शौच सफाई में भी मुनाफे की ताक में कंपनियां

Submitted by Hindi on Fri, 12/14/2012 - 11:57

जिस तेजी से मात्र पिछले 6 महीनों में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की जलापूर्ति में पीपीपी को लागू किया गया है; पनबिजली परियोजनाओं में निजी निवेश बढ़ा है, उससे तो नहीं लगता कि सरकारें पानी से जुड़े किसी भी क्षेत्र की जिम्मेदारी को अब अपने पास रखना चाहती हैं। जलापूर्ति क्षेत्र में पीपीपी घोटालों को लेकर जनविरोध है। सीवेज शोधन में जनविरोध शायद कम होगा, संभवतः इसी उम्मीद से सरकार ने तय किया है, कि जलापूर्ति में कोशिशें जारी रहें और सीवेज शोधन का जिम्मा पूरी तरह निजी को सौंप दिया जाये। वाह! शौच साफ करने में भी मुनाफा!

कोई पिता यदि संतान की देखरेख करने में कोताही बरते, तो संतान के बाबा को क्या करना चाहिए? वह थोड़े से पैसे देकर उसे किसी दुकानदार को सौंप दे और उससे अपेक्षा करे कि वह उसे बढ़िया खाना-पानी-संस्कार देगा, पढ़ाई-लिखाई करायेगा, बदले में संतान दुकानदार के मुनाफे में सहयोग करेगा या ठीक यह होगा कि बाबा.. संतान के पिता को सुधारे कि वह बाबा के पोते की ठीक से देखभाल करे?

यह एक गहरा प्रश्न है कि सरकारी तंत्र में सुधार करने की बजाय सरकारी जिम्मेदारियों को निजी तंत्र को सौंप देने का वर्तमान सरकारी रवैया कितना वाजिब है? फिलहाल आई आई टी टीम द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन पर्यावरणीय प्रबंधन योजना का संकेत तो यही है। गंगा व दूसरी जलसंरचनाओं के प्रबंधन को लेकर हाल ही में आयोजित ’इंडिया वाटर इंपेक्ट समिट-2012’ में आये विदेशी कंपनियों के प्रतिनिधियों व तकनीकी विशेषज्ञों की बड़ी संख्या तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के भाषण ने भी इसका स्पष्ट संकेत दिया।

संगठित क्षेत्र को सौंपे पानी प्रबंधन: अहलूवालिया


अपने वक्तव्य में मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने पानी की मांग व उपलब्धता के बीच बढ़ती दूरी, सीवेज से नदी प्रदूषण की चिंता, पौल्यूटर्स-पे का सिद्धांत, भूजल व अंतरराज्यीय नदियों को नियंत्रित करने के लिए कानून तथा खेती व दूसरे क्षेत्रों में जलोपयोग क्षमता में सुधार जैसे कई बुनियादी मसलों पर अपनी राय तो रखी, लेकिन उनका पूरा जोर जलापूर्ति व सीवेज खर्च को उपभोक्ता से वसूले जाने तथा ‘वेस्ट वाटर’ यानी औद्योगिक अवजल व सीवेज के शोधन के लक्ष्य को पूरी तरह प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप के जरिए हासिल किए जाने पर था। पीपीपी के पक्ष में तर्क देते हुए अहलूवालिया ने कहा कि जलापूर्ति की मांग व उपलब्धता के बीच दूरी घटाने के लिए जलापूर्ति व जल संरक्षण के काम को असंगठित क्षेत्र के भरोसे छोड़ने के स्थान पर इसके लिए संगठित क्षेत्र विकसित करना होगा।

शहर जितना ताजा पानी लेते हैं, उतना साफ पानी स्रोत को वापस लौटायें


अहलूवालिया ने कहा कि शहरों को चाहिए कि वे जितना ताजा पानी लेते हैं, उतना साफ पानी ताजे जल के स्रोत को वापस लौटायें। यह नहीं कि शहर ताजा पानी लें और सीवेज लौटायें। दिल्ली 17-18 मिलियन लीटर पानी यमुना से लेती है और बदले में उसे लौटाती क्या है? सीवेज! दिल्ली तो सीवेज शोधन की पूरी क्षमता का ही उपयोग नहीं कर पाती। शहरों में जलापूर्ति का 90 प्रतिशत हिस्सा सीवेज में जाता है। सीवेज का 70 प्रतिशत हम सीवेज के रूप में ही नदियों को लौटा रहे हैं। उन्होंने कहा- “मैं नहीं समझता कि हमारे यहां सीवेज पूरी गंभीरता के साथ शोधित किए जाते हैं। यह नहीं होना चाहिए।’’ अहलूवालिया ने जितना ताजा पानी लेना, उतना साफ पानी उसके स्रोत को वापस लौटाने के सिद्धांत के लागू करने को जरूरी बताया। भला इससे किसे इंकार हो सकता है, पानी कार्यकर्ताओं द्वारा लंबे अरसे से इसकी मांग लेकिन इस सिद्धांत को लागू करने के लिए सुझाये रास्ते से जनता पर आने वाले दोहरे बोझ पर विचार करने की जरूरत है।

वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट के लिए सरकारों के पास पैसा नहीं


उन्होने कहा – “वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट के लक्ष्य को लागू करने के लिए पैसा चाहिए। मुझे शक है कि केन्द्र या राज्य की कोई सरकार इसका खर्च वहन कर सकती है। इसीलिए फेल्योर... चूंकि सिस्टम के पास पैसा नहीं है।’’ एक ओर निजी से निवेश जुटाने का उपाय उन्होंने सामने रखा, तो दूसरी ओर कहा कि अभी लोग आपरेटर का खर्च देते हैं, सफाई का नहीं। पानी के बिलों में सीवेज का खर्च भी जोड़ा जाना चाहिए।

इसी सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी यही रोना रोते रहे। उन्होंने कहा कि पैसा और तकनीक मिले, तो कुछ हो सकता है। उत्तर प्रदेश की नदियों की प्रदूषण मुक्ति व पुनर्जीवन को लेकर प्रतिबद्धता का उनमें भी अभाव ही दिखा। दूसरे की ओर देखने का यह परजीवी रवैया हमारी नदियों को कहां ले जायेगा?

जलापूर्ति पब्लिक संभाले और सीवेज शोधन प्राइवेट’’- डॉ. विनोद तारे


राष्ट्रीय नदी गंगा पर्यावरणीय प्रबंधन योजना नियोजन में लगी आई आई टी टीम के संयोजक डॉ. विनोद तारे ने योजना के मूल बिंदुओं को रखते हुए कहा कि प्राइवेट सेक्टर को वेस्ट वाटर और पब्लिक सेक्टर को फ्रेश वाटर मैनेजमेंट का जिम्मा उठाना चाहिए। लेकिन जिस तेजी से मात्र पिछले 6 महीनों में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की जलापूर्ति में पीपीपी को लागू किया गया है; जिस तेजी से पनबिजली परियोजनाओं में निजी निवेश बढ़ा है, उससे तो नहीं लगता कि सरकारें पानी से जुड़े किसी भी क्षेत्र की जिम्मेदारी को अब अपने पास रखना चाहती हैं। जलापूर्ति क्षेत्र में पीपीपी घोटालों को लेकर जनविरोध है। सीवेज शोधन में जनविरोध शायद कम होगा, संभवतः इसी उम्मीद से सरकार ने तय किया है, कि जलापूर्ति में कोशिशें जारी रहें और सीवेज शोधन का जिम्मा पूरी तरह निजी को सौंप दिया जाये। वाह! शौच साफ करने में भी मुनाफा!

अमीर को प्राइवेट, गरीब को पब्लिक!


हालांकि मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि प्राइवेट सेक्टर अमीरों का ख्याल रखे और पब्लिक सेक्टर गरीबों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति करे। दिल्ली में ही देखें तो पानी के बिलों में सीवेज खर्च के नाम पर निजी ऑपरेटर का खर्च तो सभी को देना पड़ता है। दरों में फर्क खपत की मात्रा पर है, हाउस टैक्स में दर्ज कॉलोनी की श्रेणी के अनुसार नहीं।

खैर! प्रश्न यह नहीं है। प्रश्न यह है कि जीवन जीने के लिए जरूरी बुनियादी जरूरतों के क्षेत्र में गुणवत्ता तो सभी को चाहिए; नागरिक चाहे गरीब हो या अमीर। गरीब होने से किसी की हकदारी कम नहीं हो जाती। साफ पानी, स्वच्छ नदी, अच्छी पढ़ाई, उम्दा इलाज, खड्ढा विहीन सड़कें... सभी को चाहिए। यह तो नहीं होना चाहिए कि जो पैसा खर्च करे उसे साफ पानी मिले और गरीब के नल का पानी पीला व बदबूदार हो। पब्लिक सेक्टर की कार्यशैली और भ्रष्ट आचार में सुधार का कोई विकल्प नहीं है। इसे सुधारे बगैर पब्लिक का प्राइवेट से गठजोड़ भ्रष्टाचार और घोटाले बढ़ायेगा; साथ-साथ बुनियादी सेवाओं की कीमत व जनता पर खर्च का बोझ भी।

निजी के मुनाफे और सरकारी ढांचे का बोझ- दोनो का खर्च क्यों वहन करें लोग?


सच पूछें तो निजी से निवेश जुटाने की बात बेमानी है। प्रस्तुत खर्च अक्सर वास्तविक खर्च से ज्यादा होता है। पीपीपी का असल खेल यही है। निजी को तो आप सिर्फ इस तर्क पर लाना चाहते हैं कि निजी आयेगा, तो गुणवत्ता सुधरेगी; क्रियान्वयन क्षमता में सुधार होगा। इससे सभी को और पर्याप्त पानी मिलेगा। यदि क्रियान्वयन क्षमता में सुधार ही मुख्य वजह है, तो क्रियान्वयन में लगे सरकारी प्रशासनिक तंत्र के नाकारापन का खामियाजा व खर्च लोग क्यों भुगते? यदि इस तंत्र को सुधारा नहीं जा सकता, तो इसे सुधारने का जिम्मा जिस शासकीय तंत्र का है, उसका बोझा भी लोग क्यों उठाये? यह कहां तक वाजिब है कि लोग शासकीय व प्रशासनिक तंत्र का खर्च भी उठायें और निजी को उसके काम के बदले खर्च व मुनाफा.. दोनो दें?

निजी सहयोग करे, लूट नहीं


निजी क्षेत्र सरकार की जिम्मेदारियों को निभाने में सहयोगी बने। सुनने में यह अच्छी बात है। सिद्धांततः भी यह ठीक ही लगता है, लेकिन व्यवहार यह है कि अभी पीपीपी लूट की साझेदारी साबित हो रही है। इसके कारण प्रकृति का संसाधन भी जा रहा है और गरीब की जेब भी कट रही है। अनुभव बताते हैं कि इस गठजोड़ से पहले पब्लिक-प्राइवेट साझे में दोतरफा ईमानदारी और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी जरूरी होगी। इसे लोकोन्मुखी बनाना होगा। कोई भी कंपनी खैरात बांटने के लिए नहीं खोली जाती। प्राइवेट सेक्टर तो मुनाफा कमायेगा ही, लेकिन इस मुनाफे का प्रतिशत तथा मुनाफे का आकलन इतनी ईमानदारी से तो होना ही चाहिए कि वह उपभोक्ता पर बोझ न बन जाये। प्राकृतिक संसाधन की अमानत में भी ख्यानत न हो और उसका सर्वश्रेष्ठ सदुपयोग भी होता रहे। क्या योजना आयोग के उपाध्यक्ष के पास इसकी कोई गारंटीशुदा योजना है? यदि है, तो पानी के हर क्षेत्र में पीपीपी लागू करने की वकालत करने से पहले देश के सामने लायें। क्या जब तक और जहां-जहां यह सुनिश्चित नहीं हो जाता, पीपीपी को इजाजत नहीं दी जानी चाहिए? कौन देगा??

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