सामुद्रिक प्रदूषण (Marine Pollution in Hindi)

Submitted by Hindi on Thu, 06/22/2017 - 16:04
Source
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

पृथ्वी का तीन चौथाई भू-भाग महासागरों से घिरा है। भारत स्वयं एक प्रायद्वीप है, जो तीन ओर से समुद्रों से घिरा है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब महासागर और दक्षिण में हिन्द महासागर स्थित है। विश्व में इनके अतिरिक्त 5 प्रमुख महासागर हैं।

भावी विकास का आधार - महासागर भौगोलिक दृष्टि एवं जलवायु की दृष्टि से महासागरों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके साथ ही आर्थिक दृष्टि से भी महासागरों का काफी महत्त्व है। समुद्रों के माध्यम से यात्री एवं माल परिवहन बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार की सामुद्रिक मछलियाँ, जीव, सीप, मोती एवं अनेक बेशकीमती वनस्पतियाँ समुद्र से प्राप्त की जाती हैं। समुद्र में पेट्रोलियम पदार्थों का भी अथाह भण्डार है। कहना न होगा कि समुद्र अर्थ-व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार-स्तम्भ है। सामाजिक दृष्टि से भी समुद्रों का अत्यधिक महत्त्व है। वर्तमान में राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा की दृष्टि से भी समुद्री सीमाएँ चर्चा में हैं।

समुद्री प्रदूषण के कारण, प्रभाव एवं इस पर नियंत्रण लगाने के उपाय


इसमें सन्देह नहीं कि नदियाँ समुद्र में मिलने के साथ ही अपने साथ बहाकर लाई गई प्रत्येक वस्तु को भी समुद्र में समाहित कर देती हैं। अर्थात नदी के साथ बहकर आया घरेलू एवं औद्योगिक दूषित जल, कीटनाशक, उर्वरक, भारी धातु, नगरीय एवं औद्योगिक ठोस अपशिष्ट, कृषि अपशिष्ट, नाभिकीय कचरा, पॉलीथीन आदि सभी अन्ततः समुद्र में मिल जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार लगभग 30-35 मिलियन किलोग्राम प्लास्टिक पैकिंग सामग्री और बैग्स सीधे ही समुद्र में डम्प किये जाते हैं। जबकि लगभग 200 मिलियन किलोग्राम प्लास्टिक कचरा विभिन्न नदियों के माध्यम से महासागरों में पहुँचता है।

तेल रिसाव से होने वाला समुद्री प्रदूषण


समुद्रों का दूसरा प्रमुख प्रदूषक तेल है। तेल का अधिकांश परिवहन समुद्रों के माध्यम से होता है। इनके दुर्घटनाग्रस्त होने या इनके रिसाव से बड़ी मात्रा में तेल समुद्र में बिखर जाता है। लगभग 300 मिलियन गैलन तेल का प्रतिवर्ष समुद्र में रिसाव होता है।

समुद्र में सीधे ही अथवा नदियों के माध्यम से मिलने वाले अपशिष्ट का 80 प्रतिशत, ड्रेजिंग द्वारा 10 प्रतिशत, औद्योगिक अपशिष्ट एवं सीवेज स्लज 9 प्रतिशत होता है।

दुनियाभर में तेल का अधिकांश परिवहन समुद्रों से होता है। तेल परिवहन में उपयोग में आने वाले टैंकर एवं सुपर टैंकर से बड़ी मात्रा में तेल परिवहन के दौरान रिसाव होता है। इसके साथ ही समुद्र तट पर पेट्रोलियम तेल के उत्खनन के दौरान भी तेल की बड़ी मात्रा समुद्र में मिल जाती है। अनुमानतः 10 लाख टन तेल के समुद्री परिवहन के दौरान लगभग एक टन तेल का रिसाव होता है। इसके अतिरिक्त समुद्री तूफानों के आने से भी बड़ी मात्रा में परिवहन किया जा रहा तेल समुद्र जल में जा मिलता है।

समुद्री जल में जहाजों से रिसाव या अन्य किसी कारणवश तेल के मिलने की समस्या एक गम्भीर पर्यावरणीय समस्या है। क्योंकि एक बार समुद्र जल में तेल के मिल जाने के बाद इसे पृथक करना लगभग असम्भव है। तेल का सर्फेस टेंशन कम होने से वो तुरन्त पानी की सतह पर फैल जाता है। पानी की सतह पर इसकी पतली फिल्म बन जाती है।

एमोको कैडिज टैंकर में फ्रेंच कोस्ट के पास हुए रिसाव से 1978 में लगभग 1.6 मिलियन बैरल कच्चा तेल, मेक्सिको की खाड़ी में स्थित इक्सटॉक आई तेल के कुएँ से 1979 में 3.3 मिलियन बैरल तेल तथा जनवरी 1993 में शेटलैंड आईलैंड के तट पर समुद्री तूफान से लगभग 6,80,000 बैरल तेल का रिसाव समुद्रों में हो चुका है। इसी तरह की अनेक घटनाएँ समय-समय पर समुद्रों में घटती रहती हैं जिसके कारण बड़ी मात्रा में तेल का रिसाव होता है।

समुद्री प्रदूषण के प्रभाव


1. समुद्री जल में घुलित ऑक्सीजन की कमी :-
समुद्री जल में प्रदूषकों विशेषकर कार्बनिक प्रदूषकों की मात्रा बढ़ने के साथ ही जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा में कमी होती है। इसका कारण यही है कि जल में उपस्थित सूक्ष्म जीव एवं बैक्टीरिया द्वारा प्रदूषक के रूप में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों का भक्षण करने के साथ ही उनकी संख्या में वृद्धि होने के फलस्वरूप घुलित ऑक्सीजन की खपत भी बढ़ती है और जल में घुलित ऑक्सीजन उसी तीव्रता से कम होती है। वास्तव में समुद्री जल में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ने से स्वाभाविक रूप से उसकी बीओडी बढ़ जाती है तथा बी.ओ.डी. बढ़ने से जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है।

2. समुद्री जीवों पर प्रभाव :-
समुद्री जल में तेल के रिसाव से समुद्री जल सतह पर तेल की पतली फिल्म बन जाती है, जिससे वातावरण की वायु जल सतह के सीधे सम्पर्क में नहीं आ पाती, जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन की सांद्रता कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त रिसे हुए तेल को हटाने के लिये उपयोग किए जाने वाले डिटर्जेंट भी समुद्र की जलीय जीवन को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। ये रासायनिक डिटर्जेंट अत्यंत विषैले किस्म के होते हैं। इनके जलीय जीवों द्वारा ग्रहण किए जाने से ये रसायन खाद्य श्रृंखला में आ जाते हैं। साथ ही ये समुद्री सेडीमेंट में भी जमा हो जाते हैं। समुद्री जीवों की अनेक प्रजातियाँ इस प्रकार डिटर्जेंट का शिकार बन समाप्त होती जा रही हैं। डिटर्जेंट को खाने वाले समुद्री जीवों को ग्रहण करने पर मनुष्य के शरीर में भी ये हानिकारक रसायन पहुँच जाते हैं।

3. खाद्य श्रृंखला पर प्रभाव :-
समुद्री प्रदूषण के दौरान प्रदूषकों के समुद्री खाद्य श्रृंखला अथवा सतह के सेडीमेंट के साथ विभिन्न भौतिक – रासायनिक क्रियाओं के माध्यम से ये उनमें पहुँच जाते हैं। प्रदूषकों के समुद्री जीवों द्वारा ग्रहण किये जाने अथवा समुद्री वनस्पति द्वारा इनके अवशोषण से इनके माध्यम से ये मनुष्य की खाद्य श्रृंखला में भी पहुँच जाते हैं। अनेक विषैले प्रदूषक समुद्री जीवों एवं वनस्पतियों की मृत्यु का कारण बनते हैं और इस प्रकार समुद्र के पारिस्थितिकीय तंत्र को प्रभावित करते हैं। समुद्री जैव-विविधता पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है।

4. अन्य प्रभाव :-
उपरोक्त के अतिरिक्त समुद्री प्रदूषण का दुष्प्रभाव समुद्रों पर आधारित जीव-जन्तुओं पर भी पड़ता है। अनेक समुद्री पक्षी जो समुद्रों पाये जाने वाले विभिन्न जीवों जैसे- मछलियों आदि पर निर्भर होते हैं, वे या तो खाद्य श्रृंखला में आने वाले प्रदूषकों के कारण मारे जाते हैं या समुद्री जल में पाये जाने वाले पॉलीथीन की थैलियों को निगलकर मर जाते हैं। कई बार पॉलीथीन की थैलियाँ उनकी गर्दन में फँस जाती हैं और दम घुटने के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है।

समुद्री प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव समुद्रों में पाये जाने वाले कोरल पर पड़ रहा है। समुद्री प्रदूषकों में पाये जाने वाले कीटनाशकों, खरपतवार नाशकों, पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन, विषैली धातुओं एवं रेडियोएक्टिव प्रदूषकों के कारण संवेदनशील कोरल धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं।

समुद्री प्रदूषण पर नियंत्रण


जैसा कि हम चर्चा कर चुके हैं कि सभी नदियाँ अन्ततः समुद्रों में मिलती हैं। समुद्री प्रदूषण का प्रमुख कारण इन नदियों के द्वारा बहाकर लाया गया दूषित जल एवं अपशिष्ट है। नदियों के माध्यम से औद्योगिक निस्राव के साथ घरेलू दूषित जल बड़ी मात्रा में समुद्रों में मिलता है। अतः स्पष्ट है कि समुद्रों में मिलने से पहले यदि नदी के दूषित जल को स्वच्छ कर लिया जाये तो समुद्रों में होने वाले प्रदूषण को कम किया जा सकता है। इस हेतु औद्योगिक दूषित जल को समुचित उपचार के लिये प्रत्येक औद्योगिक इकाई को दूषित जल उपचार संयंत्र लगाना चाहिए। साथ ही नगरीय निकायों से निकलने वाले घरेलू दूषित जल का भी उचित उपचार किया जाना आवश्यक है। जब तक दूषित जल का स्रोत पर ही उपचार सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक प्रदूषण की समस्या पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। औद्योगिक एवं घरेलू दूषित जल के साथ ही नदियों के माध्यम से बहाकर लाये जाने वाले अन्य अपशिष्टों का भी समुद्र में मिलने से पूर्व पृथक्करण आवश्यक है। समुद्री गतिविधियों पर नजर रखकर भी समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है। यथासम्भव, समुद्रों में तेल आदि के रिसाव को रोकना चाहिए। समुद्रों में नाभिकीय कचरा न मिलने पाये इस हेतु भी समुचित प्रबंध किया जाना चाहिए। समुद्र को डम्पिंग साइट न समझकर, उसे एक जीवित पारिस्थितिकीय तंत्र का अनिवार्य अंग समझते हुए उसमें बाह्य प्रदूषक तत्वों को मिलने से रोककर ही समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है।

 

जल प्रदूषण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

पुस्तक भूमिका : जल और प्रदूषण

2

जल प्रदूषण : कारण, प्रभाव एवं निदान

3

औद्योगिक गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण

4

मानवीय गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण

5

भू-जल प्रदूषण

6

सामुद्रिक प्रदूषण

7

दूषित जल उपचार संयंत्र

8

परिशिष्ट : भारत की पर्यावरण नीतियाँ और कानून (India's Environmental Policies and Laws in Hindi)

9

परिशिष्ट : जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water (Pollution Prevention and Control) Act, 1974 in Hindi)

 

 

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