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पानीदार समाज

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भारत का बड़ा हिस्सा पानी के मामले में दूभर माना जाता है। विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात का सौराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश का रायलसीमा, महाराष्ट्र का मराठवाड़ा, मध्य प्रदेश का बुन्देलखण्ड, कनार्टक का कुर्ग क्षेत्र लगभग प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार अल्प वर्षा व चार वर्ष में एक बार अति वर्षा से जूझता है।

यहाँ जल संकट साल भर बना रहता है। इसके बावजूद कई गाँवों में कई ऐसे सेनानी हैं, जोकि जल संग्रहण के कार्य में अपनी तकनीक, श्रम और धन से पानी के प्राकृतिक संकट पर भारी हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में कई स्वयंसेवी संस्थाएँ व व्यक्ति पानी के संरक्षण के अनूठे प्रयोग कर रहे हैं। जहाँ देश का बड़ा हिस्सा पानी का संकट खड़ा होने पर सरकार व प्रकृति को कोसने व चीखने में लिप्त रहता है व इसे अपनी नियति मानकर कहीं से भी पानी चुराने की जुगत में रहता है, वहीं देश में कई लोग ऐसे भी हैं जो संकट को चुनौती के तौर पर लेते हैं, पानी की हर बूँद को सहेजते हैं, किफायत से खर्च करते हैं और वक्त के साथ अपने पुरखों से मिले ‘‘जल-संचय’’ ज्ञान को संवर्धित करते हुए अगली पीढ़ी को भरोसा दिलाते हैं कि यदि दिल में जज्बा हो तो पानी का कहीं अकाल नहीं है।

सौराष्ट्र इलाके में कई लाख कुएँ और नलकूप हैं, जिनमें से कई का जल स्तर 200 फीट तक गहरा है। पाँच लाख से ज्यादा पम्प सेट पानी को जमीन से उलीचने में लगे हुए हैं, जाहिर है कि पाताल पानी कितने दिन जिन्दा रहेगा। ऐसे में भावनगर जिले के खाणका, राजकोट के राजसमढियाला सांवरकुडला जैसे गाँवों में प्रेमजी भाई पटेल, हरदेव सिंह जडेजा, श्यामजी भाई अंटाला जैसे लेागों ने स्थानीय भूविज्ञान को पढ़कर पानी को संचित करने के अपने तरीके गढ़े है। और वे लाखें रुपए खर्च कर इंजीनियरिंग की डिग्री पाए ज्ञानियों की समझ से परे हैं। राजस्थान के अलवर जिले में अरवरी नदी के क्षेत्र में बसे 70 गाँवों द्वारा नदी को जिन्दा करने व अब उसके पानी व संसाधनों के उपभोग का फैसला सामूहिक तौर पर एक संसद बुलाकर करने का प्रयोग तो भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

‘‘पानीदार समाज’’ एक ऐसी पुस्तक है जिसमें ऐसे ही आशा जगाते चुनिन्दा अनूठे व अनुकरणीय प्रयोगों को चित्रों के साथ प्रकाशित किया गया है। यह जल संकट से परेशान लोगों के लिए उम्मीद की किरण तो है ही, साथ ही यह देश की जल-नीति निर्धारकों के लिए दस्तावेज भी है। झारखण्ड की राजधानी राँची से करीब अनगढ़ा प्रखण्ड में टाटी पंचायत के सिंगारी गाँव में 18 तालाब हैं जो हर कंठ की प्यास व हर खेत की आस को पूरा करते हैं।

पहले यहां ‘‘दांडी’’ हुआ करते थे, तालाब की ही तरह पारम्परिक जल-निधि। दांडी नष्ट होने के बाद वहाँ पानी की मारामारी हुई व गाँव वाले अपनी जड़ों की तरफ लौटे व तालाब बना दिए। जल जागरुकता के बाद अब वहाँ हरियाली व जंगल बचाने का काम भी बेहतरीन चल रहा है। उड़ीसा के सम्भलपुर का पाएँधरा में जल का जादू हो या अहमदाबाद जिले के धन्धुका तालुके के बोरासू जैसे गाँव जहाँ पानी पर ताला लगाया जाता है और उससे पानी निकालने व भरने का हिसाब रखा जाता है, या फिर उज्जैन जिले में महिदपुर के पास मोहिनुद्दीन पटेल द्वारा रची गई ‘‘बूँदों की बैरक’’- ऐसे ही कई प्रयोगों की जीवन्त कहानियों का संकलन अमन नम्र ने ‘‘चरखा’’ में काम करने के दौरान किया था।

लेखक अमन नम्र पत्रकार हैं और पिछले एक दशक से देश के विभिन्न हिस्सों में जारी कई जनान्दोलनों, सकारात्मक सामुदायिक प्रयासों के सहयात्री रहे हैं। लेखन व संचार विषय पर सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए देशभर में लगभग 50 कार्यशालाओं के संचालन के साथ-साथ कई पुस्तकों का लेखन व संपादन। नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए ‘‘हमारा पर्यावरण’’ पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने वाले श्री नम्र को वर्ष 2001 में भारतीय प्रतिष्ठान की ओर से दक्षिण एशिया मीडिया एक्सचेंज कार्यक्रम के तहत् नेपाल के लिए विशेष फ़ेलोशिप प्रदान की गई थी। इन दिनों वे दैनिक भास्कर, भोपाल के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत हैं।

यदि आपको भी यह भरोसा रखना है कि छोटे स्तर पर स्थानीय संसाधनों, तकनीक और पारम्परिक ज्ञान से किए गए प्रयोग कभी निराश नहीं करते तो यह पुस्तक जरूर पढ़ें। बड़े आकार में रंगीन चित्रों के साथ 70 पेज की इस पुस्तक का दाम महज रु. 135/ है और इसे आनॅलाईन भी खरीदा जा सकता है।

नेशनल बुक ट्रस्ट
 

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