हिमालय को नया जीवन दे रहे प्रदीप सांगवान

Submitted by HindiWater on Sun, 09/06/2020 - 20:27

पहाड़ का सौंदर्य हर किसी को लुभाता है। कोई पर्यटक के तौर पर पहाड़ों पर जाता है, तो कोई पर्यटन को ही रोजगार का आधार बनाकर इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है, लेकिन ऐसे बिरले ही लोग होते हैं, जो पर्यटन के साथ साथ स्वच्छता और पर्यावरण का भी ध्यान रखते हैं। इन्हीं लोगों में शामिल हैं, मूल रूप से हरियाणा के निवासी प्रदीप सांगवान। सांगवान हिमाचल प्रदेश में न केवल एक पेशेवर ट्रैकर हैं, बल्कि ट्रैकिंग के दौरान रास्ते पर दिखने वाले प्लास्टिक कूड़े को एकत्रित भी करते हैं। अपने संघर्षपूर्ण जीवन में प्रदीप अभी तक पहाड़ों से 7 लाख किलोग्राम से ज्यादा गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा एकत्रित कर चुके हैं। इस कचरे से बनी बिजली से कई गांव रोशन भी हो रहे हैं। 

हरियाणा में जन्मे प्रदीप सांगवान के पिता सेना में थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई भी मिलिट्री स्कूल में ही हुई थी। जिस कारण अनुशासन का पालन करना वे बचपन से ही सीख गए। पिता की इच्छा थी कि प्रदीप बड़ा होकर उन्हीं की तरह सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा करे, लेकिन प्रदीप का मन पहाड़ की वादियों में ही रमता था। 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद लोगों ने भी आर्मी में जाने के लिए कहा, लेकिन प्रदीप ने एक काॅलेज में दाखिला लिया और समय समय पर पहाड़ों पर ट्रैकिंग के लिए जाया करते थे। पहाड़ों पर जाना और ट्रैकिंग करना धीरे धीरे उनका शोक बन गया।

स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब कोई उच्च शिक्षा की तरफ जाता है तो कोई नौकरी करता है, तब प्रदीप अपने ट्रैकिंग के जुनून को पूरा करना चाहते थे। इस बात से घरवाले काफी नाराज रहते थे और उन्हें हमेशा प्रदीप के भविष्य की चिंता सताती थी। अपने इसी जुनून को पूरा करने के लिए प्रदीप घरवालों की नाराजगी के बावजूद भी हिमाचल प्रदेश के मनाली में जाकर वहां रहने लगे। मनाली आने के बाद शुरूआती दिनों में उन्हें वहां के मौसम और रहन-सहन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी और न ही किसी प्रकार का रोजगार। सर्दियों में जब लोग ठंड से बचने की व्यवस्था करते थे, तब प्रदीप को समझ नहीं आता था कि वह अपने लिए कैसे व्यवस्था करें। हालांकि मनाली में शुरूआती दिनों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन रोजी रोटी चलाने के लिए उन्होंने रोहतांग पास मार्ग पर कोठी गांव में एक कैफे खोला। 

मनाली में रहते-रहते उन्होंने पहाड़ों पर बढ़ते पर्यटन व्यवसाय को प्रत्यक्ष तौर पर जाना और अनुभव किया। पर्यटकों के बढ़ने से ट्रैवलिंग एजेंसियां भी विभिन्न स्थानों पर फलफूल रही थीं। ये एजेंसियां पर्यटकों के रहने-खाने की व्यवस्था से लेकर यात्रा के दौरान उनके सफर को सुगम बनाने के लिए सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत रहती थीं। साथ ही पर्वतारोहियों को रोमांचित करने वाले विभिन्न ट्रैक्स पर जाने की सुविधा भी प्रदान कराती हैं, जहां से पहाड़ों की सुंदरता को आत्मसात किया जा सके। सुविधाएं मिलने का दौर जैसे जैसे बढ़ता गया, हिमाचल प्रदेश के मनाली, शिमला सहित विभिन्न पर्यटन स्थलों पर करोड़ों की संख्या में पर्यटक पहुंचने लगे। ट्रैवलिंग कंपनियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई। कंपनियां विभिन्न पर्यटन स्थलों के पोस्टर बनवाकर ऑफलाइन और ऑनलाइन प्रचार करने लगी। पर्यटकों को लुभाने के लिए आकर्षक ऑफर दिए जाने लगे, लेकिन प्रदीप ने जब वास्तव में पहाड़ों को करीब से देखा और जाना तो वहां सब कुछ तस्वीरों और ऑनलाइन दुनिया के विपरीत था। ऑफलाइन दुनिया के पर्यटन स्थलों पर फैला कूड़ा पहाड़ों के सौंदर्य को धूमिल कर रहा था। पहाड़ों के इस दर्द को देखते हुए प्रदीप ने खुद से ही कचरा साफ करने की पहल की।

उन्होंने अकेले ही अपने अभियान की शुरुआत की और पर्यटकों को ट्रैकिंग पर ले जाने लगे। शुरुआत में ये चुनौतीभरा रहा, लेकिन फिर लोग उनके साथ जुड़ने लगे। प्रदीप जब भी ट्रैक पर जाते तो अपने साथ प्लास्टिक कचरा एकत्रित करके लाते। इस कार्य में स्थानीय लोगों ने उनका पूरा साथ दिया। कुछ लोग तो ऐसे भी थे, जिन्होंने रिसाइक्लिंग संयंत्रों तक कूडें को ले जाने में उनका प्रोत्साहन किया। इस बीच कुछ लोग उनको ‘‘कूड़े वाला’’ बोलकर हतोत्साहित करते, लेकिन पहाड़ों को बचाने और ट्रैकिंग के प्रति अपने जुनून के सहारे वे निरंतर अपनी राह पर अथक बढ़ते रहे और कुछ समय बाद अपने आप को पूरी तरह से पहाड़ों के संरक्षण के कार्य पर लगा दिया। 

प्रदीप सांगवान

पहाड़ों को बचाने के लिए एक टीम खड़ी करने के लिए अपने जैसे विचारधारा के लोगों की तलाश करने लगे, ताकि वे लोग भी उनके इस कार्य में सहयोग कर सकें। इसके लिए उन्होंने वर्ष 2016 में ‘‘द हीलिंग हिमालय फाउंडेशन’’ नाम से एक संस्था की शुरुआत की। प्रचार के लिए सोशल मीडिया पर आईडी और एक वेबसाइट बनाई। सोशल मीडिया के माध्यम से कई स्वयंसेवियों को अपने साथ जोड़ा। स्वयंसेवी के रूप में पंजीकृत होने के लिए वेबसाइट पर पंजीकरण का ऑप्शन भी दिया है। कई स्वयंसेवी निस्वार्थ भाव से पर्यावरण के संरक्षण के लिए संस्था से जुड़ने लगे। द हीलिंग हिमालय फाउंडेशन द्वारा स्वयंसेवियों की उपलब्धता के अनुसार ट्रैकिंग अभियानों का आयोजन कराया जाता है। जिसमें सभी स्वयंसेवी अपने साथ जूट के बोरे और दस्ताने तैयार रखते हैं, ताकि ट्रैक पर मिलने वाले गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे को उठाकर वापिस ला सके। अब संस्था को शुरू करे चार साल से अधिक समय हो गया है। इन वर्षों में सैंकड़ों ट्रैकिंग अभियानों का आयोजन कराया गया है। इस अभियान की खास बात ये है कि कचरा रिसाइक्लिंग प्लांट में भेजा जाता है, जहां से प्लास्टिक कचरे से उत्पन्न होने वाली बिजली से गांवों को बिजली मिल रही है। इससे पहाड़ स्वच्छ होने के साथ ही यहां रोशनी की बहार आ रही है।

प्रदीप सांगवान ने इंडिया वाटर पोर्टल को बताया कि

अभी तक 7 लाख किलोग्राम से ज्यादा गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा एकत्रित किया जा चुका है। मैंने अपने अभियान के तहत स्थानीय ग्रामीणों को जागरुक किया कि किसी प्रकार प्लास्टिक कचरा उनके जलस्रातों और खेती को प्रभावित करेगा। ट्रैकिंग रूट पर हमने कूड़ादान भी रखे हैं, ताकि लोग खुले में कूड़ा न फेंके। समय समय पर पौधारोपण अभियान भी चलाया जाता है। 

 

किसी भी कार्य को करने के लिए सबसे पहले दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत होती है, लेकिन पैसा भी अहम भूमिका निभाता था। कई बार पैसों की कमी के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन प्रदीप किसी भी प्रकार की चुनौती से हारे नहीं। कभी कभी प्रदीप को भी पैसे की दिक्कत हुई तो दोस्तों से पैसे मांगने पड़े। कई बार मणिकरण स्थित गुरुद्वारे में भोजन किया। उन्होंने बताया कि मैंने पैसे की दिक्कत का सामना किया है, लेकिन मुझे अपने लिए ज्यादा पैसों की जरूरत नहीं है। मुझे कम उपभोग वाली साधारण जीवनशैली पसंद है।

अभियान के अंतर्गत पहला ट्रैक हम्प्ता पास का था, जिसमें केवल चार लोग गए थे, लेकिन प्रदीप के संघर्ष का नतीजा है कि 4 लोगों के साथ शुरु किए गए इस अभियान में अब पांच हजार से ज्यादा स्वयंसेवी जुड़ चुके हैं, जिनमें विदेशी भी शामिल हैं। बाॅलीवुड अभिनेत्री दिया मिर्जा भी उनके अभियान से जुड़ी हुई हैं। प्रदीप का पूरा सफर आसान नहीं था। शुरुआत सफाई अभियान से हुई थी, लेकिन बाद में उनकी संस्था को पता चला कि सफाई अभियान से बड़ी समस्या कचरा प्रबंधन है। इसलिए वें अब कचरा प्रबंधन पर जोर दे रहे हैं और इस पर सरकार के साथ मिलकर कार्य भी कर रहे हैं। साथ ही फाउंडेशन द्वारा इस समय किन्नौर के छितकुल के पास रक्छाम गांव में एक वेस्ट कलेक्शन सेंटर बनवाया जा रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों को रोजगार मिलने की संभावना भी है। 

प्रदीप कहते हैं

इंसान खुद को दूसरे इंसान से तो बचा सकता है, लेकिन प्रकृति इंसान के खिलाफ नहीं लड़ सकती। इसलिए प्रकृति को बचाने के लिए हम सभी को अपने प्रयासों में एकता लानी होगी।


हिमांशु भट्ट (8057170025)

Disqus Comment