पूर्वोत्तर क्षेत्र में जैव-विविधता

Submitted by birendrakrgupta on Sun, 02/22/2015 - 23:35
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योजना, दिसम्बर 2010

पूर्वोत्तर भारत की जैव-विविधता का क्या महत्व है?


देश का पूर्वोत्तर क्षेत्र एक जैव-विविधता वाला क्षेत्र है। यह हिमालय की पहाड़ियों से लेकर बाढ़ सम्भावित निचले मैदानों तक फैला हुआ है और इसकी पारिस्थितिकीय-जलवायु परिस्थितियाँ ऊष्ण कटिबन्धीय से लेकर समशीतोष्ण हैं। इस क्षेत्र में 51 प्रकार के वन पाए जाते हैं जिन्हें मुख्य रूप से 6 प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है। जैसे- ऊष्ण कटिबन्धीय नम क्षेत्रीय वन, ऊष्ण कटिबन्धीय अर्ध सदाबहार वन, ऊष्ण कटिबन्धीय नम सदाबहार वन, उप-ऊष्ण कटिबन्धीय वन, नम क्षेत्रीय वन और अल्पाइन वन। ये क्षेत्र इण्डो-मलायन और पैलेक्ट्रिक बायोजियोग्राफिक क्षेत्रों के बीच पड़ता है। इस कारण इस क्षेत्र में पर्यावरण-जलवायु प्रकार की वनस्पतियाँ पाई जाती हैं जिसके चलते यहाँ तरह-तरह की वनस्पतियाँ हैं। इस क्षेत्र का जैविक स्तर बहुत ऊँचा है इसका मतलब यह है कि क्षेत्र में बहुत प्रकार की वनस्पतियाँ और अनोखे पशु पाए जाते हैं।

अगर किसी प्रजाति की कम से कम आधी आबादी घट गई हो तो वो क्षेत्र अन्तरराष्ट्रीय रूप से प्रजातियों के लिए खतरे वाला क्षेत्र मान लिया जाता है। भारत और बर्मा हॉट स्पॉट पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा है और यहाँ 25 प्रतिशत प्रजातियाँ खतरें में हैं। इस क्षेत्र का 1,67,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र जंगलों से ढका है जहाँ भारत की 50 प्रतिशत वनस्पतीय नस्लें पाई जाती हैं। यहाँ लगभग 7,500 प्रकार के कीट-पतंगे मिलते हैं। अकेले सिक्कम में 5,000 प्रकार के फूल वाले पौधे पाए जाते हैं जिनमें से कुछ बहुत पुरानी नस्लें हैं। क्षेत्र की एक-तिहाई वनस्पतियाँ अनोखी हैं। उदाहरण के तौर पर कार्नीवोरस पिचर पौधे। यही नहीं कुछ अनोखे प्रकार के खट्टे फल वाले पेड़, केले, आम और धान की नस्लें इसी क्षेत्र से निकली हैं। भारत में 1,300 प्रकार के आर्किड पाए जाते हैं जिनमें से 700 किस्में पूर्वोत्तर क्षेत्र की हैं। इनमें से भी 550 किस्में अकेले अरुणाचल प्रदेश में मिलती हैं।

इस क्षेत्र में देश में पाए जाने वाले कुल 136 प्रकार के बांसों में से 63 तरह के बांस उगते हैं। 28 प्रकार की वनस्पतियाँ पाई जाती हैं जिनमें बगैर फूल वाले पौधे शामिल हैं। अनेक जड़ी-बूटियाँ पाई जाती है जो औषधि बनाने और भोजन के काम आती हैं। ये क्षेत्र पशुओं की विविधता के लिए भी मशहूर है। एक अनुमान के अनुसार यहाँ 3,624 प्रकार के कीट-पतंगे, 236 प्रकार की मछलियाँ, 64 तरह के उभयचर, 137 किस्म के सरीसृप, 541 प्रकार के पक्षी तथा 160 किस्म के स्तनधारी जीव पाए जाते हैं। कई प्रजातियाँ अन्यत्र दुर्लभ हैं। इनमें हूलक, गोल्डन लंगूर और कई प्रकार के बन्दर, चितकबरे चीते, बर्फ में रहने वाले चीते, अनेक प्रकार के जीव-जन्तु और चमगादड़ जैसे रात्रिचर पाए जाते हैं। भारत में पाए जाने वाले जंगली हाथियों की 33 प्रतिशत किस्में यहाँ मिलती है। कई प्रकार के दरियाई घोड़े, चीनी पंगोलिन अनेक प्रकार के हिरण इस क्षेत्र में मिलते हैं। पूर्वोत्तर भारत में कई ऐसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो सिर्फ दुनिया के पूर्वी देशों में मिलती हैं।

इस क्षेत्र में जैव-विविधता की वर्तमान चिन्ताजनक बातें क्या हैं?


क्षेत्र की अनेक प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर हैं जिन्हें लेकर चिन्ता व्यक्त की जा रही है। वन साफ करने, झूम खेती, खनन उद्योग, जंगल में लगने वाली आग, मिट्टी का कटान, अतिक्रमण, शहरीकरण, जलाशयों का लोप आदि कुछ ऐसे कारण हैं जिनके चलते इन प्रजातियों के रहने की जगह खत्म हो गई। उनकी नस्लें खत्म होने की आशंका पैदा हो गई और ये प्रजातियाँ खतरे वाले वर्ग में शामिल कर ली गईं।

अगर किसी प्रजाति की कम से कम आधी आबादी घट गई हो तो वो क्षेत्र अन्तरराष्ट्रीय रूप से प्रजातियों के लिए खतरे वाला क्षेत्र मान लिया जाता है। भारत और बर्मा हॉट स्पॉट पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा है और यहाँ 25 प्रतिशत प्रजातियाँ खतरें में हैं। ये बात क्षेत्र की जैव-विविधता बनाए रखने वालों के लिए चिन्ता का विषय बन गई है।

क्षेत्र की जैव-विविधता के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

पूर्वोत्तर क्षेत्र की जैव-विविधता ने इसे संरक्षण के काम में लगी दुनिया भर की एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण बना दिया है। वर्ड्् वाइल्ड लाइफ फाउण्डेशन ने पूरे पूर्वी हिमालय क्षेत्र को ग्लोबल 2000 इकोरीजन की संज्ञा दी है और इसे प्राथमिकता प्रदान की है। इससे पहले भारत को दुनिया के उन 12 देशों की सूची में शामिल किया गया जो जैव-विविधता के लिए जाने जाते हैं। बाद में पूर्वी हिमालय क्षेत्र को इसका प्रमुख स्थान माना गया। इस क्षेत्र में अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, दार्जिलिंग और नेपाल के कुछ इलाके आते हैं जिन्हें जैव-विविधता का हॉट स्पॉट माना गया है। ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ जैव-विविधता बहुत ज्यादा है, अनोखी किस्में पाई जाती हैं लेकिन वे विभिन्न कारणों से लोप होने के कगार पर हैं। वर्ष 2000 में इस क्षेत्र को वृहत्तर इण्डो-बर्मा हॉट स्पॉट क्षेत्र में शामिल किया गया। इसे दुनिया के दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा जैव-विविधता हॉट स्पॉट माना गया है। पहला स्थान मेडिटेरनियन बेसिन का है।

अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, दार्जिलिंग और नेपाल के कुछ इलाके आते हैं जिन्हें जैव-विविधता का हॉट स्पॉट माना गया है। वर्ष 2000 में इस क्षेत्र को वृहत्तर इण्डो-बर्मा हॉट स्पॉट क्षेत्र में शामिल किया गया। इसे दुनिया के दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा जैव-विविधता हॉट स्पॉट माना गया है। पहला स्थान मेडिटेरनियन बेसिन का है।किसी क्षेत्र को अन्तरराष्ट्रीय रूप से जैव-विविधता का हॉट स्पॉट मानने का मतलब है कि संरक्षण कार्यों में लगी एजेंसियाँ उस क्षेत्र में जमकर काम करें। इस क्षेत्र के प्रमुख स्थानों पर नस्लें बचाने के काम में 3 अन्तरराष्ट्रीय और 5 राष्ट्रीय प्राथमिकता वाली परियोजनाएँ लागू की गई हैं। इनके अन्तर्गत उन स्थानों और नस्लों की पहचान की गई जो सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। संरक्षण के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों और गलियारों की पहचान की गई है। असम के मैदानों और पूर्वी हिमालय क्षेत्रों को पक्षियों की अनोखी किस्मों के लिए चिन्हित किया गया है। इसके अलावा पक्षियों की लुप्तप्राय नस्लों को बचाने के लिए 59 महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्रों की पहचान की गई है। विश्व वन्य जीवन प्रतिष्ठान (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) ने निम्नलिखित क्षेत्रों को महत्वपूर्ण चिन्हित किया है—

ब्रह्मपुत्र घाटी अर्द्धसदाबहार वन, पूर्वी हिमालय के चौड़ी पत्ती वाले वन, पूर्वी हिमालय के सब अल्पाइन कोनीफेरस वन और भारत-म्यांमार पाइन वन।

प्राथमिकता वाला पर्यावरण क्षेत्र उसे माना गया है जो तुलनात्मक रूप से जमीन या पानी का बड़ा क्षेत्र है और जहाँ भौगोलिक रूप से स्वाभाविक तरीके से अनके प्रकार की प्रजातियाँ रहती हैं। ऐसे इलाकों में पर्यावरण सम्बन्धी परिस्थितियों और कार्यों में विविधता होती है। इस प्रकार के पर्यावरण क्षेत्र आमतौर पर बड़े क्षेत्र होते हैं। अतः इनके अन्तर्गत उन छोटे इलाकों की पहचान कर ली जाती है जहाँ संरक्षण कार्य जोर-शोर से चलाया जाना है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने निम्नलिखित क्षेत्रों की इस दृष्टि से पहचान की है—

अरुणाचल प्रदेश में पश्चिमी अरुणाचल का इलाका, सिक्किम में खांगचेनडोंग और दार्जिलिंग, असम के काजीरंगा कर्बी अंगलोंग क्षेत्र को भी इसी वर्ग में रखा गया है।

राष्ट्रीय स्तर पर इस उद्देश्य से कई कार्यक्रम चलाए गए हैं। उदाहरण के लिए संरक्षित एवं सुदृढ़ तन्त्र, जैव-विविधता संरक्षण प्राथमिकताकरण परियोजनाएँ भी बनाई गई हैं जिनके अन्तर्गत प्राथमिकता वाले इलाकों और नस्लों की पहचान की जाती है। उनके जीव वैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक महत्व को इसका आधार बनाया जाता है। राष्ट्रीय पैमाने पर इनके संरक्षण की कार्यनीतियाँ विकसित की जाती हैं।

बंगलुरु के फाउण्डेशन फॉर रिवाइटलाइजेशन ऑफ लोकल हेल्थ ट्रेडिशंस ने इन संरक्षण अनुमानों और प्रबन्धन प्राथमिकता अध्ययनों के आधार पर अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय और सिक्किम में पाए जाने वाले औषधीय पादपों की सूची तैयार की है। इनकी संख्या 51 बताई गई है जिनमें से एक या अनेक राज्यों में 47 किस्में लोप होने के कगार पर पाई गईं। इनमें 6 ऐसी नस्लें शामिल हैं जो दुनिया भर में लुप्त हो रही है।भारत के वनस्पति शास्त्रीय सर्वेक्षण ने इण्डियन रेड डाटा बुक्स प्रकाशित की हैं जिनमें दुर्लभ पौधों और लुप्तप्राय नस्लों का विवरण दिया गया है। ऊष्ण कटिबन्धीय वनस्पति शास्त्रीय अनुसन्धान संस्थान ने भारत, भूटान और नेपाल के अनोखे पौधों वाले हॉट स्पॉट की सूची प्रकाशित की है। इसमें सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागा, मणिपुर, लुशाई-मिजो और खासी जयन्तिया पहाड़ियों के विवरण शामिल किए गए हैं। बंगलुरु के फाउण्डेशन फॉर रिवाइटलाइजेशन ऑफ लोकल हेल्थ ट्रेडिशंस ने इन संरक्षण अनुमानों और प्रबन्धन प्राथमिकता अध्ययनों के आधार पर अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय और सिक्किम में पाए जाने वाले औषधीय पादपों की सूची तैयार की है। इनकी संख्या 51 बताई गई है जिनमें से एक या अनेक राज्यों में 47 किस्में लोप होने के कगार पर पाई गईं। इनमें 6 ऐसी नस्लें शामिल हैं जो दुनिया भर में लुप्त हो रही है। ऐसे पौधों की 5 किस्में अरुणाचल प्रदेश में, 1 असम में, 2 मेघालय में, 2 सिक्किम में और 1-1 सभी पूर्वोत्तर राज्यों में पाई जाती है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ भारत ने अमेरिका के स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर पाखुई अभयारण्य और नामेरी नेशनल पार्क की वनस्पतियों की सूची बनाई।

भारत में वे कौन-से कानून हैं जो जैव-विविधता के उद्देश्य से बनाए गए हैं?


भारत ने भारतीय वन अधिनियम 1927, वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम 1972, वन संरक्षण अधिनियम 1980, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, जैव-विविधता अधिनियम 2002, जैव-विविधता नियम 2004 आदि पारित किए हैं। भारत अन्तरराष्ट्रीय लुप्तप्राय प्रजातियों के व्यापार वाले समझौते का 1976 में सदस्य बन गया था। भारत ने जैव-विविधता वाले समझौते पर 1992 में हस्ताक्षर किए थे। देश में अनेक प्रकार के संरक्षित इलाकों का तन्त्र बनाया जा चुका है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में 4 बायोस्फीयर रिजर्व, 48 अभयारण्य, 14 राष्ट्रीय पार्क और 2 विश्व दाय स्थल हैं।

सैक्रेड ग्रोव्स किसे कहते हैं?


मेघालय, मणिपुर और नागालैण्ड में सैक्रेड ग्रोव्स वन हैं। सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भी सैक्रेड वन खण्ड बनाए हैं। ये सदियों पुराने सांस्कृतिक संस्थान हैं जो वनों और जैव-विविधता की रक्षा करते हैं। स्थानीय जनता इन्हें स्थानीय देवता का निवास स्थल मानती है इसीलिए उनकी रक्षा करती है। ये ऐसे पर्यावरण तन्त्र हैं जो प्राचीन वनों के अवशेषों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन अब इस प्रकार की परम्पराएँ बदलते विश्वास और जीवनशैली के चलते तेजी से खत्म हो रही हैं।

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