रिश्तों की प्यास

Submitted by Hindi on Tue, 03/10/2015 - 16:28
Source
साक्ष्य नदियों की आग, अक्टूबर 2004
.मैथ्यू साहब की बात सुन कर मुझे काफी हैरत हुई। सच पूछें तो एक सकते जैसी स्थिति मुझ पर तारी हो गई। ‘पानी के इस रंग' से पहले मेरी वाक्फियत नहीं थी। लेकिन उस दिन पानी का यह नया रूप सामने आया था। पानी भी किसी को तोहफे में देने की चीज है, यह सवाल पहली नजर में बेमानी-सा लगता है। पर हुआ ऐसा ही था। मैथ्यू साहब को किसी ने तोहफे में पानी दिया था और उन्होंने किसी दूसरे साथी को वही पानी तोहफे में दे दिया। देश में जहाँ लाखों लोगों को साफ पानी मयस्सर नहीं हो, वहाँ पानी को तोहफे में देने की बात मेरे जैसे किसी भी इन्सान को हैरत में डालने के लिए काफी थी।

दिल्ली में मेरी यह दूसरी बकरीद थी। कोलकाता से तबादले के बाद लगातार दूसरे साल बकरीद के मौके पर घर से दूर रहा, वरना ईद और बकरीद इन दो त्योहारों पर गाँव जरूर जाता था। माँ-पिता के साथ दादी अम्माँ, फूफी, चचा, भाई-बहनों के साथ-साथ गाँव के लोगों के साथ ईद और बकरीद की खुशियों में शरीक होता। यह मेरा पुराना मामूल था। पटना और कोलकाता में रहने के दौरान शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब ईद-बकरीद में गाँव नहीं जाना हुआ हो। यह एक बंधा-बंधाया मामूल था। घर बालों को भी मेरा इन्तजार रहता था कि कम से कम दो मौकों पर तो मैं जरूर घर आऊंगा और सबके साथ थोड़ा समय बिताऊँगा। लेकिन साल भर पहले कोलकाता से तबादला होकर दिल्ली आया तो बकरीद और ईद पर गाँव जाना नहीं हो पाया। ईद देहरादून में पत्नी और बच्चों के साथ मनाई थी, लेकिन बकरीद में दिल्ली में ही रहा।

पर्व-त्योहारों के मौके पर अकेलापन काफी सालता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। अकेले आदमी के लिए पर्व-त्योहारों का होना न होना बहुत मतलब नहीं रखता। फिर अनजान जगह, लोगों से ज्यादा मेल-मिलाप भी नहीं, साल भर में जान-पहचान का दायरा बढ़ा जरूर है, लेकिन उनमें ऐसे लोग बहुत कम हैं जहाँ पर्व-त्योहार में जाकर अपनी खुशियाँ बाँट सकूँ। हाँ सिर्फ भाभी हैं। पिछली बार भी बकरीद उनके घर ही बीती थी। भाभी के साथ मेरा पहला त्योहार था और उन्होंने मुझे बच्चों की तरह ही ईदी दी थी। हालाँकि मैं उनसे ईदी नहीं ले रहा था लेकिन पहले उन्होंने मुझे डाँट लगाई और फिर दुलार से समझाया। उनकी बात वैसे भी टालना मेरे लिए मुमकिन नहीं था।

इस बार भी बकरीद में उनके यहाँ ही जाना हुआ। दिल्ली में भाभी के रहने से बहुत ही तसल्ली रहती है, वरना दिल्ली में आदमी कट कर अपने से भी बेगाना हो जाता है। भाभी से बातचीत हो ही रही थी कि हनी का फोन आया। हनी भाभी की बड़ी बेटी है और मयूर विहार में रहती है। उसके पति कलीम अख्तर मीडिया में हैं। पर वे मीडिया में व्यापार और मार्केटिंग से जुड़े हुए हैं। भाभी ने हनी से बात करने के बाद फोन मुझे थमाया। सलाम-दुआ और ईद की मुबारकबाद के बाद हनी ने छूटते ही कहा - चचाजान, आप सीधे यहाँ चले आए। खाना आपको मेरे साथ खाना है। शायद भाभी से पहले ही उसने इजाजत ले ली थी। यूँ भी मुलाकात के लिए उसके घर मुझे जाना ही था। मोना और दीबा से मुलाकात हो ही चुकी थी, इसलिए भाभी से इजाजत लेकर मैं हनी के घर चल पड़ा था।

हनी को तरह-तरह के व्यंजन बनाने का शौक जाहिर है भाभी से ही मिला था। फिर ईद और बकरीद तो वैसे भी अच्छे और जायेकादार व्यंजनों का त्योहार है। हनी के यहाँ पहुँचा तो वहाँ कई लोग पहले से मौजूद थे। उनके कलीम भाई के कार्यालय के मैनेजर मैथ्यू और उनका परिवार भी था। हाल ही में उनका मुम्बई से तबादला हुआ था। कलीम भाई ने उन्हें भी खाने पर बुलाया था। बातचीत के बाद खाने का दौर चला। मैथ्यू का हाल ही में मुम्बई से दिल्ली तबादला हुआ था इसलिए पानी वगैरह में वे थोड़ी एहतियात बरत रहे थे। इसी को ध्यान में रख कर कलीम भाई ने उनके लिए बोतलबन्द पानी या मिनरल वाटर का इन्तजाम किया था। उन्हीं दिनों एक संस्था की रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि बोतलबन्द पानी भी सेहत के लिए फायदेमन्द नहीं होते हैं, क्योंकि उन बोतलों में भी कीटाणुओं की अच्छी-खासी मात्रा पाई गई है जो किसी भी सेहतमन्द आदमी को बीमार करने के लिए काफी है।

आज पानी कई रंगों में बाजार में बिकने लगा है और उसका रिश्ता भूखों की भूख और प्यास से अब नहीं रहा है। पानी अब बाजार का एक हिस्सा हो गया है। इसे खरीदा और बेचा जा सकता है और लोगों को तोहफे में दिया जा सकता है। पानी आज पैसा बनाने का जरिया बन गया है। देश भर में तालाब, कुएँ, पोखर, नदियाँ सूखते जा रहे हैं लेकिन बोतलों में बन्द पानी बाजार में हर जगह आसानी से उपलब्ध है। सिर्फ पैसा फेंकिए और तमाशा देखिए।

हनी ने मिनरल वाटर की बोतल मैथ्यू साहब को थमाई। हालाँकि उन्होंने मना भी किया और कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। लेकिन पानी की बोतल तो आ ही चुकी थी। इस बीच हनी ने ही मिनरल वाटर की जाँच की चर्चा करते हुए कहा कि अब तो बोतल बन्द पानी की गारण्टी नहीं दी जा सकती कि स्वास्थ्य के लिए यह पानी लाभदायक है। बात फिर बोतल बन्द पानी के कीटाणुओं पर ही होती रही। हनी ने ही उस बीच बताया कि जिस संगठन ने बोतल बन्द पानी की जाँच करवाई है, उससे जुड़े हैं अहमद। वे अक्सर मेरे घर आते रहते हैं। बोतलबन्द पानी में कीटाणु होने की बात जिन दिनों चर्चा में थी, वे घर आए थे और मैंने उनसे पूछा था कि इसमें कोई सच्चाई है या सिर्फ खबरों में बने रहने के लिए उसके संगठन ने यह शगूफा उछाला है? तब उन्होंने बताया था कि नहीं, यह कोई शगूफा नहीं है, बल्कि इसमें सच्चाई है।

भारत में बोतलों में बिकने वाले सभी ब्राण्ड के पानी दूषित होते हैं। हनी ने बताया कि उन्होंने सिर्फ एक ब्राण्ड को ही कीटाणु रहित बताया था। बोतल बन्द पानी का यह ब्राण्ड सिर्फ स्विट्जरलैंड से आयातित होता है और बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है। मैथ्यू साहब ने ही तब कहा था कि उन्होंने स्विट्जरलैंड के उस बोतल की पानी को देखा है जो बहुत ही खूबसूरत बोतल में बेहतरीन पैकिंग के साथ यहाँ आयात होता है। दरअसल वह पानी का ब्राण्ड हाल ही में उन्हें उस कम्पनी ने तोहफे में भेजा था। पाँच लीटर के उस बोतल बन्द पानी की खूबसूरती ने उन्हें मोहित किया था। हालाँकि उस पाँच लीटर पानी की कीमत भारतीय बाजार में करीब तीन सौ रुपए के आस-पास पड़ती है। लेकिन उसकी पैकिंग काफी आकर्षक होती है। आकर्षक पैकिंग और खूबसूरत बोतल, यह पानी मैथ्यू साहब भी पी नहीं पाए। उन्होंने कहा भी कि इतना कीमती पानी पीना उन्हें अच्छा नहीं लगा था। दिवाली के मौके पर उन्होंने उस बोतलबन्द पानी को अपने एक दोस्त को तोहफे में भेज दिया।

तोहफे में पानी देने की बात मुझे सकते और हैरत में डालने के लिए काफी थी। दुकानों में फ्रिज में रखी पानी की ठण्डी बोतलों ने मुझे यूँ भी कभी आकर्षित नहीं किया था। हालाँकि लोग फ्रिज के उस ठण्डे पानी के लिए मारामारी करते दिखाई पड़ते थे। दरअसल बोतल बन्द पानी कभी एक स्टेटस सिंबल बन गया था। शुरुआती दौर में तो बोतल बन्द पानी को देख कर बहुतों की आँखों में पीड़ा, बोतलों के पानी को न पीने की कसक और इन जैसी ही लिखी इबारत साफ पढ़ी जा सकती थी। बाद में यह दूसरे लोगों के लिए भी सुलभ हुआ। लेकिन फिर भी बोतल बन्द पानी ने मुझे कमी भी आकर्षित नहीं किया। फ्रिज से निकाल कर ग्राहकों को थमाते दुकानदारों और बोतलें खरीद कर पानी पीते लोगों को देख कर अक्सर मुझे गाँव का कुआँ याद आ जाता। मीठे पानी का गाँव में वह इकलौता कुँआ था। पूरे गाँव को मीठे पानी के इस कुएँ ने एक डोर में बाँध रखा था। हिन्दू हो या मुसलमान, सवर्ण हो या दलित सभी इसी कुएँ से अपनी प्यास बुझाते।

गर्मी के दिनों में पानी की ठंडक फ्रिज को मात देती थी। बिना पैसे के हर कोई मुसाफिरों, राहगीरों से लेकर बच्चे-बूढ़ों तक की प्यास बुझाने के लिए तत्पर रहता था। जिस किसी ने भी पानी मांगा, पानी भरने वाली या भरने वाला फौरन कुएँ में बाल्टी डालता और पानी खींच कर प्यासे को पानी पिलाने लगता। प्यासे ओक लगा कर पानी पीते और पानी पिलाने वालों को दुआएं देकर अपनी राह लेते। लेकिन बोतल बन्द पानी के साथ ऐसी बात नहीं है। खरीद कर सफर में साथ लेकर चलने वाले लोगों से इस पानी को माँगने की हिम्मत किसी में नहीं होती है। गरीब-गुरबा तो हिम्मत जुटा ही नहीं पाते हैं। कई बार ऐसा हुआ है कि आप रेल या बस में सफर कर रहे हों और कोई गरीब का बच्चा प्यासा रो रहा है तो बोतलों में बन्द पानी न तो बच्चे के लिए कोई माँगता है और न ही ‘पानी का मालिक’ उदारता दिखाता हुआ बच्चे या प्यासे को पानी पिलाता है। यह एक आम बात है। इसमें अपवाद हो सकते हैं, लेकिन खरीदे हुए पानी की त्रासदी यही है कि यह प्यासों के कदम नहीं आता।

पता नहीं मैथ्यू सादृब के उस दोस्त ने उस पानी को पीया या उन्होंने भी उसे किसी दूसरे दोस्त को तोहफे में दे दिया। लेकिन हमारे यहाँ तो मेहमानों को पानी पिलाने का रिवाज है। यह रिवाज विदेशों में भले नहीं हो जहाँ बोतलों में बन्द पानी का चलन है और जो आयातित हो कर हमारे देश में आ पहुँचा है और उसने देश के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया है। सभा-सेमिनारों से लेकर रेलगाड़ी व सफर में अब यही पानी लोगों का 'जीवन' बन क्या है। जिस मुल्क में करोड़ों लोगों को आज भी साफ पानी पीने को मयस्सर नहीं हो वहाँ अवाम और जनता के हितों के दावे करने वाले नेताओं को यह पानी ही ज्यादा सुहाता है। दरअस्ल यह पानी सिर्फ पानी भर नहीं रह गया है, बल्कि एक कारोबार में बदल चुका है और जिससे बहुतों के हित सधते हैं। बाजारवाद में बदलगई दुनिया में पानी अब एक बिकाऊ माल में बदल गया है और आकर्षक और लुभावने पैकिंग में साबुन, तेल की तरह ही पानी बिकने लगा है।

हो सकता है कि बाजार कल बोतलों में बन्द इस पानी के साथ कोई 'गिफ्ट आइटम' भी देने लगे और फिर 'एक के साथ एक फ्री' की स्कीम शुरू हो। दुनिया जिस तेजी से बाजार में बदल रही है, वहाँ यह नामुमकिन भी नहीं। आज मैथ्यू साहब को किसी ने तोहफे में पानी दिया और उन्होंने किसी दूसरे दोस्त को उसे भेज दिया। क्या पता कल पानी अपने साथ इतने आकर्षक और लुभावनी स्कीम लेकर आए या फिर हमारे ताल-तलैया और नदी-कुएँ इन बोतलों की भेट चढ़ जाएँ तो दूसरे लोग भी पानी की इन बन्द बोतलों को दिवाली, ईद या इसी तरह के दूसरे पर्व-त्योहारों पर एक-दूसरे को तोहफे में भेजने लगे। फिलहाल ऐसा दिखता तो नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तान जिस तरह तेजी से विश्व बाजार की गोद में समाता जा रहा है वहाँ आने वाले कुछ सालों में पानी तोहफों में भेजें तो किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए।

काफी पहले एक फिल्म आई थी ‘शोर’ हैं। उस फिल्म में एक गीत है। गीत के बोल हैं - 'पानी रे पानी, तेरा रंग कैसा/ जिसमें मिला दो लगे उस जैसा/ भूखों की भूख और प्यास जैसा’। पर आज पानी कई रंगों में बाजार में बिकने लगा है और उसका रिश्ता भूखों की भूख और प्यास से अब नहीं रहा है। पानी अब बाजार का एक हिस्सा हो गया है। इसे खरीदा और बेचा जा सकता है और लोगों को तोहफे में दिया जा सकता है। पानी आज पैसा बनाने का जरिया बन गया है। देश भर में तालाब, कुएँ, पोखर, नदियाँ सूखते जा रहे हैं लेकिन बोतलों में बन्द पानी बाजार में हर जगह आसानी से उपलब्ध है। सिर्फ पैसा फेंकिए और तमाशा देखिए।

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