सोच, शौच और शौचालय

Submitted by Hindi on Tue, 10/09/2012 - 10:41
Source
पंचायतनामा, 08-14 अक्टूबर 2012
खुले में शौच तो हमें हर हाल में रोकना ही होगा। खुले में पड़ी टट्टी से उसके पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम) कड़ी धूप से नष्ट होते हैं। साथ ही टट्टी यदि पक्की सड़क या पक्की मिट्टी पर पड़ी है तो कम्पोस्ट यानी खाद भी जल्दी नहीं बन पाती और कई दिनों तक हवा, मिट्टी, पानी को प्रदूषित करती रहती है। मानव मल में मौजूद जीवाणु और विषाणु हवा, मक्खियों, पशुओं आदि तमाम वाहकों के माध्यम से फैलते रहते हैं और कई रोगों को जन्म देते हैं। सुबह-सुबह गांवों में अद्भुत नजारा होता है। रास्तों में महिलाओं की टोली सिर पर घूंघट डाले सड़कों पर टट्टी करती मिल जाएगी। पुरुषों की टोली का भी यही हाल होता है। टोली जहां-तहां सकुचाते, शर्माते और अपने भाई-भाभियों, काका-काकियों से अनजान बनते मलत्याग को डटी रहती है। हिंदुस्तान की बहुत सी भाषाओं में शौच जाने के लिए ‘जंगल जाना’, ‘बाहर जाना’, ‘दिशा मैदान जाना’ आदि कई उपयोगी शब्द हैं। झारखंड में खुले में ‘मलत्याग’ को अश्लील मानते हुए लोगों में एक ज्यादा प्रचलित शब्द है ‘पाखाना जाना’। पर जनसंख्या बहुलता वाले इस देश में न गांवों के अपने जंगल रहे और न मैदान ही। अब तो गांवों को जोड़ने वाली पगडंडियां, सड़कें, रेल की पटरियां, नदी-नालों के किनारे ही ‘दिशा मैदान’ हो गए हैं। परिणाम; गांव के गली-कूचे, घूरे-गोबरसांथ और कच्ची-पक्की सड़कें सबके सब शौच से अटी पड़ी हैं।

विषम परिस्थिति हो गई है। खुले में शौच जाने वाले मानते हैं कि शौचालय बन जाने से सुबह-सुबह की सैर रुक गयी है, लंबी सैर से निपटान का प्रेशर ठीक से बन जाता है। कब्ज आदि से बचाव होता है। घर में शौच जाने वालों को शौच में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। दवा से लेकर बीड़ी-तम्बाकू, चाय आदि तक का सहारा लेना पड़ता है। खुली हवा का आनंद भी नहीं मिल पाता। और खेतों में टट्टी जाने से खेतों की उर्वरता भी बढ़ती है।

गांधी जी खुले में शौच की आदत हरगिज पसंद नहीं करते थे। वे खुली जगह में लोगों का पाखाना फिरना और बच्चों तक को फिराना असभ्यता मानते थे। गांधी जी कहते थे ‘’यदि जंगल ही जाना हो तो गांव से एक मील दूर जहां आबादी न हो, वहां जाना चाहिए। टट्टी करने से पूर्व एक गड्ढ़ा खोद लेना चाहिए और क्रिया पूरी करने के बाद मल पर खूब मिट्टी डाल देनी चाहिए। समझदार किसान को चाहिए कि अपने खेतों में हीं पूर्वोक्त प्रकार के पाखाने बनाकर अथवा गड्ढ़े में मैला गाड़े और बे-पैसे की खाद ले।

जो खुली हवा का मजा लेना चाहते हैं लें, पर ‘टट्टी पर मिट्टी’ जरूर डालें जिससे मल को सोनखाद में बदला जा सके। हमारे पास यदि शौचालय हो तो भी हमें ऐसे शौचालय ही चाहिए जो मानव मल को खाद में बदल सकें। गांधी जी चाहते थे कि मनुष्य के मल-मूत्र की भांति ही पशुओं के गोबर और मूत्र का भी खाद के रूप में ही उपयोग करना चाहिए। पशुओं के मूत्र का यदि कोई उपयोग नहीं करते, तो यह आर्थिक ही नहीं, आरोग्य की दृष्टि से भी हानिकर होता है।

कई अध्ययनों से यह सिद्ध हो गया है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने मल-मूत्र के जरिये 4.56 किलो नाईट्रोजन(एन), 0.55 किलो फ़ॉस्फ़ोरस(पी) तथा 1.28 किलो पोटेशियम(के) प्रतिवर्ष उत्पन्न करता है। इस मात्रा से खेत के एक बड़े टुकड़े को उपजाऊ बनाया जा सकता है।

इस विचार में बहुत दम है। ‘जल, थल और मल’ पर शोधरत सोपान जोशी कहते हैं कि कल्पना कीजिए कि जो अरबों रुपए सरकार गटर और मैला पानी साफ करने के संयंत्रों पर खर्च करती है वो अगर इकोसन (इकोलॉजिकल सेनिटेशन – मल से खाद बनाने का एक सुधरा रूप) पर लगा दें तो करोड़ों लोगों को साफ-सुथरे शौचालय मिलेंगे और बदले में नदियां खुद ही साफ हो चलेंगी। किसानों को टनों प्राकृतिक खाद मिलेगी और जमीन का नाइट्रोजन जमीन में ही रहेगा। पूरे देश की आबादी सालाना 80 लाख टन नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटेशियम दे सकती है। हमारी 115 करोड़ की आबादी जमीन और नदियों पर बोझ होने की बजाए उन्हें पालेगी क्योंकि तब हर व्यक्ति खाद की एक छोटी-मोटी फैक्ट्री होगा। जिनके पास शौचालय बनाने के पैसे नहीं हैं वो अपने मल-मूत्र की खाद बेच सकते हैं। अगर ये काम चल जाए तो लोगों को शौचालय इस्तेमाल करने के लिए पैसे दिए जा सकते हैं। इस सब में कृत्रिम खाद पर दी जाने वाली 50,000 करोड़, जी हां पचास हजार करोड़ रुपए की सबसिडी पर होने वाली बचत को भी आप जोड़ लें तो इकोसन (इकोलॉजिकल सेनिटेशन) की संभावना का कुछ अंदाज लग सकेगा। तो हम अपनी जमीन की उर्वरता चूस रहे हैं और उससे उगने वाले खाद्य पदार्थ को मल बनने के बाद नदियों में डाल रहे हैं अगर इस मल-मूत्र को वापस जमीन में डाला जाए- जैसा सीवर डलने के पहले होता ही था- तो हमारी खेती की जमीन आबाद हो जाएगी और हमारे जल स्रोतों में फिर प्राण लौट आएंगे।

खुले में शौच तो हमें हर हाल में रोकना ही होगा। खुले में पड़ी टट्टी से उसके पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम) कड़ी धूप से नष्ट होते हैं। साथ ही टट्टी यदि पक्की सड़क या पक्की मिट्टी पर पड़ी है तो कम्पोस्ट यानी खाद भी जल्दी नहीं बन पाती और कई दिनों तक हवा, मिट्टी, पानी को प्रदूषित करती रहती है। मानव मल में मौजूद जीवाणु और विषाणु हवा, मक्खियों, पशुओं आदि तमाम वाहकों के माध्यम से फैलते रहते हैं और कई रोगों को जन्म देते हैं। खुली हवा का मजा भी जाता रहता है। रही लंबी सैर की बात तो आपको रोका किसने है। पर खुले में शौच से तो यह बहुत मजेदार नहीं रह जाती। लंबी सैर का मजा सुबह-शाम तो ठीक है, पर दोपहरी और आधी रात को यदि प्रेशर बना तो। आदमियों के लिए तो वो भी ठीक है पर औरतें कहां जाएंगी? दोपहरी और आधी रात तो दोनों उनके लिए खतरनाक है, उनको तो सुबह-शाम के धुंधलके का ही इंतजार करना पड़ता है। वरना कई बार वे लम्पट तत्वों का शिकार बनती हैं। और अगर शाम ढलने का इंतजार करें तो आप अंदाजा लगा ही सकते हैं कि टट्टी-पेशाब को रोककर रखना कितना दुखदायी है। ज्यादा देर तक पेशाब रोकने से पेशाब की थैली या यूरीनरी ब्लैडर की क्षमता कमजोर होने लगती है। इस स्थिति को डॉक्टरी भाषा में ‘एकॉनट्रैकटाइल’ कहते हैं। इस स्थिति में ब्लैडर पेशाब को पूरी तरह बाहर नहीं निकाल पाता। खुलकर पेशाब भी नहीं आती और ब्लैडर संक्रमित और लकवाग्रस्त भी हो सकता है। देर-सबेर यूरीनेरी ब्लैडर की पथरी की संभावना और गुर्दों को भी नुकसान पहुंचता है। टट्टी का रोका जाना पेटदर्द, सिरदर्द, कमजोरी बढ़ाता है फिर भी हमारे घरों की महिलाओं को यह पीड़ा हर रोज सहनी पड़ती है सिर्फ इसलिये कि घर में शौचालय नहीं है और बाहर जा नहीं सकतीं तो ऐसे हालात से निपटने के लिये क्या किया जाए?

हमें मर्यादापूर्वक टट्टी निपटाने की सोच तो चाहिए ही। टॉयलेट-पाखाना-शौचालय नाम चाहे कुछ भी हो, चाहिए ही। सरकार निर्मल भारत अभियान, सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान आदि से संडासघर, पाखानाघर बनवाना चाहती है और इसके लिए काफी बड़े बजट का प्रावधान किया गया है। पर सफाई-स्वच्छता पर खर्च होने वाला रुपया केवल यदि ‘लैट्रीन रूम’ बनाने तक सीमित है तो हम मल प्रबंधन, खुले में शौच समस्या को ‘ट्रांसफर’ कर रहे हैं। सफाई का काम पूरा तो नहीं कर रहे हैं। इन तरीकों में उड़ाऊपन, फिजूलखर्ची का दोष है। सोनखाद जैसी अपने हाथ की खाद व्यर्थ गंवाना बेवकूफी और दुर्दैव का लक्षण है।

धनी मुल्कों में फिजूलखर्ची के ये तरीके चल सकते हैं, उनके पास साधन की विपुलता है और रासायनिक खाद काफी मात्रा में वहां उपलब्ध है, इसलिए सोनखाद की अभी उतनी आवश्यकता वहां नहीं महसूस होती। लेकिन हिन्दुस्तान जैसे देश में, जहां हरेक आदमी के पास मुश्किल से एक-डेढ़ एकड़ जमीन है, वहां मैले को व्यर्थ गंवाना नहीं पुसा सकता। एशिया के कई मुल्कों में मल को खेती का बल बना लिया जाता है।

मैले को किसी भी अर्थ में बर्बाद करना संसाधनों की बर्बादी ही है। आदमी के विवेक का विकास भी नहीं माना जाएगा। जहां आदमी में एक भी चीज व्यर्थ गंवाने की आदत आई तो सारा जीवन व्यर्थ गंवाने तक बढ़ जाती है। यह सब बदलना है तो किसी भी उपयोगी चीज की बेकदरी और बर्बादी की आदत छोड़नी होगी। फ्लश या सेप्टिक टैंक जैसे पाखाने भी हमें नहीं चाहिए, उन तरीकों के गुण यानी साफ-सुथरापन चाहिए।

लेखक द्वय हिन्दी वाटर पोर्टल से जुड़े हैं।

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