सोने के दाँतोें को निवाला नहीं

Submitted by UrbanWater on Sun, 04/02/2017 - 13:02
Source
‘बरगी की कहानी’, प्रकाशक - विकास संवाद समूह, 2010, www.mediaforrights.org

बरगी जलाशय से लगभग दस किमी की दूरी पर बसे हैं गाँव कठौतिया, बरैयाखेड़ा और मिर्सी। यह जलाशय में टापू पर बसे गाँव हैं। तीन ओर से पानी है एक और से जंगल। इन तीनों गाँव में आने-जाने का केवल एक ही रास्ता है जलमार्ग। चाहे सार्वजनिक वितरण प्रणाली का राशन लाना हो या मजदूरी। इसके अलावा कोई चारा नहीं। इसके लिये हर यात्रा के बाद बीस रुपए चुकाने होते हैं। यहाँ गाँवों में मनरेगा के जॉब कार्ड तो बने, लेकिन काम एक दिन भी नहीं हो पाया। न बेरोजगारी भत्ता ही मिला। यहाँ पर आजीविका का कोई साधन नहीं होने से लोग बाहर मजदूरी करने जाने को विवश हैं। बींझा निवासी सत्तर साल गोपाल उइके और सुखराम आदिवासी के दाँतों में लगी सोने की कील बताती है कि वह भी कभी समृद्ध थे। दोनों बुजुर्गों के पास अब सोने का एक भी आभूषण नहीं है। उनके बेटों के लिये सोना तो क्या अब रोटी का भी संकट है। कलोरी गाँव के करोड़ी पटेल भी कभी 56 एकड़ जमीन के मालिक थे। उनके घर लगभग तीस गाय, बैल और भैंस भी थे। उनका परिवार शाकाहारी था। अब वे मछुआ समिति के अध्यक्ष हैं। खुद मछली नहीं खाते पर इसके कारोबार के लिये जरूर मजबूर हो गए। उनके घर की दीवार पर लिखा है कि अब वह गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। यह कहानी कोई एक दो लोग या गाँव की नहीं है। 162 गाँव के हर घर-परिवार में ऐसी दुखद गाथाएँ विकास को मुँह चिढ़ा रही हैं। विकास के लिये इस विनाश की इबारत चार दशक पहले लिखी गई थी जब नर्मदा नदी पर बरगी बाँध योजना को आकार दिया गया था। इसे विस्थापन की सबसे बड़ी त्रासदी कहा जा सकती है। यहाँ लोगों को बिना किसी बेहतर पुनर्वास के अपने घरों से बेदखल कर दिया गया। इन गाँवों के बाशिन्दे अब भी इस बलिदान की कीमत चुका रहे हैं।

गौरतलब है कि नर्मदा घाटी विकास परियोजना के अन्तर्गत 1312 किमी लम्बी नर्मदा पर तीस बड़े, 56 छोटे और 250 लघु आकार के बाँध बनाए जा रहे हैं। इस शृंखला का सबसे पहला बाँध नर्मदा की सहायक नदी तवा पर बना। दूसरा बाँध जबलपुर जिले में नर्मदा नदी पर ही बनाया गया। रानी अवंतीबाई सागर परियोजना के नाम से बनाए गए इस बाँध की चौड़ाई लगभग पाँच किमी है तथा ऊँचाई 69 मीटर है। केन्द्रीय जल और ऊर्जा आयोग ने इस बाँध के निर्माण का खाका तैयार किया था। इसके अन्तर्गत 2980 वर्ग किमी क्षेत्र में सिंचाई और 105 मेगावाट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था। बाद में इसका सिंचाई क्षेत्र बढ़ाकर 4370 वर्ग किमी कर दिया गया। इस बाँध का निर्माण 1974 में शुरू हुआ और 1990 में यह पूरी तरह बनकर तैयार हो सका। इसी साल इस बाँध को पूरी क्षमता के साथ भरा गया। इसका जलाशय 75 किमी लम्बा और साढ़े चार किमी चौड़ा है। इस तरह यह 267 वर्ग किमी में इसका विस्तार है। यह जबलपुर, मंडला और सिवनी जिले की सीमाओं को छूता है। बरगी बाँध बनने से 162 गाँव डूब में आये।

डूब प्रभावित गाँव बींझा के गोपाल उइके ने बताया कि बाँध बनने से पहले उन्हें तकलीफ नहीं थी। घर में खूब घी-दूध होता था। खेतों में धान, कोदो-कुटकी, ज्वार, बाजारा, दाल-मसाले, गेहूँ-चना पैदा हो जाता था। हर चीज के लिये बाजार नहीं जाना होता था। धन-दौलत थी। बाँध बना और उन्हें यहाँ आना पड़ा। आठ एकड़ जमीन का केवल 9000 रुपए मुआवजा मिला। अब दो किलो अनाज से परेशान हैं। बींझा गाँव के 85 परिवारों की यही हालत है। सुखराम आदिवासी की भी 18 एकड़ जमीन का केवल 25 हजार रुपए मुआवजा मिला। सुखराम बताते हैं कि बाँध बनाते समय सरकार ने वायदा किया था कि उन्हें यहाँ से जाने के बाद पाँच एकड़ जमीन और परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी। पर ऐसा आज तक नहीं हो सका।

इन गाँवों का अस्तित्व ही नहीं


बरगी बाँध से उजड़े 11 गाँव का अस्तित्व ही नहीं है। इन गाँवों में सरकार की सारी योजनाएँ लागू हैं, लेकिन जब रिकॉर्ड की बात आती है तो न इन्हें राजस्व ग्राम माना जाता है और न ही वन ग्राम। यह गाँव वीरान गाँव की श्रेणी में हैं। गावंदा, मिर्की, कठौतिया, मगरधा, बडैयाखेड़ा, बींझा, खामखेड़ा, भुल्लापाठ, तुनिया, खमड़िया, हददुली गाँव के लोग केवल दस्तावेज की इस पेचींदगी के कारण महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इन गाँवों में लोगों को जॉब कार्ड तो मिले, लेकिन अब तक एक भी दिन का काम नसीब नहीं हुआ है। तुनिया ग्राम पंचायत के सरपंच सुक्कू पटेले ने बताया कि खाते में तीन लाख रुपए जमा होने के बावजूद वह काम नहीं खोल पा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यह राजस्व ग्राम हो जाएँगे तो बहुत काम निकल आएगा।

टापू पर बसे तीन गाँव


बरगी जलाशय से लगभग दस किमी की दूरी पर बसे हैं गाँव कठौतिया, बरैयाखेड़ा और मिर्सी। यह जलाशय में टापू पर बसे गाँव हैं। तीन ओर से पानी है एक और से जंगल। इन तीनों गाँव में आने-जाने का केवल एक ही रास्ता है जलमार्ग। चाहे सार्वजनिक वितरण प्रणाली का राशन लाना हो या मजदूरी। इसके अलावा कोई चारा नहीं। इसके लिये हर यात्रा के बाद बीस रुपए चुकाने होते हैं। यहाँ गाँवों में मनरेगा के जॉब कार्ड तो बने, लेकिन काम एक दिन भी नहीं हो पाया। न बेरोजगारी भत्ता ही मिला। यहाँ पर आजीविका का कोई साधन नहीं होने से लोग बाहर मजदूरी करने जाने को विवश हैं। बच्चों की पढ़ाई अलग प्रभावित हो रही है। बढ़ैयाखेड़ा के विद्यार्थियों की पढ़ाई आठवीं कक्षा के बाद नहीं हो पाती। युवाओं के पास मछली पकड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यहाँ के लड़कों की शादी नहीं हो पा रही। अब गाँव के लोग आपस में ही शादी कर रहे हैं। पिछले दिनों ही यहाँ सीमा और देवीप्रसाद की शादी हुई।

वायदा नहीं हुआ पूरा


बाँध प्रभावित क्षेत्र में डूब की खेती कुछ सहारा देती है। सरकार ने दस साल पहले बाँध प्रभावित लोगों के आन्दोलन के बाद यह मौखिक वायदा किया था कि हर साल 15 दिसम्बर तक बाँध का जलस्तर 418 मीटर के जलस्तर तक कर दिया जाएगा। लेकिन इस साल 20 दिसम्बर तक भी बाँध का जलस्तर 421 मीटर के जलस्तर तक भरा हुआ है। बरगी बाँध विस्थापित संघ के राजकुमार सिन्हा कहते हैं कि यह लोगों के साथ सरासर धोखा है। अब जबकि बरगी के नजदीक ही चुटका में परमाणु बिजली संयंत्र स्थापित किया जा रहा है और वहाँ के लिये भी पानी की सप्लाई बरगी से ही की जाएगी तब यह कहना मुश्किल है कि सरकार अपने वायदे को निभा पाएगी।

नहर ने किया खेतों को बर्बाद


1990 में बाँध के पूरा हो जाने के बीस साल बाद नहरों का काम पूरा हो सका है। बरगी के दाईं तट शाखा में दो साल पहले पानी छोड़ा गया। नहर निर्माण में तकनीकी खामियों के चलते कई गाँवों की सैकड़ों एकड़ जमीन में पानी का रिसाव हो रहा है। जमीन दलदली हो रही है। पिछले तीन सालों से अपने खेतों में किसान फसल ही नहीं ले पा रहे हैं। सगड़ा ग्राम पंचायत के किसान कल्लू सिंह पटेल, पिछले तीन सालों से कोई फसल नहीं ले पाये हैं। इसका कोई मुआवजा भी उन्हें नहीं मिला है। दिलीप कुमार पटेल बीस एकड़ के किसान हैं। उनके आठ एकड़ खेत में पानी है और खेत के बीचोंबीच से नाली निकाल दी गई है। उनके यहाँ के पूर्व सरपंच आशीष पांडे ने बताया कि नहर के किनारे बनाई गई ड्रेनेज को सही तरीके से नहीं बनाने से यह हालात बने हैं।

मछली का भी हक नहीं


इस बाँध से विस्थापित लोगों को मछली पकड़ने का हक भी नहीं है। दरअसल इस जलाशय में मछली उत्पादन अब ठेकेदार के हवाले है। मत्स्य समितियों के माध्यम से यह मछली 18 रुपए किलो के भाव से ही बिक पाती है। बाजार में इसका भाव औसतन साठ रुपए किलो होता है।

 

बरगी की कहानी

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

बरगी की कहानी पुस्तक की प्रस्तावना

2

बरगी बाँध की मानवीय कीमत

3

कौन तय करेगा इस बलिदान की सीमाएँ

4

सोने के दाँतों को निवाला नहीं

5

विकास के विनाश का टापू

6

काली चाय का गणित

7

हाथ कटाने को तैयार

8

कैसे कहें यह राष्ट्रीय तीर्थ है

9

बरगी के गाँवों में आइसीडीएस और मध्यान्ह भोजन - एक विश्लेषण

 


Disqus Comment