पानी : पेटलावद हादसे के सबब और सबक

Submitted by RuralWater on Fri, 09/18/2015 - 11:31

सदियों से हमारी नदियों और कुओं से सहज रूप में खेतों को मिलने वाले पानी की जगह अब गाँव–गाँव सैकड़ों की तादाद में बोरवेल ही जैसे पानी का एकमात्र स्रोत के रूप में प्रचारित और प्रचलित कर दिया गया है। भूजल के लगातार अन्धाधुन्ध दोहन से इसमें भारी गिरावट आ रही है और पानी धरती में नीचे और नीचे जा रहा है। हमारी चिन्ता भूजल के दोहन को कम करने की दिशा में होनी चाहिए लेकिन इससे उलट हमारी चिन्ताओं के केंद्र में अब भी मूल मुद्दा कहीं नहीं है।

पानी के लिये आज का समाज किस विभ्रम की स्थिति में है, यह किसी से छुपा नहीं है। हमने अपने परम्परागत प्राकृतिक संसाधनों और जलस्रोतों को लगभग हाशिये पर धकेलते हुए एक नई तरह की व्यवस्था कायम की है, जिसमें पानी एक छलावे के रूप में हमारे सामने पेश किया जाता है लेकिन इसके निहितार्थ में कुछ ख़ास लोगों के लिये मुनाफा कमाना ही होता है।

मुनाफा कमाने की होड़ में वे इतने मसरूफ हो चले हैं कि न तो उन्हें पानी के असल मुद्दों से कोई वास्ता रह गया है और न ही वे जो कर रहे हैं, उसके खतरों से आगाह होने की जरूरत समझ पा रहे हैं।

मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के पेटलावद में हुआ हादसा और करीब 90 से ज्यादा लोगों की वीभत्स मौतों ने एक बार फिर पानी के नाम पर चल रहे तमाम तरह के खतरनाक किस्म के गोरखधंधों की ओर ध्यान खींचा है।

खेती को जिन नए तरीकों ने महंगा बनाया है, उनमें महंगे खाद-बीज और ट्रैक्टर के साथ हर खेतों तक पानी होने की बातें भी कही जाती रही है। किसान ज्यादा-से-ज्यादा पानी की चाह में साल-दर-साल अपने–अपने खेतों पर पानी के लिये महंगे ट्यूबवेल या विस्फोट के जरिए कुएँ खोदने के लिये महंगे कर्ज लेते हैं। किसान के खेत में कई बार पानी निकल जाता है और कई बार नहीं निकलता पर दोनों ही स्थितियों में इसके सौदागरों का तो फायदा ही है।

लिहाजा परम्परागत तरीकों की उपेक्षा करते हुए ज्यादातर किसानों को किसी भेड़चाल की तरह इसी तरफ चलाया जा रहा हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में बीते 25 सालों में पानी की लगातार होती कमी के चलते यह कारोबार करीब 10 गुना से ज्यादा बढ़ा है।

लंबे समय से मध्य प्रदेश और ख़ासतौर पर पिछड़े माने जाने वाले निमाड़-झाबुआ इलाके में कुछ विस्फोट व्यापारी प्रशासन की खामियों का फायदा उठाकर खेतों में पानी के नाम पर क्षेत्र के किसानों को लूटकर अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ इस अंचल में ऐसे 500 से ज्यादा सौदागर हैं जो हर साल किसानों से करीब एक सौ करोड़ से ज्यादा का अवैध कारोबार करते हैं।

अकेले पेटलावद जैसी छोटी सी जगह पर ही दर्जन भर से ज्यादा कारोबारी इस धंधे से जुड़े बताए जाते हैं और इनमें से ज्यादातर के कस्बे में ही गोदाम भी हैं। यह पूरा कारोबार ऐसे लोग करते हैं, जिनका शासन–प्रशासन में प्रभाव होता है और ज्यादातर इसमें नियमों से काम नहीं होता है।

कई–कई बार नियमों की अनदेखी की जाती है। इनके खिलाफ किसी तरह की शिकायत को भी न तो प्रशासन गम्भीरता से लेता है और न ही पुलिस। दरअसल यह उन किसानों के सपनों के भी सौदागर हैं, जो खेत पर छलछलाते पानी के झूठे सपने दिखाकर अन्ततः उन्हें इस हद तक बर्बाद कर देते हैं कि कई किसान आत्महत्याओं के रास्ते जाने को मजबूर हो जाते हैं।

यहाँ कस्बे की घनी आबादी में कुएँ और नहरों में पत्थर तोड़ने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले जिलेटिन डेटोनेटर के मौजूद बड़े जखीरे में धमाका होने से भयावह हादसा हुआ जिसने लोगों के जिस्म को चिथड़ों में बदल दिया। अकेले डेटोनेटर में ही नहीं बल्कि यहाँ अमोनियम नाइट्रेट का भी बड़ी तादाद में भण्डारण किया गया था।

अमोनियम नाइट्रेट को वैसे तो खाद के रूप में बताया जाता है पर विस्फोट से जुड़े कई व्यापारी डीजल या कोई तेल मिलकर इसका इस्तेमाल कुँआ या नहर खोदने के दौरान पत्थरों को तोड़ने के लिये भी करते हैं। यह जिलेटिन के मुकाबले सस्ता होता है इसलिये व्यापारी खतरनाक होने के बाद भी इसका धड़ल्ले से उपयोग करते हैं।

25 किलो जिलेटिन करीब चार हजार रुपए का होता है यानी करीब एक सौ जिलेटिन। अब इसका गणित देखें तो एक टोटा लगाने का सरकारी रेट करीब एक सौ दस रुपए निर्धारित है यानी सौ टोटे पर करीब ग्यारह हजार रुपए। मतलब साफ़ है बड़ा मुनाफा। इसमें भी यदि अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया जाये तो मुनाफा और कई गुना तक बढ़ जाता है।

इसके लिये सरकार विस्फोट कारोबारियों को 25 किलो जिलेटिन तक रखने का लाइसेंस जारी करती है लेकिन इसकी आड़ में ये करीब 300 गुना तक माल अपने गोदामों में भर रखते हैं। गोदाम भी कायदे से बस्तियों के बाहर होना चाहिए पर ये लोग अपनी सुविधा से अपने गोदाम घनी आबादी में भी बना लेते हैं।

बावजूद इसके प्रशासन कभी इन पर कोई गम्भीर कार्यवाही नहीं करता। खुद पेटलावद के मामले में लोगों ने कई बार शिकायतें की, लोग कलेक्टर के सामने जन सुनवाई में भी गए लेकिन किसी ने कोई कार्यवाही नहीं की और नतीजा सबके सामने है। उधर कलेक्टर अरुणा गुप्ता इससे साफ़ इनकार करती हुई कहती हैं कि उनके पास इस तरह की कभी कोई शिकायत ही नहीं पहुँची।

पानी के नाम पर कई तरह की साजिशें की जा रही हैं। लोगों की प्यास बुझाने के नाम पर करोड़ों रुपए सिर्फ बोरवेल, हैण्डपम्प, टैंकर, बड़ी परियोजनाओं और पाइपलाइन से नदी जोड़ जैसे अस्थाई संसाधनों पर खर्च किये जा रहे हैं।

जबकि पहले भी लोग पानी पीते ही थे, उनके क्या परम्परागत संसाधन और स्रोत थे और बीते कुछ सालों में इनका किस तरह दुरुपयोग हुआ या उपेक्षा हुई, जैसे सवालों को लगभग दरकिनार करते हुए यही सोच और मान लिया गया है कि पानी की कमी होने पर बस यही एकमेव विकल्प हैं। यहाँ तक कि भौगोलिक और भूगर्भीय स्थितियों का अध्ययन तक नहीं किया जा रहा है। बोतलबन्द पानी का अपना कारोबार फल–फूल रहा है।

सदियों से हमारी नदियों और कुओं से सहज रूप में खेतों को मिलने वाले पानी की जगह अब गाँव–गाँव सैकड़ों की तादाद में बोरवेल ही जैसे पानी का एकमात्र स्रोत के रूप में प्रचारित और प्रचलित कर दिया गया है। भूजल के लगातार अन्धाधुन्ध दोहन से इसमें भारी गिरावट आ रही है और पानी धरती में नीचे और नीचे जा रहा है।

हमारी चिन्ता भूजल के दोहन को कम करने की दिशा में होनी चाहिए लेकिन इससे उलट हमारी चिन्ताओं के केंद्र में अब भी मूल मुद्दा कहीं नहीं है। देश में एक बड़े तबके को इस तरह के सवालों से कोई लेना–देना नहीं है बल्कि वे इससे भी अपना कारोबार ही चमका रहे हैं। यही हाल इन विस्फोट कारोबारियों का है। ये अपने मुनाफ़े की होड़ में किसानों को सब्जबाग दिखाते हैं और कंगाल कर देते हैं।

अब भी समय है कि हम इन काले सौदागरों की साजिशों को समझें और सरकार का भी दायित्व है कि वह इस तरह इन्हें समाज को लूटने से रोके। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि पानी के स्थायी निदान पर हमें अपना फोकस बढ़ाना होगा। यही नहीं अब पानी को लेकर हमें नए और वैज्ञानिक नज़रिए से सोचने की भी दरकार है ताकि पानी के नाम पर देश भर में पनप रहे ऐसे अवैध और खतरनाक कारोबारों पर लगाम लगाई जा सके।

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