पानी से रिश्ता

Submitted by admin on Tue, 04/15/2014 - 11:15
Source
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान की पत्रिका 'जल चेतना', जुलाई 2013

हमारे प्रतिदिन के जीवन में जल की महत्ता को भारतीय संस्कृति में अलग नजरिए से देखा है। जल के दुरुपयोग से मनुष्य कितनी मुसीबतों में आ गया है यह बात अब प्रत्यक्ष हो चुकी है। भारतीय साहित्य में तो नदियों को जल की देह माना है इसलिए भारतीय संस्कृति में नदियों को भौगोलिक और सामाजिक ही नहीं आध्यात्मिक महत्व भी प्रदान किया है।

पानी का रिश्ता बड़ा घनिष्ठ और स्थाई होता है- जीते जी भी वह मनुष्य से रिश्ता निभाता है और जीने के बाद भी क्योंकि मृत्यु के बाद भी बिना जल के मोक्ष प्राप्त नहीं होता।

जल प्रकृति की अनुपम सौगात है जिसकी व्याप्ति नभ से लेकर पाताल तक मानी गई है। आज यदि हम सिर्फ जल की बात करें तो इसका व्यावहारिक महत्व भी उतना ही अधिक है जितना आध्यात्मिक। जल केवल प्यास तृप्त करने, वस्त्र और शरीरांग साफ करने या किसी वस्तु को भिगाने एवं गीला करने के उपयोग में ही नहीं आता बल्कि उसके कतिपय उपयोग समग्र व्यक्तित्व को भी प्रभावित करता है।

प्राणियों की काया में भी जल की उपस्थिति अनिवार्य मानी गई है। कोई शुभ संकल्प ग्रहण करना हो, क्रोधवश किसी को शाप देना हो, मृत व्यक्ति का श्राद्ध करना हो, आचमन से लेकर तर्पण तक तथा चरणामृत तक जल के ही ढेरों विधि विधान हैं।

हमारे प्रतिदिन के जीवन में जल की महत्ता को भारतीय संस्कृति में अलग नजरिए से देखा है। जल के दुरुपयोग से मनुष्य कितनी मुसीबतों में आ गया है यह बात अब प्रत्यक्ष हो चुकी है। भारतीय साहित्य में तो नदियों को जल की देह माना है इसलिए भारतीय संस्कृति में नदियों को भौगोलिक और सामाजिक ही नहीं आध्यात्मिक महत्व भी प्रदान किया है।

पृथ्वी पर अग्नि को बुझाने के लिए जल की जरूरत होती है तो पेट की भूख रूपी अग्नि को जीवित रखने हेतु भी जल की आवश्यकता होती है। जल हमें स्वच्छ कर पवित्र बनाता है साथ ही बहुत सारे कार्यों में सहायक है जैसे तापमान नियंत्रित रखना, पाचनक्रिया में सहायक होना, शरीर से निरर्थक पदार्थों को बाहर निकालना, पौष्टिक तत्वों को विभिन्न कोशिकाओं तक पहुंचाना आदि। इसीलिए जल को परम औषधि माना गया है। जीवन की शुरुआत से उसके अंत तक जल हमारे साथ सदैव विद्यमान रहता है। जल ही जीवन है और जीवन से उसका जुड़ाव अटूट है, यह नितांत सत्य है।

पानी से रिश्ता अटूट है, सगे-संबंधियों से भी बढ़कर। यही कारण है कि आयु पर्यन्त पानी काम आता है और अंतिम विदाई में भी गंगाजल का प्रयोग होता है। अंतिम क्रिया के बाद भी अस्थियां पानी में विसर्जित की जाती हैं यानि पानी से रिश्ता जीवित रहने पर भी रहता है और मृत्योपरांत भी।

कहा गया है कि मनुष्य का स्वभाव पानीदार होना चाहिए। यानि स्वाभिमान से ओतप्रोत -रहिमन पानी राखिए बिना पानी सब सून - पानी नहीं होगा तो बहुमूल्य मोती भी नहीं मिलेगा। पानी नहीं तो धरती पर जीव का नामोनिशान नहीं होगा और आटे की रोटियां भी नहीं बनेगी, हालांकि रहीमदास जी ने पानी के माध्यम से आदमी को स्वाभिमान तथा इज्जत का पाठ पढ़ाया था। मनुष्य का व्यवहार पानीदार, पारदर्शी और पानी सा निर्मल होना चाहिए।

पानी का स्वभाव इतना लचीला होता है कि वह चाहे जिसमें मिश्रित किया जा सकता है। जिसमें मिलाओ वह वैसा ही बन जाता है इससे मनुष्य को सीख ग्रहण करनी चाहिए। जल को सृष्टि के विकास का आधार माना गया है इसलिए वह देव भी है।

जल हमारा प्राणरक्षक है। जल से प्रारंभ है और प्रारब्ध भी। जल न केवल जीवन धारण करता है बल्कि स्वयं जीवन भी हैं। एक वयस्क आदमी के शरीर में लगभग 70 प्रतिशत पानी अर्थात् 38 से 40 लीटर तक पानी होता है जो मांसपेशियों और रक्त में मिलता है। शरीर में पानी की कमी से हमें थकान महसूस हो सकती है। हमारे शरीर की कोशिकाओं के आसपास पानी की दो प्रतिशत कमी हो जाए तो हमारी 20 प्रतिशत ऊर्जा कम हो जाती है।

सुबह उठकर जल पीना कई रोगों से रक्षा करता है। पानी शरीर में होने वाले अनेक संभावित नुकसानों से भी रक्षा करता है। मस्तिष्क में करीब 80 प्रतिशत टिश्यू पानी से निर्मित होते हैं। इनके सूखने से मस्तिष्क गंभीर अवस्था में चला जाता है। मस्तिष्क के इस निर्जलीकरण से याददाश्त में कमी आ जाती है।

भारतीय ज्योतिष व लोक-परंपरा में जल को संकल्प के साक्षी का दर्जा दिया गया है जल से अर्घ्य देना, जल छिड़कर स्वस्ति-वाचन करना हमारी परंपरा के अभिन्न अंग हैं। भोजन से पूर्व प्रार्थना, पवित्रता के लिए जल का प्रयोग, विविध कर्मकांडों में जल का उपयोग तथा ऐसा कोई भी धार्मिक अनुष्ठान नहीं जिसमें जल कलश का पूजन न होता हो।

पवित्र नदियों, सरोवरों में स्नान करना, उनकी आरती उतारना आदि केवल कर्मकांड भर नहीं है। और अगर है भी तो यह संकेत देता है कि जल पवित्र है और उसे पवित्र रखने में ही हमारी भलाई है।

संपूर्ण ब्रह्मांड पंचतत्वों के अधीन है। पंचतत्व अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल व आकाश हैं। प्रकृति व शरीर में जल तत्व का संतुलन आवश्यक रूप से कायम रहना चाहिए।

वास्तुशास्त्र एवं फेंगशुई में भी जल को काफी महत्व प्रदान किया गया है। फेंगशुई में शुई का अर्थ ही जल होता है।

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