रसायनों की जहरीली दुनिया

Submitted by Hindi on Wed, 06/26/2013 - 09:49
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सप्रेस/थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फीचर्स, जून 2013
सन् 1930 के दशक से शुरू हुई रासायनिक होड़ ने लाखों वर्षों की सभ्यता को चूलें हिलाकर रख दी हैं। पिछले 8 दशकों में हम इतने प्रदूषित हो गए कि आज भारत जैसे देश में एक भी नदी साफ सुथरी नजर नहीं आती। यदि गर्भनाल तक में रासायनिक प्रदूषण मिल गया तो भविष्य क्या गुल खिलाएगा कहा नहीं जा सकता। हम एक विशाल और अनियोजित प्रयोग के भंवर में फंसे हैं। पिछली शताब्दी में हमने हजारों-हजार ऐसे रसायन निर्मित कर लिए जिनका इससे पहले धरती पर अस्तित्व ही नहीं था। हमने जानबूझकर इस भौतिक विश्व को बदला है और ऐसे अनगिनत उपयोगी उत्पाद बना लिए हैं जिनके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। लेकिन ये रसायन चाही गई उपयोगिता से परे जाकर हमारी दुनिया को बदल रहे हैं। पाया गया है कि इसमें से बहुतेरे हमारे जीवन की आधारभूत जैविक संरचना जिसमें जीन्स, हारमोन भी शामिल हैं, के साथ हमारी महत्वपूर्ण जीवनप्रणाली को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

हमारी इस जटिल शारीरिक संरचना को जिन रसायनों से साबका पड़ता है, उसके घातक परिणाम अब जन्म के पहले ही प्रभावित करने लगे हैं। इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिल गए हैं कि पर्यावरणीय प्रदूषण अत्यंत जटिल मानव बीमारियों एवं गड़बडि़यों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अमेरिका के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य एवं मानव विकास संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक का कहना है कि सामान्य और लंबी बीमारियां एवं रसायन के जहरीलेपन के अंतर्गत संबंधों से संबंधित संकेत मिल गए हैं।

ऐसा कैसे होता है? लोग तो पुरातन काल से अणुओं से छेड़छाड़ करते रहे हैं। लेकिन 1930 के दशक में रसायनविदों ने व्यापक उत्पादन हेतु उत्पादों को डिजाइन करना प्रारंभ किया और अपना ध्यान अल्कोहल, सेल्युलोज, मक्का, दूध और स्टार्च से हटाकर रासायनिक पेट्रोलियम पदार्थों की ओर लगाया। विशालकाय तेल एवं गैस उद्योग ने भारी मात्रा में हाईड्रोकार्बन उपलब्ध करवा कर रसायनशास्त्रियों को अणुओं के एक नए संसार से परिचित कराया। इसके परिणामस्वरूप रासायनिक यौगिकों का ऐसा प्रयोग हुआ जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। इस मुहीम ने पीढ़ी दर पीढ़ी तेज गति पकड़ी और प्रत्येक जीवित व्यक्ति को हल्के, न टूटने वाले और लोचदार प्लास्टिक, पानीरोधी कपड़े और ऐसा डिटरजेंट जो कि तेल और ग्रीस भी निकाल देता है, के विश्व में पहुंचा दिया। वैसे ये बहुत थोड़े उदाहरण हैं, जिन्हें आधुनिक रसायन शास्त्र द्वारा अस्तित्व में लाया गया है।

आज अदृश्य रूप से हमारे पूरे शरीर को संचालित करने वाले नानस्टिक बर्तन, चिकनाई न सोखने वाली भोजन पैकिंग, पानीरोधी वस्त्र, पॉलिकार्बिनेट प्लास्टिक, खाने के केन (डिब्बे) बेक्टीरियारोधी साबुन, सनस्क्रीन क्रीम, कीटनाशक, भोजन को न सड़ने देने वाले रसायन, नकली खुशबू, सौंदर्य प्रसाधन, खिलौने और राकेट का ईंधन, सभी तोरसायनों के भरोसे हैं। वैज्ञानिकों को नवजात शिशु की गर्भनाल के खून में 200 प्रकार के रसायन मिले हैं। इसके अलावा दुनियाभर से इकट्ठा किए गए नमूनों में इसी तरह के पदार्थ खून, मूत्र एवं मां के दूध में भी मिले हैं। ये सब रसायन अपने निर्माण स्थल से बहुत दूर वायु, जल, मिट्टी और वन्यजीवन में पाए गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ सिंथेटिक रसायन, प्राकृतिक रसायन उत्पादों से इतने अलग हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें किसी दूसरी दुनिया से लाकर यहां डाला गया हो।

दुनिया भर में प्रतिवर्ष 40 करोड़ टन रसायनों का उत्पादन होता है तथा इसकी मात्रा में लगातार वृद्धि होने की उम्मीद है। व्यावसायिक तौर पर उत्पादित रसायनों की वास्तविक संख्या का कोई अंदाजा नहीं, लेकिन अनुमान यह है कि एक लाख रसायन बाजार में उपलब्ध हैं। इसी के साथ प्रतिवर्ष हजारों नए रसायनों का अविष्कार हो रहा है तथा इनमें से अनेक को बिना पूरी जानकारी के बाजार में उतारा जा रहा है। वैसे कई रसायनों ने हमारे जीवन को सुरक्षित भी बनाया है। लेकिन इसने अनेक तरह से मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरा भी पैदा किए हैं। कई रसायन पर्यावरण में बरसों-बरस बने रहते हैं और कई रसायन पौधों और जानवरों में प्रविष्ट हो हमारी भोजन श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं।

कई रासायनिक उत्पादों के बारे में यह कहा जाता है कि वे हमारी जीवित कोशिकाओं के प्राकृतिक रसायन को प्रभावित नहीं करेंगे। लेकिन ऐसे कुछ रसायन जो पर्यावरण अनुकूल नहीं हैं वे भी लगातार हमारे संपर्क में रहते हैं, जैसे पुनः इस्तेमाल में आने वाले भोजन एवं पेय के डब्बे, भोजन एवं पेय पदार्थों के केन में प्रयोग आने वाली कलई या लाइनिंग। हमें यह भी पता लगा है कि औद्योगिक कारखाने, चिमनियां, ड्रेनेज पाइप और कचड़ा फेंकने के स्थान ही रसायनों के संपर्क में आने के स्थान नहीं हैं। हम जो पहनते हैं, जिस पर बैठते हैं और सोते हैं और जानबूझकर जिन्हें हम अपनी चमड़ी पर रगड़ते हैं वे भी खतरनाक रसायन हैं। ये जो भोजन हम खाते हैं, पानी या ज¨ कुछ हम पीते हैं, या सांस लेते हैं, में भी रसायन मौजूद हैं। ये हमारे साथ-साथ ध्रुवीय भालू, समुद्री कछुए, घोंघे, मेंढ़क और सील मछली में भी मौजूद हैं। जलीय वैज्ञानिकों का कहना है पिछली शताब्दी में हमारा ग्रह पिछले किसी भी समय की तुलना में रासायनिक तौर पर अलग था। आज ये रसायन हमारे पूरे शरीर के नाजुक अंगों को प्रभावित कर रहे हैं।

बच्चों से लेकर बड़े तक सभी में इसे लेकर समस्याएं खड़ी हो रही हैं। इसका गर्भाधान से लेकर मनोवैज्ञानिक स्तर तक प्रभाव पड़ रहा है। हम जानते हैं कि कुछ रसायन इतने घातक हैं कि उनकी बहुत थोड़ी मात्रा के संपर्क में आने के विध्वंसकारी परिणाम निकल सकते हैं। साथ ही इनके संपर्क में आने से आगे की कई पीढि़यां भी प्रभावित हो सकती हैं। कुछ रसायन (बीपीए, ट्रिब्युटिलिन, कुछ विशिष्ट फ्थालेट्स एवं पनफ्लोरिनेट यौगिक) ऐसे हैं जो कि मोटापे की कोशिकाएं निर्मित करते हैं, जिससे कि जीवन के बाद के वर्षों में मोटापा बढ़ जाता है।

वैज्ञानिक संस्थाओं ने इनके खिलाफ आवाज उठाई है और नीति निर्माताओं से कहा है कि वे कम से कम ऐसे रसायनों पर प्रतिबंध लगाएं, जिनका शिशुओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। साथ ही सुरक्षित उत्पादों के निर्माण की दिशा में कदम उठाएं। हम समय को वापस तो नहीं ला सकते, लेकिन कम से कम ऐसे रसायन बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं, जो कि मानव जीवन और पर्यावरण के लिए सुरक्षित हों।

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