पेड़ काटे जा रहे हैं, लगाए नहीं जा रहे

Submitted by Hindi on Wed, 12/07/2011 - 10:24
Source
नई दुनिया, 04 दिसम्बर 2011

डिब्रूगढ़ के जयपुर वर्षा वन के अंदर नदी को बांधकर पनबिजली परियोजना बनाने की तैयारी चल रही है। यदि वहां पर पानी के बहाव को रोका गया तो जमा पानी नए इलाके में पसर जाएगा। नीचे के इलाके में नदी का पानी गर्मी के दिनों में नहीं जाएगा तो वन्यजीवों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। वर्षा वन के कई वन्यजीव घने जंगल के बाहर नहीं आते हैं। वैसे जीवों को बचाना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए वर्षा वन को विकास से दूर रखना जरूरी है।

असम के वन एवं पर्यावरण मंत्री रकीबुल हुसैन यह मानने को भले ही तैयार न हों कि असम में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है, लेकिन असलियत यही है कि पूरे राज्य में अवैध रूप से रोजाना हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। वे यह जरूर मानते हैं कि सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने और ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर के निर्माण के लिए पेड़ों को काटने की मजबूरी थी। विकास योजनाओं के लिए कितने पेड़ काटे गए इसका सही आंकड़ा उन्हें पता नहीं था, लेकिन यह दावा जरूर करते रहे कि जितने पेड़ काटे गए हैं, उनसे पांच गुणा अधिक पौधे लगाए गए हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और है। गुवाहाटी से करीब के भी संरक्षित वन क्षेत्र लकड़ी माफियाओं तथा अतिक्रमणकारियों के कब्जे में हैं।

इसके चलते इन वन क्षेत्रों में पाए जाने वाले मूल्यवान शाल, सागौन आदि वृक्षों का अस्तित्व संकट में हैं। पश्चिम कामरूप के कुलसी संरक्षित वनांचल से मूल्यवान पेड़ों का तकरीबन सफाया ही कर दिया गया है। कुछ दिनों पूर्व वन मंत्री रकीबुल हुसैन ने कुलसी में एक वृक्षारोपण कार्यक्रम में हिस्सा लेकर कुलसी के पेड़ों के संरक्षण का आह्वान किया था, लेकिन मंत्री के इस आह्वान को नकारते हुए निखिल राभा छात्र संघ की छयगांव, लोहारघाट आदि आंचलिक समितियों ने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर एक सौ वर्ष से अधिक पुराने सागौन के पेड़ों को काटा जा रहा है। पहाड़ी इलाकों में चलाई जा रहीं अवैध आरा मिलों में इनकी सबसे ज्यादा मांग है। यहां इनकी कटाई कर गुवाहाटी भेजा जाता है। नदियों के किनारे अवैध खनन के कारण कामरूप जिले का पुराना शहर पलासबाड़ी ब्रह्मपुत्र में समा चुका है।

नए बसाए गए विजय नगर पर भी कटाव का खतरा मंडरा रहा है। रिको नदी से रेत निकालने का परमिट वन विभाग ने दिया है। नियम से किनारे से काफी दूर जाकर रेत उठाया जाना है। लेकिन ठेकेदार नदी के किनारे खुदाई करवाते हैं। इस वजह से किनारे की सख्त मिट्टी भी कट जाती है और बरसात में बाढ़ का पानी नदी के किनारे को काटता जाता है। वन एवं वन्यजीवों पर काम कर रहे स्वयंसेवी संगठन अरण्यक के जयंत तालुकदार का कहना है कि गैर जरूरी विकास योजनाओं की वजह से वर्षा वन के अस्तित्व को खतरा है। डिब्रूगढ़ के जयपुर वर्षा वन के अंदर नदी को बांधकर पनबिजली परियोजना बनाने की तैयारी चल रही है। यदि वहां पर पानी के बहाव को रोका गया तो जमा पानी नए इलाके में पसर जाएगा। नीचे के इलाके में नदी का पानी गर्मी के दिनों में नहीं जाएगा तो वन्यजीवों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। वर्षा वन के कई वन्यजीव घने जंगल के बाहर नहीं आते हैं। वैसे जीवों को बचाना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए वर्षा वन को विकास से दूर रखना जरूरी है।

स्वयंसेवी संगठन सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काटे जा रहे पहाड़ और पेड़ों से चिंतित हैं। वह चाहते हैं कि विकास के लिए पेड़ काटा जाए लेकिन सड़क बनने के बाद दोनों किनारों पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाए ताकि बारिश के पानी के साथ मिट्टी के क्षरण को रोका जा सके। पहाड़ और पेड़ की कटाई के साथ नए पौधे लगाने से वे कुछ वर्षों में बड़े होकर मिट्टी के कटाव को रोक पाएंगे और सड़क किनारे छांव भी मिलेगी। पहाड़ भी नंगे होने से बच जाएंगे। लेकिन इस तरह की कोई योजना नहीं है। जिसके परिणामस्वरूप पहाड़ की मिट्टी सड़कों पर गिरती रहेगी और भूस्खलन से सड़कें कटती रहेंगी।

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