पेड़ नहीं घास बचाएगी रेगिस्तानीकरण से

Submitted by admin on Tue, 09/14/2010 - 09:57
भारत का विशाल रेगिस्तान ‘थार‘ फैलता ही जा रहा है और यह प्रतिवर्ष करीब 12000 हेक्टेयर उपयोगी भूमि को या तो निगल रहा है या उसे खराब कर रहा है। इससे सचेत होकर राजस्थान सरकार ने राज्य प्रदूषण निवारण बोर्ड से पूछा है कि भूमि को खराब होने और भू क्षरण से कैसे रोका जा सकता है। बोर्ड द्वारा सूखी धरती पर जलवायु परिवर्तन से संबंधित 200 शोध पत्रों के अध्ययन के पश्चात यह सुझाव दिया गया कि राज्य में व्यापक स्तर पर पेड़ों की बागड़ लगाई जाए। परंतु कुछ वैज्ञानिकों को डर है कि यह कदम रेगिस्तान के संवेदनशील पर्यावरण को और अधिक बिगाड़ेगा। हड़बड़ी में किया गया कार्य कभी-कभी अच्छी भावना से किए गए कार्य को भी संदेह के घेरे में ले आता है। राजस्थान में रेगिस्तानीकरण को रोकने के लिए पेड़ों की बागड़ का विचार भी ऐसा ही एक कदम है। आवश्यकता इस बात की है कि पारंपरिक ज्ञान का सहारा लेकर और भूजल आधारित खेती को समाप्त कर रेगिस्तानीकरण रोकने की नई रणनीति बनाई जाए।

भारत का विशाल रेगिस्तान ‘थार‘ फैलता ही जा रहा है और यह प्रतिवर्ष करीब 12000 हेक्टेयर उपयोगी भूमि को या तो निगल रहा है या उसे खराब कर रहा है। इससे सचेत होकर राजस्थान सरकार ने राज्य प्रदूषण निवारण बोर्ड से पूछा है कि भूमि को खराब होने और भू क्षरण से कैसे रोका जा सकता है। बोर्ड द्वारा सूखी धरती पर जलवायु परिवर्तन से संबंधित 200 शोध पत्रों के अध्ययन के पश्चात यह सुझाव दिया गया कि राज्य में व्यापक स्तर पर पेड़ों की बागड़ लगाई जाए। परंतु कुछ वैज्ञानिकों को डर है कि यह कदम रेगिस्तान के संवेदनशील पर्यावरण को और अधिक बिगाड़ेगा।

राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रमुख सचिव वी.एस सिंह का मत है कि अनेक अध्ययनों ने सुझाया है कि भविष्य में होने वाले जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का प्रभाव कम करने और उन्हें अनुकूल बनाने के लिए आवश्यक है कि इसमें मानवीय हस्तक्षेप भी आनुपातिक ही हो। उनके विभाग ने भूमि के ह्रास के दो कारणों वायु क्षरण एवं भूमि का क्षारीयकरण की पहचान करते हुए सुझाव दिया है कि इसे पुनःवनीकरण, वनों के संरक्षण एवं पेड़ों की बागड़ लगाकर काबू में किया जा सकता है।

आई.आई.टी. खड़गपुर एवं भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलुरू के वैज्ञानिकों की सहायता से तैयार की गई समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि ये बागड़ें धूल के तूफान के वेग में अवरोध पैदा करेंगी, भूमि का क्षरण कम करेगीं तथा रेत के टीलों के जगह बदलने को सीमित करेगी। सिंग का कहना है कि पेड़ कार्बन सिंक (संग्रहण) का भी कार्य करेंगे।

बोर्ड की अनुशंसाएं उन शोध पत्रों पर आधारित हैं जिनमें बीकानेर से लेकर रामगढ़ तक का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि पौधारोपण के पश्चात इस इलाके की जलवायु में सुधार आया है। सन् 1960 से वन विभाग ने यहां की सड़कों, रेल पटरियों और नहरों के किनारे 36000 कि.मी लम्बी बागड़ लगाई है। बोर्ड ने इस सदंर्भ में चीन में गोबी रेगिस्तान को रोकने के लिए वन पट्टियों के रूप में बनाई गई ‘चीन की हरी दीवार‘ का भी अध्ययन किया है। इस परियोजना के अन्तर्गत सन् 1978 से 2009 तक 5 करोड़ हेक्टेयर इलाके पर रोपण किया जा चुका है। समीक्षा पत्र में दावा किया गया है कि इसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में धूल के तूफान आना कम हो गए हैं।

सभी संतुष्ट नहीं
राजस्थान स्थित स्कूल आफ डेजर्ट साइंस के एस.एम. महनोत का कहना है कि महान हरी दीवार (ग्रेट ग्रीन वाल) की तरह बागड़ लगाने की परियोजनाएं उचित नहीं हैं क्योंकि इस तरह की परियोजनाओं में एक ही तरह के पेड़ (मोनोकल्चर) लगाए जाते हैं। जिससे उस इलाके के वनों की जैव विविधता कम हो जाती है तथा स्थानीय पौधे और पशु भी प्रभावित होते हैं। उनका कहना है कि यदि स्थानीय पौधों की प्रजातियां भी लगाई जाती हैं तो भी सूखी भूमि का नाजुक पर्यावरण इतने विशाल पैमाने पर पौधों की वृद्धि को सहन ही नहीं कर सकता। महनोत का कहना है चरागाह और वर्षा आधारित खेती के स्थान पर भूमि का उपयोग बोर वेल आधारित अधिक सिंचाई वाली कृषि भूमि में करने से भी रेगिस्तानीकरण बढ़ा है। कृषि का विकास तो होना चाहिए लेकिन उन्हीं फसलों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जिनमें पानी की खपत कम हो। महनोत का मानना है कि ‘रेगिस्तानीकरण को रोकने के लिए रेगिस्तान के पांरपरिक ज्ञान को महत्व दिया जाना चाहिए।‘ इस संबंध में सुझाव देते हुए उन्होंने इंगित किया कि अधोसंरचना विकास और खनन् राजस्थान में भूमि के ह्रास के दो प्रमुख कारण हैं।

थार रेगिस्तान स्थित रेत के टीलों का पिछले 30 वर्षों से अध्ययन कर रहे आर.एस. मेढ़तिया भी इस बात से सहमत हैं। अपने सहयोगी प्रियब्राटा सांट्रा के साथ मिलकर उन्होंने राजस्थान स्थित केन्द्रीय सूखी भूमि क्षेत्र शोध संस्थान (सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टिट्यूट) के माध्यम से राजस्थान के दो प्रमुख चरागाहों, जैसलमेर और चंदन का अध्ययन किया है। गर्मियों के चार महीनो में जैसलमेर में अत्यधिक चराई से और चंदन जहां पर न्यूनतम चराई होती है, के मुकाबले चार गुना अधिक भूमि का नुकसान हुआ। शोधकर्ताओं ने 13 मई के ईओलिअन रिसर्च के आनलाइन संस्करण में बताया है कि, ‘भारत के थार मरुस्थल का 80 प्रतिशत हिस्सा चरागाह है। नियंत्रित चराई के माध्यम से इन्हें सुरक्षित कर धूल के तूफानों से होने वाला भूमि ह्रास और मिट्टी का क्षरण रोका जा सकता है।‘ मेढ़तिया और सांट्रा ने यह सुझाव दिया है कि घास की पारंपरिक किस्म ‘सीवान‘ का क्षेत्र बढ़ाने से भूमि को क्षरण से रोका जा सकता है और इससे जानवरों को चारा भी उपलब्ध हो पाएगा।(सप्रेस/डाउन टू अर्थ फीचर्स)

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