पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमिगत जल का गहराता संकट: समस्याएं एवं समाधान

Submitted by HindiWater on Sat, 01/11/2020 - 11:07
Source
अमरनाथ मिश्र पी.जी. कालेज, दूबेछपरा, बलिया (उ.प्र.) और कुँवर सिंह पी.जी. कालेज, बलिया (उ.प्र.)

प्रतीकात्मक।

सारांश 

जल की उपलब्धता उसकी आपूर्ति एवं मांग पर निर्भर करती है। धरातल पर जलापूर्ति का प्रमुख स्रोत वर्षा है। जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कुछ वर्षों में वर्षा की मात्रा, आवृत्ति और वितरण में अनिश्चितता एवं अनियमितता में काफी वृद्धि हुई। दूसरी तरफ जनसंख्या, नगरीकरण एवं औद्योगिकीकरण में वृद्धि तथा बढ़ते जीवन स्तर के साथ जल की मांग में वृद्धि होती जा रही है। भारत में वर्ष 1951 में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 6000 घन मीटर वार्षिक थी, जो वर्ष 1955 में 5277, वर्ष 1990 में 1970, वर्ष 1999 में 1947 एवं अनुमानित रूप से वर्ष 2017 में 1600 घनमीटर रह गई है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2025 में 1350 घनमीटर प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता रह जाएगी। जबकि एक व्यक्ति को औसतन प्रति वर्ष 1700 घन मीटर से भी ज्यादा जल की आवश्यकता होती है। बढ़ते जीवन स्तर के साथ जल की प्रति व्यक्ति मांग में भी वृद्धि होती है। प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता घटती जा रही है। अध्ययन क्षेत्र में वर्ष 1996 की तुलना में वर्ष 2000 में विभिन्न जनपदों में भू-जल की उपलब्धता में वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 की तुलना में वर्ष 2004 में भू-जल उपलब्धता में अधिकांश 27 में से 23 जनपदों में कमी आयी है। वर्ष 1996 के अनुसार अध्ययन क्षेत्र के एकमात्र जनपद गोण्डा में उपयोग की मात्रा 8000 लाख घनमीटर से अधिक थी, इस वर्ष में 2004 में जनपदों की संख्या बढ़कर 8 हो गई है। इस प्रकार जनपद स्तर पर उपयोग की मात्रा में लगातार वृद्धि भी हुई है। अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल से सम्बन्धित समस्याओं को अति उपयोग एवं प्रदूषण जन्य समस्या के रूप में देखा जा सकता है। भूमिगत जल के समुचित-संतुलित उपयोग के लिए व्यापक स्तर पर जन-जागरण कार्यक्रमों को आयोजित करना, भूमिगत जल में आर्सेनिक की समस्या के समाधान के लिए जागरूकता और शोध तथा अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा देना आवश्यक है।

मुख्य शब्द:- भूमिगत जल, शुद्ध वार्षिक पुनर्भरण, शुद्ध वार्षिक निकासी, दोहन, संरक्षण 

Abstract

The availability of water depends on its supply and demand. Rainfall is the major source of water supply on the ground. Uncertainty and irregularity in the amount, frequency and distribution of rainfall has increased considerably in the last few years due to climate change. On the other hand with the increase in population, urbanization and industrialization and increasing living standards, the demand for water is increasing. The per capita water availability in India in the year 1951 was 6000 cubic meters per annum, which has been reduced to 5277 in the year 1955, 1970 in the year 1990, 1947 in the year 1999 and 1600 cubic meters in the year 2017. According to an estimate, in the year 2025, there will be 1350 cubic meter per capita water availability. Whereas an individual requires more than 1700 cubic meters of water per year on an average. With increasing living standards, per capita demand for water also increases. Per capita water availability is decreasing. Availability of ground water has increased in different districts in the year 2000 as compared to the year 1996 in the study area. In comparison to the year 2000, in the year 2004, ground water availability has decreased in 23 districts out of 27 districts. According to the year 1996, Gonda, the only district of the study area, had more than 8000 lakh cubic meters, the number of districts has increased to 8 in 2004 in this year. Thus there has been a steady increase in the amount of usage at district level.  Problems related to ground water in the study area can be seen as a problem of overuse and pollution. It is necessary to conduct mass awareness programs for proper balanced use of ground water, awareness and
promotion of research and research work to solve the arsenic problem in ground water. 

प्रस्तावना

जल सभी प्रकार के जीवों के अस्तित्व के लिए परम आवश्यक तत्व है। मानव अपने शारीरिक क्रियाओं के संचालन, घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ औद्योगिक, कृषि मत्स्य-पालन, व्यापार आदि कार्यों के लिए जल का उपयोग एक संसाधन के रूप में करता है। एक संसाधन के रूप में जल की समुचित मात्रा एवं समान वितरण किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यक है। भारत जैसे कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देशों में कृषि विकास के लिए जल संसाधन के समुचित-संतुलित उपयोग का स्पष्ट महत्व है। ऐसी स्थिति में जब देश की कृषि व्यवस्था कहीं जलाधिक्य, तो कहीं जलाभाव की समस्या से ग्रस्त है, जल संसाधन का मात्रात्मक एवं गुणात्मक जानकारी, संरक्षण एवं प्रबन्धन का महत्व अधिक बढ़ जाता है। पृथ्वी के ऊपर सतह के नीचे पृष्ठीय चट्टानों की संधियों, छिद्रों, दरारों एवं अवशिष्ट रिक्त स्थानों में स्थित जल की मात्रा को भूमिगत जल कहा जाता है। भूमिगत जल का मुख्य स्रोत वर्षा जल है। भूमिगत जल की मात्रा पर वर्षा की प्राप्ति, चट्टानों की सरंध्रता व संरचना तथा धरातलीय स्वरूप आदि का प्रभाव होता है। पिछले अध्ययनों से स्पष्ट है कि पर्यावरण अवनयन के फलस्वरूप वर्षा की मात्रा और उसके अन्तःस्पन्दन की दर घटती जा रही है। जिससे भूमिगत जल की उपलब्धता घटती जा रही है। इस संदर्भ में प्रस्तुत शोध-पत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमिगत जल की उपलब्धता व उपयोग का स्थानिक-कालिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण एवं विवेचन प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि अध्ययन क्षेत्र के सभी जनपदों में भूमिगत जल के उपयोग के प्रतिशत में लगातार वृद्धि हो रही है, जिसके चलते इस क्षेत्र में भूमिगत जल से संबंधित समस्याओं को अति उपयोग एवं प्रदूषणजन्य समस्या के रूप में देखा जा सकता है। एक तरफ जहां भूमिगत जल के वार्षिक पुनर्भरण मात्रा में कमी होती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण, नगरीकरण एवं बढ़ते जीवन स्तर से साथ मांग और उपयोग बढ़ता जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में भूजल का उपयोग खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है, जिससे भूमि की धंसने की क्रिया भी प्रारम्भ हो गई है। अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल से जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण समस्या भूजल में आर्सेनिक की बढ़ती मात्रा है, जिसका प्रभाव यहां के निवासियों के स्वास्थ्य पर पूरी तरह से दिखायी दे रहा है और इस क्षेत्र के लोग न केवल शारीरिक तथा मानसिक कठिनाईयों का सामना कर रहे हैं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी ये अलग-थलग होते जा रहे हैं। कृषि में प्रयुक्त कृत्रिम रसायनों का प्रभाव भी भूजल पर दृष्टिगोचर हो रहा है तथा औद्योगिक क्रियाओं एवं नगरीकरण से भी भूमिगत जल प्रदूषित होता जा रहा है। 

अध्ययन का उद्देश्य 

प्रस्तुत अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल की उपलब्धता एवं उपयोग की विशेषताओं का स्थानिक एवं कालिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करना।
  2. अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल की उपलब्धता व उपयोग से सम्बन्धित समस्याओं का स्थानिक एवं कालिक संदर्भ में वितरण स्पष्ट करना।
  3. अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल की उपलब्धता व उपयोग सम्बन्धित समस्याओं के निराकरण हेतु सुझाव प्रस्तुत करना।

अध्ययन की विधि तंत्र 

प्रस्तुत अध्ययन पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमिगत जल की उपलब्धता, उपयोग, समस्याएं एवं संरक्षण, सांख्यिकीय डायरी-उत्तर प्रदेश से प्राप्त द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है। भूमिगत जल की विशेषताओं के अध्ययन हेतु तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक विधि तंत्रों का उपयोग किया जाएगा। प्राप्त आंकड़ों की तुलना एवं विश्लेषण हेतु उपयुक्त सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया गया है। प्राप्त परिणामों को सारणी, आरेख एवं मानचित्र की सहायता से प्रस्तुत कर पूर्णता प्रदान की गयी है। 

अध्ययन क्षेत्र

अध्ययन क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में भौगोलिक दृष्टि से 23o50’84’’ उत्तरी से 28o26’40’’ उत्तरी अक्षांश तथा 80o51’14’’ पूर्वी से 84o38’10’’ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। अध्ययन क्षेत्र का सम्पूर्ण क्षेत्रफल 85844 वर्ग किमी है। यहां औसतन वार्षिक वर्षा 958.62 मिमी. प्राप्त होती है। यहां की सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा 88.23 प्रतिशत भाग वर्ष के चार महीनों-जून से सितम्बर में प्राप्त होता है।

विश्लेषण एवं व्याख्या

अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल की उपलब्धता, उपयोग, समस्याएं एवं संरक्षण का विश्लेषण एवं व्याख्या निम्नवत है- 

भूमिगत जल की उपलब्धता 

वर्षा का जल का भू-सतह के नीचे अन्तः निवेशन भूमिगत जल का प्रमुख स्रोत है। किसी क्षेत्र में अन्तः निवेशन की दर वर्षा की प्रकृति एवं गहनता तथा वातायन क्षेत्र का निर्माण करने वाली मृदा एवं शैली की पारगम्यता पर निर्भर करती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों में जल की शुद्ध पुनर्भरण क्षमता में भिन्नता है। वर्ष 1996 के अनुसार अध्ययन क्षेत्र के 20 जनपदों में काफी असमानता मिलती है। उच्च पुनर्भरण क्षमता (15000 लाख घनमीटर से अधिक) वाले जनपदों की संख्या चार है। इस उच्च पुनर्भरण क्षमता वाले जनपदों में गोंडा (21270), देवरिया (24850), इलाहाबाद अब प्रयागराज (15920), सुल्तानपुर (15220) है। मध्यम पुनर्भरण क्षमता (10000-15000 लाख घनमीटर) वाले जनपदों में बहराइच (13430), सिद्धार्थनगर (10120), बस्ती (14140), गोरखपुर (10550), महाराजगंज (14840), आजमगढ़ (11970), वाराणसी (11850), जौनपुर (12500), प्रतापगढ़ (10990) और गाजीपुर (10600)। निम्न पुनर्भरण क्षमता (5000-10000 लाख घन मीटर) वाले जनपदों की संख्या पांच है। जिनमें बलिया (9060), मऊ (5420), सोनभद्र (6930), अम्बेडकरनगर (12890) और फैजाबाद (6990) हैं। अति निम्न पुनर्भरण क्षमता (5000 लाख घनमीटर से कम) वाला एकमात्र जनपद-मिर्जापुर (4800) है।

वर्ष 2000 की गणना के अनुसार अध्ययन क्षेत्र के 27 जनपदों में भूमिगत जल के शुद्ध वार्षिक पुनर्भरण मात्रा में असमानता मिलती है। भू-जल के उच्च पुनर्भरण क्षमता (15000 लाख घनमीटर से अधिक) पांच जनपदों-कुशीनगर (15240), आजमगढ़ (15430), आजमगढ़ (15430), जौनपुर (16240), इलाहाबाद (15430) और सुल्तानपुर (17040) में मिलता है। मध्यम पुनर्भरण क्षमता (10000-15000 लाख घनमीटर) उपलब्धता नौ जनपदों-बलरामपुर (11380), सिद्धार्थनगर (10600), गोरखपुर (11550), महाराजगंज (14800), बलिया (11470), मिर्जापुर (10320), आजमगढ़ (13780) और गाजीपुर (14310) में मिलता है। निम्न उपलब्धता (5000-10000 लाख घनमीटर) वाले जनपदों की संख्या 11 है, जिसमें बहराइच (9440), श्रावस्ती (6170), मऊ (5760), चन्दौली (9330), वाराणसी (5670), सोनभद्र (8920), कौशाम्बी (6030), अम्बेडकर नगर (8440), फैजाबाद (8580) जनपद शामिल है। अति निम्न उपलब्धता (5000 लाख घनमीटर से कम) वाला एकमात्र जनपद संत रविदासनगर है। 

इसी प्रकार वर्ष 2004 के अनुसार अध्ययन क्षेत्र में भू-जल की उच्च पुनर्भरण क्षमता (15000 लाख घनमीटर से अधिक) दो जनपदों-आजमगढ़ (15070) और सुल्तानपुर (15790) में मिलता है। मध्यम पुनर्भरण क्षमता (10000-15000 लाख घनमीटर) वाले जनपदों की संख्या 11 है, जिसमें बहराइच (12750), गोण्डा (14210), सिद्धार्थनगर (10450), गोरखपुर (13240) कुशीनगर (12440), महाराजगंज (11460), जौनपुर (14370), इलाहाबाद (10950), प्रतापगढ़ (11970), फैजाबाद (11010) और गाजीपुर (12160) जनपद शामिल हैं। निम्न पुनर्भरण क्षमता (5000-10000) वाले जनपदों की संख्या-8 है, जिसमें बलरामपुर (9470), बस्ती (8750), संत कबीरनगर (5390), देवरिया (8640), बलिया (9620), चन्दौली (6990), वाराणसी (5160) और अम्बेडकरनगर (9530) शामिल हैं। अति निम्न पुनर्भरण क्षमता (5000 लाख घनमीटर से कम) वाले जनपदों की संख्या 6 हो गई है, जिसमें श्रावस्ती (4250), मऊ (4980), सोनभद्र (2790), मिर्जापुर (4950), संत रविदासनगर (3510) और कौशाम्बी (4180) जनपद आते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में वर्ष 1996 की तुलना में वर्ष 2000 में विभिन्न जनपदों में भू-जल की उपलब्धता में वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 की तुलना में वर्ष 2004 में भू-जल उपलब्धता में अधिकांश 27 में से 23 जनपदों में कमी आयी है। 

भूमिगत जल की उपलब्धता में परिवर्तन 

अध्ययन क्षेत्र में भू-जल की उपलब्धता में विभिन्न वर्षों में परिवर्तन देखने को मिलता है। अध्ययन क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों में भूमिगत जल के शुद्ध वार्षिक पुनर्भरण मात्रा में काफी असमानता मिलती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में वर्ष 1996 की तुलना में वर्ष 2000 में बहराइच (29.70 प्रतिशत), गोण्डा (29.57 प्रतिशत), बस्ती (25.03 प्रतिशत), देवरिया (62.81 प्रतिशत), महाराजगंज (0.26 प्रतिशत), वाराणसी (52.15 प्रतिशत) और इलाहाबाद में (3.08 प्रतिशत) की कमी आई है जबकि सिद्धार्थनगर (7.8 प्रतिशत), बलिया (26.6 प्रतिशत), मऊ (6.27 प्रतिशत), आजमगढ़ (28.90 प्रतिशत), सोनभद्र (28.71 प्रतिशत), मिर्जापुर, सुल्तानपुर (11.96 प्रतिशत), अम्बेडकर नगर (6.97 प्रतिशत), फैजाबाद (22.75 प्रतिशत) और गाजीपुर में (35.0 प्रतिशत) की वृद्धि हुई है। उक्त अवधि में पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमिगत जल के शुद्ध वार्षिक पुनर्भरण मात्रा में कुल 21.63 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

अध्ययन क्षेत्र में वर्ष 2000 के आधार पर वर्ष 2004 में जनपद गोण्डा में 5.14 प्रतिशत, श्रावस्वती में 31.12 प्रतिशत, बलरामपुर में 16.78 प्रतिशत, सिद्धार्थनगर में 4.21 प्रतिशत, बस्ती में 17.45 प्रतिशत, संत कबीर नगर में 0.70 प्रतिशत, कुशीनगर में 18.37 प्रतिशत, देवरिया में 6.49 प्रतिशत, बलिया में 16.12 प्रतिशत, मऊ में 13.54 प्रतिशत, आजमगढ़ में 2.33 प्रतिशत, चन्दौली में 25.08 प्रतिशत, वाराणसी 9.0 प्रतिशत, सोनभद्र में 68.72, मिर्जापुर में 52.03, संत रविदासनगर में 19.31 प्रतिशत, जौनपुर में 11.57 प्रतिशत, इलाहाबाद में 29.30, कौशाम्बी में 30.67 प्रतिशत, प्रतापगढ़ में 13.13 प्रतिशत, सुल्तानपुर में 7.33 प्रतिशत और गाजीपुर में 15.02 प्रतिशत की कमी हुई है। जबकि बहराइच में 35.06 प्रतिशत, गोरखपुर में 11.63 प्रतिशत, अम्बेडकरनगर में 12.91 प्रतिशत और फैजाबाद में 28.32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

भूमिगत जल का उपयोग 

अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल उपयोग के स्वरूप में जनपद स्तर पर काफी असमानता मिलती है। साथ ही जनपद-स्तर पर उपयोग की मात्रा में लगातार वृद्धि भी हुई है। अध्ययन से प्राप्त तथ्यों के अनुसार वर्ष 1996 में शुद्ध निकासी की उच्च मात्रा (8000 लाख घनमीटर से अधिक) गोण्डा जनपद में, मध्यम (6000-8000 लाख घनमीटर) जौनपुर में और बहराइच में, निम्न (4000-6000 लाख घनमीटर के बीच) सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़, वाराणसी, इलाहाबाद, सुल्तानपुर और गाजीपुर तथा अति निम्न (4000 लाख घनमीटर से कम) उपयोग महाराजगंज, बलिया, मऊ, सोनभद्र, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, अम्बेडकरनगर व फैजाबाद जनपद में मिलता है। 
अध्ययन क्षेत्र में वर्ष 2000 के आधार पर शुद्ध निकासी की उच्च मात्रा (8000 लाख घन मीटर से अधिक) भूमिगत जल उपयोग करने वाले जनपद में गोण्डा आजमगढ़, जौनपुर, मध्यम (6000-8000 लाख घनमीटर के बीच) बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, इलाहाबाद, सुल्तानपुर और गाजीपुर में निम्न (4000-6000 लाख घनमीटर) बहराइच, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, बलिया, प्रतापगढ़, अम्बेडकरनगर और फैजाबाद जनपद में तथा अति निम्न (4000 लाख घनमीटर से कम), श्रावस्ती, संत कबीरनगर, कुशीनगर, मऊ, चन्दौली, वाराणसी, सोनभद्र, मिर्जापुर, संत रविदासनगर और कौशाम्बी जनपद में प्राप्त होता है। 

इसी प्रकार वर्ष 2004 के आधार पर भूमिगत जल के शुद्ध निकासी की उच्च मात्रा (8000 लाख घनमीटर से अधिक) उपयोग करने वाले जनपद में गोण्डा, आजमगढ़, जौनपुर, मध्यम (6000-8000 लाख घनमीटर), बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, इलाहाबाद, सुल्तानपुर और गाजीपुर में, निम्न (4000-6000 लाख घनमीटर के बीच) बहराइच, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, बलिया, प्रतापगढ़, अम्बेडकर नगर और फैजाबाद जनपद में तथा अति निम्न (4000 लाख घनमीटर से कम) श्रावस्ती, संत कबीरनगर, चन्दौली, वाराणसी, सोनभद्र, मिर्जापुर, संत रविदासनगर और कौशाम्बी शामिल हैं। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल के उपयोग की मात्रा में काफी परिवर्तन हुए हैं। वर्ष 1996 के अनुसार अध्ययन क्षेत्र के एकमात्र जनपद गोण्डा में उपयोग की मात्रा 8000 लाख घनमीटर से अधिक थी, इस वर्ग में 2004 में जनपदों की संख्या बढ़कर 8 हो गई है। इस प्रकार जनपद स्तर पर उपयोग की मात्रा में लगातार वृद्धि भी हुई है। 

भूमिगत जल उपयोग में परिवर्तन 

अध्ययन क्षेत्र के विभिन्न जनपदों में वर्ष 1996, 2000, 2004 में भूमिगत जल के उपयोग का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है। अध्ययन क्षेत्र में 2000 की गणना के अनुसार भूमिगत जल के उपयोग का प्रतिशत उच्च (60 प्रतिशत से अधिक) पांच जनपदों-गोण्डा, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया और अम्बेडकर नगर में मिलता है, जबकि वर्ष 2004 में (60 प्रतिशत से अधिक) भूमिगत जल का उपयोग करने वाले जनपदों की संख्या बढ़कर 18 हो गई है। अध्ययन क्षेत्र के जनपदों-गोण्डा, बस्ती, देवरिया, मऊ, संत रविदास नगर, जौनपुर में भूमिगत जल के उपयोग का प्रतिशत 75 से अधिक हो गया है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र के सभी जनपदों में भूमिगत जल उपयोग के प्रतिशत में लगातार वृद्धि हो रही है। 

भूमिगत जल की कमी से उत्पन्न समस्याएं

अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल से सम्बन्धित समस्याओं को अति उपयोग एवं प्रदूषण जन्य समस्या के रूप में देखा जा सकता है। अध्ययन क्षेत्र में वर्षा की अनियमितता और अनिश्चितता के प्रभाव से भूमिगत जल के वार्षिक पुनर्भरण मात्रा में कमी होती जा रही है, वहीं बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं बढ़ते जीवन स्तर के साथ मांग और उपयोग बढ़ता जा रहा है। अध्ययन क्षेत्र के कुशी नगर, महाराजगंज, चन्दौली, सोनभद्र और मिर्जापुर के अतिरिक्त शेष सभी जनपदों में भूमिगत जल के उपयोग की मात्रा उपलब्ध मात्रा के 50 प्रतिशत से अधिक हो गया है। कुछ जनपदों जैसे-देवरिया और मऊ में भू-जल का उपयोग खतरनाक स्तर (80 प्रतिशत से अधिक) तक पहुंच चुका है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में अध्ययन क्षेत्र में भूमि धंसने की क्रिया में तेजी आयी है।

इसी प्रकार अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल से जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण समस्या भू-जल में आर्सेनिक की बढ़ती मात्रा है। पिछले कुछ अध्ययनों (स्कूल ऑफ इन्वायरमेंटल स्टडीज, जादवपुर विश्वविद्यालय, पं.बं. और भू-जल विभाग, उत्तर प्रदेश) में यह तथ्य से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र के गंगा के समीपवर्ती जनपदों-बलिया और गाजीपुर के भू-जल में आर्सेनिक अपने निर्धारित मात्रा से बहुत अधिक पाया गया है। जनपद-बलिया के द्वाबा क्षेत्र के लगभग 55 गांवों के भूमिगत जल में आर्सेनिक की निर्धारित मात्रा 50 पीपीएम से अधिक 100-200 पीपीएम होने की पुष्टि हो चुकी है। आर्सेनिक के प्रभाव से अब तक अकेले बलिया जनपद में 33 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। साथ ही पांच दर्जन से अधिक लोग आर्सेनिकोसिस नामक बीमारी से पीड़ित हैं। आर्सेनिक प्रभावित ग्रामों के लोग न सिर्फ शारीरिक और मानसिक कठिनाईयों का सामना कर रहे हैं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी ये लोग अलग-थलग होते जा रहे हैं। 

इन दो प्रमुख समस्याओं के अतिरिक्त कृषि में प्रयुक्त कृत्रिम रसायनों का प्रभाव भू-जल पर दिखाई दे रहा है। साथ ही कुछ सीमित क्षेत्र पर औद्योगिक क्रियाओं और नगरीकरण से जल में प्रदूषण की मात्रा बढ़ती जा रही है। भूमिगत जल का संरक्षण जल संसाधन के संदर्भ में सामान्यतः यह अवधारणा है कि जल प्रकृति प्रदत्त असीमित भण्डार है, जल के दुरुपयोग को बढ़ावा देती है। अध्ययन क्षेत्र एक कृषि प्रधान क्षेत्र है, इसके विकास में कृषि विकास की उच्च प्राथमिकता है। सिंचाई में भूमिगत जल का उपयोग सम्पूर्ण उपयोग का 70 प्रतिशत से अधिक है। पिछले दशकों में सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर भू-स्तरीय पम्पसेट और निजी पम्प सेटों को स्थापित कर भूमिगत जल का अनियंत्रित दोहन हुआ है। जिससे भूमिगत जल से सम्बन्धित समस्याओं का जन्म हुआ है। अतः अध्ययन क्षेत्र भूमिगत जल के संरक्षण के लिए निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है- 

  1. सम्पूर्ण अध्ययन क्षेत्र में व्यापक स्तर पर वनारोपण करना। 
  2. अध्ययन क्षेत्र के पुराने गड्ढे एवं तालाबों का जीर्णोद्धार करना। 
  3. कृषि में सिंचाई की तकनीक में सुधार कर भूमिगत जल के दुरुपयोग को कम करना। 
  4. दूषित जल को स्वच्छ करने के उपरान्त ही जल स्रोतों में मिलाना। 
  5. भूमिगत जल के समुचित-संतुलित उपयोग के लिए व्यापक स्तर पर जनजागरण कार्यक्रमों को आयोजित करना। 
  6. भूमिगत जल में आर्सेनिक की समस्या के समाधान के लिए जागरूकता और शोध तथा अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा देना आवश्यक है।

Reference: 

  1. Bruce, J.P. and R.H.Clark (1966), : "Introduction to Hydrology", Pergamon Press. 
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Email:- dr.sunilojha@gmail.com skchaturvedi2014@gmail.com

 

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