पर्यावरण के साथ होने का मतलब

Submitted by Hindi on Sun, 06/07/2015 - 11:31
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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 06 जून 2015

देश में राज-काज के साथ पर्यावरण के साथ होने की बात अब सभी को समझनी चाहिए, ऐसा न होने की स्थिति में इसके कई नकारात्मक मतलब निकल रहे हैं। पर्यावरण जागरूकता में वर्तमान संदर्भ में धरती का बढ़ता तापमान इस कदर चर्चा में है कि इसकी गूँज दुनिया के हर कोने में सुनाई दे रही है।

कहावत है कि बिगड़े पर्यावरण के साथ रहेंगे तो बीमार ही होंगे। पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि पर्यावरण को कितनी शिद्दत से सम्भाला गया है। वातावरण में जहर हो तो जीवन में जहर घुलने में देर नहीं लगेगी। पुस्तकों, पत्रिकाओं, समाचार पत्रों एवं टेलीविजन के माध्यम से भी इन चिन्ताओं को अक्सर पढ़ा और देखा गया है कि पर्यावरण को बनाए रखना इस धरा पर सबसे जरूरी कार्य है, पर यथार्थ यह है कि यहाँ की आबोहवा दिन-प्रतिदिन दूषित हो रही है।

जलवायु और पर्यावरणीय परिवर्तन के नकारात्मक होने के पीछे मानव की ही त्रुटियाँ रही हैं, इसके अलावा प्रकृति के अंदर का बदलाव और उसका अपना समावेशन भी इसके लिए उत्तरदाई है। विश्व अमीर-गरीब देशों में भी वर्गीकृत है, अमीर देश हैं तो कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी होगी, गरीब हैं तो काफी हद तक पर्यावरण प्रेमी की संज्ञा में निहित हो सकते हैं, पर इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि पर्यावरण का नाश किसी के द्वारा क्यों न हुआ हो, किन्तु इसके नकारात्मक प्रभाव की पहुँच सभी तक है।

मानव जनित ग्रीन हाउस गैसों विशेषकर कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन से होने वाला खतरा नि:सन्देह अब कोई अटलकलबाजियों का खेल नहीं रह गया है। इसके समाधान में विलम्ब होता रहा तो समूचे विश्व के लिए प्रलयकारी परिणाम होंगे। पृथ्वी बचाने की अवधारणा में निहित परिप्रेक्ष्य पर्यावरण का सन्तुलन ही है, साथ ही पटरी से हटी हुई जलवायु को पुन: उसी दशा में प्राप्त करना फिलहाल बड़ी चुनौती बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने हेतु अन्तरराष्ट्रीय सहयोग से कार्यवाही शुरू करने की आवश्यकता करीब तीन दशक पहले महसूस की गई।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1988 में एक प्रस्ताव इस विषय पर स्वीकार किया और जलवायु परिवर्तन को लेकर प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। जाहिर है कि वर्ष 1992 में रियो द जनेरियो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं पृथ्वी शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ। यहाँ से जलवायु परिवर्तन को लेकर एक संवेदनशील परिस्थिति देखने को मिलती है। पर्यावरण और पृथ्वी को सुरक्षित रखने वाली यात्रा को शुरू हुए दो दशक से अधिक हो चुके हैं। हालाँकि अन्तरराष्ट्रीय मानव पर्यावरण सम्मेलन स्टॉकहोम में 1972 में आयोजित हुआ था, यहीं से पाँच जून को अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस मनाने की परंपरा भी शुरू हुई।

पर्यावरण हो या जलवायु परिवर्तन इन दोनों में सुधार मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। स्पष्ट है कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण को लेकर चिन्ताएँ हैं। जहाँ तक भारत का प्रश्न है, पर्यावरण संरक्षण विषय को संविधान में महत्त्व दिया गया है। इससे सम्बन्धित प्रमुख कानूनों का प्रावधान भी देखा जा सकता है। भारतीय वन कानून 1927, पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 सहित देश में ब्रिटिश काल से लेकर अब तक दर्जनों कानून बने, पर इसका क्रियान्वयन सशक्त न होने के कारण तमाम कानून होने के बावजूद देश की पर्यावरणीय व्यवस्था हाँफने लगी है।

पर्यावरणीय समस्याओं के निराकरण के सम्बन्ध में सितम्बर 2003 में भारत के विधि आयोग ने अपनी 186वीं रिपोर्ट में पर्यावरण न्यायालयों के गठन का सुझाव दिया था। पर्यावरण सुरक्षा कानून के तहत इससे जुड़े प्राधिकरण का गठन केन्द्र सरकार को करने का अधिकार है। असल में पर्यावरण के संरक्षण के मामले में सरकारी और कानूनी स्तर पर जो प्रयास किए गए हैं, वे भरोसे पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते। दूसरी बात, देश में पर्यावरण को लेकर जागरूकता का भी अभाव है।

जिस देश में कृषकों की संख्या सर्वाधिक रही है और क्षेत्रफल भी खेती के मामले में अधिक रहा है, वहाँ पर्यावरण का संरक्षण अधिक कारगर सिद्ध हुआ है। भारत के मामले में देखा जाए तो आज भी 60 फीसदी किसान कृषि कार्य से जुड़े हैं, परन्तु औद्योगीकरण और शहरीकरण के चलते पर्यावरण बेतहाशा नाश की ओर बढ़ा है, जबकि किसानों द्वारा पर्यावरण मित्र होने का उदाहरण हमेशा से पेश किया गया है। भले ही देश के किसान पर्यावरण संरक्षण के मामले में पढ़े-लिखे लोगों की भाँति जागरूक न हो, पर इसके बचाव में ये कहीं अधिक बेहतर सिद्ध हुए हैं।

विश्व तेजी से औद्योगिक और तकनीकी होता जा रहा है। जैसे-जैसे सभ्यता परवान चढ़ रही है, वैसे-वैसे पर्यावरण को कीमत चुकानी पड़ रही है। पर्यावरण को सन्तुलित बनाए रखने के लिए 33 फीसदी वन की पर्याप्तता होनी चाहिए। भारत के मामले में औसत से यह 10 फीसदी नीचे चल रहा है। यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है, इस लिहाज से यहाँ का पर्यावरण अधिक विविधता से युक्त है। ऐसे में इसे संरक्षित करने वाली चुनौतियाँ भी तुलनात्मक अधिक ही हैं। पर्यावरण के साथ अन्याय होने पर पूरी धरा के साथ अन्याय होगा।

जिस प्रकार इसको लेकर स्थितियाँ बिगड़ी हैं, चिन्ता होना लाजमी है, परन्तु क्या सबक लिया गया, कहना कठिन है। बिगड़ी जलवायु से क्या नहीं बिगड़ रहा है। इसके बावजूद भी बिगड़ने का क्रम रुका नहीं है। तापमान में बढ़ोत्तरी, संक्रामक रोगों का बढ़ना, भारी बारिश, बाढ़, सूखा तथा तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आदि का चलन भी बढ़ गया है।

सन 1990 में करीब छह लाख लोग प्राकृतिक आपदाओं के शिकार बने थे, जिसमें 95 फीसदी मौतें विकासशील देशों में हुई थी। दिल और सांस सम्बन्धी रोगों से मृत्यु दर बढ़ रही है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते प्रदूषण में इजाफा दमा का कारण है। विश्व में 30 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी के शिकार हैं, जिसमें से पाँच करोड़ भारत से हैं।

दिल्ली प्रदूषण की राजधानी कही जा सकती है, यहाँ दमा रोगियों की संख्या किसी भी स्थान से सर्वाधिक है। हालाँकि सीएनजी आदि के चलते यहाँ के पर्यावरण को काफी कुछ सुधार लिया गया है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पर्यावरणीय घटाव के चलते वर्षा के स्तर में भी भारी बदलाव आया है। इससे खाद्यान्न उत्पादन में कमी जिसके चलते कुपोषण और खाद्य असुरक्षा का प्रसार सम्भव होता दिख रहा है।

भारत में जलवायु परिवर्तन के चलते बीते जनवरी से अप्रैल के बीच दर्जनों बार बेेमौसम बारिश का होना इसी प्रकार के लक्षण को इंगित करता है। ‘करेगा सो भरेगा’ यह पर्यावरण से हुए नुकसान की कीमत को दर्शाता है और मानव जीवन का सचेत सूचकांक भी है। भारत जैसे देश में पर्यावरण प्रबन्धन के विधिक दृष्टिकोण के विकास को लेकर अभी भी भूमिकाओं का विस्तार करना बाकी है।

देश में राज-काज के साथ पर्यावरण के साथ होने की बात अब सभी को समझनी चाहिए, ऐसा न होने की स्थिति में इसके कई नकारात्मक मतलब निकल रहे हैं। पर्यावरण जागरूकता में वर्तमान संदर्भ में धरती का बढ़ता तापमान इस कदर चर्चा में है कि इसकी गूँज दुनिया के हर कोने में सुनाई दे रही है। बढ़ती जनसंख्या और विश्व अर्थव्यवस्था के विकास और भरण-पोषण के लिए, जो दोहन प्राकृतिक संसाधनों का हो रहा है, उस पर अगर सधा हुआ दृष्टिकोण अब भी न पनप पाया तो धरा पर पसरे जीवन के लोप होने में अधिक समय नहीं लगेगा।

वनों की जिस प्रकार अंधाधुंध कटाई चल रही है, इससे तो पर्यावरण की सांस ही रुक जाएगी। परिप्रेक्ष्य यह भी है कि पर्यावरण के साथ कौन है? निहित भाव में पर्यावरण के बारे में सचेतता कम हो या ज्यादा इससे परे होते हुए इसे बनाए रखने के मामले में मुनाफा हमेशा पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों का ही होने वाला है।

ईमेल - sushilksingh589@gmail.com

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