फ्लोराइड एवं इसके दुष्प्रभाव

Submitted by admin on Mon, 02/10/2014 - 12:40
Source
ग्रामीण विकास विज्ञान समिति

1. फ्लोराइड एवं इसके भौतिक गुण


मनुष्य की शारीरिक संरचना में फ्लोराइड की उपस्थिति अत्यंत कम मात्रा में अति आवश्यक है। कुछ एन्जाइम प्रक्रियाएं फ्लोराइड की कम मात्रा से या तो धीमी हो जाती हैं अथवा तेज हो जाती हैं और अन्य कार्बनिक एवं अकार्बनिक तत्वों के साथ रासायनिक प्रक्रियाएं संपन्न होती हैं। शरीर में अस्थियों एवं दांतों में कैल्शियम की सर्वाधिक मात्र पाई जाती है कैल्शियम एक विद्युत धनात्मक तत्व है और अपने धनात्मक प्रभाव के द्वारा विद्युत ऋणात्मक फ्लोराइड को अधिकाधिक मात्रा में अपनी तरफ खींचता है। फ्लोराइड भू-पटल में बहुतायत से पाया जाने वाला तेरहवां (13वां) तत्व है। इसकी खाज प्रोफेसर हेनरी मॉइसन द्वारा सन् 1886 में की गई। प्रोफेसर हेनरी को उनकी उपलब्धियों के लिए सन् 1905 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पिछली शताब्दियों में फ्लोराइड से संबंधित प्रश्न प्रयोगशालाओं तक ही सीमित थे, परंतु सन् 1920 में फ्लोरीन के कई उपयोगी गुणों की खोज हुई। इसके पश्चात् आधुनिक उद्योग में फ्लोराइड अनिवार्य माना जाने लगा।

फ्लोरीन अत्यधिक सक्रिय तत्व है और अन्य तत्वों के साथ संयुक्त होने की दृढ़ क्षमता द्वारा फ्लोराइड नामक यौगिक निर्मित करता है। फ्लोराइड सभी तत्वों में सर्वाधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व है, इसलिए यह हमारी जानकारी में सबसे मजबूत ऑक्सीकारक तत्व है। स्वतंत्र अवस्था में यह एक हल्के पीले रंग की उत्तेजक गंध वाली गैस है। इसका क्वथनांक -188 डिग्री सेल्सियस एवं हिमांक -220 डिग्री सेल्सियस है।

2. फ्लोराइड एवं जैविक ऊतक


मनुष्य की शारीरिक संरचना में फ्लोराइड की उपस्थिति अत्यंत कम मात्रा में अति आवश्यक है। कुछ एन्जाइम प्रक्रियाएं फ्लोराइड की कम मात्रा से या तो धीमी हो जाती हैं अथवा तेज हो जाती हैं और अन्य कार्बनिक एवं अकार्बनिक तत्वों के साथ रासायनिक प्रक्रियाएं संपन्न होती हैं। शरीर में अस्थियों एवं दांतों में कैल्शियम की सर्वाधिक मात्र पाई जाती है (सामान्य दांत के इनामेल में करीब 110 पी.पी.एम. फ्लोराइड पाया जाता है) कैल्शियम एक विद्युत धनात्मक तत्व है और अपने धनात्मक प्रभाव के द्वारा विद्युत ऋणात्मक फ्लोराइड को अधिकाधिक मात्रा में अपनी तरफ खींचता है। इस प्रकार फ्लोराइड “कैल्शियम फ्लोएपेटाइट क्रिस्टल” के रूप में जमा होता है। मनुष्य के शरीर में फ्लोरोसिस नामक बीमारी का मूल कारण इस क्रिस्टल का जमाव है। मानव शरीर में प्रोटीन, एन्जाइम एवं डी.एन.ए. को भी फ्लोराइड प्रभावित करता है। इस प्रकार शरीर के ऊतकों में कुछ मात्रा में फ्लोराइड इकट्ठा हो जाता है।

शरीर से फ्लोराइड का कुछ मात्रा में त्याग पसीना, मूत्र एवं शौच द्वारा होता है। शरीर से फ्लोराइड के त्याग की मात्रा कुछ विभिन्न कारणों पर भी निर्भर करती है, जैसे कि गुर्दों की कार्यकारक क्षमता, हारमोन्स का स्तर, उम्र, खान-पान का स्तर, मौसम की स्थिति इत्यादि।

3. फ्लोराइड के स्रोत


अ. पानी एवं भोजन


फ्लोराइड विभिन्न स्रोतों द्वारा शरीर में प्रवेश करता है। राजस्थान के भू-पटल में फ्लोराइड मिश्रित लवण प्रचुर मात्रा में है, अतः जल, खाद्य-पदार्थ एवं फसलों में फ्लोराइड की उपस्थिति पाई जाती है।पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा 1-1.5 पी.पी.एम. (मिग्रा/लीटर से अधिक होने पर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं, अर्थात मानव शरीर फ्लोराइड की मात्रा एक सीमा (1 से 1.5 पी.पी.एम.) तक सहन करने की क्षमता रखता है। भारतीय मानक ब्यूरो एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फ्लोराइड की अधिकतम सीमा 1.5 पी.पी.एम. तय की है।

फ्लोराइड कुछ मात्रा में खाद्य पदार्थों में भी उपस्थित होता है परंतु समुद्री मछली, पनीर, तुलसी एवं चाय में फ्लोरीन अधिक मात्रा में उपस्थित होता है। तंबाकू एवं पान-मसाला में भी फ्लोराइड बहुतायत में पाया जाता है। विभिन्न खाद्य पदार्थों जैसे कि हरी सब्जियों, दाल, मांस-मछली एवं फलों में फ्लोराइड अल्प मात्रा में होता है।

खाद्य-सामग्री में फ्लोराइड की मात्रा मुख्यतः मिट्टी के प्रकार, भू-पटल में उपस्थित लवणों एवं उपलब्ध पानी पर निर्भर करती हैं। उच्च फ्लोराइयुक्त पानी भोजन एवं सब्जियों में फ्लोराइड की मात्रा को बढ़ाता है।

एक ग्राम चाय की पत्ती को 125 मिली. पानी में डालकर 5 मिनट तक उबालने पर फ्लोराइड में 18.13 से 56.19 मिग्रा/लीटर तक वृद्धि हो जाती है। फ्लोराइड की मात्रा पान में 7.8 से 12 मिग्रा/लीटर सुपारी में 3.8 से 12 मिग्रा/लीटर एवं तंबाकू में 3.1 से 38.0 मिग्रा/लीटर तक होती है। राजस्थान के भूजल में फ्लोराइड की सर्वाधिक मात्रा 31.0 पी.पी.एम. तक पाई गई है। संपूर्ण भारत में यह फ्लोराइड की सर्वाधिक मात्रा है। संयोगवश भारत में चाय के साथ दूध का प्रयोग फ्लोराइड के प्रभाव को कम करता है।

ब. दवाईयां


सोडियम फ्लोराइड (NaF) ऑस्टियोस्क्लेरोसिस ऑस्टियोपारोसिस एवं डेंटल केरीस जैसी बीमारियों में लाभदायक है। फ्लोरोसिस एवं फ्लोराइड संबंधी बीमारियाँ फ्लोराइड के लगातार लंबे समय तक व अधिक मात्रा में इस्तेमाल किए जाने से उत्पन्न होती हैं।

(स) टूथपेस्ट एवं माफथवॉश


यह सर्वविदित है कि अधिकांशतः टूथपेस्ट फ्लोराइड युक्त होते हैं। माउथवॉश भी एक प्रकार का फ्लोरीनयुक्त पानी है, जो मुख में उपस्थित रक्त वाहिनियां फ्लोराइड को कुछ ही मिनट में सोख लेती हैं।

फ्लोराइड के दुष्प्रभावों को मद्देनज़र रखते हुए ड्रग एवं कॉस्मेटिक एक्ट (1945) के तहत दो शर्तें रखी गई

किसी भी टूथपेस्ट में 1000 पीपीएम से अधिक फ्लोराइड नहीं होना चाहिए।
प्रत्येक टूथपेस्ट पर निर्माण व समाप्ति की तारीख स्पष्ट लिखित हो।

(विस्तृत जानकारी के लिए परिशिष्ट-1 देखें)

फ्लोराइड व फ्लोरोसिस से पीड़ित लोग

4 फ्लोराइड का स्वास्थ्य पर प्रभाव


फ्लोराइड एक प्रकार की दो धार वाली तलवार है अर्थात् शरीर में फ्लोराइड का कम मात्रा में होना उतना ही हानिकारक है जितना कि अधिक मात्रा में होना। मनुष्य के शरीर हेतु फ्लोरीन अति आवश्यक तत्व है क्योंकि फ्लोरीन की सहायता से अस्थियों का सामान्य लवणीकरण होता है एवं दांतों के इनामेल का निर्माण होता है। शरीर में उपस्थित कुल फ्लोराइड का 96% फ्लोराइड अस्थियों एवं दांतों में पाया जाता है।

(अ) शरीर में अल्पमात्रिक फ्लोराइड का प्रभाव


खासतौर पर बच्चों में फ्लोराइड के अपर्याप्त उपभोग (0.5 पीपीएम से कम) से कुछ स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं, जैसे-

दातों का सड़ना
दांतों के इनामेल की बनावट में कमी
अस्थियों के सामान्य लवणीकरण मे कमी

ठंडे-देशों जैसे कि रूस, अमेरिका, इंग्लैंड, इत्यादि में स्वास्थ्य समस्याएं फ्लोराइड के अल्प मात्रा में उपभोग से संबंधित है। उपरोक्त देशों में स्वास्थ्य समस्याओं के रुकाव के लिए फ्लोरीन को पानी में मिलाते हैं। कुछ जगहों पर फ्लोराइड को पानी में मिलाने से दाँतों से संबंधित समस्याएं कम हुई हैं।

ब. अधिक मात्रा में फ्लराइड के उपभोग से शरीर पर दुष्प्रभाव अधिक मात्रा में फ्लोराइड के उपभोग से जैविक क्रियाओं पर दुष्प्रभाव निम्न कारणों पर निर्भर करता है –

पेयजल में उपस्थित फ्लोराइड की मात्रा
अधिक क्षारीय पेयजल एवं कैल्शियम की कमी
फ्लोराइड की प्रतिदिन ग्रहण की गई मात्रा
फ्लोराइड के संपर्क में रहने की अवधि

गर्भवती महिलाएं एवं स्तनपान कराने वाली माताएं फ्लोराइड के प्रभाव की दृष्टि से सर्वाधिक असुरक्षित हैं क्योंकि इन महिलाओं में फ्लोराइड आवॅलनाल एवं स्तनपान द्वारा बच्चे के शरीर में प्रविष्ट होता है।

फ्लोराइड की अधिकता के कारण शरीर में हारमोन संबंधी अनियमितताएं भी आरम्भ होने लगती हैं। स्वस्थ हड्डियों के निर्माण एवं कार्य के लिए आवश्यक हारमोन कैल्सिटोनिन पैराहारनोन, विटामिन-डी एवं कॉर्टीजोन इत्यादि हैं। फ्लोराइड की अधिकता से उत्पन्न फ्लोरोसिस एक धीमी गति से बढ़ने वाली बीमारी होती है। फ्लोरोसिस तीन प्रकार का होता है –

दंत फ्लोरोसिस (Dental Fluorosis)
अस्थि फ्लोरोसिस (Skeletal Fluorosis)
अस्थि के अतिरिक्त (Non-Skeletal Fluorosis)

सारिणी 1.1 फ्लोराइड की मात्रा एवं उसका शरीर पर प्रभाव


फ्लोराइड    (मिग्रा / लीटर )

मनुष्य के शरीर पर प्रभाव

0.5 से कम

दंत – क्षरण

0.5 से 1.0

दंत – क्षरण से बचाव , दांतों एवं हड्डियों की सुरक्षा

1.5 से 3.0

दंत फ्लोरोसिस

3.0 से 10

अस्थि – फ्लोरोसिस

10 से अधिक

पंगु अस्थि – फ्लोरोसिस एवं अस्थिजड़ता

 



5. दंत फ्लोरोसिस


दाँतों की ऊपरी सतह (Enamel) की श्वेतता एवं चमक धीरे-धीरे लुप्त होना ही दंत फ्लोरोसिस के प्राथमिक लक्षण है। तत्पश्चात दाँतों पर पीले धब्बे गहरे होते हैं तथा क्रमशः भूरे एवं काले धब्बों का रूप ले लेते हैं। फ्लोरोसिस की तीव्रता दाँतों के निर्माण की प्रक्रिया में फ्लोराइड ग्रहण करने की मात्रा पर निर्भर करती है।

दंत फ्लोरोसिस को तीन अवस्थाओं में विभक्त किया जा सकता है-प्रारंभिक अवस्था, मध्यम अवस्था एवं अंतिम अवस्था।

फ्लोरोसिस दाँतों की बाहरी एवं भीतरी सतह को समान रूप से प्रभावित करता है। स्थाई दाँतों (कृंतक (इंसीजर्स) और चवर्णक (मोलर) में फ्लोरोसिस से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले दांत हैं।

अ. लक्षण : प्रारंभिक अवस्था, मध्यम अवस्था एवं गंभीर अवस्था।


1. प्रारंभिक अवस्था- सफेद दांत पीले होने लगते हैं एवं दांतों की चमक खत्म हो जाती है।
2. मध्यम अवस्था- दांतों पर यह पीला रंग चिकते के रूप में या रेखा के आकार में स्पष्ट उभरने लगते हैं तथा धीरे-धीरे दांतों पर समतल रेखाएं बढ़ती जाती हैं, जो क्रमशः पीले, भूरे व काले रंग की हो जाती हैं।

3. अंतिम अवस्था- सभी दांत काले हो सकते हैं। इसके बाद दाँतों में खड्डे या छेद हो जाते हैं तथा वे टूट जाते हैं। कम उम्र में दांतों का टूटना उन इलाकों में होता है जहां फ्लोरोसिस महामारी की तरह फैला होता है।

ब. उपाय :


दंत फ्लोरोसिस से प्रभावित दांत फिर से सामान्य अवस्था नहीं प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि यह दाँतों का अभिन्न हिस्सा बन चुका होता है। रंगहीन दांतों को निम्न तरीकों से संरक्षित किया जा सकता है।

1. दांतों का विरंजन (ब्लीच करना)
2. हल्के सफेद धातु से दांतों को भरवाना
3. दांतों पर किसी धातु जैसे सोना या क्रोम की परत चढ़वाना

6. अस्थि फ्लोरोसिस


उच्च फ्लोराइड युक्त पानी का सेवन अगर व्यक्ति लगातार जारी रखता है तो शरीर पर अस्थि फ्लोरोसिस के लक्षण दृष्टिगत होते हैं। इसके प्रभाव से व्यक्ति के संरचनात्मक/कंकालीय तंत्र में विकृति पैदा हो जाती है। इसमें हड्डियों का बढ़ना, जोड़ों में जड़ता आना, जोड़ों में दर्द व जोड़ों का लचीलापन खत्म हो जाता है। फ्लोराइड की विषाक्तता के कारण सर्वाइकल (गर्दन) एवं लंबर (कटि-प्रदेश) मेरूदंड के जोड़, घुटनों के जोड़ व कूल्हे की हड्डी के जोड़ों में तीव्र दर्द, कठोरपन एवं जड़ता आ जाती है। ऐसा अस्थियों में असामान्य वृद्धि व अत्यधिक मात्रा में फ्लोराइड का अस्थियों पर जमा होना एवं हड्डियों की कड़ियों के बीच का स्थान असामान्य रूप से बढ़ना या सिकुड़ जाने के कारण होता है।

अस्थि के जोड़ों में कठोरता एवं अस्थि विरुपता के कारण निम्न रोग उत्पन्न होते हैं।

1. कुबड़ापन (Kythosus):- मेरूदंड के वक्षीय क्षेत्र में अत्यधिक वक्रता जिसमें पीछे की ओर उन्नतोदरता हो जाती है, अर्थात उभार निकल आता है।

2. पार्श्वकुटजता (Scoliosis) :- रीढ़ की हड्डी (मेरूदंड) का एक ओर टेढ़ापन

3. अधरांगघात (Paraplegia) :- दोनों टांगों सहित शरीर के निचले भाग में होने वाला पक्षाघात।

4. चतुरांगघात (Quabriplegia):- दोनों हाथ व पैर मेx पक्षाघात हो जाना।

5. घुटने के जोड़ों की मुड़ने संबंधी (कुंचन) विरुपताअस्थि-फ्लोरोसिस बच्चों एवं बूढ़ों दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है।

अ. लक्षण


1. गर्दन, मेरूदंड एवं जोड़ों में दर्द।
2. गर्दन, मेरूदंड एवं जोड़ों की अकड़न।
3. कूल्हे की हड्डी में तीव्र दर्द एवं दृढ़ता।
4. एक्स-रे (एक्स-किरण) द्वारा अस्थियों की बढ़ी हुई परिधि एवं मोटापन से स्पष्ट होती है।
5. कशेरुकदंड रज्जु एवं अंतराकशेरुक रंध्र के संकीर्णन से उत्पन्न दबाव से दर्द एवं पक्षाघात की अवस्था विकसित होती है।

ब. अस्थि फ्लोरोसिस के भौतिक परीक्षण


1. व्यक्ति को झुककर बिना घुटनों को मोड़ें पैर की अंगुली को छूने के लिए कहा जाता है।
2. व्यक्ति को ठोड़ी द्वारा सीने को छूने के लिए कहा जाता है।
3. व्यक्ति को दोनों हाथों को फैलाकर पीछे की तरफ मोड़ते हुए सिर के पिछले भाग को छुने के लिए कहा जाता है।

फ्लोराइड व फ्लोरोसिस से पीड़ित लोग

(स) प्रबंध


अस्थि संबंधी फ्लोरोसिस एक अपरिवर्तनीय प्रक्रिया है अर्थात फ्लोरोसिस रोग से पीड़ित होने के पश्चात पुनः सामान्य अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता है, परंतु रोग की प्रारंभिक अवस्था को आगे बढ़ने से रोकने के कुछ उपाय व सावधानियां व्यवहार में लाए जा सकते हैं जो निम्न प्रकार हैं :-

क) भोजन में विटामिन-सी एवं कैल्शियम की भरपूर मात्रा ग्रहण करनी चाहिए एवं संतुलित भोजन लेना चाहिए।

ख) फ्लोराइड मुक्त करके ही पेयजल को उपयोग में लेना चाहिए।
ग) जिन साधनों में फ्लोराइड उपस्थित हो उन साधनों के प्रयोग से बचना चाहिए। फ्लोराइडयुक्त साधन हैं – टूथपेस्ट, माउथवॉश, तंबाकू, फ्लोराइडयुक्त कुछ दवाईयों आदि।
घ) फ्लोरोसिस के किसी भी लक्षण के प्रकट होते ही डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

7. शरीर के अन्य अंगों पर फ्लाराइड के दुष्प्रभाव


फ्लोरोसिस न सिर्फ अस्थियों एवं कंकाल को प्रभावित करता है बल्कि मांसपेशियों, लाल रक्त कणिकाओं, पाचन तंत्र एवं स्नायु (लिगामेंट) इत्यादि को भी प्रभावित करता है। फ्लोराइड कोमल अंग तथा शरीर की तंत्रिकाओं पर भी अपना प्रभाव डालता है।

(1) मांसपेशियों पर प्रभाव :-


फ्लोराइड के कारण मांसपेशियों में भी विभिन्न परिवर्तन होते हैं जिसके फलस्वरूप मांसपेशियों में उपस्थित एक्टिन एवं मायोसिन नामक सूत्र (फिलामेंट) नष्ट हो जाते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया का रचनात्मक जुड़ाव लुप्त होने लगता है। जिससे रोगी मांसपेशियों में थकान एवं ऊर्जा का अभाव महसूस करता है।

(2) लाल रक्त कणिकाओं पर प्रभाव :-


जब फ्लोराइड का शरीर में अंतर्ग्रहण होता है, तब ये लाल रक्त कणिकाओं की झिल्लियों में भी एकत्रित हो जाता है। फलस्वरूप लाल रक्त कणिकाओं की झिल्लियों से कैल्शियम की मात्रा कम होने लगती है एवं झिल्ली सिकुड़ कर अनियमित आकार धारण कर लेती है। इस प्रकार लाल रक्त कणिकाएं “अमीबा” का रूप ले लेती हैं जिन्हें एकिनोसाइट कहते हैं। मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कणिकाओं का जीवन-चक्र 120-130 दिन है, परंतु भक्षक-कोशिकाएं (मैक्रोफेज) एकिनोसाइट को खा जाती हैं, जिससे वे अपना जीवन पूरा नहीं कर पाती और रोगी में एनिमिया और रक्त की कमी हो जाती है। इस प्रक्रिया के कारण शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो जाता है।

(3) पाचन तंत्र पर प्रभाव :-


आमाशय (स्टोमक) में फ्लोराइड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCI) से मिलकर हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल (F2 + 2HCI = 2HF + cl2) बनाता है जो कि अत्यधिक संक्षारण करने वाला विनाशकारक अम्ल है। जिसके फलस्वरूप आमाशय एवं आंतों की श्लेष्मा झिल्ली नष्ट हो जाती है एवं कोशिकाएं सूख कर फट जाती हैं। प्रभावित मरीजों में सामान्यतया निम्न लक्षण प्रकट होते हैं –

(i) पेट में तीव्र दर्द
(ii) दस्त या कब्ज
(iii) शौच में खून आना
(iv) पेट में गैस बनना
(v) जी घबराना
(vi) मुंह में छाले होना
(vii) भूख कम लगना
(viii) सिर दर्द

(4) तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव


घबराहट, मानसिक अवसाद (डिप्रेशन), हाथ एवं पैर की अंगुलियों में झनझनाहट व कंपकपाहट, अधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब जाना इत्यादि। कभी-कभी मूत्र त्याग करते समय मूत्र की मात्रा कम होती है, मूत्र पीले लाल रंग का होता है व जलन हो सकती है।

(5) शुक्राणु पर प्रभाव


शुक्राणुओं के फ्लोरोसिस से प्रभावित होने के कारण पुरूषों में नंपुसकता आ जाती है। वीर्य में शुक्राणुओं की कमी या अनुपस्थिति का रोग हो जाता है। प्रभावी क्षेत्रों के उन लोगों के रक्त में टेस्टोस्टेरॉन की कमी एक आम समस्या है। यहां अधिक फ्लोराइड युक्त पेयजल का उपभोग किया जाता है।

8. फ्लोराइड-विषाक्तता को रोकने संबंधी उपाय


(i) फ्लोराइड के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए प्रतिदिन 500-1000 मि.ग्रा. विटामिन-सी ग्रहण करना चाहिए।
(ii) फ्लोराइड के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए भोजन में कैल्शियम की पर्याप्त मात्रा का होना भी अति आवश्यक है अर्थात एक वयस्क व्यक्ति को प्रतिदिन 1.5 ग्राम कैल्शियम लेना चाहिए। दूध, दही, हरी पत्तेदार सब्जियां आदि खाद्य पदार्थ कैल्शियम से परिपूर्ण होते हैं।आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग एवं अशिक्षित लोगों में फ्लोरोसिस का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। संपूर्ण संतुलित भोजन फ्लोराइड के दुष्प्रभाव को रोक सकता है।

9. समस्या


राजस्थान में बहुत अधिक संख्या में स्त्री, पुरुष एवं बच्चे फ्लोरोसिस नामक बीमारी से प्रभावित हैं जो कि फ्लोराइड का अधिक मात्रा में उपभोग करने से उत्पन्न होती है। यह पाया गया कि फ्लोराइड का सर्वाधिक अंतर्ग्रहण पेयजल द्वारा होता है, परंतु इसके अतिरिक्त भी फ्लोराइड के विभिन्न स्रोत हैं जैसे कि भोजन, दवाईयां, हवा एवं औद्योगिकी वातावरण आदि। राजस्थान में पीने के पानी का मुख्य स्रोत भूजल है। राजस्थान की मिट्टी में फ्लोराइड युक्त लवण प्रचुर मात्रा में हैं एवं गिरते भूजल स्तर के कारण भूजल में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ रही है। अतः इस कारण राजस्थान फ्लोरोसिस से सर्वाधिक प्रभावित राज्य है।

.अस्थि-फ्लोरोसिस ने व्यक्ति को न सिर्फ शारीरिक स्तर पर विकलांग/अपाहिज बनाया है अपितु सामाजिक व आर्थिक रूप से भी उसे पिछड़ेपन की श्रेणी में सम्मिल्लित कर दिया है। फ्लोरोसिस व्यक्ति की कार्यक्षमता को भी प्रभावित करता है। फ्लोराइड गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए भी हानिकारक है क्योंकि यह आवनाल (प्लासेंटा) द्वारा गर्भस्थ शिशु तक पहुंच सकता है एवं मां के दूध द्वारा स्तनपान करने वाले बच्चों को भी प्रभावित करता है। दंत-फ्लोरोसिस सामाजिक एवं शारीरिक खूबसूरती से संबंधित समस्या उत्पन्न करता है। फीके व रंगविहीन दांत वाले लोगों में हीन भावना घर कर जाती है। कांतिहीन दांत लड़कियों के वैवाहिक संबंधों हेतु बाधक सिद्ध होते हैं।

समस्या के फैलाव का प्रमुख कारण बढ़ी हुई जनसंख्या का पेयजल के स्रोतों पर दबाव डालना है। पेयजल की गुणवत्ता को नज़रअंदाज़ करते हुए नलकूपों की अंतहीन खुदाई, पानी में फ्लोराइड की मात्रा को बढ़ा रही है।

Disqus Comment