पुरानी या नई कारें, उन्हें बसों के लिये रास्ता बनाना होगा

Submitted by RuralWater on Mon, 08/03/2015 - 11:32
दस साल पुरानी डीजल गाड़ियों को प्रतिबन्धित करने के पीछे व्यावहारिक तर्क यह हो सकता है कि इसके विकल्प के तौर पर जब गाड़ियों की चलने लायक स्थिति की जाँच चलेगी तो उसमें भारी भ्रष्टाचार होगा। आप देख सकते हैं कि किस तरह से हाइवे के किनारे खड़े सामान्य वाहनों से प्रदूषण नियंत्रित होने के प्रमाण पत्र बाँटे जाते हैं। कुछ मामलों में प्रमाण पत्र बिना किसी टेस्ट के ही जारी कर दिये जाते हैं। राष्ट्रीय हरित पंचाट ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दस साल पुरानी डीजल गाड़ियों पर जो पाबन्दी लगाई है उसके असर और इंसाफ के बारे में दो राय हो सकती है। कई विशेषज्ञों ने इसे बिना सोचे लिया गया फैसला कहा है जिसका असर गाड़ी वालों पर और सार्वजनिक मालवाहकों को दंड देने जैसा होगा। हालांकि यह निर्णय एक पखवाड़े यानी इस महीने के अन्त तक रोक दिया गया है।

लेकिन इस फैसले का पूरा मकसद पलट दिया जाएगा अगर लोग इन पुरानी डीजल कारों की जगह पर नई डीजल कारें खरीद लेंगे और हवा को प्रदूषित करते रहेंगे। लेकिन इस बात में कोई सन्देह नहीं हो सकता कि प्रदूषण फैलाने वाली डीजल गाड़ियों को किसी भी प्रकार से सड़क से हटना चाहिए। आठ अप्रैल को मैं सीएनएन आईबीएन पर चालीस मिनट की पैनल बहस में शामिल हुआ। बहस के लाइव होने से पहले परिवहन विशेषज्ञ ने हमसे यह बात कही कि गाड़ियों की उम्र से उनके सड़क पर चलने या न चलने की योग्यता का निर्धारण नहीं होना चाहिए।

एक अच्छी तरह से रखरखाव और नियमित रूप से सर्विस कराई जाने वाली गाड़ी का उत्सर्जन स्तर नई गाड़ी के बराबर भी हो सकता है। टूट-फूट के कारण गाड़ी या इंजन के कुछ हिस्सों को बदलने की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन पूरी गाड़ी या चेसिस को जो कि समुचित सर्विस करने की स्थिति में है, पूरी तरह से फेंक देना संसाधनों की बर्बादी भी होगी और उसका ज्यादा व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव होगा।

दिल्ली (और दूसरे एशियाई शहरों) की समस्या गाड़ियों की उम्र (दस साल से ज्यादा पुरानी गाड़ियों की संख्या कुल गाड़ियों की संख्या का छोटा हिस्सा है) उतनी नहीं है जितनी गाड़ियों की कुल संख्या और उनका घनत्व है। उस विशेषज्ञ का कहना था, “हमें जल्दी ही उन नीतियों को अपनाना होगा जो कि सार्वजनिक परिवहन और बिना मोटर वाले परिवहन के लिये बेहतर और सुरक्षित आधारभूत ढाँचा प्रदान करके निजी परिवहन पर निर्भरता को कम करें।”

बहस शुरू होने से पहले एक और विशेषज्ञ ने कहा कि यह भी महत्त्वपूर्ण है कि यह बातचीत सिर्फ कार, ट्रक और अन्य निजी वाहनों पर रुक न जाए। यही तर्क बसों पर भी लागू होता है। रख-रखाव करते रहने का असर उत्सर्जन स्तर और ईंधन की दक्षता पर पड़ता है। जिन बसों का अच्छी तरह से रखरखाव किया जाता है उनके अचानक बिगड़ने की घटनाएँ कम होती हैं और यात्रियों को ज्यादा सुविधाएँ मिलती हैं। दरअसल कुछ सार्वजनिक बस एजेंसियाँ इस अच्छे आचरण का पालन करती हैं जहाँ पर वे आठ से दस साल चलने वाली गाड़ी के पुर्जों को बदलते हुए उसकी बॉडी का दोबारा इस्तेमाल कर लेती हैं।

निश्चित तौर पर इन तर्कों में वजन है लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि स्थिति संकट वाली है और निराशाजनक स्थितियाँ उसी प्रकार के समाधान की उम्मीद करती हैं। ऐसे में हमें यह जानने के लिये दिल्ली में वायु प्रदूषण की स्थिति कितनी खतरनाक है, द इंडियन एक्सप्रेस की तरफ से चलाई गई बेहतरीन शृंखला –डेथ बाइ ब्रेथ—को पढ़ना चाहिए।

सिर्फ एक कदम आगे


एक पर्यावरण पत्रकार के तौर पर पिछले 35 सालों के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि मैंने इस बीच कभी भी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा आएगा जब एक राष्ट्रीय अखबार लगातार पेज-1 पर बैनर शीर्षक से ऐसी शृंखला चलाएगा जिसमें यह वर्णन होगा कि किस तरह से दिल्ली की हवा अपने घिरे हुए लोगों की जान ले रही है।

जैसा कि अब यह एक सार्वजनिक जानकारी में आ चुका है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार दिल्ली दुनिया का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है, इसने बीजिंग को इस बदनाम विशेषण से मुक्त कर दिया है। वास्तव में डब्लूएचओ ने दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित 20 शहरों में से 13 शहर भारत के ही चिन्हित किये हैं।

टीवी की बहस में मैंने दलील दी कि कई कदमों में से यह पहला कदम है जिसे उठाए जाने की जरूरत है। एनसीआर में दुनिया का तीव्र शहरीकरण हो रहा है और अगर योजनाकार इस प्रक्रिया को ध्वस्त नहीं करना चाहते तो उन्हें इस इलाके को जीने लायक बनाना होगा।

दस साल पुरानी डीजल गाड़ियों को प्रतिबन्धित करने के पीछे व्यावहारिक तर्क यह हो सकता है कि इसके विकल्प के तौर पर जब गाड़ियों की चलने लायक स्थिति की जाँच चलेगी तो उसमें भारी भ्रष्टाचार होगा। आप देख सकते हैं कि किस तरह से हाइवे के किनारे खड़े सामान्य वाहनों से प्रदूषण नियंत्रित होने के प्रमाण पत्र बाँटे जाते हैं। कुछ मामलों में प्रमाण पत्र बिना किसी टेस्ट के ही जारी कर दिये जाते हैं।

संयोग से 15-16 अप्रैल के बीच दिल्ली में हुई द्वितीय कनेक्टकारो कांफ्रेंस में उन तमाम उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई जिन्हें प्रदूषण घटाने और गतिशीलता बढ़ाने के लिये योजनाकारों और प्रशासकों को उठाना चाहिए। इस सम्मेलन का आयोजन इमबार्क और वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की भारतीय शाखा ने किया था जिसका मूल कार्यालय वाशिंगटन डीसी में है। दूसरे किस्म की पहल में गुड़गाँव और दिल्ली के दूसरे स्थलों पर राहगीरी कार-फ्री संडे, मुम्बई में इक्वल स्ट्रीट और देश में इसी प्रकार के अन्य अभियानों के पीछे प्रेरक शक्ति इमबार्क की ही थी। इस दौरान बंगलुरू के दो कार्यकर्ता भी यह देखने के लिये मौजूद थे कि किस प्रकार इस प्रयोग को वहाँ पर भी दोहराया जा सकता है।

क्या बीआरटीएस से समाधान निकल सकता है?


इमबार्क में शोध और प्रयोग के निदेशक डॉ डैरियो हिडालगो सहित दुनिया के कई शीर्ष सार्वजनिक परिवहन विशेषज्ञों की आम राय है कि बस रैपिड ट्रांजिट प्रणाली इस मामले के समाधान के लिये सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है। जैसा कि सर्वविदित है कि दिल्ली और एक हद तक पुणे में इस प्रणाली की विफलता ने इस रेडिकल विकल्प को बदनाम कर दिया है। हालांकि निजी कारों की जगह को कम करके यह प्रणाली दिल्ली में जहरीली हवा से होने वाली मौतों को कम करने का प्रमुख उपाय हो सकती है।

कनेक्टकारो में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इस प्रणाली को ‘खराब नियोजन’ का एक उदाहरण बताया और कहा कि इसे जल्दी ही समाप्त कर दिया जाएगा। उन्होंने यह मानते हुए कि दिल्ली को बीआरटीएस और दूसरी नवीन किस्म की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की जरूरत है लेकिन योजनाकारों को यह चेतावनी भी दी कि यह काम दूसरे शहरों से सीधे उठाकर दिल्ली पर नहीं थोपी जानी चाहिए।

शहरों की आबादी के घनत्त्व को देखते हुए बीआरटीएस भारत के लिये विशेष तौर पर उपयुक्त था। यहाँ देश में प्रति हेक्टेयर 120 लोगों की आबादी है जबकि यूरोप में महज 40 से 50। अमेरिका में यह घनत्त्व 10 से 15 है और आस्ट्रेलिया में उससे भी कम। दूसरी तरफ यहाँ प्रति हजार लोगों के बीच सिर्फ सौ कारें हैं जबकि यूरोप में 400 और अमेरिका में 600 से 800 हैं। अगर हम भारत में प्रति हजार व्यक्तियों पर 250 दुपहिया वाहनों को जोड़ भी दें तो भी यहाँ यूरोपीय संघ के मुकाबले वाहनों की कुल संख्या कम है। सिसोदिया ने कहा कि दुनिया के दूसरे देशों और शहरों में बीआरटीएस के प्रयोग हमने देखे है .....वहाँ वे बहुत असरदार भी हैं। लेकिन दिल्ली के साथ समस्या यह है कि इसकी विधिवत योजना नहीं बनाई गई। या यह कह सकते हैं कि इसे लोगों की जरूरत के मुताबिक नहीं देखा गया क्योंकि योजना बनाने में लोगों को शामिल नहीं किया गया। यहाँ जब वे जनता का जिक्र कर रहे थे तो उनके दिमाग में मोटरवाले लोग थे, जिन्होंने बहुत पहले बसों के लिये रिजर्व की गई 5.6 किलोमीटर की सड़क के विरुद्ध अपना सामूहिक गुस्सा जताया था।

कार धारक चाहे जितना असहज महसूस करें लेकिन दिल्ली में भी वे अल्पमत में हैं। लेकिन लाचार बस यात्रियों के मुकाबले उनकी आवाज ज्यादा जल्दी सुनी गई। मीडिया ने इस पहल के विरुद्ध खबरों को सतत अभियान चलाया। कुछ लोगों का आरोप है कि ग्रेटर कैलाश में रहने वाले एक राष्ट्रीय अखबार के बड़े संपादकों ने इसमें प्रमुख भूमिका निभाई।

अहमदाबाद की सीईपीटी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शिवानन्द स्वामी ने इस स्थिति को एक परिप्रेक्ष्य में रखा। प्रचलित धारणा के विपरीत उनका कहना था कि दिल्ली का मामला दरअसल अधिकारियों की तरफ से संवाद की नाकामी का एक मामला था, जो परियोजना का वास्तविक उद्देश्य स्पष्ट नहीं कर सके, जिसका मकसद सार्वजनिक साधनों की तुलना में निजी साधनों के लिये जगह को कम करना था।

आप उस समय के टाइम्स ऑफ इण्डिया में एक फोटोग्राफ को याद कर सकते हैं जिसमें बस की लेन को खाली दिखाया गया था और बगल की कारों की लेन बुरी तरह से जाम थी। कैप्शन लगा था ‘दैनिक यात्री परेशान विशेष तौर पर गलियारी बनाए रखने के लिये यह महत्त्वपूर्ण है कि खाली लेन न छोड़ें जिससे नकारात्मक छवि बने। कुल मिलाकर दिल्ली में 130 किलोमीटर लम्बे बीआरटीएस गलियारे की योजना बनी थी जिसके कारण डीजल व दूसरे ईंधन से चलने वाली कारों और दुपहिया वाहनों की संख्या सड़क पर अपने आप कम हो जाती और उससे प्रदूषण कम हो जाता। स्वामी ने जोर देकर कहा, “बीआरटीएस के बिना गतिशीलता की कोई गारंटी नहीं हो सकती’’

शहरों की आबादी के घनत्त्व को देखते हुए बीआरटीएस भारत के लिये विशेष तौर पर उपयुक्त था। यहाँ देश में प्रति हेक्टेयर 120 लोगों की आबादी है जबकि यूरोप में महज 40 से 50। अमेरिका में यह घनत्त्व 10 से 15 है और आस्ट्रेलिया में उससे भी कम। दूसरी तरफ यहाँ प्रति हजार लोगों के बीच सिर्फ सौ कारें हैं जबकि यूरोप में 400 और अमेरिका में 600 से 800 हैं। अगर हम भारत में प्रति हजार व्यक्तियों पर 250 दुपहिया वाहनों को जोड़ भी दें तो भी यहाँ यूरोपीय संघ के मुकाबले वाहनों की कुल संख्या कम है।

जब देश के नीति निर्माता देश के सभी प्रमुख शहरों में मेट्रो प्रणाली की योजना बना रहे हैं तो यह याद करना जरूरी है कि रिजर्व लेन में मेट्रो लाइन का महज बीसवें हिस्से का व्यय लगता है।

बीआरटीएस प्रणाली वास्तव में जहाँ सफल हुई है वे शहर है अहमदाबाद और इन्दौर। अहमदाबाद में इसे जनमार्ग कहा जाता है। जनरल मैनेजर दीपक त्रिवेदी बताते हैं कि किस तरह से बसों के लिये 96 किलोमीटर की लेन रिजर्व की गई। तकरीबन 150 स्टेशनों के बीच चलने वाली 250 बसों में सुबह छह से 11 बजे के बीच 1,22000 लोग वातानुकूलित तरीके से चलते हैं। गुजरात की राजधानी में तमाम तरह के नए प्रयोग किये गए जैसे कि बस लेन को नियमित रखने के लिये और मोटर वालों को उसमें घुसने से रोकने के लिये रिटायर फौजियों को लगाया गया।

गुड़गाँव नगर निगम के प्रमुख विकास गुप्ता ने बताया कि उन्होंने अपने पूरे प्रशासकीय कैरियर में किसी राजनेता और प्रशासक को बसों की माँग करते हुए नहीं सुना, जिसका मतलब है कि उन्होंने सार्वजनिक जगह को कितनी कम प्राथमिकता दे रखी है। गुड़गाँव शहर के भीतर अपनी बस सेवा शुरू करने का प्रस्ताव रख रहा है, ताकि उन लोगों की मदद हो सके जो आटो रिक्शा में चलते हैं या फिर मुख्य मार्गों वाली बस सेवा का उपयोग करते हैं। निगम की सूची में दर्ज 145 बसों में महज 80-90 बसें वास्तव में सड़क पर चलती हैं। गुप्ता के अनुसार गुड़गाँव को 500 बसों की जरूरत है।

विडम्बना देखिए कि राहगीरी योजना गुड़गाँव में नवम्बर 2013 से सफलतापूर्वक चल रही है। लेकिन अभी तक यह बस सेवा की माँग में परिवर्तित नहीं हुई है। मुम्बई में कई छद्म शुरुआतों के बावजूद मुम्बई मेट्रोपालिटन रीजनल डेवलपमेंट अथॉरिटी बीआरटीएस के सलाहकारों की नियुक्ति के लिये प्रस्ताव आमंत्रित कर रही है। हालांकि यह अपने बीआरटीएस को पश्चिमी और पूर्वी एक्सप्रेस हाइवे के खम्भों पर खड़ा कर रही है। यह उस दलील को ही खारिज कर देता है जिसके तहत बीआरटीएस का मकसद सड़क पर कारों की जगह को कम करना, बसों की जगह को बढ़ाना और पैदल चलने वालों और साइकिल चलाने वालों को ज्यादा जगह देना है। यह इतनी निकट दृष्टि की योजना है कि इसके तहत राज्य सरकार 35 किलोमीटर लम्बी तटीय सड़क एक बीआरटीएस बना रही है। जबकि बीआरटीएस बनी बनाई सड़क पर बननी चाहिए न कि उसके लिये अलग से सड़क बनाई जानी चाहिए।

डेरियल डिमेंटो, मुम्बई टाइम्स ऑफ इण्डिया के पूर्व स्थानीय सम्पादक हैं और फोरम फार इनवायरनमेंट जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं।

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