पेशवा बाजीराव-मस्तानी के अमर प्रेम का गवाह है जैतपुर-बेलाताल

Submitted by Hindi on Sun, 01/17/2016 - 15:06
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'आल्हा-ऊदल और बुंदेलखण्ड' पुस्तक से साभार

जैतपुर-बेलातालकमल- कुमुदिनियों से सुशोभित मीलों तक फैले बेलाताल झील के किनारे खड़े जैतपुर किले के भग्नावशेष आज भी पेशवा बाजीराव और मस्तानी के प्रेम की कहानी बयाँ करते हैं। ऋषि जयन्त के नाम पर स्थापित जैतपुर ने चन्देलों से लेकर अंग्रेजों तक अनेक उतार चढ़ाव देखे हैं।

जैतपुर की शोभा में चार-चाँद तब लगा जब 17वें चन्देल नरेश मदन वर्मन के कनिष्ठ भ्राता बलवर्मन ने 1130 ई. में यहाँ पर एक झील का निर्माण कराया जो बेलाताल के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन्हीं बलवर्मन के निर्देशन में महोबा का मदन सागर, कबरई का ब्रह्मताल और टीकमगढ़ का मदन सागर भी बना।

कालान्तर में यह क्षेत्र चन्देलों से सूर्यवंशी बुन्देलों के आधिपत्य में आया। राजा छत्रसाल ने अपने पुत्रों के बीच साम्राज्य का विभाजन किया जिसमें ज्येष्ठ हृदयशाह और पन्ना और कनिष्ठ जगतराज को जैतपुर का राज्य मिला। राजा छत्रसाल के निर्देशन में ही जैतपुर का किला बना जिसमें बादल महल और ड्योढ़ी महल विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिसका उल्लेख ट्रीफैनथेलर ने भी किया है।

जैतपुर का इतिहास उस समय अचानक मोड़ लेता है जब इलाहाबाद के मुगल सूबेदार मुहम्मद खां बंगश ने 1728 ई. में जैतपुर पर आक्रमण किया और जगतराज को किले में बन्दी बना लिया। राजा छत्रसाल उस समय वृद्ध हो चले थे। मुगलसेना की अपराजेय स्थिति को देखकर उन्होंने एक ओर तो अपने बड़े पुत्र हृदयशाह जो उस समय अपने अनुज जगतराज से नाराज़ होकर पूरे घटनाक्रम के मूकदर्शक मात्र बने थे, को पत्र लिखा कि बारे ते पालो हतो, पौनन दूध पिलाय! जगत अकेलो लरत है, जो दुख सहो न जाये। तो दूसरी ओर उन्होंने मराठा पेशवा बाजीराव से सहायता की विनती निम्न शब्दों में की-

जो गति भई गज ग्राह की, सोगति भई है आय
बाजी जात बुन्देल की, राखों बाजीराव।


बाजीराव को मराठा इतिहास में ‘लड़ाकू पेशवा’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने जंजीरा के सिद्दियों और पुर्तगालियों को हराकर विशेष ख्याति अर्जित की थी। शिवाजी के नारे ‘हिन्दू पद पादशाही’ को उनके समय विशेष बुलन्दी मिली। हैदराबाद के निजाम का भी इन्होंने मान-मर्दन किया। पेशवा बाजीराज (1720-40 ई.) इतने खुबसूरत थे कि वो घोड़े पर चलते तो महिलाएँ उनको देखने के लिये घरों से निकल आतीं। 1737 ई. में जब पेशवा ने महज कुछ घुड़सवारों के साथ दिल्ली पर आक्रमण किया तो मुगल बादशाह दिल्ली छोड़ने के लिये तैयार हो गया।

राजा छत्रसाल का पत्र पाते ही पेशवा अपनी घुड़सवार सेना के साथ जैतपुर आते हैं और एक रक्तरंजित युद्ध में मुहम्मदखां बंगश पराजित होता है और उसका पुत्र कयूम खान जंग में काम आता है, जिसकी कब्र मौदहा में आज भी विद्यमान है।

इस प्रकार वृद्धावस्था में राजा छत्रसाल की आन बची। उन्होंने पेशवा बाजीराव को अपना तीसरा पुत्र माना और झाँसी, गुना का क्षेत्र मराठों को मिला। जैतपुर के युद्ध ने मराठों को बुन्देलखण्ड में स्थापित किया। मराठाकालीन किले, बावड़ियाँ और मन्दिरों के अवशेष आज भी बुन्देलखण्ड में उनके गौरव की गाथा गाते हैं। छत्रसाल की वसीयत डॉ. महेन्द्र प्रताप सिंह की पुस्तक में उद्धृत है-

‘‘लिख दई श्री महाराजाधिराज महाराजाश्री राजा छत्रसाल जू देव ने येते श्री पेशवा बाजूराव जू कौ, आपर बंगस लो लड़ाई में हमने तुमको बलावो, तुमने फतै करी’’ ऊको भगा दयौ, हम तुमारे ऊपर खुशी हैं, तुमने बुढ़ापे में बड़ी मरजाद राखी ती पाय, तुमकौ राज्य से तीसरा हीसा मिलहै। अबे ईसैं नहीं देते कै लड़ै मिरे से कछु जागा और मिल गई तौ फिर सब हिसाब लगा कै तीसरा हीसा दवो जैहै। हमै सो अपना समझिओ। हाल में दो लाख रुपैया तुमारे खर्च को दए जात हैं सौ लियौ।’’
(बैसाख सुदि 3 संवत 1783 बमुकाम जैतपुर)

जैतपुर के युद्ध में पेशवा ने एक महिला को भी लड़ते हुए देखा और उसके कद्रदान हो गए। पेशवा ने छत्रसाल से उस महिला योद्धा की माँग की। यह योद्धा मस्तानी थी, जो छत्रसाल की पुत्री थी। डॉ. गायत्री नाथ पंत के अनुसार छत्रसाल ने मध्य एशिया के जहानत खां की एक दरबारी महिला से विवाह किया था, मस्तानी उसी की पुत्री थी। मस्तानी प्रणामी सम्प्रदाय की अनुयायी थी, जिसके संस्थापक प्राणनाथ के निर्देश पर इनके शिष्य कृष्ण और पैगम्बर मुहम्मद की पूजा एक साथ करते थे। छत्रसाल ने ड्योढ़ी महल में एक समारोह में पेशवा और मस्तानी का विवाह कराकर उसे पूना विदा किया।

छत्रसाल ने इस कन्यादान के माध्यम से एक तीर से कई निशाने साधे। छत्रसाल जानते थे कि बुन्देला साम्राज्य जो उसके अनेक पुत्रों में विभाजित है, मुगलिया कोप से तभी तक सुरक्षित रह सकता है, जब उस पर मराठों का वरदहस्त हो। विवाह के बाद यह उम्मीद भी थी कि बाजीराव सरदेशमुखी और चौथ की माँग नहीं करेगा जो कि मराठों का पुश्तैनी कर था। बुन्देलों से मित्रता बाजीराव की भी मजबूरी थी। दिल्ली पर आक्रमण का रास्ता बुन्देलखण्ड से होकर जाता था। इस क्षेत्र में मित्रों का होना बाजीराव के लिये बहुत आवश्यक था। छत्रसाल की मृत्यु के उपरान्त उसके दोनों पुत्रों हृदयशाह और जगतराज ने इस मित्रता की डोर को बखूबी निभाया। वो लड़ाइयों में बाजीराव के अन्त तक साथ रहे, कुछ बड़ी लड़ाइयों का खर्च भी उठाया।

छत्रसाल की पुत्री मस्तानी जब ढेर सारे अरमान लिये पूना पहुँची तो पूना उसको वैसा नहीं मिला, जैसा उसने सोचा था। पेशवा की माता एवं छोटे भाई ने इस सम्बन्ध का पुरजोर विरोध किया। पेशवा ने मस्तानी का नाम नर्मदा रखा किन्तु यह मान्य नहीं हुआ। पेशवा और मस्तानी को एक पुत्र हुआ जिसका नामकरण पेशवा ने कृष्ण किया किन्तु पारिवारिक सदस्यों के विरोध के कारण कृष्ण का रूपान्तरण शमशेर बहादुर किया गया। रघुनाथ राव के यज्ञोपवीत संस्कार तथा सदाशिवराव के विवाह संस्कार के अवसर पर उच्चकुलीन ब्राह्मणों ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिस संस्कार में बाजीराव जैसा दूषित और पथभ्रष्ट व्यक्ति उपस्थित हो वहाँ वे अपमानित नहीं होना चाहते। इसी प्रकार एक दूसरे अवसर पर जब बाजीराव शाहू से भेंट करने के लिये उनके दरबार में गये तो मस्तानी उनके साथ थी। जिसके कारण शाहू ने उनसे मिलने से इनकार ही नहीं किया बल्कि मस्तानी की उपस्थिति पर असन्तोष भी व्यक्त किया।

बाजीराव-मस्तानी का प्रेम इतिहास की चर्चित प्रेम कहानियों में है। पेशवा ने विजातीय होते हुए भी मस्तानी को अपनी अन्य पत्नियों की अपेक्षा बेपनाह मुहब्बत दी। पूना में उसके लिये एक अगल महल बनवाया। मस्तानी के लगातार सम्पर्क में रहने के कारण पेशवा मांस-मदिरा का भी सेवन करने लगे। पेशवा खुद ब्राह्मण थे और उनके दरबार में ज्यादातर सरदार यादव थे, क्योंकि शिवाजी की माँ जीजाबाई यदुवंशी थीं और उसी समय से मराठा दरबार में यदुवंशियों की मान्यता स्थापित थी। दोनों जातियों में मांस-मदिरा को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। एक दिन आक्रोश में पेशवा के भाई चिमनाजी अप्पा और पुत्र बालाजी ने मस्तानी को शनिवारा महल के एक कमरे में नजरबन्द कर दिया, जिसे छुड़ाने का असफल प्रयास बाजीराव द्वारा किया गया। मस्तानी की याद पेशवा को इतना परेशान करती कि वो पूना छोड़कर पारास में रहने लगे। मस्तानी के वियोग में पेशवा अधिक दिनों तक जीवित न रहे और 1740 में पेशवा मस्तानी की आह लिये चल बसे। पेशवा के मरने पर मस्तानी ने चिता में सती होकर अपने प्रेम का इज़हार किया। ढाउ-पाउल में मस्तानी का सती स्मारक है।

बाजीराव-मस्तानी से एक पुत्र शमशेर बहादुर हुए जिन्हें बांदा की रियासत मिली और इनकी सन्तति नवाब बांदा कहलाई। शमशेर बहादुर 1761 ई. में पानीपत के युद्ध में अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों की ओर से लड़ते हुए मारे गए। इनकी कब्र भरतपुर में आज भी विद्यमान है जो उस समय जाटों के अफलातून सूरजमल की रियासत थी। शमशेर बहादुर-2, जुल्फिकार अली बहादुर और अली बहादुर-2 इस वंश के प्रमुख नवाब हुए। शमशेर बहादुर-2 मराठा समाज में पले बढ़े थे। उन्होंने बांदा में एक रंगमहल बनवाया जो कंकर महल के नाम से जाना जाता है। उन्होंने दूर-दूर से क्लासिकी गायकी के उस्तादों को बुलाकर बांदा में आबाद किया। उस मुहल्ले का नाम कलावंतपुरा था जो आजकल कलामतपुरा हो गया है। बांदा की जामा मस्जिद जो दिल्ली की जामा मस्जिद की तर्ज पर बनी है का निर्माण जुल्फिकार अली बहादुर ने कराया। मिर्जा गालिब इसी नवाब को अपना रिश्तेदार बताते हैं। अपनी मुफलिसी के वक्त गालिब बांदा आये और नवाब ने सेठ अमीकरण मेहता से उन्हें 2,000 रु. कर्ज अपनी जमानत पर दिलवाया। इसी परम्परा में नवाब अली बहादुर-2 हुए जिन्होंने 1857 में अंग्रेजों से भयंकर युद्ध किया। रानी झाँसी अलीबहादुर को अपना भाई मानती थीं और उनके सन्देश पर अली बहादुर उनके साथ लड़ने कालपी गए। 1857 में अली बहादुर ने बांदा को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।

1857 के गदर में बांदा पहली रियासत थी जिसने अपनी आज़ादी का ऐलान किया। कालान्तर में ह्विटलॉक ने यहाँ कब्ज़ा किया और भूरागढ़ के किले में लगभग 800 क्रान्तिकारियों को फाँसी दी गई। नवाब बांदा को इन्दौर निर्वासित कर दिया गया। इसके बाद बाजीराव-मस्तानी के वंशज इन्दौर में ही रहे।

जैतपुर राज्य उस समय स्वर्णिम युग में प्रवेश करता है जब यहाँ पर छत्रसाल के वंशज राजा पारीक्षत राज सिंहासन पर बैठते हैं। पारीक्षत अंग्रेजों की पराधीनता से बहुत दुखी थे। काशी नरेश की प्रेरणा पर उन्होंने 1836 ई. में ग्राम सूपा में एक ‘बुढ़वा मंगल’ का आयोजन किया और इसमें 53 रियासतों के राजाओं ने भाग लिया। पारीक्षत की प्रेरणा पर विद्रोह की अलख जगी। किन्तु चरखारी नरेश राव रतन सिंह की गद्दारी से उन्हें गिरफ्तार किया गया। और कानपुर में सवाई हाता सिंह में उनको और उनकी पत्नी रानी राजों को नजरबंद किया गया जहाँ 1853 र्इं. में अंग्रेजों ने पारीक्षत को विष दे दिया।

चरखारी नरेश राव रतन सिंह को देश भक्तों से गद्दारी के फलस्वरूप अंग्रेजों ने जैतपुर की जागीर उनके भाई खेतसिंह को दी। खेत सिंह नि:सन्तान मरे और मौका पाकर डलहौजी ने अपनी हड़प नीति के तहत 1849 ई. में जैतपुर को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया। इस प्रकार 1849 ई. में बाजीराव-मस्तानी के प्रथम मिलन का यह गवाह अंग्रेजों के आधिपत्य में चला गया।

जैतपुर-बेलाताल

सम्पर्क : कौशलेन्द्र प्रताप यादव, ग्राम-सारडीह, पो.-सैफाबाद, जिला-प्रतापगढ़, उप्र., मो. 09415167275, 09452814256, ईमेल- yadavkaushlendra@yahoo.in

मस्तानी एक मुश्किल किरदार (हशर मृदुल)
दीपिका पादुकोणदीपिका पादुकोण टॉप पर पहुँच चुकी हैं। इस साल उन्होंने 'पीकू', ‘तमाशा’ और ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसी सफल फिल्में दी हैं। इन फिल्मों में उनका अभिनय बताता है कि विविध किरदारों को परदे पर प्रामाणिकतासे जी लेने की उनमें भरपूर सामर्थ्य है। हालिया रिलीज फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ में निभाया मस्तानी का किरदार उन्होंने जिस शिद्दत से जिया है, वह काबिलेतारीफ है। अब तक ‘हंड्रेड करोड़ क्लब’ में एंट्री कर चुकीइस फिल्म में दीपिका की मौजूदगी निश्चित रूप से चार चाँद लगाती है।

लगातार हिट फिल्में देकर आप टॉप पर पहुँच चुकी हैं। इस सफलता को आप किस तरह लेरही हैं?
मैंने बड़ी मेहनत से यह सफलता पाई है। मैं जब नयी थी, तो मुझे फिल्म इंडस्ट्री के बारे में कुछ भी पता नहीं था। चूँकि मैं बॉलीवुड के बाहर की हूँ, इसलिए शुरू में मुझे थोड़ी परेशानी भी हुई। हर इंडस्ट्री की तरह बॉलीवुडके भी कुछ अलिखित कायदे कानून हैं, इन्हें समझने में मुझे वक्त लगा। मेरा कैरियर बहुत लंबा नहीं है, लेकिन इस दरमियान मैं कई फेज से गुजरी हूँ। फिल्में हिट होने के बाद मुझे बड़ी खुशी हुई, तो फ्लॉप होने के बाद अवसाद में भी जा पहुँची। लेकिन मैंने मेहनत का दामन कभी नहीं छोड़ा। आज मेरी फिल्में सफल हैं और इसकी मुझे बहुत खुशी भी है, परन्तु मेरे पाँव जमीन पर ही हैं। मेरे माता-पिता मुझे अब भी यही सीख देते रहते हैं कि कभी उड़ना मत। विनम्र बने रहना। हिम्मत कभी मत हारना। मुझे लगता है कि माता-पिता की इसी सीख ने मेरी सफलता की राह बनायी है।

आपको क्या लगता है कि टॉप पर बने रहने के लिये आपको अब कितनी जद्दोजहद करनी पड़ सकती है?
मैं टॉप या बॉटम जैसे शब्दों से अपने आपको नहीं आंकती। इस तरह का आकलन मीडिया करता है, जिससे मुझे कोई एतराज भी नहीं है। मुझे पता है कि हर हीरो या हीरोइन का एक फेज होता है। एक दिन हर किसी कावक्त बदलता है। शिखर पर पहुँचना शिखर पर बने रहने की तुलना में आसान होता है। मेरी हरदम कोशिश रहती है कि मैं अच्छी स्क्रिप्ट साइन करूँ। इधर मैंने काफी समय से नयी फिल्में साइन नहीं की हैं। मैंने कईस्क्रिप्ट पढ़ी हैं। उनमें से ही कुछ फिल्मों में काम करने के लिये हांमी भरूँगी।

‘बाजीराव मस्तानी’ में मस्तानी का किरदार काफी प्रशंसा पा रहा है। दर्शकों ने इस ऐतिहासिक रोल में आपको पसंद किया है। लेकिन खुद आपके लिये यह भूमिका कितनी चुनौती-पूर्ण रही?
मस्तानी की भूमिका मेरे लिये कई मायनों में कठिन थी। मेरी पूरी कोशिश रही थी कि इस किरदार को मैं मानिसक स्तर पर भी जिऊूँ। मुझे लगता है कि मैंने इस काम में काफी हद तक कामयाबी पाई। असल में जबमैं मस्तानी का रोल कर रही थी, उसी दौरान दो अन्य फिल्मों की भी शूटिंग कर रही थी। मेरे हाथ में तीन फिल्में थीं। तीनों की शूटिंग एक साथ ही चल रही थी। यह सच है कि मस्तानी के किरदार के लिये मुझे बहुतमेहनत करनी पड़ी। इस रोल ने मुझे फिजिकल चैलेंज भी दिया और मानिसक स्तर पर भी उद्वेलित किये रखा। मस्तानी को जानने के लिये मैंने किताबें पढ़ी। घुड़सवारी सीखी। तलवार चलाने का अभ्यास किया।कथक सीखा। चूँकि मैंने स्कूल के दिनों में भरतनाट्यम सीखा है, इसलिए कथक का अभ्यास करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं आयी।

इस तरह की फिल्में मेनस्ट्रीम हीरोइन के लिये तलवार की धार जैसी होती हैं। क्या पीरियड फिल्में आपको आकर्षित करती रही हैं?
किसी भी हीरोइन के कैरियर में ऐसे मौके कम आते हैं कि उसे अच्छी पीरियड फिल्म ऑफर हो। ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसी स्क्रिप्ट बहुत कम लिखी जाती है। संजय लीला भंसाली जैसा फिल्मकार उसे बना रहा हो, तोआकर्षित होना स्वाभाविक है। पीरियड फिल्मों के लिये बैनर और निर्देशक की ओर देखना बहुत जरूरी होता है। ये फिल्में हर लिहाज से कठिन होती हैं। आज के दौर में किसी पीरियड फिल्म में काम करना निश्चित रूप सेजोखिम भरा काम है। जरा भी संतुलन बिगड़ा नहीं कि गये काम से। भंसाली जैसे कल्पनाशील निर्देशक ही ऐसे विषयों के साथ न्याय कर सकते हैं। हालाँकि मैंने पहली बार पीरियड फिल्म में काम नहीं किया है। मैंनेआशुतोष गोवारिकर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘खेले हम जी जान से’ की थी। यह फिल्म चल नहीं पायी थी, लेकिन इसकी विषय वस्तु भी बेहतरीन थी।

इस साल आपकी 'पीकू', ‘तमाशा’ और ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसी तीन अगर अंदाज की फिल्में रिलीज हुई हैं। तीनों ही फिल्मों में आपने विश्वसनीय अभिनय किया है। आप अपनी फिल्मों का चयन किस आधार पर करती हैं?
मेरी कोशिश होती है कि एक जैसी विषय वस्तु की फिल्म से बचूँ। मैं नये किरदार करने को वरीयता देती हूँ। मैंने ‘फाइंडि़ग फेनी’ जैसी फिल्म की, तो 'पीकू' भी की। ‘ये जवानी है दीवानी’ और ‘तमाशा’ भी की। ‘बाजीरावमस्तानी’ ने जरूर मेरे कैरियर को एक नया आयाम दे दिया है। इस किरदार के लिये मुझे बहुत तारीफ मिल रही है। यह भूमिका मेरे लिये काफी कठिन भी थी। कह सकते हैं कि मस्तानी ने कई तरह से मेरी परीक्षा ली।

अभी तक के अभिनय कैरियर में आपके दिल के करीब किरदार कौन सा है ?
मैं फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ में नैना के किरदार को अपने दिल के काफी करीब मानती हूँ। नैना एक ऐसी लड़की है, जो खुद को खोजती है और इस काम में कामयाबी पाती है। यह एकदम अलग तरह का रोल है।मैं अपने आपको इस रोल से बहुत ज्यादा रिलेट करती हूँ। मैं काफी हद तक नैना जैसी ही हूँ।

एक अभिनेत्री के रूप में आपने अब तक अपना कितना विकास किया है?
पहले मेरी दोस्ती कैमरे से नहीं थी। मैं कैमरे के आगे जाते ही सतर्क हो जाया करती थी। मैं रटकर अपने डायलॉग बोलती थी। जल्दी नर्वस हो जाती थी। लेकिन अब काम करते हुए मैंने काफी कुछ सीखा है। मेरे भीतरआत्मविश्वास आ चुका है। अब मैं अपनी भूमिका को एक लयात्मक तरीके से अभिनीत कर लेती हूँ।

आपकी दोस्ती रणबीर कपूर से भी है और रणवीर सिंह से भी। आप किसके नजदीक ज्यादा हैं?
दोनों ही मेरे पक्के दोस्त हैं। दोनों का मिजाज एकदम अलग है, लेकिन दोनों ही बनावटी नहीं हैं। रणबीर कपूर थोड़े गम्भीर किस्म के हैं, तो रणवीर सिंह काफी खुले दिल के हैं। दोनों में एक कॉमन बात यह है कि वेशानदार एक्टर हैं।

घर में आपका सबसे बड़ा क्रिटिक कौन है? मम्मी या डैड?
मेरी सबसे बड़ी क्रिटिक मेरी बहन है। वह बिना किसी झिझक के मेरी खामियां गिना देती है। वह इस मामले में कोई लिहाज नहीं करती है। वह मेरी हर फिल्म देखती है। बहन की तुलना में माँ जरूर थोड़ी सॉफ्ट हैं। लेकिनमेरी आलोचना में वे भी सख्ती दिखाती हैं। डैड जरूर मेरे साथ खड़े नजर आते हैं। उन्हें मेरी की हुई हर चीज अच्छी लगती है।

कभी फुर्सत मिले, तो आप क्या सीखना चाहती हैं?
मुझे म्यूजिक से बहुत लगाव है। खास तौर पर मैं गिटार और पियानो सीखना चाहती हूँ। मुझे लगता है कि तनाव दूर करने का इससे बड़ा साधन कोई दूसरा नहीं। लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मेरे पासइतना वक्त कब होगा कि मैं गिटार या पियानो का अभ्यास कर पाऊूँगी।

अब आपके हाथ में एक भी नयी फिल्म नहीं है। आगे किस फिल्मकार के साथ काम करने जा रही हैं?
इस संबंध में जल्द ही निर्णय ले लूँगी। मैं जल्दबाजी में किसी एक फिल्मकार का नाम नहीं बता सकती।

इधर खबर है कि आप अब हॉलीवुड में भी सक्रिय होने जा रही हैं। आपने एक अंग्रेजी फिल्म में काम करने का मन बना लिया है?
मैंने कोई हॉलीवुड फिल्म साइन नहीं की है। पता नहीं, किसने यह खबर उड़ाई है। मैं हॉलीवुड की ऐसी किसी फिल्म में काम नहीं करूँगी, जिसमें कि मेरा नाम मात्र का रोल हो। मुझे हॉलीवुड का ठप्पा लगवाने का कोई शौक नहीं है। बेहतरीन स्क्रिप्ट मिलेगी, तो जरूर विचार करूँगी। वरना मैं हिंदी फिल्मों में काम कर काफी खुश हूँ।

शुक्रवार, 15-21 जनवरी, 2016

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