रोजगार का केंद्र बने टिहरी झील

Submitted by Hindi on Tue, 02/07/2012 - 15:32
Source
नैनीताल समाचार, 14 नवंबर 2011
टिहरी बाँध विस्थापितों के अधिकारों के लिये सक्रिय ‘माटू जन संगठन’ और नागेन्द्र जगूड़ी, जगदीश रावत तथा रणवीर सिंह राणा आदि सामाजिक कार्यकर्ताओं ने टिहरी जिला पंचायत के अध्यक्ष रतन सिंह गुनसोला को एक पत्र लिख कर टिहरी व कोटेश्वर बाँध की झील में पर्यटन के लिये लाइसेंस स्थानीय निवासियों को देने की माँग की है। दैनिक अखबारों में पर्यटन विकास के नाम पर दिये गये विज्ञापन के संदर्भ में लिखे गये पत्र में आशंका व्यक्त की गई है कि जैसे भागीरथी-भिलंगना के निवासियों के हाथ के बगल से बहती नदी चली गई और आज लोग पीने के पानी के लिये तरस रहे हैं, उसी तरह अब कहीं झील भी न छिन जाये। आशंका है बड़ी-बड़ी बाहरी कंपनियाँ विशेषज्ञता के नाम पर विशेष रियायतें ले लेंगी। बाँधों के निर्माण में लगे ठेकेदारों ने पहले ही झील के किनारे की काफी जमीन पर कब्जा कर रखा है, जबकि विस्थापितों को माँगने पर भी झील के किनारे की जमीन का टुकड़ा भी नहीं मिला।

आज तक टिहरी बाँध के विस्थापितों का पुनर्वास नहीं हो पाया है। सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे एन.डी. जयाल व शेखर सिंह बनाम भारत सरकार व अन्य मामलों से भी यह स्पष्ट होता है। टिहरी बाँध की झील भरने के बाद सर्वे ऑफ इंडिया ने जिन्हें विस्थापित माना, उनका पुनर्वास भी अभी तक नहीं हो पाया है। 35 साल पुराने विस्थापित स्थलों में भी पुनर्वास की आवश्यक व नीतिगत नागरिक सुविधायें उपलब्ध नहीं है। राज्य सरकार की फरवरी 2010 की रिपोर्ट भी इसे सत्यापित करती है कि इसके लिये टीएचडीसी ने पूरा पैसा नहीं दिया है। झील के किनारे के लगभग 80 गाँवों में भूस्खलन के कारण नया विस्थापन शुरू हुआ है। सबसे खराब स्थिति तो झील के पार की है, जिसे कट ऑफ एरिया कहा जा रहा है। 22-09-2011 की सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हीं कारणों से टीएचडीसी को राज्य सरकार से ही टिहरी बांध झील को पूरा भरने की इजाजत लेने का आदेश दिया था।

टिहरी बाँध की झील पर किसका अधिकार है


भागीरथी घाटी के विकास व संरक्षण के लिये टिहरी बाँध परियोजना की पर्यावरण स्वीकृति 19 जुलाई 1990 में शर्त संख्या 3.7 में केन्द्रीय ऊर्जा मंत्रालय को 31-3-1991 तक ‘भागीरथी घाटी प्रबंधन प्राधिकरण’ बनाने के निर्देश दिये गये थे। लगभग 22 साल बाद 2003 में फिर सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया तब 2005 में इसे वास्तविक रूप में बनाया गया। इस प्राधिकरण ने भी टिहरी झील में पर्यटन के लिये 15 सितंबर 2006 में नई टिहरी में बैठक का आयोजन किया था। जिसमें एक विस्तृत योजना बनी थी, जिसमें तत्कालीन व पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने खास रुचि ली थी। एक ‘झील प्राधिकरण’ भी बनाया गया है, जिसकी अब तक बैठक भी नहीं हो पाई है।

यह असमंजस की स्थिति है कि टिहरी बाँध की झील पर किसका अधिकार है ? वास्तव में तो पहला व अंतिम अधिकार विस्थापितों का ही बनता है। लेकिन दैनिक अखबारों में पर्यटन विकास के नाम पर दिये गये विज्ञापन में यह भाव कहीं नहीं दिखाई देता। हमें ध्यान रखना चाहिये कि अभी टिहरी बाँध की झील के किनारे के गाँवों का अस्तित्व खतरे में है। झील की रिम, यानी चारों ओर की पहाड़ियाँ स्थाई नहीं हैं। इसलिये रिम पर कोई भी योजना भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वे को ध्यान में रख कर बनाई जानी चाहिये। सबसे पहले भूस्खलन प्रभावित गाँवों के पुनर्वास के लिये काम हो। यह 3 व 5 सितारा होटलों से ज्यादा जरूरी है। इस संदर्भ में 18 अप्रैल 2011 को दाखिल की गई विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को आधार बनाना चाहिये। हालाँकि इस समिति की रिपोर्ट भी अंधेरी है, क्योंकि इसने तीन दिन में 42 किलोमीटर की झील पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर लिया। अभी झील का स्तर स्थायी नहीं है। अभी यह विद्युत उत्पादन पर निर्भर है। इसलिये यहाँ हाऊस बोट व बड़ी नौकायें सफल होनी मुश्किल हैं। भूकंप व भूस्खलनों के मद्देनजर भी यह सुरक्षित भी नहीं होगा।

सितारा होटल पहाड़ की देव संस्कृति पर बुरा असर डालेंगे, अतः इनसे बचना चाहिये। पर्यटन का पर्यावरण व स्थानीय संस्कृति के साथ सामंजस्य होना चाहिये।

ऐसा मालूम पड़ रहा है कि पर्यटन के नाम पर नये तरह के विस्थापन की तैयारी चल रही है। पहले से ही उत्तराखंड में खेती की जमीन बहुत कम है। इससे यह और कम होगी। फिर भी भू-अर्जन यदि अनिवार्य हो ही जाये तो भूमि के बदले भूमि दी जाये। अतिरिक्त भूमि का मूल्य, टिहरी जिले में भूमि के अधिकतम बाजार भाव से दिया जाये। पुनर्वास की अन्य सुविधायें नवीनतम पुनर्वास नीति के तहत ही दी जानी चाहिये। पूर्व में बाँध के लिये ली गई भूमि और नये भू अर्जन में ली जा रही भूमि को जोड़कर पात्रता का निर्धारण किया जाना चाहिये। पिछली बार बहुत से परिवार पात्रता से वंचित रह गये थे, क्योंकि उनकी भूमि विस्थापित हेतु पात्रता से कम थी।

पत्र में सुझाव दिया गया है कि बड़ी मोटर बोट, 3-5 सितारा होटल, मछली के बड़े ठेकेदार नहीं होने चाहिये। मछली पकड़ने, नौकायन, मोटर बोट संचालन, रोप वे संचालन, राफ्टिंग, जलक्रीड़ा आदि में बाँध विस्थापितों को हक मिलना चाहिये। उनके लिये झील संबंधी किसी भी तरह के व्यवसाय की लाइसेंस फीस न्यूनतम होनी चाहिये। प्रभावित गाँवों के, खासकर धनार लोग, पुश्तैनी रूप से नाविक और मछली पकड़ने का काम करते रहे हैं। कुछ स्थानीय युवको ने हिमाचल में जलक्रीड़ा का प्रशिक्षण लिया है। वे इस तरह के उद्यम स्वयं करने के साथ अन्य स्थानीय लोगों को भी प्रशिक्षण दे सकते हैं। जिला पंचायत को स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिये और इसके लिये करोड़ों रुपये कमा रहे टीएचडीसी को ‘व्यावसायिक सामाजिक दायित्व’ के अंतर्गत जिम्मेदारी दी जानी चाहिये। इससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे और स्थानीय स्तर पर सामाजिक व आर्थिक स्तर ऊँचा होगा। सभी कामों में 75 प्रतिशत आरक्षण स्थानीय लोगों, अर्थात् झील के किनारे के ग्रामीणों और विस्थापितों के लिये हो। इससे पलायन रुकेगा। ‘होम स्टे’ जैसी पद्धति, जिसमें पर्यटक घरों में रुकते हैं, को एक सहकारी समिति के तहत इस क्षेत्र में लागू किया जा सकता है। पिथौरागढ़ के मुनस्यारी में ‘होम स्टे’ का लाभ ग्रामीण वर्षों से उठा रहे है। इसमें पर्यटकों को उचित दर पर आवास और भोजन मिल जाता है और वे स्थानीय संस्कृति को भी समझ पाते है।

Disqus Comment