पानी की समस्या

Submitted by HindiWater on Wed, 02/04/2015 - 14:07
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योजना, अप्रैल 2010
पिछले दो वर्षों में उत्तर भारत में वर्षा और आर्द्रता में पहले से ही बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कार्ययोजना के मुताबिक देश में उष्णता बढ़ने के फलस्वरूप हिमालय के हिमनदों के पिघलने से गंगा, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र का जलस्तर बढ़ेगा किन्तु बाद में नदियाँ सूख जाएँगी। यदि वर्ष 2050 तक हिमालय के हिमनद पिघल गए तो उत्तर भारत में भारी जल संकट पैदा हो जाएगा। सूखा और बाढ़ की सम्भावनाएँ बढ़ जाएँगी। जलवायु परिवर्तन ऐसा विषय है जिसकी चर्चा इन दिनों सारी दुनिया में है। केवल चर्चा में ही नहीं है वरन् पर्यावरण विशेषज्ञों, प्रशासकों और आम लोगों को चिन्तित भी कर रहा है। जलवायु में परिवर्तन होना यों तो विशेष चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए क्योंकि भौगोलिक व भू-भौतिक परिस्थितियों में कुछ-न-कुछ परिवर्तन होता ही रहता है।

किन्तु जो जलवायु परिवर्तन इस समय चर्चित है वह जलवायु में सामान्य प्राकृतिक बदलाव नहीं बल्कि मनुष्य की शीवनशैली और विकास के तौर-तरीकों से उत्पन्न ऐसी स्थिति है जो मानवता के अस्तित्व के लिए ही खतरनाक सिद्ध होती जा रही है। जलवायु परिवर्तन से पृथ्वी के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है जिससे समूचे विश्व में उष्णता बढ़ रही है।

लगभग सभी हिमनद यानी ग्लेशियर पिघल रहे हैं। बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ने से हिमनद छोटे होते जा रहे हैं जिसके फलस्वरूप नदियों का स्वरूप बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन का मौजूदा दौर इसलिए अधिक गम्भीर और चिन्तनीय है क्योंकि इसके लिए प्रकृति नहीं हमारा अपना आचरण जिम्मेदार है। यह स्थिति उद्योगों और मोटरवाहनों से उत्सर्जित ऊष्मा, वन कटने तथा जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल के कारण बनी है। सभी देशों,विशेषकर विकसित देशों में जीवन को अधिक-से-अधिक आरामदेह बनाने की होड़ में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों का भण्डार हमारे वायुमण्डल में इतना अधिक हो गया है कि पृथ्वी की ऊष्मा निकलकर अन्तरिक्ष मेंउतनी नहीं जा पा रही जितनी पहले जाती थी।

इन गैसों को ग्रीनहाउस गैस कहा जाता है। ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव से पृथ्वी के वायुमण्डल में उष्मा पहले भी बढ़ती रही है लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के बाद से इस वृद्धि की रफ्तार बहुत तेज हो गई है। ताजा सर्वेक्षणों से पता चला है कि पिछले 50 वर्षों में समुद्रों में ऐसे क्षेत्रों का विस्तार हुआ है जहाँ आॅक्सीजन की मात्रा बहुत कम है। ग्लेशियरों के लगातार पिघलने से समुद्रों में बसे कई टापू तथा किनारे की बस्तियाँ समुद्र में डूबती जा रही हैं।

आॅक्सीजन की कमी के कारण समुद्र के भीतर रेगिस्तान बन रहे हैं यानी इन जल क्षेत्रों में जीव और वनस्पति का उत्पादन बन्द होता जा रहा है। इस कारण मछलियों की संख्या घट जाने की सम्भावना है। ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव से समुद्र और नदियों की दशा और दिशा बदलने के साथ-साथ बारिश की मात्रा और समय में भी बदलाव आने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इसके फलस्वरूप बाढ़, सूखा, तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप और प्रभाव व्यापक हो सकता है।

एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण से पता चला है कि ग्लोबल वार्मिंग से वर्ष 2050 तक पृथ्वी के जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों की एक चौथाई प्रजातियाँ लुप्त हो सकती हैं। जलवायु परिवर्तन की समस्या की गम्भीरता का अनुमानइसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जुलाई 2008 के दूसरे सप्ताह में विकासशील देशों के समूह जी-8 ने इसी विषय पर विचार-विमर्श के लिए जापान में विशेष बैठक की।

इस बैठक में प्रधानमन्त्री डाॅ. मनमोहन सिंह भी शामिल हुए, क्योंकि जलवायु परिवर्तन पर हो रहे अन्तरराष्ट्रीय विचार-विमर्श में भारत विशेष भूमिका निभा रहा है। भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन के स्वरूप और प्रभाव के बारे में 1 जुलाई, 2008 को राष्ट्रीय कार्ययोजना जारी की जिसमें कई भयावह तथ्य सामने आए हैं।

इस योजना में बताया गया है कि यदि जलवायु परिवर्तन की मौजूदा गति और प्रवृत्ति को नहीं रोका गया तो समूची मनुष्य जाति, विशेषकर निर्धन व विकासशील देशों का भविष्य अन्धकारमय है। इसमें खाद्यान्न उत्पादन में और कमी आने, अनेक पुराने व नए रोग फैलने जैसे खतरों के अलावा सबसे अधिक शोर पानी की समस्या पर दिया गया है।

कार्ययोजना के दस्तावेज के अनुसार भारत जलवायु में हो रहे परिवर्तन के अनुरूप विकास योजनाओं में बदलाव लाने पर सकल घरेलू उत्पाद की 2.6 प्रतिशत राशि खर्च करता है। इसमें यह भी अनुमान लगाया गया है कि इससदी के अन्त तक देश के तापमान में 3-5 डिग्री सेल्शियस तक की बढ़ोतरी होगी। इसका अधिक असर उत्तर भारत के क्षेत्रों में दिखाई देगा।

कार्ययोजना में पहले से ही विकट जल समस्या के और जटिल और गम्भीर होने की आशंका प्रकट की गई है। कार्ययोजना के मुताबिक वर्ष 2040 से गर्मियों में बारिश की मात्रा काफी बढ़ जाएगी। इस सदी के आखिर तक इसमें 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। पिछले दो वर्षों में उत्तर भारत में वर्षा और आर्द्रता में पहले से ही बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

कार्ययोजना के मुताबिक देश में उष्णता बढ़ने के फलस्वरूप हिमालय के हिमनदों के पिघलने से गंगा, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र का जलस्तर बढ़ेगा किन्तु बाद में नदियाँ सूख जाएँगी। यदि वर्ष 2050 तक हिमालय के हिमनद पिघल गए तो उत्तर भारत में भारी जल संकट पैदा हो जाएगा।

सूखा और बाढ़ की सम्भावनाएँ बढ़ जाएँगी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्री मिलापचन्द शर्मा के अनुसार वर्ष 1990 से 2007 के बीच गोमुख ग्लेशियर 22.80 हेक्टेयर पीछे खिसका है। इसी तरहगंगोत्री ग्लेशियर 1.5 किलोमीटर तक पिघल कर छोटा हो गया है। हमारे देश के उत्तरी, पूर्वी और पूर्वोत्तर हिस्सों का 40 प्रतिशत भाग पहले से ही बाढ़ की चपेट में आता रहता है जिससे लगभग हर साल 3 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं।

राजस्थान, गुजरात, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के बहुत से इलाके सूखे का शिकार होते रहते हैं। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का बुन्देलखण्ड क्षेत्र पिछले पाँच वर्षों तक भीषण सूखे की मार झेल रहा था।

इस वर्ष वहाँ वर्षा हुई है। गंगा नदी, जिसका हमारे देश के विकास और संस्कृति में विशिष्ट स्थान रहा है, अपनीगति, जलस्तर और विशिष्टता से तेजी से वंचित होती जा रही है। गंगा केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं भौतिक और आर्थिक दृष्टि से भी भारत, विशेषकर उत्तर भारत के लिए वरदान रही है। किन्तु इसके पानी के अधिक इस्तेमाल, नदी में शहरों का कचरा पड़ने और बिजली परियोजनाओं व बाँधों के निर्माण से इसका मूल स्वरूप नष्ट हो रहा है।

इन सब कारणों से गंगा जल की शुद्धता और पवित्रता दूषित हो रही है। हाल में पर्यावरणविद डाॅ. गुरुदासअग्रवाल ने गंगा को विनाश से बचाने के लिए उत्तराखण्ड में आमरण अनशन किया। डाॅ. अग्रवाल ने गंगोत्री से उत्तरकाशी तक के 125 किलोमीटर लम्बे मार्ग पर बिजली परियोजनाएँ लगाने का कड़ा विरोध किया क्योंकि इससे न केवल नदी जल बल्कि पूरी भगीरथी घाटी का प्राकृतिक स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा।

हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 18 वर्षों में गंगा के तापमान में 6 डिग्री सेल्शियस की बढ़ोतरीहुई है। गंगा को पवित्र और प्रदूषण रहित बनाने वाले बैक्टीरिया कम होते जा रहे हैं।

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बी.डी. जोशी के निर्देशन में गंगा प्रदूषण के बारे में किए जा रहे शोध में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वर्ष 1990 में गंगा का तापमान 11.6 डिग्री का सेल्शियस था जो अब 14 से 17 डिग्री सेल्शियस तक पहुँच गया है। गंगा की शीतलता घट जाने से उसमें आॅक्सीजन धारण करने की क्षमताक्षीण हो रही है।

भारत जैसे विकासशील देश में यह प्रयोग खतरनाक हो सकता है। सरकार की राष्ट्रीय जल नीति में जल स्रोतों का बेहतर प्रबन्धन करके पानी के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसमें जल संसाधनों के संरक्षण और उनके बेहतर तथा किफायती इस्तेमाल पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। इसके लिए वर्षा जल के संग्रह, पोखरों-तालाबों, बावड़ियों को पुनर्जीवित करने, भूजल के घटते स्तर को कृत्रिम उपायों से ऊँचा उठाने तथा जल संग्रह के नए साधनों के निर्माण का सुझाव दिया गया है।एक अन्य विद्वान और भूगर्भ शास्त्री डाॅ. के.एस. वाल्दिया ने हिमालय क्षेत्र के उत्खनन से प्राप्त तथ्यों के आधार पर बताया है कि गंगा के साथ-साथ हिमालय की दक्षिणी ढलान से निकलने वाली अन्य नदियों- यमुना, काली और करनाती के स्वरूप में भारी बदलाव आ चुका है। बरसात और गर्मियों में इन नदियों में पानी की मात्रा में काफी अन्तर देखा गया है।

इन नदियों में गर्मियों में बरसात के मौसम के मुकाबले 10 प्रतिशत पानी बहता है। इससे पानी की कमी के साथ-साथ हिमालय की पारिस्थितिकी में बदलाव आ रहा है। उन्होंने इस समस्या से निपटने के लिए इन नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में वर्षा जल का संग्रह करने का सुझाव दिया है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि पानी मनुष्य के अस्तित्व और विकास की अनिवार्य और बुनियादी आवश्यकता है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि जल ही जीवन है। यह पीने के साथ-साथ घरेलू कामों, साफ-सफाई, सिंचाई,उद्योग, बिजली उत्पादन आदि कामों में भी इस्तेमाल होता है। कहने को तो ब्रह्माण्ड का दो-तिहाई भाग पानी है लेकिन उपयोग योग्य पानी की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है।

जनसंख्या वृद्धि तथा पानी के उपभोग की मात्रा में वृद्धि के फलस्वरूप पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में हो रही कमी समूचे विश्व में गम्भीर समस्या का रूप लेती जा रही है। अब तक यही धारणा रही है कि पानी सर्वसुलभप्राकृतिक स्रोत है अतः इसका खुलकर इस्तेमाल होता रहा है। किन्तु अब स्थिति बदल रही है।

अब पानी भी एक वस्तु या जिंस का रूप लेने लगा है। हमारे देश में कई क्षेत्र ऐसे हैं जो स्थायी रूप से पानी की कमी की समस्या से ग्रस्त हैं। दूरदराज और पर्वतीय इलाकों में पानी लाने की समस्या अधिक गम्भीर है।

राष्ट्रीय महिला आयोग ने पानी की व्यवस्था करने में महिलाओं द्वारा उठाए जाने वाले कष्टों पर अध्ययन के बाद जानकारी दी है कि घरेलू उपयोग के लिए पानी का प्रबन्ध करने में 15 करोड़ महिला दिवस और करीब 10 करोड़ रुपए के बराबर श्रम खर्च हो जाता है। महिलाओं को कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर सिर पर पानी ढोकर लाना पड़ता है।

पानी लाने के लिए जहाँ गाँवों की महिलाओं को 9-10 किलोमीटर तक चलना पड़ता है वहीं शहरों की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों की औरतें घण्टों नलके पर लाइन में लगकर पानी जमा करती हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि बुन्देलखण्ड में औरतों का लगभग पूरा दिन ही पानी एकत्र करने में बीत जाता है। आठ-दस साल की बच्चियाँ भी पानी भरने के काम में लगा दी जाती हैं जिससे न वे खेल-कूद सकती हैं और न ही शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं।

पानी के मामले में सबसे खराब स्थिति राजस्थान की है। एक अनुमान के अनुसार राज्य में एक ग्रामीण महिला को पानी लाने के लिए प्रतिवर्ष औसतन 14,000 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। जैसलमेर में कराए गए सर्वेक्षण के मुताबिक वहाँ औरतों को रोज तीन से पाँच बार पानी लेने जाना पड़ता है और हर बार इसमें एक से डेढ़ घण्टा लग जाता है।

उड़ीसा के पियालापतार क्षेत्र की ग्रामीण महिलाएँ तीन किलोमीटर की दूरी से सुबह तीन से चार घण्टे और शाम को पाँच से छह घण्टे चलकर पानी लाती हैं। उत्तराखण्ड के टिहरी जिले में औरतें 40 लीटर पानी उठाकर हर रोज पाँच बार डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई करती हैं। गढ़वाल मण्डल की कुछ महिलाओं को पीतल की गगरी सिर पर रखकर 20 से 24 किलोमीटर प्रतिदिन चलना पड़ता है जिसमें 5 से 7 घण्टे लग जाते हैं।

कुछ समय से पानी की आपूर्ति के निजीकरण और इसमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भागीदारी की चर्चा चल रही है। वास्तव में दिल्ली, पुणे, चेन्नई जैसे कुछ शहरों में इस दिशा में प्रयास भी हुए हैं किन्तु कुछ स्वयंसेवी संगठनों और कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप से इन कोशिशों को विफल कर दिया गया। विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसे अन्तरराष्ट्रीय संस्थान पानी के व्यवसायीकरण का समर्थन कर रहे हैं। इसे हर हालत में रोकना चाहिए क्योंकि पानी की आपूर्ति तथा उत्पादन का काम निजी हाथों में जाते ही इसके दाम बढ़ने लगेंगे और इसकी सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ेगी जो पहले से ही इस बुनियादी जरूरत को प्राप्त करने में कष्ट भोग रहे हैं।

भारत जैसे विकासशील देश में यह प्रयोग खतरनाक हो सकता है। सरकार की राष्ट्रीय जल नीति में जल स्रोतों का बेहतर प्रबन्धन करके पानी के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसमें जल संसाधनों के संरक्षण और उनके बेहतर तथा किफायती इस्तेमाल पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। इसके लिए वर्षा जल के संग्रह, पोखरों-तालाबों, बावड़ियों को पुनर्जीवित करने, भूजल के घटते स्तर को कृत्रिम उपायों से ऊँचा उठाने तथा जल संग्रह के नए साधनों के निर्माण का सुझाव दिया गया है।

कई राज्य सरकारों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं जिनके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। केन्द्र सरकार ने यह भी सुझाव दिया है कि वे जल संग्रह स्थलों के पुनर्निर्माण की योजनाओं को कृषि के साथ जोड़कर चलें। इससे पेयजल तथा सिंचाई के पानी पर समान रूप से ध्यान दिया जा सकेगा। इसके लिए राष्ट्रीय जल संसाधन विकास योजना तैयार की गई है। इसमें नहर प्रणालियों को आपस में जोड़ने का भी प्रावधान है।

सरकार विभिन्न राज्यों के किसानों को वर्षा जल के संग्रह के उपायों की जानकारी देने के लिए विशेष शिविर भी लगाती है। शाहिर है कि पानी की कमी और जलवायु परिवर्तन भविष्य की चिन्तनीय समस्याएँ हैं जिन पर समय रहते ध्यान देना आवश्यक है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए सबसे पहले तो विकास के मौजूदा माॅडल को बदलना होगा। इन गैसों की मात्रा बढ़ाने में उद्योगों, ईंधन आदि के साथ-साथ बढ़ती जनसंख्या का बहुत बड़ा योगदान है।

समूचे विश्व की आबादी का एक-तिहाई हिस्सा चीन व भारत में है। इसलिए हमारे देश को विशेष सावधानी बरतनी होगी। हमारे यहाँ भूमि का मात्रा, कृषि उत्पादन, तेल उत्पादन, जल संसाधन सभी सीमित हैं किन्तु जनसंख्या का दबाव लगातार बना हुआ है और आर्थिक स्तर में वृद्धि के फलस्वरूप इन संसाधनों की प्रतिव्यक्तिखपत भी बढ़ रही है। इसलिए जनसंख्या पर नियन्त्रण सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा ऊर्जा के स्वच्छ, प्रदूषण रहित और अक्षय साधनों का अधिक इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

मोटर वाहनों के ईंधन का विकल्प भी तलाशना बहुत जरूरी है। इन सामूहिक व सामुदायिक उपायों के साथ जमीनी स्तर पर आम लोगों को जलवायु परिवर्तन और जलसंकट से उत्पन्न चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए तैयार करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उदाहरण के लिए शहरों में लोग निजी मोटर वाहनों का कम औरसार्वजनिक वाहनों का अधिक इस्तेमाल करें।

कई यूरोपीय और पूर्वी एशियाई देशों- जापान, चीन आदि में लोग थोड़ी दूरी तक के स्थानों पर साइकिल चलाकर जाते हैं। हमारे देश में भी ऐसा किया जाना चाहिए। किन्तु हो इसके विपरीत रहा है। बढ़ते उपभोक्तावाद और जीवनस्तर ने साइकिल सवारी की रही-सही आदत को भी समाप्त करना आरम्भ कर दिया है।

शहरी सड़कों पर बढ़ती भीड़ ने साइकिल पर सवारी को किंचिंत असुरक्षित भी बनाया है जिससे नए सवार साइकिल की ओर कम ही प्रवृत्त हो पा रहे हैं। आवश्यकता इस प्रवृत्ति में आमूल परिवर्तन लाने की है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बड़े-बड़े और ऊँचे होटल बनाए जाते हैं। उनके स्थान पर झोपड़ीनुमा आवास बनाएँ जाएँ।

मालदीव तथा कुछ अन्य द्वीपीय देशों में यह प्रथा प्रचलित है। यदि हर गृहस्थ यह सोच ले कि वह अपने घर में या उसके आस-पास पेड़-पौधो, झाड़ियाँ, फूल या सब्जियाँ लगाएगा तो पर्यावरण स्वतः ही खुशगवार हो जाएगा। इस सन्दर्भ में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की याद आना स्वाभाविक है जिन्होंने 7 दशक पहले ही छोटे और कुटीरउद्योगों, स्थानीय शैली की इमारतों, गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने और अपनी भौतिक जरूरतों पर अंकुश लगाने के लिए आत्मसंयम जैसे मूल्यों का प्रतिपादन किया था।

आज जब सारी दुनिया भोगवाद और उपभोक्ता संस्कृति के अपने बुने जाल में फँसती दिखाई दे रही है तो बापू द्वारा बनाया गया सरलता और सादगी की जिन्दगी गुजारने का रास्ता उपयुक्त प्रतीत हो रहा है। गाँधी जी कहा करते थे कि यह पृथ्वी मनुष्य की जरूरतें पूरी करने में तो सक्षम है किन्तु उसके लालच को पूरा नहीं कर सकती।

नदी को माँ मानने और उनके जल को संरक्षित करने की परम्परागत मान्यता का भी उपयोग जल स्रोतों के सन्तुलित प्रबन्धन के लिए किया जा सकता है। नदी, सरोवरों में स्नान करने और उनके रखरखाव पर ध्यान देने, पक्षियों, पेड़-पौधों की पूजा-अर्चना तथा इसी तरह की अन्य प्रथाओं से व्यक्ति का प्रकृति के साथ भावात्मकरिश्ता जुड़ता था और वह प्रकृति की रक्षा अपना धर्म मानता था। ऐसी मान्यताओं को भी पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

पर्यावरण और पानी के संरक्षण के प्रति जागरुकता पैदा करने में स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका उल्लेखनीय है। कुछ संगठन तो इस दिशा में काफी उपयोगी काम कर रहे हैं। संकट की गम्भीरता को देखते हुए उन्हें अपने प्रयास बढ़ाने होंगे। आम लोगों को पानी की बचत की तकनीकों की जानकारी देने में मीडिया भी सहयोग कर सकता है। इस तरह व्यक्तिगत, सामुदायिक, आरै राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उचित कदम उठाकर हम जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तपन से उत्पन्न हो रही समस्याओं का सामना कर सकते हैं और मानवता के सामने मुँह बाए खड़े विनाश के संकट से बच सकते हैं।

लेखक आकाशवाणी के समाचार निदेशक रह चुके हैं।
ई-मेल: setia_subhash@yahoo.co.in

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