सिंगापुरः आदर्श देश का घटिया पाठ

Submitted by Hindi on Wed, 12/08/2010 - 10:05
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गांधी मार्ग, नवंबर - दिसंबर 2010
समुद्र से घिरे सिंगापुर में जमीन बहुत कम है। इसका हल इसने अपनी अमीरी से निकाला था। सिंगापुर ने सन् 1960 से अब तक अपना क्षेत्राफल 20 प्रतिशत बढ़ा लिया है। कैसे? उसने पड़ौसी देशों की जमीन नहीं हड़पी। उसने समुद्र से जमीन छीन कर यह काम किया है। हमारे देश से नीचे दक्षिण में पूरब की तरफ बसा है एक देश सिंगापुर। आकार में बहुत ही छोटा, इसलिए अक्सर इसे शहरनुमा देश भी कहा जाता है। सिंगापुर की प्रसिद्धि एक अमीर, बेहद साफ सुथरे देश की तरह है। नागरिक-अनुशासन, पर्यावरण की चिंता, साफ पानी, वर्षा जल संग्रह और मोटर गाड़ियों के लिए खूब ही कड़े नियम, बहुत ही सुंदर आरामदेह सार्वजनिक वाहनों की, बस आदि की व्यवस्था के कारण यह दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का भी केन्द्र बन चुका है। पर इस स्वर्ग के पीछे यहां एक नरक भी है। पहली बार उस नरक को दिखा रहे हैं श्री टाम लेविट।

एक बड़े शहर जैसा छोट-सा देश है सिंगापुर। यहां आधुनिक और विकसित माने गए समाज की सभी अच्छी बातें एक ही जगह दिख जाएंगी। पर नहीं दिखेंगी तो वे बातें जो कोई छोटी भी नहीं हैं। इतनी बड़ी हैं कि उनसे सिंगापुर के पड़ौसी देश तक परेशान होने लगे हैं। उनकी तो जमीन ही खिसकने लगी है!

सिंगापुर के पास सब कुछ है। बस एक चीज की बेहद कमी है। वह है जगह। समुद्र से घिरे सिंगापुर में जमीन बहुत कम है। इसका हल इसने अपनी अमीरी से निकाला था। सिंगापुर ने सन् 1960 से अब तक अपना क्षेत्राफल 20 प्रतिशत बढ़ा लिया है। कैसे? उसने पड़ौसी देशों की जमीन नहीं हड़पी। उसने समुद्र से जमीन छीन कर यह काम किया है। नई जमीन बनाने के लिए उसने समुद्र में भराव की बेहद खर्चीली योजना बनाई है। यह भराव वह अपनी जमीन काटकर तो कर नहीं सकता। उसने यह काम अपने पड़ौसी देशों से बहुत ही बड़े पैमाने पर रेत मांग कर किया है। एक तरह से देखा जाए तो उसने अपने पड़ोसी देशों की जमीन ही छीनी है। पर यह हमला बिलकुल अदृश्य है।

सन् 2008 में कोई 1.42 करोड़ टन रेत का आयात कर सिंगापुर इस विषय में दुनिया का नंबर एक देश बन गया है। इस रेत का अधिकांश निर्यात पड़ौसी देशों- इंडोनेशिया, मलेशिया और वियतनाम से हो रहा है। अब इन देशों में से इतनी ज्यादा रेत सिंगापुर में पटकी जा चुकी है कि इन जगहों में उसके दुष्परिणाम दिखने लगे हैं। लोगों में भी विरोध उठने लगा है। इसलिए ये तीनों देश रेती के निर्यात पर प्रतिबंध या इसे नियंत्रिात करने की बात सोचने लगे हैं।

परंतु अगले 10 वर्षों में अपने क्षेत्राफल में अतिरिक्त 7 प्रतिशत की वृद्धि का इच्छुक सिंगापुर अब अपनी मांग की पूर्ति के लिए एक अन्य पड़ौसी कंबोडिया पर निर्भर होता जा रहा है। सार्वजनिक तौर पर कंबोडिया ने रेती के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन मिट्टी से, रेत से सोना कमा लेने का लालच वहां भी है ही। एक स्वयंसेवी संगठन ‘ग्लोबल विटनेस’ का कहना है कि कंबोडिया के एक प्रांत कोहकांग से ही कोई 7,96,000 टन रेत निकालकर प्रतिवर्ष सिंगापुर को निर्यात की जा रही है। बाजार में इसकी कीमत 1250 करोड़ रुपया बैठती है।

इन पड़ौसी देशों को अपनी रेत सिंगापुर को बेचने की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। बड़ी-बड़ी नौकाएं, जहाज खूब बड़े फावड़ेनुमा यंत्रों से भीतर से रेत उठाकर बाहर ला पटकते हैं। इससे वहां के पानी के एक बड़े भाग में एकदम खलबली मच जाती है। रेत निकालने से पानी की गुणवत्ता घटती है। उसमें गंदलापन आ जाता है। फिर सूर्य की रोशनी बाधित होती है और समुद्री घास और कोरल चट्टानों सहित अनेक पौधे नष्ट हो जाते हैं। रेत निकालने का असर प्राकृतिक रूप से बने तट पर पड़ता है। इन क्षेत्रों में भूमि कटने और नीचे धंसने लगती है। बाढ़ का खतरा बढ़ता जाता है। इन सभी जगहों पर समुद्री जीवों की संख्या में भी काफी कमी आई है। सिंगापुर देश का क्षेत्राफल थोड़ा बढ़ जाए, इसके लिए इंडोनेशिया का एक द्वीप ही डूबने लगा था। वहां के रिऊ नामक द्वीप में अत्यधिक खनन के कारण कोरल चट्टानों को जबरदस्त नुकसान पहुंचा था और पूरा द्वीप ही विलुप्ति के कगार पर पहुंच गया था। अंततः सन् 2007 में यहां के अधिकारियों को रेत के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा था। कंबोडिया के कोहकांग प्रांत में रेत के खनन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर भी यही चिंता की जा रही है कि कहीं इसका हश्र भी इंडोनेशिया के रिऊ द्वीप जैसा न हो जाए।

नई जमीन बनाने के लिए उसने समुद्र में भराव की बेहद खर्चीली योजना बनाई है। यह भराव वह अपनी जमीन काटकर तो कर नहीं सकता। उसने यह काम अपने पड़ौसी देशों से बहुत ही बड़े पैमाने पर रेत मांग कर किया है। एक तरह से देखा जाए तो उसने अपने पड़ौसी देशों की जमीन ही छीनी है। पर यह हमला बिलकुल अदृश्य है। कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने गत वर्ष रेत के निर्यात पर प्रतिबंध की घोषणा की थी। लेकिन ग्लोबल विटनेस नाम के नागरिक संगठन ने पाया कि यह प्रतिबंध नदियों के किनारों से रेत निकालने पर था, समुद्री किनारों पर नहीं। संगठन का कहना है कि यह क्षेत्रा पूरी तरह से भ्रष्टाचार में लिप्त है और शासक वर्ग के नजदीकी लोग इस रेत के धंधे में लिप्त हैं। रेत निकालने के लाइसेंस समुद्री घास के इलाकों में भी दे दिए गए हैं। इससे इन तटों में समुद्री लहरों से सुरक्षा की प्राकृतिक दीवार पूरी तरह टूट जाएगी, ढह जाएगी और तब यहां आने वाले समुद्री तूफान भयानक हो जाएंगे। समाचार पत्रों में ऐसी खबरें बराबर हैं कि रेत निकालने का क्षेत्र बढ़ाने के फेर में यहां के लोगों को जबरन बेदखल किया जा रहा है। इस दौरान उन पर हमले भी हुए हैं और कईयों को जान भी गंवानी पड़ी है। ग्लोबल विटनेस के निदेशक श्री जॉर्ज ब्राउन का कहना है कि ‘अंततः प्राकृतिक संसाधनों पर सर्वाधिक निर्भर रहने वाले मछुआरे और यहां के निवासी खानाबदोश हो जाएंगे।

ग्लोबल विटनेस का आरोप है कि देश के कीमती वन संसाधनों को ठिकाने लगाने के बाद कंबोडिया का यह वर्ग अब खनन कंपनियों के साथ सांठगांठ कर रेत के अवैध व्यापार से जुड़ गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार बिना किसी तरह का कर या रॉयल्टी चुकाए करोड़ों डॉलर के राष्ट्रीय धन की चोरी हो रही है।

कंबोडिया, मलेशिया और इंडोनेशिया को सबसे अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अधिकांश लोग अब अपनी इन सब समस्याओं के लिए सिंगापुर को दोषी ठहरा रहे हैं जो कि नए रेसिंग ट्रेक, केसीनो और बंदरगाह विकसित करने की ललक में पड़ौसी पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों की अनदेखी कर रेत के आयात में जुटा है। कंबोडिया, मलेशिया और इंडोनेशिया को सबसे अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अधिकांश लोग अब अपनी इन सब समस्याओं के लिए सिंगापुर को दोषी ठहरा रहे हैं जो कि नए रेसिंग ट्रेक, केसीनो और बंदरगाह विकसित करने की ललक में पड़ौसी पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों की अनदेखी कर रेत के आयात में जुटा है। इन सब आरोपों के जवाब में सिंगापुर सरकार का कहना है कि सिंगापुर में रेत का आयात निजी कंपनियों द्वारा व्यावसायिक तौर पर किया जाता है। रेत के आयात के किसी भी अनुबंध से सिंगापुर सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। देश का क्षेत्राफल कृत्रिाम रूप से बढ़ाने के लिए विशाल पैमाने पर रेत चाहिए सरकार को। वह व्यापारियों से रेत खरीदती है। अब उसके ये व्यापारी रेत कौन से कारखाने में बनाते हैंμ यह तो वे ही जाने! लेकिन ग्लोबल विटनेस का कहना है कि उसके पास इस बात के प्रमाण हैं कि कंबोडिया से रेत खरीदने के मामले में सिंगापुर के मंत्रालय लिप्त हैं।

पड़ौसी देशों द्वारा अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए रेत निकालना प्रतिबंधित करने के बाद अब सिंगापुर में तस्करी से रेत पहुंचाने का धंधा खूब फल फूल रहा है। इंडोनेशिया में काम कर रहे ग्रीनपीस नामक एक पर्यावरण संगठन का कहना है कि सिंगापुर तक रेत पहुंचाने में तस्करों को कोई दिक्कत नहीं है। ऐसा कभी-कभी ही होता है कि नौसेना का सीमा शुल्क विभाग रेत से लदे तस्करों के विशाल जहाज को पकड़े। उनका कहना है कि इंडोनेशिया से हर साल 30 करोड़ क्यूबिक मीटर रेत अवैध रूप से निर्यात की जाती है। इस बीच ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि सिंगापुर की नजरें अब दूर बांग्लादेश पर भी हैं।

ग्लोबल विटनेस ने सिंगापुर सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि सिंगापुर सरकार स्वयं को इस अंचल में पर्यावरण के नायक के रूप में प्रस्तुत करती है। इस वर्ष जून में यहां विश्व शहर सम्मेलन भी आयोजित हो चुका है। दुनिया को आदर्श देश, आदर्श नागरिक, आदर्श अनुशासन, आदर्श पर्यावरण का पाठ पढ़ाने वाला देश अपने पड़ौसी देशों को भला क्या सिखा पाएगा? परंतु वास्तविकता यह है कि उसकी रेत की मांग से आसपास के देशों के पर्यावरण पर बहुत ही विपरीत प्रभाव पड़ा रहा है। संगठन का कहना है कि सिंगापुर को कच्चे माल के टिकाऊ स्रोतों हेतु निर्माण कंपनियों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने चाहिए।

लेखक लंदन से प्रकाशित होने वाली द्वैमासिक पत्रिाका ‘द इकॉलॉजिस्ट’ में काम करते हैं।

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