पानी की हर बूंद मांगेगी हिसाब

Submitted by Hindi on Sat, 03/19/2011 - 09:33
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दैनिक भास्कर, 19 मार्च 2011

घरों में भी पानी बचाने वाले उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे शॉवर, डिश वॉशर और क्लॉथ वॉशर इत्यादि। कुछ देशों में पानी की रक्षा के लिए कठोर मानकों पर आधारित घरेलू उपकरण ही बेचने व प्रयोग करने का प्रावधान किया गया है।

शहरों में घरों से निकलने वाली गंदगी हो या फिर कारखानों का कचरा, उसे पानी में बहाकर नष्ट करना हमारी पुरानी आदत और व्यवस्था रही है। हम शहरों में नदियों का पानी लाते हैं और उसे कूड़े-करकट से प्रदूषित कर दोबारा नदियों में छोड़ देते हैं। कारखानों से निकलने वाला विषैला कूड़ा न सिर्फ नदियों व कुओं को प्रदूषित बना रहा है, बल्कि भूगर्भ जल को भी पीने लायक नहीं रहने दे रहा है।

वर्तमान में शहरों में मानव मल को साफ करने के लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, उसमें अत्यधिक मात्रा में पानी का प्रयोग किया जाता है। खासतौर पर सीवर प्रणाली में, जिसमें बिना किसी ट्रीटमेंट के उसे सीधे नदियों में बहाया जा रहा है। इस तरह के ‘फ्लश एंड फॉरगिव’ सिस्टम से जिन पोषक तत्वों को मिट्टी में मिलना चाहिए, वे आस-पास के नजदीकी जलस्रोतों में जाकर नष्ट हो जाते हैं। इस तरह सिर्फ कृषि क्षेत्र के लिए पोषक तत्वों का ही नुकसान नहीं हो रहा, नदियों का अस्तित्व भी समाप्त हो रहा है। यह अतिप्रचलित तकनीक महंगी तो है ही, साथ ही पानी की बेइंतहा बर्बादी का जरिया भी है। यह तमाम तरह की बीमारियों का कारण भी बनती है। विश्वभर में खराब जलनिकासी व गंदगी के कारण हर साल करीब 20 लाख बच्चों की मौत होती है, जबकि 60 लाख बच्चों की मौत भूख व कुपोषण से होती है।

भारत में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की प्रमुख सुनीता नारायण ने इस बात पर जोर दिया है कि पानी पर निर्भर फ्लश सिस्टम, खासतौर पर जलनिकासी प्रणाली न तो आर्थिक और न ही पर्यावरणीय दृष्टिकोण से उचित है। उन्होंने बताया है कि भारत में पांच सदस्यों वाला एक परिवार, जो अपने घर में वॉटर फ्लश वाला टॉयलेट इस्तेमाल करता है, मल बहाने के लिए साल भर में करीब 1.5 लाख लीटर पानी बर्बाद कर देता है। उन्होंने जोर देकर विस्तार से बताया है कि वर्तमान में जो फ्लश सिस्टम घरों में लगा है, उससे मल तो साफ हो जाता है और यह रोग-मुक्त प्रणाली भी है, लेकिन इसमें बहुत बड़ी मात्रा में पानी की बर्बादी होती है और बड़े पैमाने पर प्रदूषण होता है सो अलग। भारत सरकार भी दूसरे बहुत से विकासशील देशों की तरह उन इलाकों में भी जहां फिलहाल यह व्यवस्था नहीं है, इसे ही स्थापित करने में जुटी है, जो आर्थिक दृष्टि से उचित नहीं है।

सौभाग्य से हमारे पास कम खर्च वाला एक अच्छा माध्यम भी उपलब्ध है। वह है कंपोस्ट टॉयलेट। इसमें पानी की बर्बादी नहीं होती, साथ ही इसको एक खाद निर्माण प्रणाली से भी जोड़ दिया जाता है। कुछ क्षेत्रों में तो मूत्र संग्रह प्रणाली भी अलग से लगाई जाती है और संगृहीत मूत्र को खेतों में डाल दिया जाता है, जो मिट्टी की उर्वरा क्षमता को बढ़ाता है। मानव मल भी सूखकर गंधहीन मिट्टी के स्वरूप का खाद बन जाता है, जिसे वापस खेतों में मिला दिया जाता है। यानी आवश्यक पोषक तत्व पुन: मिट्टी में मिल जाते हैं। इस प्रक्रिया के बाद मिट्टी को और किसी खाद की आवश्यकता नहीं होती। इस कंपोस्ट टॉयलेट प्रणाली में घरों में इस्तेमाल हो रही मौजूदा फ्लश प्रणाली की तुलना में पानी का इस्तेमाल भी नगण्य होता है। इस तरह से पानी का खर्च तो बचा ही सकते हैं, साथ ही भूगर्भ जल को उलीचकर पानी के भंडार को खत्म करने के अपराध से भी बच सकते हैं। यही नहीं, पानी के शुद्धीकरण में खर्च होने वाली ऊर्जा को भी बचा सकते हैं। इस विधि से अपशिष्टों को पानी में मिलने व धरती के पोषक तत्वों को नष्ट होने से भी रोका जा सकता है। हाल ही में अमेरिका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी ने कंपोस्ट टॉयलेट बनाने वाली विभिन्न कंपनियों को इनके निर्माण व प्रयोग की मंजूरी दी है। अमेरिका के निजी आवासों और चीन के गांवों में भी इनका सुगमता से प्रयोग हो रहा है।

रोज जार्ज की किताब द बिग नेसेसिटी : दि एनेमेबल वर्ल्ड ऑफ ह्यूमन वेस्ट एंड व्हाय इट मैटर्स में इस बात का जिक्र है कि फ्लश सिस्टम वास्तव में बहुत सारी ऊर्जा का उपभोग करने वाली तकनीक है। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि इसमें मल को बहाने के लिए बड़ी मात्रा में साफ पानी का प्रयोग होता है। दूसरा यह कि सीवेज सिस्टम चलाने के लिए बड़ी मात्रा में मानवीय ऊर्जा का भी नुकसान होता है। बहुत साल पहले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने कहा था कि सभ्य लोगों को मल निष्कासन के लिए पानी के प्रयोग के अलावा किसी दूसरे माध्यम का विकास करना चाहिए।

यदि दैनिक जीवन में प्रयोग किए जाने वाले पानी से टॉयलेट की फ्लश लाइन अलग हो जाएगी तो घरेलू प्रयोग के पानी को रिसाइकिल करना ज्यादा आसान हो जाएगा। शहरों में जल उत्पादन क्षमता बढ़ाने का सबसे सरल तरीका यही है कि हम प्रतिदिन इस्तेमाल किए जाने वाले पानी को रिसाइकिल यूनिट में शुद्ध करें और फिर उसका प्रयोग दैनिक जीवन में करें। इस तरह हम काफी मात्रा में पानी को सुरक्षित कर सकेंगे और उसकी बर्बादी रोक सकेंगे। दुनिया के कुछ शहरों में जहां पानी की सप्लाई कम होने लगी है और दाम भी बढ़ गया है, वहां लोगों ने उपयोग किए जा चुके पानी को रिसाइकिल करना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, सिंगापुर जो कि मलयेशिया से ऊंचे दामों पर पानी खरीदता है, अपने यहां इस्तेमाल किए जा चुके पानी को रिसाइकिल करता है। कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स और साउथ फ्लोरिडा में भी रिसाइकिल प्लांट को मंजूरी दे दी गई है।

इसके अलावा घरों में भी पानी बचाने वाले उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे शॉवर, डिश वॉशर और क्लॉथ वॉशर इत्यादि। कुछ देशों में पानी की रक्षा के लिए कठोर मानकों पर आधारित घरेलू उपकरण ही बेचने व प्रयोग करने का प्रावधान किया गया है। पानी के दाम जैसे-जैसे बढ़ते जाएंगे, वैसे-वैसे कंपोस्ट टॉयलेट और ऊर्जा संरक्षित उपकरणों की मांग बढ़ेगी। समय के साथ इस बात की जागरूकता भी बढ़ेगी कि वर्तमान में घरों व कारखानों की गंदगी साफ करने के लिए प्रयोग की जा रही जलनिकासी प्रणाली व्यावहारिक नहीं है। पानी घटता जा रहा है और जनसंख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में यदि पानी के कम खर्च पर आधारित उपकरणों का इस्तेमाल चलन में नहीं आएगा, तो धरती पर मौजूद जलनिधि का संकट असाध्य हो जाएगा।

लेखक विश्व पर्यावरण के शीर्षस्थ चिंतक और अर्थ पॉलिसी इंस्टीट्यूट के प्रमुख हैं।
E-mail:- lesterbrown@earthpolicy.com

 

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