पानी-पानी होता पानी

Submitted by RuralWater on Sat, 07/02/2016 - 16:07
Source
कादम्बिनी, मई 2016

सदियों से पानी हमारे यहाँ सार्वजनिक उपयोग की वस्तु रही है। प्यासे को पानी पिलाना हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। चाहे कितनी ही क्रूर सत्ता रही हो, पानी को उसने सार्वजनिक और उसके प्रबन्धन को अपना कर्तव्य माना। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जैसे-जैसे जल-संकट गहराता गया, पानी का भी एक बाजार खड़ा हो गया। आज पानी का बाजार राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय राजनीति को भी तय करने लगा है।

जिस समाज में प्यासे को पानी पिलाना पुण्य समझा जाता हो और जिस देश में अपने ‘सुजलाम’ और अपनी ‘नदियों’ का गुणगान गीतों में होता आया हो, वहाँ पानी की तिजारत पर बहस होना अपने आप में एक विडम्बना है। हमारा इतिहास पानी के सामुदायिक और राजकीय प्रबन्धन की नायाब मिसालों से भरा पड़ा है।

पानी की व्यवस्था का उपक्रम हमेशा सार्वजनिक और परजन हिताय ही रहा है, चाहे शासकों का चरित्र कुछ भी रहा हो। प्राकृतिक और भौगोलिक विभिन्नताओं के बावजूद मध्यकालीन और औपनिवेशिक शासकों ने पानी की व्यवस्था को कभी ‘फुल कॉस्ट रिकवरी’ या ‘यूजर्स पे प्रिंसिपल’ के नजरिए से नहीं देखा।

खेती से प्राप्त होने वाला लगान इन शासकों के ऐशो आराम के लिये मायने रखता था और शायद पानी की व्यवस्था में उनके ‘परजन हिताय’ नजरिए के पीछे यही स्वार्थ रहा हो, लेकिन फिर भी ‘पानी’ को सार्वजनिक उपयोग की वस्तु और उसकी व्यवस्था को सार्वजनिक उपक्रम ही माना गया।

आजादी के बाद इसी अवधारणा को ‘कल्याणकारी राज्य’ के खाँचे में फिट किया गया और पानी को सार्वजनिक उपयोग की वस्तु और उसकी व्यवस्था को सार्वजनिक उपक्रम के रूप में ही देखा गया। इस दौरान आधुनिक तरक्की के उतावलेपन में पानी के निजी उपभोग व पानी के अपव्ययवाली जीवनशैली को बढ़ावा मिला।

यह सच है कि पानी के सार्वजनिक प्रबन्धन में नियोजन और व्यवस्था दोनों ही स्तरों पर बहुत-सी खामियाँ रहीं, लेकिन यह मानना ठीक न होगा कि ये खामियाँ लाइलाज थीं। एक जनतांत्रिक व्यवस्था में वाजिब अवधारणा के दायरे में गलतियों को उजागर करना, उन पर बहस चलाना और सामूहिक समझ के आधार पर सुधार किया जाना सदैव सम्भव रहता है। मूल अवधारणा और उसमें निहित मूल्यों को तिलांजलि देना स्वस्थ जनतंत्र की निशानी नहीं है।

मेरी राय में परम्परा से हटकर पानी को खरीद-फरोख्त की वस्तु की तरह देखना और पानी की तिजारत से मुनाफा कमाने को वाजिब ठहराने की कवायदें करना न तो जन-आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का नतीजा है और न ही काल और परिस्थितियों की देन है। यह तो सीधे उदारीकरण और निजीकरण के मौजूदा दौर की ही उपज है। यह विश्व स्तर पर पिछले कई दशकों से चल रही उस कवायद का हिस्सा है, जिसके तहत पानी के अरबों रुपए के बाजार पर चुनिन्दा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को काबिज करवाया जाना है।

इस साजिश के तहत भारत के ‘पानी बाजार’ में सेंधमारी का काम कई दशकों से चोरी-छिपे चल रहा है। इस साजिश में विश्व बैंक की रहनुमाई में संयुक्त राष्ट्र की तमाम एजेंसियाँ, इंग्लैंड की डीएफआइडी और यूरोपियन यूनियन की एजेंसियाँ प्रमुख हैं। ये गिरोह पिछले कई दशकों से अनुदान व ऋण की ताकत के बूते और तकनीकी सहायता के नाम पर नीति-निर्धारकों, राजनेताओं और आम नागरिकों की मानसिकता व नजरिए को प्रभावित करने की कोशिशें कर रहा है।

अन्धाधुन्ध खर्च कर चलाई गई परियोजनाओं की आंशिक जानकारी के आधार पर वैकल्पिक नमूनों को प्रचारित करने में इन कलाकारों को महारत हासिल है। इन अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय और सामाजिक संस्थानों की जुगलबन्दी में अजब का तारतम्य है, जो दौलत की चकाचौंध से आक्रान्त नीति-निर्धारकों को मंत्रमुग्ध करने के लिये बहुत कारगर है। इन्होंने हमारे देश के नौकरशाहों और राजनीतिक नेतृत्व को फँसा लिया है। हर कोई ‘पूरी लागत वसूली’ के नए मंत्र जाप करता दिखाई देता है।

इस पवित्र जाप की धुन और लय हर दिशा में गूँजने लगी है। जब तक जनता को ‘पूरी लागत वसूली’ का अभ्यस्त नहीं बना लिया जाता तब तक पानी से मुनाफा कमाने की बात राजनीतिक रूप से जोखिम भरी हो सकती है। हमारे देश में भी बगावत के आसार पैदा हो सकते हैं, जैसा कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में हुए हैं। भारत में वे ऐसी गलती दोहराना नहीं चाहते इसीलिये यहाँ सब कुछ चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है।

इस पूरे प्रकरण का एक और खतरनाक पहलू है- पानी के सन्दर्भ में सम्पत्ति अधिकारों के निर्धारण की जरूरत। अगर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को पानी के क्षेत्र में मुनाफा कमाना है, तो उन्हें मोटी रकम का निवेश करना होगा और उस निवेश की सुरक्षा के लिये सम्पत्ति अधिकारों को स्पष्ट करना जरूरी होगा।

इस चिन्ता की सुगबुगाहट विश्व बैंक और भारत सरकार द्वारा तैयार की गई साझा रपटों में साफ दिखाई देती रही। फिलहाल रणनीतिक कारणों से इस मसले पर अभी तेजी से अमल नहीं किया जा रहा है, लेकिन देर-सबेर ऐसा होना तय है और पानी क्षेत्र में सम्पत्ति अधिकारों का नियमन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्वार्थ साधन को ध्यान में रखकर ही किया जाएगा। जैसा कि हम अन्य क्षेत्रों में देख रहे हैं। अब जब पानी-जैसे प्राकृतिक संसाधन से स्थानीय समुदायों के रिश्ते और उस पर इन समुदायों की पहुँच की सदियों से चली आ रही शर्तें एकदम बदल जाएँगी। इस प्रक्रिया में पानी से स्थानीय समुदायों की बेदखली निश्चित है।

इस दृष्टि से पानी के निजीकरण और उससे मुनाफा कमाने की छूट की मौजूदा कोशिशें सीधे-सीधे प्राकृतिक संसाधनों पर हकदारी के व्यापक सवाल से जुड़ी हुई हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर खगोलीय हकदारी उदारीकरण का अभिन्न अंग है और उदारीकरण के काजल की कोठरी में घुसकर प्राकृतिक संसाधनों से स्थानीय समुदायों की बेदखली की कालिख से बच पाना सम्भव नहीं है। पानी की ही तरह जमीन व जंगल के सन्दर्भ में भी खगोलीय हकदारी की वकालत अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों व सामाजिक संस्थानों के नीतिगत दस्तावेजों में खुलकर प्रकट होती है।

यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि पिछले कई दशकों से पानी के इर्द-गिर्द चल रही बहस के मूल में ‘प्राकृतिक संसाधनों’ पर नियंत्रण का मसला निहित है और उसे एक घिनौनी साजिश के तहत छुपाने की कोशिश की जा रही है, जल, जमीन और जंगल पर स्थानीय समुदायों की निर्भरता और उन पर इन समुदायों के उपयुक्त अधिकारों की पवित्रता मानव की विकास यात्रा का अभिन्न अंग रहे हैं, परन्तु आज मानव मात्र की इस साझा धरोहर को मुनाफाखोर गिरोहों से खतरा पैदा हो गया है।

प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों की हकदारी के पक्ष में हमारे देश में भी ठीक उसी प्रकार से संघर्ष की जरूरत है जिस प्रकार बोलिविया, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और इंग्लैंड आदि देशों में जारी है।

 

रहिमन पानी राखिए


रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।1

जाल पड़े जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।

रहिमन मछरी नीर को, तऊ न छाड़त छोह।।2

धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पियत अघाय।

उदधि बड़ाई कौन है, जगत पियासो जाय।।3

तरुवर फल नहीं खात है, सरवर पियत न पान।

कहि रहीम पर काज हित सम्पत्ति संचहि सुजान।।4

पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।

दोनों हाथ उलीचिए यही सयानो काम।।5

-रहीम

 

(लेखक पॉपुलर एजुकेशन एण्ड एक्शन सेंटर-‘पीस’ के निदेशक हैं)

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