प्रदूषण ने लगाई पानी में आग

Submitted by Hindi on Sat, 05/23/2015 - 10:45

बेलंदूर की घटना बंगलूरू के लिए चेतावनी है कि यदि अब तालाबों पर अतिक्रमण व उनमें गन्दगी घोलना बंद नहीं किया गया तो आज जो छोटी सी चिंगारी दिख रही है, वह कभी भी बड़ी ज्वाला बन सकती है, जिसमें जल-संकट, बीमारियाँ, पर्यावरण असन्तुलन की लपटें होंगी।

यह सारी दुनिया में सम्भवतया भारत में ही हुआ, जब एक बड़े से तालाब से पहले चार-चारफुट ऊँचे झाग बाहर निकले व सड़क पर छा गए और देखते ही देखते उसके बीच आग की लपट उठी व कई मिनट तक दूर तक सुलगती रही। बदबू, झाग से हैरान, परेशान लोग समझ नहीं पा रहे थे कि यह अजूबा है या प्राकृतिक त्रासदी, यह कोई दैवीय घटना है या वैज्ञानिक प्रक्रिया। बहरहाल बस यही बात सामने आई है कि कभी समाज को जीवन देने वाले तालाब के नैसर्गिक ढाँचे से की गई छेड़-छाड़ व उसमें बेपनाह जहर मिलाने से नाराज तालाब ने ही इन चिंगारियों के जरिये समाज को चेताया है। इतने गम्भीर मसले पर अभी तक तो बस कागजी शेर दहाड़ रहे हैं, लाल बस्ते में बँधे घोड़े कड़बड़-कड़बड़ कर रहे हैं। यह सब कुछ हुआ बीते शनिवार को देश के साईबर राजधानी व अपने बेहतरीन मौसम के लिए मशहूर बंगलूरू में।

देश के सबसे खूबसूरत महानगर कहे जाने वाले बंगलूरू की फिजा अब कुछ बदली-बदली सी है। अब यहाँ भीषण गर्मी पड़ने लगी है। जाहिर है कि इसके साथ गम्भीर जल-संकट भी पैदा हो गया है। यदि थोड़ी सी बारिश हो जाए तो कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मुख्यालय बंगलूरू पानी-पानी हो जाता है। कारण अब दबी जुबान से सामने आने लगा है- यहाँ के पारम्परिक तालाबों के स्वरूप के साथ अवांछित छेड़-छाड़ हुई, जिसके कारण यहाँ जल हर तरह का संकट बन गया है।

सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक नब्बे साल पहले बंगलूरू शहर में 2789 केरे यानी झील हुआ करती थीं। सन साठ आते-आते इनकी संख्या घट कर 230 रह गई। 1985 में शहर में केवल 34 तालाब बचे और अब इनकी संख्या तीस तक सिमट गई है। जल निधियों की बेरहम उपेक्षा का ही परिणाम है कि ना केवल शहर का मौसम बदल गया है, बल्कि लोग बूँद-बूँद पानी को भी तरस रहे हैं। वहीं ‘सेन्टर फॉर कन्जर्वेसन, इनवारमेंटल मैनेजमेंट एंड पाॅलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट’ ने दिसम्बर-2012 में जारी अपनी रपट में कहा है कि बंगलूरू में फिलहाल 81 जल-निधियों का अस्तित्व बचा है, जिनमें से नौ बुरी तरह और 22 बहुत कुछ दूषित हो चुकी हैं। शोधकर्ता पी जयप्रकाश, पीपी दास, डीजेमायथेरंड और श्रीनिवास ने ‘‘एसेसमेंट एंड कन्सर्वेसन स्ट्रेजेडीज फॉर वाटर बॉडीज ऑफ बंगलूरू’’ नाम से एक शोध पत्र तैयार किया, जिसमें चेताया गया है कि शहर के अधिकांश तालाबों के पानी की पीएच कीमत बहुत ज्यादा है।

ऐसी ही बिसरा दी गई एक झील है बेलंदूर, जो शहर के दक्षिण-पूर्व में स्थित है और आज भी यहाँ की सबसे बड़ी झील है। इसका क्षेत्रफल 148 वर्ग कि.मी. यानि कोई 37 हजार एकड़ है। कल्पना करें कि 3.6 किलोमीटर लम्बी झील, जिसका अतिरिक्त पानी बह कर अन्य झील वर्तुर में जाता है और आगे चल कर यह जल निधि पोन्नियार नदी में मिलती है। ऐसा नहीं है कि अचानक ही बेलंदूर में आग लग गई। अभी 26 अप्रैल को ही इससे जुड़ी वर्तुर झील में कई-कई फुट ऊँचे सफेद झाग का जंगल खड़ा हो गया था। उसकी जानलेवा बदबू और उसके पानी से शरीर पर छाले पड़ने का नजारा कई-कई घंटों तक लोगों ने देखा था। कुछ बयानबाजी हुई, नगरपालिका ने विकास प्राधिकरण और प्राधिकरण ने प्रदूषण बोर्ड व ऐसे ही जिम्मेदारियाँ एक दूसरे के सर पर मढ़ी जाती रहीं। उसकी अगली कड़ी थी जब 16 मई की रात को अगली सुबह तक इस झील के पानी में आग सुलगते हुए लोगों ने देखा। फिर 18 मई को भी पानी में चिंगारियाँ देखी गईं। कई स्थानीय खबरिया चैनलों ने पानी में आग लगने के वीडियो दिखाए।

यह बात तो सामने आ गई है कि बेलंदूर में आग लगने का कारण इलाके के कारखानों, गैराज से बहा, डीजल, पेट्रोल, ग्रीस, डिटरजेंट, जल-मल है। मीथेन की परत जल के ऊपरी स्तर पर बढ़ जाने से आग लगी सनद रहे कि अदालत के आदेश, जनता के विरोध व कई-कई कानूनों के बावजूद इस बेमिसाल झील में हर दिन 500 मीट्रिक लीटर अपशिष्ठ व गन्दा पानी बगैर किसी शोधन के सीधे डाला जाता है। इलाके के बिल्डरों व पूरे बंगलूरू में चल रहे निर्माण कार्य के ठेकेदारों के लिए मलवा डालने का मुफ्त और निरंकुश स्थान यही झील है। परिणामतः इसकी गहराई बेहद कम हो गई, इसमें कई-कई फीट गाद जमा हो गई व पानी को परिशोधित करने वाले नैसर्गिक उपकरण- वनस्पितयों, मछली व अन्य जन्तु पूरी तरह मर गए। प्रदूषण बोर्ड के मुताबिक इसके जल की गुणवत्ता ‘ई’ स्तर की है, यानि एक मृत जल निधि की। रही बची कसर पूरी कर दी इसके लबालब भरने पर अतिरिक्त जल बाहर निकालने के लिए बने रास्तों व नहरों पर अतिक्रमण ने। यहाँ तक कि इससे निकली एक नहर को नगर पालिका ने एक पुल बनाने के लिए घेर लिया है तो 64 फुट चौड़ी एक अन्य नहर को मलवे से पाट दिया गया। यदि पानी बहता रहता तो प्रदूषण का स्तर यह नहीं होता।

बेलंदूर तो महज एक बानगी है। बंगलूरू शहर में बस डिपो से ले कर स्टेडियम तक और फ्लाई ओवर से ले कर बड़ी कॉलोनियों तक उन जगहों पर बसे हैं। जहाँ अभी चार दशक पहले तक उफनते तालाब थे। अब शहर में जरा सा पानी बरसे, सड़कें तालाब बन जाती हैं, रहे-बचे तालाब उफन कर उसमें समाई गन्दगी-बदबू को बाहर फेंकने लगते हैं। बेलंदूर की घटना बंगलूरू के लिए चेतावनी है कि यदि अब तालाबों पर अतिक्रमण व उनमें गन्दगी घोलना बंद नहीं किया गया तो आज जो छोटी सी चिंगारी दिख रही है, वह कभी भी बड़ी ज्वाला बन सकती है, जिसमें जल-संकट, बीमारियाँ, पर्यावरण असन्तुलन की लपटें होंगी।

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