पथिक : बदल गईं पहाड़ की पलकें

Submitted by Hindi on Mon, 01/16/2017 - 10:46
Source
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2017

यात्राओं के सम्मोहक संसार में यूँ बदलता गया पथ और पथिक का रिश्ता

.1950 के दशक के मध्य तक मुक्तेश्वर नामक कस्बानुमा गाँव में मोटरगाड़ी नहीं पहुँची थी। सारी यात्राएँ पैदल ही शुरू और खत्म होती थीं। बस पकड़ने के लिये भुवाली तक और रेल की सवारी के लिये काठगोदाम तक संकरे-पथरीले, चढाई-उतार वाले रास्ते पड़ाव तक पहुँचाते थे। देवदार, बांज, पांगर, अखरोट के पेड़ों से बिछुड़ना इस बात का अहसास बढ़ाता था कि ‘घर’ छूट रहा है, चाहे कुछ ही दिनों के लिये हालाँकि जल्दी ही चीड़ के सुगंधित जंगल के बीच से उतरता पथ यह गम दूर करने लगता था। यह आशा जगाता कि रास्ते में जाने क्या-क्या नई-नई चीजें देखने को मिलेंगी। ‘लंबपुछड चिड़िया’, चालाक लोमड़ी, भूला भटका चुतरौल, लोहे की रस्सी पर झूलता पुल और घुटने तक पानी में डूब कर उन ‘गाडों’ (छोटी पहाड़ी नदियों) को पार करने का रोमांच जिन पर पुल नहीं बने थे।

हर दिशा रास्ते में सुस्ताने, थकान दूर करने के लिये हर तीन-चार मील की दूरी पर कुछ खाने पीने के लिये जाने पहचाने ठिकाने थे। अल्मोड़ा की तरफ सीतला, प्यूड़ा, घुराड़ी तो नैनीताल की ओर ओड़ाखान, नथुवाखान, तल्ला रामगाड, मल्ला रामगाड, गागर, श्यामखेत, भुवाली। काठगोदाम के लिये रास्ता कसियालेख से कटता था-धारी, पद्मपुरी, भीमताल होता।

कोई जगह मशहूर थी ठण्डे-मीठे पानी के धारे के लिये तो किसी खोमचेनुमा दुकान तक पहुँचते कदम अपने आप तेज होने लगते थे भुनी पत्तियों से बनी चाय और चटपटे आलू के गुटकों की उम्मीद में। सड़क किनारे जगह-जगह जहाँ गोमुख या लोहे के नल वाले धारे नहीं थे, वहाँ भी चट्टान से बूँद-बूँद रिसते पानी को ‘धार’ बनाने के लिये कौशल से बड़ा-सा हरा पत्ता इस्तेमाल किया जाता था। एकाध ज्यादा नमी वाली जगह ‘नौले’ मिलते-पहाड़ी बावली या मवेशियों के लिये कच्ची ‘हौद’। खेतों के बीच से गुजरती पतली कच्ची नालियाँ ‘गूल’ कहलाती थीं और जहाँ बारिश का पानी अपना रास्ता तलाश कर खुद बह निकलता था, वहाँ छोटे-बड़े ‘गधेरे’ जमीन को काटते खाई-सी बना देते थे। माँ को मोटर रास नहीं आती थी, पेट्रोल की बदबू से जी घबराता था। वह शादी के पहले कई बार यह सफर काठगोदाम से अल्मोड़ा तक का पैदल सफर तय कर चुकी थीं। हर बार उन्हें कोई परिचित नौला-धारा, पुलिया ग्राम देवता का मंदिर याद आने लगता। कहतीं, “बस आने ही वाला है वह ‘घट’ जो जहाँ से समतल शुरू होता है!” या “बड़ी ठंडी जगह है- यहाँ की गडेरी बड़ी मीठी होती है!”

पिता जब लखनऊ में डॉक्टरी पढ़ते थे तब 1920 के दशक के अंत में अल्मोड़ा से काठगोदाम का सफर लौरी में दो दिन में तय होता था बरास्ता कोसी-रानीखेत-गर्मपानी। कोई पचास साल बाद भी इन जगहों से गुजरते उन्हें ठोस जमा मलाईदार दही याद आ जाता था या फिर गर्मागर्म पूड़ी-आलू के साथ मिर्ची से भी तेज राई का रायता। मौसमी फल काफल-हिसालू, आडू-सेब, नाशपाती-पुलम खरीद कर कभी खाएँ हों, याद नहीं आता। रास्ते में जो बगीचे पड़ते उनके मालिकों की तरफ से यह दावत रहती।

अल्मोड़ा आधे दिन में पहुँचा जा सकता था, नैनीताल एक दिन का सफर तो काठगोदाम से रेल पकड़ने के लिये आमतौर पर रात कहीं बिताने का बंदोबस्त करने की दरकार होती थी। उस वक्त तक भी छोटी-छोटी बिना दरवाजे वाली ‘धर्मशालाएँ’ खंडहरों में तब्दील हो चुकी थीं और दुकानें या दूरदराज के रिश्तेदारों के घर ही ‘रैनबसेरे’ बन जाते थे। पिता बताते थे यह पुरानी धर्मशालाएँ ‘लछुगौड’ नाम के किसी रईस की परोपकारी विधवा ने उनकी याद में बनवाई थीं। ऐसी जाने कितनी धर्मशालाएँ बद्रीनाथ-केदारनाथ वाले यात्रापथ पर बिखरी थीं। कभी-कभार वह डाक-बंगले नजर आते थे जिन्हें अंग्रेज हाकिमों ने-खास कर जंगलात और सार्वजनिक निर्माण विभाग के अफसरों ने- अपने दौरों को आरामदेह बनाने के लिये बनवाया था। इनकी छतें मुक्तेश्वर के बंगलों की तरह लाल टीन की होती थीं और उसी अंदाज में ‘किचन’ और चौकीदार-खानसामा के रहने के लिये बनाया कमरा जरा अलग दिखता था।

उल्लेखनीय बात यह है कि पहले विश्व युद्ध के अंत से करीब 1962 वाले भारत-चीन युद्ध के अंतराल में पहाड़ी यात्राएँ बहुत कम बदली थीं- विकास के नाम पर सड़क, पुल भवन निर्माण ने पहाड़ को बुरी तरह घायल नहीं किया था। यात्रियों का रिश्ता रास्ते के साथ अपनेपन वाला था-सहयात्री पथिकों के साथ सुख-दुख साथ भोगने के जज्बे वाला। 1965 तक पैदल रास्ते छूटने लगे थे। दस-बारह मील पैदल चलने की बजाय मुक्तेश्वर से अल्मोड़ा जाने के लिये पचास साठ मील की बस यात्रा को विकल्प खर्चीला होने के बावजूद ‘बेहतर’ समझाया जाने लगा था।

पलक झपकते पथिक और पथ का रिश्ता बदल गया। अब बस चंद मिनट ठहरती थी, वह भी सवारी उठाने को। फुर्सत से गरम चाय गटकने, ताजा बना कुछ खाने की मोहलत नहीं थी। इसी मोहलत का फायदा उठा कुछ शौकीन साहसी अखबार के दोने में गरम पकौड़ियों के ऊपर रायता डलवा अपना जौहर दिखलाते थे। फिर यह भी झंझट का काम लगने लगा। दो चार साल में ही देखते-देखते गरम पानी और कोसी, रामगाड़-भुवाली उजड़ गए। बोतलबंद पानी, पैकेट वाली नमकीन, चूरन की जगह खट्टी-मीठी गोलियों ने ले ली। हार्न बजाती सरपट भागती बस से बाहर झांक कर न तो जाने पहचाने दरख्तों से दुआ सलाम सम्भव रही न ही खोमचे पर बैठे परिचित पुश्तैनी पारिवारिक मित्र दुकानदारों से। यह ना समझें कि हम वैज्ञानिक प्रगति के विरोधी, मोटर या रेल के सफर के जन्मजात दुश्मन हैं। हमारा दर्द यात्रा की रफ्तार तेज होने के साथ और उसके लगातार आसान और फिजूलखर्च होने को लेकर है। पर्यावरण के क्षय के साथ-साथ इस प्रवृत्ति ने हमारी संवेदनशीलता और मानवीय सहानुभूति को भी बेरहमी से नष्ट किया है।

अभी हाल में नैनीताल में ‘स्नो व्यू’ से रातीघाट-कैंची वाले पुराने पैदल रास्ते की छोटी सी इकदिनिया यात्रा ने घाव पर लगी पपड़ी खरोंच उसे हरा कर दिया। तीन चार मील के बाद ही चार फुट चौड़ा खच्चरों के लिये आरामदेह रास्ता पहले ऊबड़-खाबड़ पगडंडी में बदला फिर गायब हो गया। कहने को यह आरक्षित वन का हिस्सा है पर छंटनी के बहाने पेड़ो को इस तरह घायल किया जा चुका था कि वह हवा के हल्के झोंके से गिर जाएँ। नए मोटर पथ के निर्माण के लिये चट्टानें तोड़ी और पेड़ काटे जा रहे थे। गला कई जगह सूखा पर कोई सोता, धारा, नजर नहीं आया। नौला या घट तो बहुत दूर की बात है। शुरू में मिश्रित वन था जो जल्दी चीड़ की रियायत में बदल गया। साथी अनूप साह और वन निगम के अवकाश प्राप्त अधिकारी पांडे बड़े शौक से औषधीय वनस्पतियाँ दिखला रहे थे और सुंदर खलीज पक्षी भी। यह नुमाइशी नजारा भी जल्दी खत्म हो गया। जब भी किसी छोटे से गाँव का रुख किया तो आलू के चिप्स, नमकीन, गुटके के पैकटों का कचरा ही रास्ता में दिखता था।

जिस सफर में कभी करीब दो दिन लगते थे वह आज तीन-चार घंटे में निपट जाता है। जल्दी में हों तो बिना रास्ते में कहीं रुके। जितनी बार यह ‘यात्रा’ होती है कुछ बदला लगता है। सड़क के किनारे भवन निर्माण वर्जित करने वाले कानून की धज्जियाँ उड़ाती दुकानें और बहुमंजिली मकान पैदल यात्रा के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव की पहचान को धुँधला चुके हैं। घर से खाना लेकर चलने की जरूरत नहीं न ठंडे-मीठे पानी के सोतों- धारों की तलाश बाकी है। हर मोड़ पर बोतलबंद पानी और मशहूर कोल्डड्रिंक थोक के भाव मिल जाते हैं। जो ढाबे पहले पूड़ी आलू फिर कढी, राजमा चावल गर्व से खिलाते थे सुनसान हैं। ‘मैगी पॉइंट’ भी सीजन में ही गुलजार होते हैं। भीड़-भड़क्के तथा ट्रैफिक जाम से बचने के लिये जो ‘बाय पास’ बनाये गए हैं वह बस्ती से किनारा काट कर ही अपना नाम सार्थक कर सकते हैं अतः अल्मोड़ा हो या कोई और कस्बा दर्शनीय स्थल भी यात्री की नजर से ओझल होते जा रहे हैं। भूगोल बदलने के साथ स्थानीय इतिहास का ज्ञान लुप्त होता जा रहा है। साझे की विरासत का अवमूल्यन पर्यावरण को अनायास पर घातक रूप से संकट ग्रस्त बना चुका है।

कुछ वर्ष पहले जोरदार बारिश के बाद जो भूस्खलन हुए उन्होंने उत्तराखण्ड में प्रलय का दृश्य दिखला दिया। भुवाली से अल्मोड़ा तक का मोटर मार्ग कई महीने अवरुद्ध रहा। बद्री केदार यात्रा पथ की तबाही का मंजर तो और भी अधिक दिल दहलाने वाला था। इस बात को नकारना कठिन है कि यात्राओं को ‘सुखद’ और ‘लाभप्रद’ बनाने के लालच में हमने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी ही मारी है।

असली सवाल हम कब तक टालते रहेंगे कि हम कोई भी यात्रा क्यों करते हैं? क्या गैर जरूरी यात्राएँ सीमित संसाधनों की फिजूलखर्ची को ही नहीं बढ़ाती? जो यात्राएँ शौक के लिये की जाती हैं क्या उन्हें तेज रफ्तार से मशीनीकरण के बिना नहीं तय किया जा सकता? एक अंग्रेज कवि की पंक्ति है- ‘मंजिल तक पहुँचने से कहीं सुखद अनुभव होता है रास्ते से गुजरना!’ जो यात्राएँ लिंक से हटकर अनजानी राहों पर संपन्न होती हैं उनका आनंद अतुलनीय, अनिर्वचनीय होता है। डेविड फ्रोस्ट की ‘दि रोड लैस ट्रैवेल्ड’ इसी की तरफ इशारा करती है। अज्ञेय की अनेक मार्मिक कविताएँ भी यात्रा के सम्मोहक संसार का अविस्मरणीय सृजन करती हैं- ‘कितनी नावों में कितनी बार’ या ‘अरे! यायावर याद रहेगा!’।

वास्तव में हर यात्रा बाहरी दुनिया के साथ ही नहीं हमारे अंतरतम से भी हमारा नाता जोड़ती है, मजबूत करती है ‘यादें’ बनाती हुई और ताजा कर तीर्थ यात्राएँ यही असली पुण्य अर्जित करती हैं। यात्रा के अनुभव का साझा ही असली प्रसाद वितरण है। अतः ‘चरैवेति !’ सैर करिए, सफर पर निकलिये पर जिम्मेदारी के साथ। हम सफर मनुष्यों के साथ बाकी पशु-पक्षियों वनस्पतियों के सह-अस्तित्व को ध्यान में रखते हुए।

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