सौर ऊर्जा आधारित जल निकासी प्रणाली

Submitted by Hindi on Tue, 11/10/2015 - 12:24
Source
योजना, अप्रैल 1998

अच्छे स्वास्थ्य के लिये उचित गुणवत्ता वाला पीने योग्य स्वच्छ पानी सभी के लिये अति आवश्यक है। विकासशील देशों के कई ग्रामीण इलाकों में लगभग एक अरब लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक करोड़ से अधिक बच्चे 15 वर्ष से कम आयु में ही दूषित एवं गंदे पानी द्वारा प्रति वर्ष बीमारियों के शिकार हो जाते हैं तथा काफी तादाद में कालकलवित भी हो जाते हैं। अतः अधिकाधिक ग्रामीण लोगों को पेयजल सुलभ कराने के लिये सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है।

भारत सहित अनेक देशों ने सभी को स्वच्छ एवं सुविधाजनक पेयजल उपलब्ध कराने के लिये अनेक प्रभावशाली परियोजनाएँ तथा कार्यक्रम चलाये हैं। इसी उद्देश्य को मद्देनजर रखते हुये संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने 1981-90 के दशक में विश्वव्यापी स्वच्छ पेयजल अभियान भी चलाया। इस अभियान के तहत अनेक क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया गया। इस क्रम में दूरस्थ एवं दुर्गम स्थलों पर जहाँ बिजली की सुविधा नहीं है, सौर प्रकाश वोल्टीय प्रणालियों के माध्यम से ग्रामीण जनता को भूमिगत पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराई जाने लगी।

इसके लिये देश में सौर प्रकाश वोल्टीय प्रणाली द्वारा उत्पादित ‘दिष्ट विद्युतधारा’ पर चलने वाले मोटर/पम्पसेटों का विकास किया गया। इसमें 360 वाट के 12 प्रकाश वोल्टीय मोड्यूल एक ढाँचे में लगे होते हैं तथा इस ढाँचे की अवस्था आसानी से दिन में तीन बार सूर्य की स्थिति के अनुसार बदली जा सकती है। सौर प्रकाश वोल्टीय पम्प प्रणाली में दो मुख्य घटक प्रकाश वोल्टीय मोड्यूल क्षेत्र तथा पम्पसेट अर्थात मोटर होते हैं। प्रकाश वोल्टीय मोड्यूल कई सौर-सेलों को मिलाकर तैयार किया जाता है। दो या दो से अधिक मोड्यूलों को आवश्यकतानुसार जोड़कर प्रकाश वोल्टीय पैनल बनाया जाता है। प्रकाश वोल्टीय विद्युत प्रणाली में सूर्य की रोशनी को सीधे ही विद्युत में परिवर्तित करने की प्रक्रिया में कोई गतिशल घटक नहीं होता तथा इस वजह से प्रकाश वोल्टीय प्रणाली द्वारा शोर एवं वातावरण दूषित होने का डर नहीं रहता। दिष्ट विद्युतधारा पर आधारित पम्पसेट चलाने के लिये इन्वर्टर की कोई आवश्यकता नहीं होती जबकि प्रत्यावर्तित विद्युत से चलने वाले पम्पों के लिये इसकी आवश्यकता दिष्ट विद्युतधारा को प्रत्यावर्तित विद्युतधारा में बदलने के लिये होती है।

देश की लगभग 80 प्रतिशत जनता गाँवों में रहती है तथा देश की स्वतन्त्रता के 50 वर्ष बाद भी अधिसंख्य अशिक्षित ग्रामीण आबादी पेयजल जैसी मूलभूत आवश्यकता से वंचित है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश में गैर-परम्परागत ऊर्जा के क्षेत्र में हुये अनुसंधानों की वजह से पेयजल जैसी समस्या से निजात पाने का मार्ग अवश्य प्रशस्त हुआ है। पेयजल की समस्या वाले क्षेत्रों में ग्रामीणों को भूमिगत पेयजल उपलब्ध कराने के लिये ‘सौर प्रकाश वोल्टीय पम्प प्रणाली’ की स्थापना के पश्चात इस परीक्षण की सफलता के संकेत मिल रहे हैं।

देश के गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत विभाग ने अनुसंधान एवं विकास के लिये वित्तीय सहायता उपलब्ध करा कर सौर प्रकाश वोल्टीय पम्प प्रणाली का उत्पादन देश में शुरू कराया है। इस संदर्भ में पेयजल की कमी वाले दूरस्थ क्षेत्रों में 1500 से अधिक पम्प प्रणालियों की स्थापना कर ग्रामीणों को भूमिगत पेयजल मुहैया कराया जा रहा है। ये प्रणालियाँ गैर-परमपरागत ऊर्जा स्रोत विभाग द्वारा राज्य सरकार के विभागों तथा संस्थाओं की सहायता से चलाये गये प्रदर्शन एवं क्षेत्र मूल्यांकन कार्यक्रम के अन्तर्गत स्थापित की गई हैं। इन प्रणालियों को विभाग द्वारा व्यक्तिगत तथा संस्थागत उपभोक्ताओं को कम लागत पर उपलब्ध कराया जाता है।

देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में जहाँ बिजली पहुँचाना अत्यधिक दुष्कर है, सौर ऊर्जा वरदान साबित हो रही है। इन क्षेत्रों में सौर फोटो वोल्टीय तकनीक पर आधारित ‘जल निकासी प्रणाली’ पेयजल के अलावा कृषि बागवानी, पशुपालन, मुर्गीपालन, फलोद्यान, वन संवर्द्धन, मत्स्य पालन एवं नमक बनाने के कार्यों में भी उपयोग में लाई जा रही है। गाँवों में ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति के लिये यह तकनीक किसानों, सहकारी समितियों, गैर-सरकारी संगठनों, बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तथा राज्य एवं केन्द्र सरकार के संगठनों के लिये काफी उपयोगी है।

सौर पम्प प्रणाली में मुख्यतः दो प्रकार के पम्पों का प्रयोग होता है जिनमें एक ‘सेन्ट्रिफ्यूगल पम्प’ तथा दूसरा ‘डिस्प्लेसमेंट पम्प’ होता है। सामान्यतः इस कार्य के लिये ‘सैन्ट्रिफ्यूगल पम्प’ का ही उपयोग किया जाता है जबकि ‘डिस्प्लेसमेन्ट पम्प’ सौर-प्रणाली के पूर्णतया अनुरूप नहीं होते। ‘सेन्ट्रिफ्यूगल पम्प’ में भूमिगत पानी घूमते हुये प्रवृत्तक के बीच में प्रवेश करता है तथा सेन्ट्रिफ्यूगल बल फैलाने वाली परतुंडियों के जरिये पानी बाहर फेंकता है।

सौर प्रकाश वोल्टीय मोड्यूलों को खुले एवं छायारहित धूप वाले स्थलों पर लगाया जाता है। पम्प को यथासम्भव पानी के स्रोत के पास ही स्थापित किया जाना जरूरी है तथा पम्प के आस-पास पर्याप्त खुली जगह होनी भी जरूरी है ताकि इसके रख-रखाव में परेशानी न हो। पम्प प्रणाली को उचित आकार एवं दृढ़ता वाले आधार पर अच्छी तरह से लगाया जाता है तथा आधार को इस तरह से बनाया जाता है कि यह पम्प की इकाई तथा पाइप में स्थित पानी के भार को वहन कर सके। पाइप को अच्छी तरह सहारा देकर लगाया जाना भी जरूरी होता है ताकि पम्प पर तनाव न पड़े तथा घर्षण द्वारा हानि कम हो और पानी ऊपर उठने की गति समान बनी रहे। मोड्यूलों की ऊपरी सतह पर जमी धूल-मिट्टी को विशिष्ट प्रकार के कपड़े से नियमित रूप से साफ करना भी अति आवश्यक होता है ताकि अधिकतम प्रकाश को सैल अवशोषित कर सकें।

पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय जिले बाड़मेर में 28,147 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के 1800 गाँवों में 13 लाख की ग्रामीण आबादी बसती है। इनमें से मात्र 700 गाँव ही विद्युतीकृत हैं जबकि शेष गाँवों की आबादी आज भी विद्युत जैसी जरूरत से महरूम हैं। इस जिले के एक-एक गाँव के विशाल भू-भाग पर दूर-दूर स्थित ढाणियों में एक-एक परिवार निवास करता है जहाँ आम ग्रामीणों के लिये विद्युत की सुविधा जुटा पाना सरकार के लिये चुनौतीपूर्ण कार्य है। बिजली के अभाव में पेयजल की योजनाएँ कारगर नहीं हो सकती।

इन हालातों में सरकार ने जिले के चौहन एवं शिव तहसीलों के कुछ गाँवों में भूमिगत जल का सर्वेक्षण कर समस्याग्रस्त गाँवों का चयन किया। इन गाँवों में सौर फोटोवाल्टिक ‘जल निकासी’ प्रणाली स्थापित कर ग्रामीणों को पेयजल की सुविधा मुहैया कराई गई। ‘टेक्नोलॉजी मिशन’ के तहत जन स्वास्थ्य अभियान्त्रिकी विभाग ने जिले की दोनों तहसीलों में कुल आठ प्रणालियाँ स्थापित कीं। शिव तहसील में रतकूंड़िया गाँव में स्थापित प्रणाली से 140, आरंग में 1719, चोंचरा में 970 एवं शेखे का गाँव में 160 व्यक्ति पेयजल से लाभान्वित हो रहे हैं। इसी प्रकार चौहटन तहसील के गाँव दर्शों का पाड़ा में 1205, शशीबेरी में 516, पंवारियों का तला में 646 एवं भीलों का तला में 489 ग्रामीण इन प्रणालियों से लाभान्वित हो रहे हैं।

सौर ऊर्जा आधारित इस जल निकासी प्रणाली में पैनल मोटर लगे पम्प-सेट से जुड़ा रहता है तथा 1/4 से 3 हार्स पावर तक शक्ति वाली मोटर प्रयुक्त होती है। भूमि में 20 से 100 मीटर तक की गहराई में उपलब्ध पेयजल को 500 से 5000 तक की आबादी वाले क्षेत्र में उपलब्ध कराया जा सकता है। इस संयन्त्र से दो दिन की आवश्यकता के जल को ‘फैरो सीमेन्ट’ के टेंकों में एकत्रित किया जाता है। संयन्त्र में 15 सेन्टीमीटर बोर के एक पाइप में विशेष रूप से निर्मित पम्प को पानी की सतह से नीचे लगाया जाता है। यह पम्प एक पानी देने वाले पाइप से जुड़ा होता है तथा पम्प तक विद्युत कड़े आवरण चढ़े केबल द्वारा पहुँचाई जाती है। पम्प के सभी हिस्से जंगरहित धातु के बने होते हैं तथा पम्प के बेयरिंगों में पानी ही चिकनाई का कार्य करता है। पम्प की उत्पादन क्षमता 5000 से 50,000 लीटर पानी प्रतिदिन होती है।

यह जल निकासी प्रणाली आर्थिक सहायता प्राप्त मूल्य अर्थात रियायती दर पर सीधे सप्लायरों से खरीदी जा सकती है। इसके अलावा प्रणाली के लिये भारतीय गैर-परम्परागत ऊर्जा विकास एजेंसी से ऋण भी प्राप्त किया जा सकता है। भूमिगत जल निकासी की यह प्रणाली वर्षों से मेघों की ओर ताकते ग्रामीणों के लिये बहुत लाभदायक सिद्ध हो रही है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Disqus Comment