संत के भगीरथ प्रयास से साफ हुई नदी की दास्तान

Submitted by Hindi on Thu, 09/27/2012 - 09:37
Source
यू-ट्यूब

भगवा वस्त्र पहने कुदाल-फावड़े की मदद से नदी में से गाद निकालते हुए 45 वर्षीय संत को देखकर अनायास ही मन में भागीरथ नामक उस महामुनी की याद कौंध जाती है जो अपनी साधना के बल पर स्वर्गलोक से गंगा उतार लाए थे। अधपकी दाढ़ी, मजबूत देह, मधुर वाणी, आत्मविश्वास से सराबोर और धुन के पक्के यह महापुरुष कोई और नहीं बल्कि संत बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल हैं,जिन्होंने गुरू नानक देव जी के जीवन से जुड़ी गंगा के समान पवित्र नदी काली बेई को एक प्रकार से पुनर्जन्म दिया है। 160 किलोमीटर के प्रवाह मार्ग में गांवों व नगरों के गंदे पानी, आसपास के खेतों में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग, कीचड़ और जंगली घासफूस के कारण गंदा नाला बन चुकी यह नदी आज एक कमंडलधारी कर्मयोगी संत के संकल्प से सुजलाम-सुफलाम, रमणीय सरिता बन चुकी है।

भाग -2


भाग -3


भाग -4


पंजाब के होशियारपुर जिले की मुकेरियां तहसील के ग्राम घनोआ के पास से ब्यास नदी से निकल कर काली बेई दुबारा 'हरि के छम्ब' में जाकर ब्यास में ही मिल जाती है। मुकेरियां तहसील में जहां से काली बेई निकलती है। वो लगभग 350 एकड़ का दलदली क्षेत्र था। अपने 160 किलोमीटर लंबे रास्ते में काली बेई होशियारपुर, जालंधार व कपूरथला जिलों को पार करती है। लेकिन इधर काली बेई में इतनी मिट्टी जमा हो गई थी कि उसने नदी के प्रवाह को अवरूद्ध कर दिया था। नदी में किनारे के कस्बों-नगरों और सैकड़ों गांवों का गंदा पानी गिरता था। नदी में और किनारों पर गंदगी के ढेर भी थे। जल कुंभी ने पानी को ढक लिया था। कई जगह पर तो किनारे के लोगों ने नदी के पाट पर कब्जा कर खेती शुरू कर दी थी। 'पंच आब' यानि पांच नदियों वाले प्रदेश में काली बेई खत्म हो गई थी। बुद्धिजीवी चर्चाओं में व्यस्त थे। जालंधर में 15 जुलाई 2000 को हुई एक बैठक में लोगों ने काली बेई की दुर्दशा पर चिंता जताई। इस बैठक में उपस्थित सड़क वाले बाबा के नाम से क्षेत्र में मशहूर संत बलबीर सींचेवाल ने नदी को वापिस लाने का बीड़ा उठाया। अगले दिन बाबाजी अपनी शिष्य मंडली के साथ नदी साफ करने उतर गए। उन्होंने नदी की सतह पर पड़ी जल कुंभी की परत को अपने हाथों से साफ करना शुरू किया तो फिर उनके शिष्य भी जुटे।

Disqus Comment