सेहत से खेल

Submitted by HindiWater on Mon, 01/13/2020 - 20:40

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की पर्यावरण निगरानी प्रयोगशाला में की गई जांच के परिणाम दो प्रकार की विसंगतियों को उजागर करते हैं। पहला, खाद्य उत्पादक कम्पनियां उन उत्पादों को खुले आम बेच रही हैं जिनमें पोषक तत्वों की मात्रा सेहत के लिए ठीक नहीं है। दूसरा, फूड इंडस्ट्री और नियामक एजेंसियों का गठजोड़ इस बेशर्म गोरखधंधे का समर्थन कर रहा है। ऐसे में फूड पैकेट्स पर लेबल लगाने और उन पर पोषक तत्वों की सही जानकारी देने के लिए भारत में एक मजबूत कानून की तत्काल जरूरत है।

गौरतलब है कि छह वर्ष पहले ही फूड पैकेट्स की उचित लेबलिंग की जरूरत महसूस कर ली गई थी। इसका मकसद ग्राहकों द्वारा खरीदे गए खाद्य पदार्थों के बारे में सभी जानकारियां देना था। मौजूदा फूड सेफ्टी स्टैंडडर्स (पैकेजिंग व लेबलिंग) रेगुलेशंस, 2011 बेहद कमजोर और अप्रभावी है। यहां तक कि नमक जैसे बुनियादी खाद्य पदार्थ के बारे में भी अनिवार्यतः जानकारियां नहीं दी जातीं। दरअसल, देखा जाए तो स्पष्ट तौर पर शक्तिशाली जंग फूड कारोबार और लालफीताशाही के दबाव के चलते कानून तंत्र को लागू करने में प्रगति नहीं हो रही है।

भारत की खाद्य नियामक संस्था फूड सेफ्टी एंड स्टैडडर्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद वर्ष 2013 में विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित की थी। इस कमेटी का उद्देश्य स्कूलों में मौजूद जंक फूड का नियमन करना था। इस कमेटी में डॉक्टर, पोषण विज्ञानी (न्यूट्रिशनिस्ट), जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ, सिविल सोसाइटी और कारोबारी जगत के लोग शामिल थे। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट भी इसका हिस्सा था। इससे पहले उदय फाउंडेशन नाम की गैर-लाभकारी संस्था ने स्कूलों के आसपास जंग फूड की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी। वर्ष 2014 में विशेषज्ञों की कमेटी ने कैलोरी, शुगर, वसा (फैट), सैचुरेटेड वसा और नमक के बारे में फूड पैकेट्स के सामने (एफओपी यानी फ्रंट ऑफ पैक) लेबलिंग करने का सुझाव दिया था। ये ग्राहकों को जानने में मदद करता कि वे जिस खाद्य पदार्थ का सेवन कर रहे हैं, उसमें कौन-सा तत्व कितनी मात्रा में मौजूद है।

लेकिन, ये रिपोर्ट ‘उपयुक्त’ नहीं थी, इसलिए वसा, नमक व शुगर की मात्रा और इससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के मूल्यांकन के लिए अगले वर्ष यानी 2015 में एफएसएसएआई ने विशेषज्ञों की एक और कमेटी बनाई। 11 सदस्यीय इस कमेटी का अध्यक्ष प्रभाकरण को बनाया गया था। वह उस वक्त पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष थे। दो साल बाद इस कमेटी ने भी पूर्व में गठित कमेटी की अनुशंसाओं का समर्थन किया था। इस कमेटी ने पैकेटबंद और फास्ट फूड्स के सही आकार और जरूरी पोषक तत्वों की ठोस जानकारी देने का सुझाव दिया था।

अब आपको लगेगा कि इस कमेटी के सुझावों के बाद किसी तरह के टालमटोल की की सम्भावना ही नहीं थी। लेकिन ऐसा नहीं है। कमेटी के सुझाव के बाद एफएसएसएआई को फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड (लेबलिंग एंड डिस्प्ले) रेगुलेशन, 2018 लाने में एक साल लग गया। रेगुलेशन के ड्राफ्ट में नमक को अनिवार्य रूप से सोडियम क्लोराइड लिखने को कहा था, लेकिन फूड लेबल्स में अब भी नमक का जिक्र नहीं होता है। ड्राफ्ट में एफओपी का भी प्रावधान था, जो वैश्विक स्तर पर खाद्य पदार्थों में मौजूद तत्वों के बारे में जानकारी लेने का अहम तत्व है। प्रावधान के अनुसार, लेबल के ऊपरी हिस्से में कैलोरी, कुल वसा (फैट), कुल शुगर, ट्रांस फैट और नमक की मात्रा की जानकारी देनी थी और निचले हिस्से में लिखना था कि इन तत्वों का कितना प्रतिशत एक व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। एफएसएसएआई ने रिकमेंडेड डायटरी अलाउंस (आरडीए) में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2,000 कैलोरी तय किया। ड्राफ्ट में ये भी प्रस्ताव दिया गया था कि जिन पोषक तत्वों की मात्रा प्रस्तावित परिणाम से ज्यादा हो, उन सभी पोषक तत्वों के नाम में लाल निशान लगाया जाए।

यह एक बड़ा आंदोलन था, क्योंकि इस अधिसूचना के लागू होने से वे नियम बदल जाते, जिसके चलते फूड कम्पनियां हमारी रसोईघरों व हमारे पेट पर राज करती हैं। इस ड्राफ्ट के जमीन पर उतरने से हमारे पास न केवल ये विकल्प होता कि हम फूड में मौजूद नमक, शुगर या वसा के बारे में जान पाते बल्कि हमें ये भी पता चलता कि हम रोज कितना आहार लें कि कैलोरी दिनभर में बर्न हो जाए। जाहिर सी बात है कि ये सब फूड इंडस्ट्री की नकेल कसने के लिए काफी था।

17 अगस्त, 2018 को सुरक्षित व स्वस्थ भोजन के लिए फूड लेबलिंग रेगुलेशन पर हुए एक राष्ट्रीय विमर्श में एफएसएसएआई के सीईओ पवन अग्रवाल ने कहा था, ‘इंडस्ट्री नहीं चाहती कि फूड में लगने वाले लेबल में खतरे का प्रतिनिधित्व करने वाला लाल निशान लगाया जाए।’

अतः वर्ष 2018 में तैयार किया गया ड्राफ्ट आगे का सफर तय नहीं कर पाया और ड्राफ्ट बनकर ही रह गया। ऐसे में एफएसएसएआई ने एक नया तरीका ईजाद करने के लिए तीसरी कमेटी गठित करने की घोषणा की। इस बार नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन के पूर्व डायरेक्टर बी, सेसिकरण को कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से इस कमेटी की अनुशंसाओं को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।

आखिरकार, नियमन के लिए एफएसएसएआई ने जुलाई, 2019 में दूसरी बार ड्राफ्ट तैयार किया। हालांकि, ये ड्राफ्ट पिछले ड्राफ्ट के मुकाबले काफी कमजोर था। अब आपको लग रहा होगा कि मामला अपने मुकाम पर पहुंच गया, लेकिन नहीं ! नया ड्राफ्ट जो पहले की तुलना में काफी कमजोर है और आम लोगों के स्वास्थ्य के साथ गम्भीर रूप से समझौता करता है, वो भी सम्भवतः प्रभावशाली फूड इंडस्ट्री को स्वीकार्य नहीं है। इस ड्राफ्ट को लेकर अभी तक अधिसूचना जारी नहीं हुई है। आम लोगों के सुझाव के लिए एक ड्राफ्ट के जारी होने के बाद अधिसूचना जारी करने में दो महीने से ज्यादा वक्त नहीं लगना चाहिए। लेकिन, पांच महीने गुजर जाने के बाद भी अधिसूचना जारी नहीं की गई है। चर्चा है कि नियम में और ढील देने और कानून लाने में लेटलतीफी करने के लिए अब एक और नई कमेटी लाने की तैयारी चल रही है। इस तरह के टालमटोल से ये तो साफ है कि फूड बिजनेस का हमारे स्वास्थ्य से कोई वास्ता नहीं है, बल्कि यह कारोबार केवल और केवल कमाई करने के लिए किया जा रहा है।

जनस्वास्थ्य से खिलवाड़

फ्रंट ऑफ पैक (एफओपी) सुनिश्चित हो, इसके लिए कानून बनाने में कमेटी दर कमेटी बनाने की कहानी भले ही दुखद न हो लेकिन हास्यास्पद जरूर है। मिसाल के लिए, फूड सेफ्टी स्टैडर्ड (लेबलिंग एंड डिस्प्ले) रेगुलेशंस, 2019 में एफओपी लेबल पर प्रस्तावित तीन को पांच तरह के न्यूट्रिंएट्स के बदलाव प्रस्ताव रखा था। इसमें नमक की जगह सोडियम, टोटल फैट के साथ सैचुरेटेड फैट और कुल शुगर के साथ एडेड शुगर को शामिल किया गया है।

नमक हाइपरटेंशन को बढ़ावा देता है। इस साल तैयार किए गए ड्राफ्ट में नमक की जगह सोडियम लिखने का प्रस्ताव दिया गया है, जो फूड इंडस्ट्री के पक्ष में जाता है। लोगों को सोडियम और नमक के साथ उसके सम्बन्ध के बारे में बहुत कम जानकारी है। सोडियम में नमक की मात्रा कितनी है, इसका हिसाब कैसे लगाया जाए, इसकी जानकारी भी लोगों को कम ही है। मगर एफएसएसएआई ने ड्राफ्ट में पैकेट के पीछे और सामने सोडियम लिखने का ही प्रस्ताव दिया है।

एफओपी में कुल वसा की जगह सैचुरेटेड फैट का जिक्र करने को कहा गया है, ये भी फूड इंडस्ट्री के हक में ही है। पैकेटबंद खाने में वसा बुहत होता है, लेकिन उसमें अत्यधिक सैटुरेटेड फैट हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता। ये समग्रता में समस्या का हल नहीं देता है बल्कि इससे ग्राहकों में भ्रम फैलेगा और उन्हें लगेगा कि सैचुरेटेड फैट के अलावा जो फैट है, वह नुकसानदेह नहीं है।

सैचुरेटेड फैट का हृदय रोग से गहरा सम्बन्ध है, जो वयस्क होने पर सामने आता है। लेकिन, टोटल फैट की अधिकता वाला खाद्य बहुत कम उम्र में ही समस्या की जड़ बन सकता है। दिल्ली के हमदर्द अस्पताल की शिशुरोग विभाग की प्रमुख रेखा हरीश कहती हैं, ‘इससे बच्चों में मोटापे का रोग हो सकता है। इसलिए फूड पैक्स में टोटल फैट के साथ सैचुरेटेड फैट का भी जिक्र किया जाना चाहिए।’ उन्होंने आगे कहा, ‘बचपन में मोटापा एक बड़ी चिंता बन गया है। एफएसएसएआई द्वारा स्वीकृत 2000 कैलोरी बच्चों के लिए बहुत ज्यादा है। इससे बच्चे काफी ज्यादा फैट और शुगर ग्रहण कर सकते हैं।’ अतः एफओपी में फैट के बारे में आधी जानकारी से बहुत फायदा नहीं होने वाला है। एफओपी से टोटल फैट हटाने से पहले एफएसएसएआई को यूके व दक्षिण कोरिया की तरह सैचुरेटेड फैट के बगल में इसे छापने की सम्भावनाएं तलाशनी चाहिए थी। सच कहे, तो ट्रांस फैट की जगह टोटल फैट लाना चाहिए क्योंकि ये पैक्ड व फास्ट फूड से बाहर हो रहा है। एफएसएसएआई ने घोषणा की है कि वर्ष 2022 तक औद्योगिक स्तर पर उत्पादित ट्रांस फैट को खत्म करेगा। अगर ड्राफ्ट की अधिसूचना जारी हो जाए, तो वर्ष 2020 त एफओपी पर लाल निशान लगाने का नियम लागू हो जाएगा।

संशोधित ड्राफ्ट में दूसरी चीज जो खत्म की जा रही है वह है टोटल शुगर को एडडे शुगर में बदलना। इसका मतलब है कि एफओपी लेबल में खाद्य पदार्थ में प्राकृतिक तौर पर पाए जाने वाले शुगर की जानकारी नहीं रहेगी। लेबल में उसी शुगर के बारे में जानकारी दी जाएगी, जिसका इस्तेमाल फूड प्रोसेसिंग के वक्त किया जाएगा। बात यहीं खत्म नहीं होती है। टोटल शुगर की जगह एडेड शुगर लिखा जाएगा, तो शुगर के लिए तय आरडीए में बदलाव नहीं होगा। वर्ष 2018 के ड्राफ्ट कुल शुगर की स्वीकृत मात्रा 50 ग्राम तय की गई थी। अब जो ड्राफ्ट तैयार किया गया है उसमें टोटल शुगर की मात्रा भी 50 ग्राम ही तय की गई है। यह टोटल शुगर के मुकाबले दोगुना है। दूसरे शब्दों में, केवल लाभ के लिए चल रहे खाद्य कारोबार का पूरा खेल गुमराह करने वाला और गलत जानकारी पर आधारित है।

दूसरी तरफ, संशोधित ड्राफ्ट में पेय पदार्थों को इससे छूट दी गई है जबकि पुराने ड्राफ्ट में 80 किलो कैलोरी से कम शुगर डालने का प्रावधान रखा गया था और इससे अधिक शुगर डालने पर एफओपी में लाल निशान लगाने की बात थी। 10-11 ग्राम एडेड शुगर वाला 100 मिलीलीटर का एक सॉफ्ट ड्रिंक, जिसमें 40 से 45 प्रतिशत एम्टी कैलोरी हो, अगर उसे छोटे आकार में बेचा जाए, तो लाल कोड से बचा जा सकता है। यह महज संयोग नहीं है कि इसी तर्ज पर 150-200 मिलीलीटर आकार का सॉफ्ट ड्रिंक्स भी अब बाजार में उपलब्ध हैं। नियामक संस्थाएं ये समझने में विफल रहीं कि अस्वास्थकर पेय पदार्थ का सेवन अगर कम मात्रा में किया जाए, तो वो स्वास्थ्यकर नहीं हो जाएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (साउथ-ईस्ट एशिया) के मुताबिक, प्रति 100 मिलीलीटर पानी-आधारित मसालेदार पेय पदार्थ में एडेड शुगर की मात्रा 2 ग्राम होने चाहिए, मगर एफएसएसएआई सॉफ्ट ड्रिंक में इस सीमा से पांच गुना ज्यादा एडेड शुगर डालने की अनुमति देने को तैयार है। अतिरिक्त शुगर होने के बावजूद एफओपी लेबल में लाल निशान नहीं लगाया जाएगा।

नए ड्राफ्ट में हालांकि कैलोरी की भी सामान्य मात्रा निर्धारित नहीं की है। अगर एक उत्पाद में केवल टोटल फैट और टोटल शुगर की तयशुदा मात्रा है व उसमें टोटल कैलोरी बहुत अधिक है, तो भी एफओपी पर लाल निशान लगाने से बच जाएगा। यह ड्राफ्ट कम्पनियों को नियम लागू करने के लिए तीन साल का वक्त देता है। पहले दो वर्षों तक कम्पनियां अपने उत्पादों में पोषक तत्व स्वीकृत मात्रा से 30 प्रतिशत अधिक रख सकती है और तीसरे साल में इन तत्वों को स्वीकृत मात्रा के स्तर पर लाएंगी। यानी अगर ये पता भी चल जाए कि पैकेटबंद भोजन खराब है और रेड कैटेगरी का है, तो भी फूड इंडस्ट्री के पास चीजों को ठीक करने का वक्त रहेगा। हीं, अगर ये ड्राफ्ट, ड्राफ्ट ही रह जाता है, तब तो अपना वक्त खुद तय करेंगे और हमें बुरा स्वास्थ्य व बुरा कानून मिलेगा।

दुनिया चेतावनी की ओर भारत में पहले ही देर हो चुकी है। गलत भोजन से स्वास्थ्य की चुनौतियों को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि एफएसएसएआई दुनियाभर में अपनाए जा रहे सर्वोत्तम तरीकों से सीखेगा। बहुत से देशों को यह समझ में आ गया है कि बहुत सारे लेबल्स काम नहीं करते। इसके बदले चेतावनी का लेबल सबसे कारगर विकल्प है। एक अन्य चिंता यह है कि पैकेट के सामने बहुत से आंकड़े, एक कंपोनेंट के लिए एफओपी पर लाल निशान उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि दूसरे कम्पोनेंट सीमा से ऊपर नहीं जाते। अगर यह हरे निशान में है तो हम हरे रंग के बॉक्स बनाम लाल रंग के बॉक्स के आधार पर निर्णय ले सकते हैं। इससे गलत संदेश जाएगा और भ्रम की स्थिति बनेगी।

एफएसएसएआई ने 2019 के मसौदे में एफओपी की लेबलिंग में रंग बढ़ाने का विकल्प खुला रखा था। इसलिए हरा जैसा रंग जो सकारात्मक संकेत देता है, भविष्य में शामिल किया जा सकता है। ऐसा लेबलिंग उपभोक्ता को मिश्रित संकेत देती है। इससे उपभोक्ता को मदद नहीं मिलती।

यही वजह है कि विभिन्न देश चेतावनी के स्तर को लेबलिंग में शामिल कर रहे हैं जो हर न्यूट्रिएंट में प्रमुखता से अंकित किया जाता है। यह विश्व का सबसे उत्तम तरीका है। चिली में अधिक कैलोरी और न्यूट्रिएंट्स वाले खाद्य पैकेट में चेतावनी का स्तर लाल और सफेद रंग के अष्टकोणीय चिन्ह के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इस लेबल को समझना आसान है। इसमें आंकड़े अंकित नहीं होते, इसलिए गणना की जरूरत नहीं होती। इसमें लिखा होता है- ‘हाई इन शुगर’ या ‘हाई इन कैलोरी’। अगर किसी खाद्य पदार्थ में दो अवयवों का मात्रा अधिक है तो उसे दो अष्टकोणीय चिन्ह में प्रदर्शित किया जाता है। पहली नजर में इससे उपभोक्ता को यह चेतावनी मिलती है कि कोई उत्पाद स्वास्थ्य के लिए कितना हितकर या अहितकर है। चिली में चेतावनी के स्तर सर्वप्रथम 2016 में लागू किए गए थे। अडोल्फो इबान्येज विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर गियरमो परीजे बताते हैं, ‘चेतावनी का स्तर छह साल का बच्चा भी समझ सकता है। ये बहुत स्पष्ट, समझ में आने वाले और वह इच्छित संदेश देते हैं।’ यह बहुत प्रभावी और पोषण की जानकारी को आसानी से समझाते हैं।

अमरिका स्थित यूएनसी गिलिंग्स स्कूल ऑफ ग्लोबल पब्लिक हेल्थ में न्यूट्रिशन के प्रोफेसर बैरी पॉपकिन बताते हैं, चिली में इसके लागू होने के एक साल बाद कार्बोनेटेड बेवरजेस का प्रति व्यक्ति उपभोग 24.9 प्रतिशत कम हो गया। जो मांएं पहले लेबल को समझ नहीं पाती थीं।, अब वे लेबल के आंकड़ों को मार्गदर्शक के रूप में देखती हैं। उन्हें समझ में आ गया है कि अधिक लेबल वाला उत्पाद स्वास्थ्य के लिए ज्यादा ठीक नहीं है। चेतावनी के स्तर पेरू और कनाडा में भी लागू किए गए हैं। उरुग्वे, सिंगापुर, मैक्सिको और इजराइल भी इन्हें लागू करने के विभिन्न चरणों में हैं। चिली में चेतावनी बड़े आकार और पैकेट के सामने वाले हिस्से के बड़े भाग में होती है। यह पैक के दाई तरफ के ऊपरी हिस्से में होती है और काले रंग के लेबल में सफेद रंग का बोर्डर ध्यान खींचता है। इससे पैकेट में चेतावनी के स्तर की स्पष्टता से पहचान हो जाती है। इस तरह के लेबल भारत में भी सफल हो सकते हैं क्योंकि आबादी का बड़ा हिस्सा निरक्षर और अंग्रेजी पढ़ने में असमर्थ है। आमतौर पर पैकेटों में अंग्रेजी का ही इस्तेमाल किया जाता है। शाकाहारी और मांसाहारी भोजन में एफओपी लेबल काफी सफल रहे हैं। एफएसएसएआई वर्तमान नियमों के अनुसार, इसे लाल और हरे रंग के बिंदुओं से स्पष्ट करता है ताकि सूचना को समझना आसान हो लेकिन खाद्य नियामक अपने अनुभवों से सीखने को तैयार नहीं है।

हम क्या खाते हैं

एफएसएसएआई अपने खुद के नियमों को लागू करने में देरी कर सकता है लेकिन सीएसई ने उन्हीं नियमों का इस्तेमाल कर जाना कि हम क्या खा रहे हैं। अगर नियमों को लागू कर दिया जाता है तो क्या होगा और जो भोजन हम खा रहे हैं वह कितना उचित है? क्या तब इसे खाना ठीक रहेगा? या यह रेड होगा जो हमें बताएगा कि भोजन सुरक्षित नहीं है?

सीएसई द्वारा प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण के नतीजे साफ बताते हैं कि सभी जंक फूड रेड फूड हैं चूंकि सभी पैकेटबंद भोजन में नमक और वसा की मात्रा अधिक है, इसलिए पैकेट में कम से कम दो लाल रंग के अष्टकोणीय चिन्ह होने चाहिए। वसा के लिए लाल होने वाली फ्राईज और नमक के लिए लाल होने वाले पिज्जा को छोड़कर, सभी फास्ट फूड नमक और वसा के लिए लाल होना चाहिए। यह महत्त्वपूर्ण है कि लाल निशान मैन्यू और रेस्तरां के डिस्प्ले बोर्ड पर प्रदर्शित किए जाते हैं।

सीएसई का विश्लेषण बताता है कि पैकेटबंद भोजन और फास्ट फूड में सीमा से कुई गुना अधिक वसा और नमक है। नमक का ही उदाहरण लें। एफएसएसएआई ने 100 ग्राम के चिप्स, नमकीन और नूडल्स में 0.25 ग्राम सोडियम की मात्रा निर्धारित की है। जबकि 100 ग्राम के सूप और फास्ड फूड के लिए 0.35 ग्राम सोडियम की सीमा निर्धारित की है। नोर क्लासिक थिक टोमेटो सूप में निर्धारित सीमा से 12 गुना अधिक नमक पाया गया है। हल्दीराम के नट क्रेकर में भी आठ गुना अधिक नमक मिला है। 100 ग्राम के चिप्स और नमकीन के लिए वसा की सीमा आठ ग्राम निर्धारित है लेकिन अधिकांश चिप्स और नमकीन में यह 2-6 गुना अधिक पाया गया है। मैकडोनल्ड्स के बिग स्पाइसी पनीर रैप, सबवे के पनीर टिक्का सैंडविच (6 इंच) और केएफसी हॉट विंग्स के चार पीस में दोगुना से अधिक वसा मिला है। 2019 का ड्राफ्ट फास्ड फूड में 25 प्रतिशत विचलन की बात कहता है लेकिन यह मात्रा उससे बहुत अधिक है।

यही वजह है फूड इंडस्ट्री आप तक जानकारी नहीं पहुंचने देना चाहती। और यही वजह है कि इंडस्ट्री ड्राफ्ट को लागू करने का विरोध कर रही है। उसकी रणनीति स्पष्ट है। वह चाहती है नई समिति बने और नियमों को और कमजोर कर दिया जाए। सेसिकरण की अध्यक्षता में 2018 में बनी कमेटी की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

लेकिन इस कमेटी ने उद्योगों के हितों को ध्यान रखा है। यह कारोबार अंधेरे में काम करने में माहिर है। 16 सितम्बर, 2019 को न्यूयॉर्क टाइम्स में ‘ए शेडो इंडस्ट्री ग्रुप शेप्स फूड पॉलिसी अराउंड द वर्ल्ड’ शीर्षक से प्रकाशित लेख में खुलासा किया गया है कि किस तरह इंटरनेशनल लाइफ साइंसेस रिसर्च इंस्टीट्यूट बड़ी फूड बिजनेस करने वाली कम्पनियों के लिए सरकार के साथ लॉबिंग करता है। इसलिए आपको यह जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि सेसिकरण इस संगठन के ट्रस्टी हैं इससे स्पष्ट होता है कि इन कम्पनियों की पहुंच कितनी व्यापक है। कमेटियों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक में उनकी पैठ है। फूड इंडस्ट्री नहीं चाहती है कि ड्राफ्ट को लेकर उसका बयान लिया जाए। 27 जून, 2019 को इकॉनोमिक टाइम्स में प्रकाशित लेख में ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुबोध जिंदल ने नियमों को न तो वैज्ञानिक माना और न ही व्यवहारिक। लेख में उनका बयान था, ‘पैकेटबंद भोजन में नमक, शुगर और वसा की मात्रा स्वाद की जरूरतों पर निर्भर करती है। यह उत्पादकों की पसंद नहीं है।’ जब सीएसई ने उनसे सम्पर्क किया जो उन्होंने टिप्पणी से इन्कार कर दिया। पेप्सिको इंडिया ने साधारण बयान दोहराया कि वह एक ‘कानून का पालन करने वाला कारपोरेट नागरिक है और वह भारत सरकार की ओर से बनाए गए सभी नियमों का पालन करेगा। इसमें लेबलिंग के नए नियम भी शामिल हैं।’

नेस्ले इंडिया ने सीएसई द्वारा भेजे गए ईमेल का पत्रिका छपने तक कोई जवाब नहीं दिया। हल्दीराम के नागपुर डिवीजन के ब्रांड मैनेजर साहिल सपरा ने भी टिप्पणी से इन्कार कर दिया। लेकिन तथ्य पूरी स्पष्टता से बोल रहे हैं। 2013 के बाद से जारी नियमों के जरिए उपभोक्ता को सूचित करने के प्रयासों को पूरी तरह नकार दिया गया है। अगर फूड इंडस्ट्री का काफी कुछ दाव पर लगा है तो लोगों का स्वास्थ्य उससे भी बड़े दाव पर है। एफएसएसएआई को स्वीकार करना होगा कि उद्योगों का हित हमारे स्वास्थ्य और कल्याण से बड़ा नहीं है। एक बेहतर और पूर्ण रूप से विकसित नियमों को तत्काल प्रभाव से लागू करने की जरूरत है।

(भव्या खुल्लर के इनपुर के साथ। अनिल अश्विनी शर्म भागीरथ और विवेक मिश्रा द्वारा अनुवादित)

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