पत्थरों पर खिलाए फूल

Submitted by Hindi on Mon, 02/06/2012 - 11:50
Source
संडे नई दुनिया, 05-11 फरवरी 2012

सहरसा के पटुआहा में बैंक की नौकरी छोड़कर वरुण सिंह ने डेयरी उद्योग लगाया है तथा वर्मी कम्पोस्ट का व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू किया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें भी प्रोत्साहित किया। पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ गांवों की आर्थिक हालत में बेहतरी के लिए वैसे पेड़ लगाने का माहौल बनाया जा रहा है जो कम समय में बड़े होकर किसानों को अधिक पैसे देते हैं। मधेपुरा के सिंहेश्वर में निदान बायोटेक के संचालक सुधीर कुमार सिंह द्वारा आस्ट्रेलियन टीक के उत्पादन का प्रयोग मुख्यमंत्री को इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने आवास पर भी लगाने का निर्देश दिए। यह पौधा पांच साल में लाखों रुपए देता है।

हौसला बुलंद हो तो बाधाओं के पहाड़ भी भरभरा कर गिर जाते हैं। दृढ़इच्छा शक्ति से नामुमकिन काम भी आसान हो जाता है, पसीना पत्थरों को पिघलाने में सफल होता है और तब खिलते हैं पत्थरों पर सुगंधित फूल। पहाड़- पुरुष के नाम से विख्यात गया के दशरथ मांझी ने गेहलौर पहाड़ी काटकर रास्ता बनाया था। बिहार ने उनके नाम पर दशरथ मांझी कौशल योजना चलाकर उनके इस जज्बे को सम्मान दिया। गया के ही महादलित सुग्रीव ने अकेले अपने दम पर 130 फुट लंबा और 50 फुट चौड़ा तालाब खोद डाला। सुग्रीव की इस कोशिश को अब सरकारी स्तर पर भी सराहना मिली और प्रशासन ने मनरेगा के तहत इस 'प्रभात सरोवर' के सौंदर्यीकरण की घोषणा की। अब गया के अतरी प्रखंड के ही रामजु मांझी ने पहाड़ काटकर 500 फुट लंबा रास्ता बनाकर नया इतिहास रच डाला है। उम्र के सत्तरवें पड़ाव पर आमतौर आदमी जोखिम भरे कार्यों से परहेज करने लगता है लेकिन रामजु मांझी ने हिम्मत नहीं हारी। अतरी प्रखंड मुख्यालय से धुसरी गांव की दूरी लगभग 15 किलोमीटर है। रास्ता नहीं रहने के कारण लोगों को पहाड़ पर चढ़कर ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरना पड़ता था। डिहुरी गांव के एक किसान ने मेले में गाय खरीदी और पहाड़ी रास्ते से गांव आते वक्त ही पहाड़ से गिरकर उसकी गाय की मौत हो गई। इस घटना ने रामजु को अंदर से हिला दिया।

दशरथ मांझी के बाद अब रामजु मांझी ने पहाड़ काटकर बनाई है राहदशरथ मांझी के बाद अब रामजु मांझी ने पहाड़ काटकर बनाई है राहरामजु मांझी ने तय किया कि अब कोई पहाड़ी रास्ते की भेंट नहीं चढ़ेगा। उसने पहाड़ काटकर रास्ता बनाने की ठान ली। उसके सामने दशरथ मांझी का चेहरा प्रेरणास्रोत के रूप में था। हथौड़ी, छेनी और टोकरी लेकर रामजु अपना संकल्प पूरा करने में जुट गए। किसी ने हौसला बढ़ाया तो किसी ने पागल करार दिया लेकिन रामजु ने आत्मविश्वास डिगने नहीं दिया। उन्होंने दस फुट चौड़े पत्थरों को छेनी और हथौड़े के बूते काटना शुरू कर दिया। संकल्प पूरा करने में रामजु मांझी को चौदह साल लग गए। अब पहाड़ की छाती चीरकर 500 फुट लंबी सड़क बन गई है। रामजु की मेहनत से न सिर्फ धुसरी बल्कि बारा, करजनी, कटइया जैसे दर्जनों गांवों के लोगों की जिंदगी आसान हो गई है। अब वे इसी सड़क से होकर अतरी और वजीरगंज बाजार जाते हैं। रामजु की मेहनत से धुसरी से वजीरगंज की दूरी 14 किलोमीटर घट गई है। पहले लोगों को 25 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता था लेकिन अब यह दूरी 11 किलोमीटर रह गई है। पत्नी सुगिया देवी के अलावा रामजु का कोई मददगार नहीं है। पांच कट्ठा जमीन है। वह भी बंजर। रामजु पसीना बहाकर खेतों में अनाज और सब्जियां उगाते हैं। छह बच्चे हैं। अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए मेहनत तो सभी करते हैं लेकिन रामजु ने पूरे इलाके को खुशहाल बनाने की कोशिश की है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के विकास को गति दी तो ग्रामीणों में भी उत्साह जगा। अब सूबे के हर कोने में खेती और स्वरोजगार के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। नीतीश ने इस प्रयोगों की न केवल सराहना की है बल्कि अपनी सेवा यात्रा के क्रम में उत्साही ग्रामीणों से मुलाकात कर उनका हौसला भी बढ़ाया है। बांका के बाबूमहल में नुनेश्वर मरांडी का बगीचा हो या सहरसा में वरुण सिंह का वर्मी कंपोस्ट का व्यावसायिक उत्पादन करने वाला केंद्र, मुख्यमंत्री सेवा यात्रा के दौरान हर प्रयोगधर्मी किसान को प्रोत्साहन दे रहे हैं। मुख्यमंत्री ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मुहैया कराकर सूबे के रहन-सहन के स्तर में सुधार लाना चाहते हैं और खेती के उन्नत तरीकों से पैदावार बढ़ाकर बेरोजगारी की समस्या के समाधान की भी ख्वाहिश रखते हैं। सेवा यात्रा में इसी दूरगामी लक्ष्य के लिए नींव के पत्थर गाड़े जा रहे हैं।

सेवा यात्रा के दौरान आस्ट्रेलियन टीक का पौधा देखते मुख्यमंत्री नीतीश कुमारसेवा यात्रा के दौरान आस्ट्रेलियन टीक का पौधा देखते मुख्यमंत्री नीतीश कुमारस्वयंसेवी सहायता समूहों को प्रोत्साहन देकर स्थानीय स्तर पर रोजगार में वृद्धि की संभावन को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शिद्दत से महसूस किया है। यह अनुभूति बांका की यात्रा के दौरान भी आकार लेती दिखी जब सूर्यमुखी स्वयंसेवा सहायता समूह एवं रजनीगंधा ग्रुप ने नीतीश को संस्था द्वारा बनाई गई बंडी और तसर की चादर भेंट की। नीतीश ने टसर आधारित उद्योग की संभावना पर भी अधिकारियों से बातचीत की है। बांका और भागलपुर में मलवरी और टसर के धागे का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है। उन्होंने टसर पालन केंद्र का मुआयना भी किया और बुनकरों के लिए पूंजी तथा बाजार की व्यवस्था की कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए। नीतीश के इन प्रयासों से बिहार के कोने-कोने में दम तोड़ रहे स्थानीय उद्योगों को भी नया जीवन मिलने की संभावना जगी है।

किसान-भूषण से सम्मानित किसान नुनेश्वर मरांडी अपनी 32 एकड़ जमीन पर आम, कटहल, अमरूद, पपीता, नीबू के उत्पादन के साथ-साथ मछली और मुर्गी पालन भी कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने किसानों को डेयरी उद्योग लगाने की भी सलाह दी। इसी तरह सहरसा के पटुआहा में बैंक की नौकरी छोड़कर वरुण सिंह ने डेयरी उद्योग लगाया है तथा वर्मी कम्पोस्ट का व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू किया है। मुख्यमंत्री ने उन्हें भी प्रोत्साहित किया। पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ गांवों की आर्थिक हालत में बेहतरी के लिए वैसे पेड़ लगाने का माहौल बनाया जा रहा है जो कम समय में बड़े होकर किसानों को अधिक पैसे देते हैं। मधेपुरा के सिंहेश्वर में निदान बायोटेक के संचालक सुधीर कुमार सिंह द्वारा आस्ट्रेलियन टीक के उत्पादन का प्रयोग मुख्यमंत्री को इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने आवास पर भी लगाने का निर्देश दिए। यह पौधा पांच साल में लाखों रुपए देता है।

पटना के फतुहा स्थित एक कमर्शियल भवन की रूपरेखापटना के फतुहा स्थित एक कमर्शियल भवन की रूपरेखामुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड में मुस्तफागंज गांव के मनोज ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वर्मी कंपोस्ट बनाकर गांव की तकदीर व तस्वीर बदल दी है। भूगोल में एमए के टॉपर रहे मनोज को आईएएस बन कर समाजसेवा करने की तमन्ना थी पर घर की आर्थिक तंगी ने मुकाम पर पहुंचने से पूर्व ही रोक दिया। अब किसानों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। मुंबई के धारावी में बैग बनाने वाले सर्फुद्दीन ने बिहार आकर उद्योग शुरू करने की ठानी तो सिलसिला बन पड़ा। छह सौ उद्यमी और चार हजार कारीगर बिहार आकर उद्योग लगाने वाले हैं। कारीगरों ने एसोसिएशन ऑफ प्रोगेसिव एंव रिसर्जेंट नेशनलिस्ट आवाम (अर्पणा) नाम से एक संस्था बनाई है। यह संस्था फतुहा में औद्योगिक कॉम्प्लेक्स बनाएगी जिसमें सौ करोड़ का निवेश प्रस्तावित है। चमड़े के बैग, जैकेट, बेल्ट जैसे सामान इसमें बनेंगे जिससे रोजगार की संभावनाएं जगेंगी।

मुजफ्फरपुर स्थित मुस्तफागंज गांव में वर्मी कंपोस्ट केंद्रमुजफ्फरपुर स्थित मुस्तफागंज गांव में वर्मी कंपोस्ट केंद्र

Email : raghvendra.mishra@naidunia.com

Disqus Comment