प्यासे प्रायद्वीप को जलदान

Submitted by birendrakrgupta on Fri, 06/19/2015 - 17:34
Source
योजना, जुलाई 2004
भारत के पश्चिमी और पूर्वी घाटों का विशाल इलाका सूखे से बराबर त्रस्त रहता है। राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी ने इन इलाकों तक पानी पहुँचाने की जो अन्तर्जलीय सम्पर्क परियोजना तैयार की है, उसके कार्यान्वयन से प्रायद्वीप के पूर्वी हिस्से के बहुत बड़े भू-भाग को पानी के अभाव की समस्या से मुक्ति मिलने की आशा है।देश में आम चुनाव के अनेक सकारात्मक पहलुओं में प्रमुख है अनेक समाचार-पत्रों के संवाददाताओं का ग्रामीण क्षेत्रों में दौरा। इस दौरान उन्हें सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के असंख्य लोगों से सीधी बातचीत के जरिए उनकी समस्याओं से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है। उनके मानस में चल रही उथल-पुथल की जानकारी प्राप्त करने का अवसर अखबारों के माध्यम से देश भर में अपने पाठकों के सामने उजागर कर सकते हैं। सम्भवतः इस प्रकार के दौरे आम चुनाव के अतिरिक्त अन्य अवसरों पर सम्भव नहीं हो पाते।

अंग्रेजी और अन्य अनेक भारतीय भाषाओं में प्रकाशित इस प्रकार की रिपोर्टों से लोग भारत के ग्रामीण क्षेत्रों की ऐसी समस्या से अवगत हो सकते हैं जिनका प्रचार बहुत कम होता है। पेयजल के अभाव की कमी हमारे ग्रामीण भारत के बहुत बड़े भाग का खुला दस्तावेज है जिससे पूरे साल का कम-से-कम आधा भाग यानी दिसम्बर से मई महीने तक ग्रामीणों के इस समस्या से जूझते रहना पड़ता है। वास्तव में यह कहने में कोई हिचक तो नहीं कि कई राज्यों में लगातार दूसरे अथवा तीसरे वर्ष भी सूखे की भयानक मार ने आम चुनावों के नतीजों को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया है कि पश्चिम बंगाल का रायगंज एकमात्र ऐसा संसदीय क्षेत्र है जहाँ सूखे की समस्या ने नहीं, बल्कि बाढ़ की समस्याओं से आम लोग बुरी तरह प्रभावित हैं। महानन्दा नदी की उफनती बाढ़ उस क्षेत्र की आम समस्या है जहाँ बड़े पैमाने पर कृषि योग्य भूमि का लगातार बहाव हो रहा है और लोगों के घर-बार उजड़ते चले जा रहे हैं। मार्च महीने में तो काल बैसाख नाम से कुख्यात अवधि में दक्षिण असम में बारक घाटी में इतनी भारी वर्षा हुई कि सिल्चर संसदीय क्षेत्र में निर्धारित मतदान की तिथि 26 अप्रैल से बढ़ाकर 10 मई कर देने को विवश हो जाना पड़ा।

सूखे से बुरी तरह प्रभावित तमिलनाडु राज्य में भी आश्चर्यजनक रूप से लगभग दो दशक बाद मई महीने के पहले सप्ताह में अप्रत्याशित वर्षा हुई। इससे बीस वर्ष पहले मई महीने के ही दूसरे सप्ताह में इसी तरह की घनघोर वर्षा का उस राज्य पर कहर बरपा था।

वर्षा का यह विकराल रूप सिर्फ तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि निकटवर्ती केरल राज्य में एक सप्ताह तक इस प्राकृतिक कहर का प्रकोप जारी रहा। वैसे यह अलग बात है कि केरल के लिए यह वर्षा वहाँ सूखे की मार झेल रहे लोगों के लिए वरदान बनकर प्रकट हुई। बाद में घने रूप से केन्द्रित हवा के दबाव ने गुजरात को चक्रवात के भँवर में डाल दिया। वैसे प्रकृति की यह आपदा अपेक्षाकृत कम कृषि योग्य सौराष्ट्र के लिए वरदान बन गई।

वैसे इस प्रकार के प्राकृतिक चमत्कारों से सूखे की जबर्दस्त चपेट में घिरे एक विशाल क्षेत्र की दर्दनाक हकीकत को बदला या झुठलाया नहीं जा सकता। सच्चाई यह है कि पश्चिमी घाटों की पर्वत शृंखलाओं की दृष्टि छाया में पड़ने के कारण पुणे से लेकर बंगलोर से भी आगे तक के क्षेत्र सदियों से अपनी भौगोलिक स्थिति का खामियाजा सूखे के रूप में भुगत रहे हैं। सूखा इन क्षेत्रों की सदियों से नियति है और सूखे की भयावहता के साथ ही ये लोग जीते-मरते रहे हैं। सदियों से अकाल से जूझते इन लोगों के चेहरे पर प्राकृतिक आपदा की लकीरें स्पष्ट दिखाई देती हैं। जाड़े या गर्मी में दक्षिण महाराष्ट्र से कर्नाटक तक राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-4 का सफर उन क्षेत्रों के लोगों के चेहरे पर सूखे की स्याह सलवटों की जीवन्त दास्तान है और कोई भी व्यक्ति उनके मूक बयान से इंकार नहीं कर सकता कि उस क्षेत्र में सदियों से जारी प्रकृति की इस विनाशलीला से निपटने के लिए विशेष ध्यान देना जरूरी है।

यह सर्वविदित तथ्य है कि हर वर्ष जुलाई से सितम्बर महीने के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून के महीने में पश्चिमी तटों के मश्चिमी ढलानों पर भारी वर्षा होती है। कर्नाटक के अगुम्बे में पश्चिमी तटीय क्षेत्र का ऊपरी हिस्सा देश भर में सर्वाधिक वर्षा वाले स्थानों में दूसरे नम्बर पर है। सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र अब चेरापूँजी नहीं, बल्कि मेघालय का मौसिनटम है। इन चार महीनों के दौरान केरल, कर्नाटक, गोवा और पश्चिमी महाराष्ट्र के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में पाँच हजार मिलीमीटर अथवा दो सौ इंच तक वर्षा रिकॉर्ड की जाती है।

यह सर्वविदित तथ्य है कि हर वर्ष जुलाई से सितम्बर महीने के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून के महीने में पश्चिमी तटों के मश्चिमी ढलानों पर भारी वर्षा होती है।इतनी वर्षा? आखिर इतनी वर्षा का पानी जाता कहाँ है? प्रश्न भले ही जटिल लगे, उत्तर बहुत आसान है। वर्षा का अधिकतर पानी विशाल अरब सागर में समा जाता है क्योंकि इस क्षेत्र का भू-भाग बहुत संकीर्ण है और पूरे क्षेत्र में न तो कोई बड़ी नदी है और न ही वहाँ किसी ऐसी आकार-प्रकार की नदी होने की कोई सम्भावना ही है। हाँ, अक्तूबर का महीना अवश्य ही वहाँ के लोगों में खुशी लेकर आता है क्योंकि यही वह समय है जब पहली खरीफ फसल की कटाई होती है और उसके बाद सारे कृषि-कार्यों पर पूर्णविराम लग जाता है। अगले आठ महीनों तक उस पूरे क्षेत्र में पानी का कहीं कोई नामोनिशान नहीं बचता, मानो पूरी सभ्यता सूखे के चपेट में आ जाती है। वैसे देखा जाए तो वहाँ अकाल जैसी कोई स्थिति नहीं रहती लेकिन लोगों के जीवन में व्याप्त गरीबी और दरिद्रता को कोई मुखौटा छुपा नहीं सकता। जहाँ जीवन नहीं, वहाँ भाव या अभाव दिखे भी तो कैसे।

महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से शारीरिक रूप से सक्षम सारे लोग, मर्द हो या औरत, अपने घर-बार, चूल्हे-चक्की छोड़कर फसल की कटाई के बाद ही आजीविका की तलाश में सदियों से मुम्बई, पुणे अथवा अन्य स्थानों के लिए निकल पड़ते हैं और उनकी वापसी जून में वर्षा की शुरुआत के साथ ही होती है ताकि मानसून के महीनों में कम-से-कम एक फसल हल लग जाए। यह सच है कि राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-17 के खुल जाने और कोंकण रेलवे से जो उस क्षेत्र से गुजरती है, वहाँ की अर्थव्यवस्था में कुछ परिवर्तन आया है। इसके अतिरिक्त, औद्योगिकीकरण की दिशा में भी थोड़ा-बहुत काम शुरू हुआ है।

लेकिन एक दूसरी भयावह सच्चाई यह भी है कि दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दौरान पश्चिमी तटीय क्षेत्र के पूर्वी हिस्से के लोगों को वर्षा का लाभ नहीं मिल पाता। यह अलग बात है कि कभी भाग्य उनका साथ दे जाए लेकिन वे इतने खुशनसीब नहीं और वर्षा का अभाव उन्हें हमेशा त्रस्त करता रहता है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा कि वर्ष 2003 में जब दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दौरान सामान्य वर्षा हुई, उस अवधि में महाराष्ट्र के चार दक्षिणी जिलों, कर्नाटक के कोई सोलह उत्तरी जिलों, तमिलनाडु के नौ जिलों और आन्ध्र प्रदेश के दो जिलों में लगातार दूसरे वर्ष भी आवश्यकता से बहुत कम वर्षा हुई।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि गोदावरी के दक्षिण, पूरे दक्कन क्षेत्र में कोई बड़ी नदी नहीं है जो जल स्रोत का सबल साधन बन सके। गोदावरी नदी का उद्गम महाराष्ट्र के नासिक के उत्तरी क्षेत्र त्र्यम्केश्वर है। मानसून के दौरान यहाँ भारी वर्षा होती है। 110.54 बिलियन घन मीटर पानी छोड़ने वाली इतनी विशाल नदी भी गर्मी में सूख जाती है। महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट से निकलने वाली एक दूसरी विशाल नदी कृष्णा की सहायक तुंगभद्र और भीम जैसी नदियाँ है जबकि इन दोनों नदियों की भी सहायक यलप्रभा और घाटप्रभा नदियाँ हैं। इनके कुल 78.12 बिलियन पानी का विभाजन महाराष्ट्र, कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश के बीच हो जाता है। यह व्यवस्था कृष्णा नदी जल विवाद प्राधिकरण के निर्णय के अनुसार की गई है। लेकिन प्राधिकरण के निर्णय से ये तीनों राज्य असन्तुष्ट हैं और इसे ध्यान में रखते हुए समस्या के निपटारे के लिए यह नया प्राधिकरण जल्दी ही अपना काम-काज शुरू कर देगा।

कावेरी एक अन्य विशाल नदी है जिसकी कुल लम्बाई 803 किलोमीटर है और पानी छोड़ने की क्षमता 21.36 बिलियन घन मीटर है। पानी के बँटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जारी विवाद जग-जाहिर है। प्रायद्वीप में कई छोटी-छोटी नदियाँ भी हैं जिनकी पानी की क्षमता भी उनके आकार-प्रकार के समान ही कम है फिर भी ये पड़ोसी राज्यों के बीच विवादों से बच नहीं पातीं। इसी प्रकार की एक नदी चित्रावती है जो कर्नाटक से निकलती है और आन्ध्र प्रदेश में पेन्नार से मिल जाती है। इस छोटी नदी से पेयजल के विभाजन को लेकर दोनों राज्यों में अच्छा-खासा विवाद चल रहा है।

समाधान


आन्ध्र प्रदेश के तेलंगाना और रायलसीमा क्षेत्र में पानी की कमी की समस्या सर्वविदित है और पिछले कुछ समय में इन क्षेत्रों में अकाल का प्रकोप लगातार छाया रहा है। आबादी में वृद्धि और जीवन-स्तर में सुधार के कारण पानी की ज्यादा-से-ज्यादा माँग बराबर उठती रही है। राष्ट्रीय जल विकास निगम द्वारा तैयार की गई अन्तर्जलीय सम्पर्क योजना को कार्यरूप मिल जाने के बाद प्रायद्वीप के पूर्वी क्षेत्र में काफी हद तक पानी की कमी दूर हो जाएगी क्योंकि दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व, दोनों मानसून के समय उस इलाके में बहुत अच्छी वर्षा होती है। फिर भी पश्चिमी घाट तथा पूर्वी घाट के पश्चिमी हिस्से का बहुत बड़ा भू-भाग सूखे की चपेट से नहीं बच सकता और वैसी स्थिति में वहाँ के लोगों के लिए आजीविका और जीवन का निर्वाह कठिन ही है। उस क्षेत्र के रोजी-रोटी की तलाश में खेतिहर मजदूरों का पलायन उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी का नियमित हिस्सा है।

आन्ध्र प्रदेश के तेलंगाना और रायलसीमा क्षेत्र में पानी की कमी की समस्या सर्वविदित है और पिछले कुछ समय में इन क्षेत्रों में अकाल का प्रकोप लगातार छाया रहा है।इस क्षेत्र में पानी की कमी कैसे दूर की जा सकती है? यह सच है कि सामान्य वर्षापात की सीमा नहीं बढ़ाई जा सकती, यद्यपि अप्राकृतिक रूप से बादल उत्पन्न करने के प्रयोग से यदि यह सफल होता है थोड़ी-बहुत वर्षा कराई जा सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि कृत्रिम उपायों से वहाँ पानी पहुँचाया जाए। अन्तर्जलीय परियोजना के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण बात निहित है- दक्षिण कर्नाटक की नेत्रावती नदी को हेमवती से जोड़ने का कार्य। ये दोनो नदियाँ कर्नाटक के सकलेशपुर क्षेत्र से निकलती हैं। ये अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र हैं जहाँ दक्षिण-पूर्व मानसून के दौरान पाँच हजार किलोमीटर तक वर्षा होती है।

नेत्रावती नदी केरल की सीमा पर मंगलोर से कुछ दक्षिण अरब सागर से मिलती है। हेमवती नदी का प्रवाह सकलेशपुर से दक्षिण की ओर है और यह कावेरी के कृष्णराजसागर जलाशय में मिल जाती है। अन्तर्जलीय सम्पर्क परियोजना से हेमवती नदी के बहाव में तेजी आ सकती है और इस तरह मैसूर के पास कावेरी से आगे कृष्णराजसागर जलाशय में पानी बढ़ सकता है।

लेकिन बेदती-वरदा सम्पर्क को छोड़कर पश्चिमी घाटों के पूरब में पश्चिमी ढलानों में पानी के सीमित विभाजन की भी अब तक कोई योजना नहीं बनी है। हाँ, इस योजना से पश्चिम की ओर कर्नाटक के गोकर्ण से भीतरी उत्तरी कर्नाटक में वरदा तक जो अरब सागर से मिलती है, तुंगभद्र कमान क्षेत्र के लिए पानी के बहाव का रूख किया जा सकता है। चाहे जो भी हो, इतना तो निश्चित ही है कि इस प्रकार की दोनों योजनाओं का उत्तरी कर्नाटक और दक्षिणी महाराष्ट्र क्षेत्रों में कोई खास असर नहीं हो सकता। इसकी सफलता के लिए एक अलग योजना की जरूरत है जिसमें यह व्यवस्था हो कि पश्चिमी तटों पर पश्चिमी हिस्से में दक्षिण-पूर्व मानसून के चार महीनों में जितनी ज्यादा वर्षा होती है, उन्हें जमा कर लिया जाए और इस तरह एकत्र किए गए पानी को पहाड़ियों पर पम्पिंग अथवा सुरंगों के जरिए वर्तमान नदियों तक पहुँचाया जाए। जो दक्षिण-पश्चिम मानसून के खत्म होते ही पलक झपकते सूख जाते हैं। ऐसा विचार जोर पकड़ रहा है कि इस क्षेत्र में नई सिंचाई योजनाएँ शुरू किए बिना वहाँ के लोगों के पलायन और वहाँ की आर्थिक स्थिति में वांछित सुधार सम्भव नहीं है। इस तरह की योजनाओं से उन नदियों से बराबर पानी मिलता रहेगा जो अचानक सूख जाती हैं। हमारे भारतीय इंजीनियर इस प्रकार की योजना को कार्यरूप देने में पूरी तरह सक्षम हैं।

स्वतन्त्रता के पूर्व से ही भारतीय इंजीनियरों ने सिंचाई के क्षेत्र में जो अभूतपूर्व कार्य किए हैं, वे ऐतिहासिक हैं और हमारे देश की महान गौरवपूर्ण परम्परा की शृंखला की यादगार मिसाल हैं। यदि जमा पानी को वांछित स्थान तक पहुँचाने के लिए पम्पिंग की जरूरत हो, तो उसके लिए पश्चिमी घाटों के पूर्वी ढलानों से छोटी नदियों और नालों में गिरने वाले पानी से ही बिजली पैदा की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिले में अजुधिया नदी परियोजना की ही तरह पम्प स्टोरेज सिस्टम भी तैयार हो सकता है। अगर योजना के लिए पहाड़ियों के काफी ऊँचे स्थानों का चुनाव किया जाए तो पानी को ऊपर तक लाने के लिए भी कोई खास प्रयास नहीं करना होगा और इस प्रकार बिजली की खपत भी ज्यादा नहीं होगी।

अगर ये योजनाएँ वास्तविकता का रूप ले लें, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रायद्वीपीय भारत में खुशहाली का नया दौर शुरू होगा और पम्पों पर होने वाले बिजली के खर्च को पूरा करने में ये स्वयं सक्षम होंगी।

पानी पहुँचाने वाली सुरंगों का निर्माण खर्चीला हो सकता है लेकिन भारतीय इंजीनियर देश के पहाड़ी क्षेत्रों में इस प्रकार की सुरंगें तैयार करने में पूरी तरह सक्षम हैं। हिमाचल में पण्डोह और देहर के बीच व्यास-सतलुज सम्पर्क योजना और हाल ही में पूरी की गई नाथपा झाकरी पन-बिजली योजना के हिमालय के रास्ते लम्बी-लम्बी सुरंगों का निर्माण हमारे इंजीनियरों की कार्यकुशलता का प्रमाण है। कोंकण रेलवे मार्ग में ही नब्बे किलोमीटर लम्बी सुरंगे हैं जिनमें रत्नागिरी के दक्षिण करबुडे में साढ़े छह किलोमीटर लम्बी सुरंग शामिल है।

ज्ञातव्य है कि हर वर्ष वर्षा से भारत को मिलने वाले 4 हजार बिलियन घन मीटर पानी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में चला जाता है। अन्तर्जलीय परियोजना के लिए इसका बहुत थोड़ा-सा भाग यानी सिर्फ ढाई सौ बिलियन घन मीटर पानी की आवश्यकता होती है। बाकी पानी पहले की ही तरह सागर में जाता रहेगा ताकि उन नदियों को बराबर पानी मिलता रहे और उनमें उत्पन्न होने वाले पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं के लिए आवश्यक मात्रा में पानी मिलता रहे जिन पर पानी जमा करने के बाँध निर्मित हैं अथवा जिनके निर्माण का प्रस्ताव है। पश्चिमी तटों से पूर्व की ओर पानी के स्थानान्तरण के लिए जितने पानी का प्रस्ताव किया गया है, उसकी मात्रा अत्यन्त सीमित है और इसका कोंकण के नाम से प्रख्यात पश्चिमी भारत के तटीय क्षेत्रों के अनेकानेक छोटी-छोटी नदियों में जल-प्रवाह में किसी प्रकार का बुरा असर नहीं पड़ेगा।

(लेखक हिन्दुस्तान टाइम्स के पूर्व संवाददाता हैं)

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