पानी पर व्यंग्य कथाएं

Submitted by admin on Tue, 03/04/2014 - 13:10
Source
नया ज्ञानोदय, मार्च 2004

(एक)


यहां पानी रुका हुआ था और नीचे वहां पानी के लिए हाहाकार था।
‘पानी छुड़वाइए साहब...’
‘क्यों जनाब?’
‘लोग प्यासे मर रहे हैं, इसीलिए...’
‘छोड़ दिया, तो बाढ़ से मर जाएँगे।’
‘इतना तो खैर आप क्या छोड़ेंगे... परंतु तनिक तो छोड़िए। सबको पानी तो बराबर मिल जाए...’

‘...तू कम्यूनिस्ट है क्या?’
‘...इसमें क्या कम्युनिस्ट, क्या समाजवादी। हमारे धर्मों में स्पष्ट उपदेश है कि जल,वायु, धूप आदि पर सभी प्राणियों का बराबर का अधिकार...’

‘..यार, तुम धर्म को बीच में मत लाओ। तुम्हें पता है कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं।’
‘परन्तु नीचे वालों के लिए पानी...?’

‘देखते नहीं यार तुम कि यहां हमने पानी रोककर कैसा बढ़िया टूरिस्ट-रिसॉर्ट बनाया है। बोटें तैर रही हैं, वाटर-गेम्स हो रहे हैं, नंगी लड़कियां झील किनारे धूप में लेटी हैं, विदेशी टूरिस्ट चले आ रहे हैं। देखों तो प्यारे कि कितनी विदेशी मुद्रा आ रही है। चार आदमी प्यासे मर भी गए तो क्या?... यार, हमें आप स्वदेशियों की यही हरकत ठीक नहीं लगती कि हम तो मरे जा रहे हैं कि कैसे इस देश को आगे ले जाएँ, पर आप जो हैं सो प्यासों का रोना लेकर बैठ जाते हैं।’

‘तो आपका कहना है कि लोग प्यासे मरें, तो मरें, पर...’
‘हमने यह कब कहा यार?... मिनरल वाटर पिएँ न! मरे क्यों?’
‘देखिए, लाखों लोगों की प्यास...’
‘यार तुम तब से प्यास-प्यास का रोना रोए जा रहे हो याद रखो कि कहीं भी पानी रोका जाएगा, तो बहुत से लोगों को प्यासा तो रहना ही पड़ेगा। धन और पानी इस मामले में एक हैं कल तुम मुँह उठाए आ जाओगे कि यह जो पैसा इकट्टा किया है, यह भी बाँट दो?... विकास के सिद्धांत को समझो यार। तुम दुनिया का रोना मत लेकर बैठ जाओ। अपनी सोचो।...’

‘मतलब?’
‘मतलब यह जनाब कि तुम प्यासों की वकालत करने में क्यों अपना जीवन तथा समय खराब कर रहे हो? आओ। हमारे साथ आकर तो देखो। इस झील के किनारे घूमकर तो देखो। वोट में बैठो। तैरो इन लहरों पर। किलोल करो। मिल जाओ हमारे साथ। भूल जाओ उन मूर्ख प्यासों को। तुम तो झील को देखो...’

पानी रुका हुआ है।
नीचे प्यासों के बीच एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचा हुआ है। प्यासे समझ ही नहीं पाते हैं कि जिसको भी वे चुनकर अपने लिए लड़ने भेजते हैं, वह शख्स झील से लौटकर क्यों नहीं आता?

 

(दो)


नाले का सड़ता, बजबजाता, गंदा पानी।
जमाने भर को गंदगी और पाप से सराबोर पानी।
और पट्ठा आकर मिल गया गंगा नदी में। बहने लगा ठाठ से। पवित्रता के ठसके से।
नाला शहर के किसी अनाम से छोर से चला था। उसकी जीवनयात्रा में बीसियों गंदली नालियां आकर उसमें मिलीं। यहाँ वहाँ का कचरा उसने शौक से समेटा। सुअरों को अपने दामन में प्यार से जगह दी उसने। जहरीले कीड़े-मकोड़े पैदा हुए उसमें। कीचड़त्व में ही जीवन की सार्थकता मानी उसने। शहर की हर गंदगी में उसका हिस्सा। दुष्कर्मों के बुलबुले उसमें सर्वेत्र। उसकी बदबू, किसी बदनामी सी सर्वत्र व्याप्त। वह जहाँ से भी निकलता है, शहर के लोग बचकर निकलते हैं या उस रास्ते को छोड़कर ही चलते हैं। ‘उधर गंदा नाला है, इधर से चलो’। नाले से दूरी भली। नाले पर भी पुलिया बनी है यत्र-तत्र, परंतु नागरिक बैठते-बतियाते नहीं उन पर। गंदगी तैरती रहती है नाले के जल में। यह सब, परंतु नाला अपने संपूर्ण गलीज के साथ सिर उठाए गुजरता है सारे शहर के बीच से।

शहर से ही गुजरती है गंगा।
अब गंगाजल का तो बखान ही क्या।
पावन स्वच्छ जल! हिमालय की उज्जवल परंपरा! गंगोत्री से जन्मा, तीर्थों के भजन कीर्तन-सत्संग में दीक्षित होता, कलकल करता निर्मल पवित्र जल। अपनी पवित्रता पर गर्वित, गौरवान्वित, गंगाजल। और क्यों न गर्व करे वह? सारा विश्व उसमें डुबकी मारकर पवित्र होता है सो गर्व से कलकल-कलकल बहता गंगाजल। आसपास ‘हर गंगे’ के निनाद। लहरों का गर्वोन्नत मस्तक उठाए गंगाजल।

कि इस शहर का यह बदनाम, गंदला नाला आकर मिल गया गंगा नदी में और गंगाजल जैसी ही गर्वोन्नत मुद्रा में बह निकला, ठाठ से। साथ बह रहे गंगाजल ने यह अनर्थ होते देखा तो वह चकित भी हुआ और क्रोधित भी। गंगाजल ने आश्चर्य के साथ यह भी देखा कि लोग गंगा में मिल गए नाले के जल में भी उसी श्रद्धा तथा भक्तिभाव से डुबकियाँ मार रहे हैं। गंगा का हिस्सा बनकर नाला भी वही सम्मान पाने का अधिकारी हो गया है।

‘यह भी खुब धाँधली है...’ गंगाजल ने कहा।
‘कैसी धाँधली?’ नाले ने अकड़कर कहा।
‘लोग तुमको भी वहीं सम्मान दे रहे हैं, जो मुझे मिलता है...।’
‘जल तो हम भी हैं, तुम भी।’
‘कहां मैं और कहां तुम...छीः।’

‘यह सत्य है कि मैं गलत संगत तथा गंदी आदतों के चलते गंदगी में बहकर नाला बन गया, परंतु... फिर भी...’

‘फिर भी क्या?’
‘फिर भी यह गंगाजल महाशय, कि इस देश में यदि नाला समझदार हो, तो वह जीवन पर्यंत भी गंदगी से उफनता बहता रहे, तब भी धर्मप्राण जनता उसकी जय जयकार कर उसकी पूजा अर्चना कर सकती है बशर्ते...’
‘बशर्ते क्या?’
‘बशर्ते वह जुगाड़ करके, येने-केन-प्रकारेण अंततः गंगा में मिल जाए।’‘मैं समझा नहीं? गंगाजल को राजनीति नहीं आती न, सो उसने पूछ लिया।’

‘तुम दिल्ली से होकर नहीं गुजरते न, इसीलिए। कभी अपनी जमुना बहन से पूछना कि दिल्ली में कैसे-कैसे गंदे नाले वहां बह रही सत्ता की गंगा में मिलकर इस देश में सम्माननीय तथा स्वीकार्य हो जाते हैं।...प्रिय मित्र, इस देश में हर गलीज नाला पूजनीय हो सकता है, बशर्ते वह उचित अवसर पाकर गंगा नदी में घुसने का जुगाड़ कर ले।’

संसद तथा विधानसभा से बहुत दूर बह रही गंगा में हजारों गंदे नाले आकर मिल रहे हैं। इस देश के भोले मतदाता तथा आमजन को पता ही नहीं है कि जिस जल में श्रद्धा से डुबकी लगाकर वह सुखी जीवन की कामना तथा याचना कर रहा है उसका पानी जहरीला होता जा रहा है।
इसीलिए न गंगा से उसकी उम्मीदें पूरी हो रही हैं; न संसद से।

 

 

 

(तीन)


भीषण गर्मी के दिन।
लू के थपेड़े। पसीना। प्यास।
‘धर्मार्थ प्याऊ’ बड़ी व्यस्त रहती है इन दिनों।
सुबह से प्याऊ बहुत व्यस्त है, आज भी। मजदूरों, बच्चों, यात्रियों की भीड़।
दोपहर हो गई। तेज धूप और लू के कारण दोपहर में लोगों की आवाजाही कम हुई, तो प्याऊ ने चैन की सांस ली और फुरसत पाकर अपने आसपास छिटकती नजर डाली। उसने चौंक कर देखा की प्याऊ के पास ही कोई मिनरल वाटर की खाली बोतल फेंक गया था।

प्याऊ ने वितृष्णा से मुँह बिचकाते हुए बोतल को देखा और तिरस्कार पूर्वक कहा, ‘क्यों री पैसे की ऐसी हाय मची है तेरे को कि तूने पानी तक बेचना शुरू कर दिया?’

‘अर्थशास्त्र की तनिक भी समझ तुझे होती तो तू ऐसे मुफ्त में पानी पिलाती न बैठी होती सड़क पर...,’ बोतल ने मुँह बिचकाते हुए उत्तर दिया।

‘इस देश में कोई चीज ऐसी छोड़ोगे तुम कि जिसको बाजार में बेचो न तुम?’
‘जो ऐसी होगी, उसे हम वैसे ही छोड़ देंगे।...जिस चीज को बाजार में बेचा न जा सके, उस चीज की अहमियत ही क्या?...’
‘अच्छा!’
‘जी हाँ...जैसे तुम्हारी यह धर्मार्थ प्याऊ। क्या मतलब है इसका? क्या महत्व है इसका?’ देश के अर्थशास्त्र में क्या रोल है इसका? बाजार में क्या पूछ-परख है इसकी? तुम्हारी प्याऊ से यदि पैसे न पैदा हों, तो यह है कि मर्ज की दवा?’

‘यह धर्मार्थ है भैया... सद्कार्य है यह...।’
‘प्याऊ मात्र हरामखोरी सिखाती है, मुप्तखोरी, बस्स!’
‘तुम नहीं समझोगे। हम प्यासे को पानी पिला रहे हैं और तुम...’
‘बहिनजी, प्यासे को पानी तो हम भी दे रहे हैं- पैसा अंटी से निकालो और ठाठ से बोतल वाला मशीन का शुद्ध पानी पियो।’
‘और जिनके पास पैसा न हो?’
‘उनसे कहो कि बैठे-बैठे हरामखोरी करने में समय खराब न करें- पैसा कमाएँ और प्यास बुझाएँ।’

‘पैसा कमाना क्या ऐसा सरल है? रोजगार न मिलने तक प्यास से मर न जाएंगे वे?’
‘जिनके पास पैसा नहीं है, बाजार के लिए उनका क्या तो जीना और क्या मरना।’
‘देखिए... प्याऊ का विचार तो बाजार से अलग है।’
‘आज की दुनिया में हर विचार अंततः बाजार द्वारा या बाजार के लिए है- उससे अलग कुछ नहीं है बहिनजी...।’
‘प्याऊ तो धर्मार्थ...।’

‘बहिन जी, धर्म और बाजार को आपस में गड्ड-मड्ड मत करो। धर्म के हामी तो हम भी हैं। धार्मिक गानों के कैसेट, धार्मिक-सीरियल, धार्मिक-प्रवचनों आदि का इत्ता बड़ा बाजार हमने ही खड़ा किया है। धर्म के वृहद बाजार पर हमारी नजर है। जब तक धर्म बाजार को बढ़ाने में मदद करता है, हम हर धर्मार्थ कार्य का स्वागत करते हैं...’
‘...फिर तो धर्मार्थ प्याऊ...।’
‘देखिए, यह प्याऊ-फयाऊ का सोच ही बाजार के विरुद्ध है और यह ठीक चीज नहीं।’
‘फिर हम क्या करें? क्या ऐसा सद्कार्य बंद कर दें?’
‘बंद मत करो बहिन.. चालू रखो। परन्तु चुपके से इसे धर्मार्थ से बदलकर एक लाभदायक वेंचर में बदलने की कोशिश करो। धर्म में यदि पैसा नहीं पीट पा रहे हो, तो वह अधर्म कहाया। पैसा लेकर पानी पिलाओ। कहो कि धर्म में सस्ते में पिला रहे हैं। कहो कि पानी ढोने वाले मजदूर का पैसा तो निकालना होगा। कहो कि नए घड़े खरीदने का पैसा कहाँ से आएगा? कहो कि जमीन का किराया भी तो निकालना है। कहो कि... ’

प्याऊ और मिनरल वाटर की बोतल में बहस जारी है।
बहस भी क्या कहें, यह कहें कि मिनरल वाटर बोतल प्याऊ को उसकी गलतियाँ समझा रही है।
प्याऊ अब चुप होकर उसके तर्क-वितर्क-कुतर्क सुन रही है।
प्याऊ अब चुपचाप बैठी कुछ सोच रही है। प्याऊ की खिड़की उसने बंद कर दी है और अभी-अभी एक प्यासे को लौटा भी दिया है कि भैय्या, बाद में आना।
मिनरल वाटर की बोतल उसे आशा की निगाहों से देख रही है।
क्या बाजार द्वारा संचालित इस नए विश्व में प्याऊ अपना सोच बदल देगी? डर है कि ऐसा होगा। प्याऊ के चारों तरफ इस देश में पहले ही ऐसा हो रहा है।

 

 

 

 

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