़ घनमीटर वार्षिक जल भारत से फसलों के रूप में निर्यात होता है। जल के इस अप्रत्यक्ष व्यापार में भारत दुनिया में अव्वल है। खाद्य पद्वार्थों, औद्योगिक उत्पादों और चमड़ों के रूप में यह निर्यात सबसे ज्यादा होता है। चमड़ा उत्पादन में लगीं कानपुर की टेनरियाँ गंगाजल को सबसे ज्यादा प्रदूषित कर रही हैं।

कई देश पानी के इस अप्रत्यक्ष निर्यात से बचने के लिये उन कृषि और गैर कृषि उत्पादों का आयात करने लगे हैं, जिनमें पानी अधिकतम खर्च होता है। उन्नत सिंचाई की तकनीक के लिये दुनिया में पहचान बनाने वाले इजराइल ने सन्तरे के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, क्योंकि इस फल के जरिए पानी का अप्रत्क्ष निर्यात हो रहा था। इटली ने चमड़े के परिशोधन पर पाबन्दी लगा दी है। इसके बदले वह जूते-चप्पल बनाने के लिये भारत से बड़ी मात्रा में परिशोधित चमड़ा आयात करता है। इस उपाय से इटली ने दो तरह से देश के हित साधने का काम किये हैं। एक तो परिशोधन में खर्च होने वाला पानी बचा लिया, दूसरे जलस्रोत प्रदूषित होने से बचा लिये।

फसल प्रणाली में बदलाव की दृष्टि से देश का पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है, जहाँ नीतिगत बदलाव शुरू हुए हैं। वहाँ धान का रकबा घटाया जा रहा है। राज्य सरकार ने करीब 12 लाख हेक्टेयर कृषि में धान की बजाय मोटे अनाज व दालें बोने के लिये 7.5 हजार करोड़ रुपए की योजना शुरू की है। सरकार ने धान की खेती वर्षा पूर्व करने पर भी पाबन्दी लगा दी है। इससे राज्य को एक साथ दो फायदे होंगे। एक तो भूजल का दोहन घटेगा, दूसरा मई में धान की रोपाई पर रोक से बिजली की बचत होगी।

फिलहाल पंजाब में 28 लाख हेक्टेयर भूमि में धान होती है, इसे अगले पाँच साल में 16 लाख हेक्टेयर तक समटने का लक्ष्य है। शेष बची 12 लाख हेक्टेयर भूमि में दालें, तिलहन, मक्का, ज्वार व अन्य शुष्क फसलें पैदा की जाने की क्रमशः शुरूआत हो रही है। साफ है पंजाब में चावल का उत्पादन घटेगा तो निर्यात भी घटेगा और निर्यात घटेगा तो अप्रत्यक्ष पानी के निर्यात पर भी लगाम लगेगी।

फसल प्रणाली में बदलाव के साथ, पानी के उपयोग में दक्षता भी बढ़ाने की जरूरत है। सिंचाई के जो मौजूदा संसाधन और तकनीकें हैं, उनसे सिंचाई के लिये जल का प्रयोग करने में करीब 25 से 40 फीसदी पानी ही वास्तविक रूप में काम आता है, बाकी बर्बाद हो जाता है। सिंचाई जल की क्षमता व उत्पादकता सिंचाई प्रणाली और परिस्थितयों से तो तय होता ही है, तापमान, आर्द्रता, मिट्टी के प्रकार और छाया पर भी बहुत कुछ निर्भर रहती है। जंगलों के घटने व खेत की मेड़ों व मार्गों पर खड़े पेड़ काट दिये जाने से ज्यादातार कृषि क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पानी भाप बनकर उड़ जाता है।

हमारे यहाँ पारम्परिक तरीकों में नहरों और नलकूपों से पाइप लाइन बिछाकर खेतों की सिंचाई की जाती है। लेकिन अब बदलते परिदृश्य में फव्वारों, ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीकों को अपनाने की जरूरत है। इनसे 30 से 50 फीसदी तक पानी की बचत होती है। साइप्रस, इजराइल और जॉर्डन जैसे छोटे देशों ने लगभग समूची खेती के लिये ये प्रणालियाँ अपना ली हैं।

भारत में भी इन पद्धतियों से खेती करने की शुरुआत तो हो गई है, लेकिन अभी महज तीन फीसदी सिंचाई हो पा रही है। यदि इनका विस्तार एक करोड़ हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में हो जाये तो भारत बड़ी मात्रा में सिंचाई के लिये इस्तेमाल होने वाले जल की बचत कर सकता है।

पानी के अप्रत्यक्ष निर्यात के साथ बोतलबन्द शीतल पेय बनाने वाली कम्पनियाँ जल का प्रत्यक्ष निर्यात भी कर रही हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के अलावा अरब देशों में बोतलबन्द पानी बड़ी मात्रा में निर्यात हो रहा है। 2013 में देश में इस पानी का कारोबार 60 अरब रुपए था, जो अब बढ़कर 150 अरब रुपए का हो गया है। इसमें 22 फीसदी की दर से सालाना इजाफा हो रहा है।

शत-प्रतिशत निजी क्षेत्र के सुपुर्द यह धंधा कम लागत और ज्यादा मुनाफे के लिहाज से बेहद आकर्षक है। लेकिन इसका खामियाजा देश कई रूपों में उठा रहा है। बोतलबन्द पानी के जहाँ-जहाँ संयंत्र लगे हैं, वहाँ-वहाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखकर जल का दोहन तो कर ही रही हैं, स्थानीय लोगों और मवेशियों को भी जल के उपयोग से वंचित कर रही हैं।

आर्थिक उदारवाद के तहत वैश्विक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के मकसद से भारत की नीतियाँ लचीली और भ्रामक बनाई गई हैं। नतीजतन प्राकृतिक जल को ये कम्पनियाँ पूरी निर्ममता से निचोड़ने में लगी हैं। दरअसल, सम्भवतः भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ पानी राष्ट्रीय प्राथमिकता में है ही नहीं, इसलिये पानी का निर्यात चाहे अप्रत्यक्ष हो रहा हो, या प्रत्यक्ष, देश के कर्णधारों के लिये यह चिन्ता का विषय है ही नहीं? इसके उलट ऐसे उपायों की जरूर भनक मिल रही है, जिससे पानी के दोहन में निवेश बढ़े और गरीब पानी से वंचित होता चला जाये।

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