सफाई के लिए अमेरिकी पुरस्कार

Submitted by Hindi on Wed, 10/22/2014 - 11:16
Source
लोकमत समाचार, 08 अक्टूबर 2014
.इसे महज संयोग ही कहा जाना चाहिए कि एक ओर केंद्र सरकार ने गांधी जयंती पर देशव्यापी सफाई अभियान शुरू किया और दूसरी ओर एक भारतीय को अमेरिका की एक संस्था की ओर से सफाई को लेकर जागरूकता करने और बड़े पैमाने पर बदलाव लाने के लिए एक लाख डॉलर के पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बिहार जैसे प्रदेश में ह्यूमेन्यूर पॉवर संस्था के माध्यम से सस्ते टॉयलेट बनाने वाले अनूप जैन और उनकी टीम का काम अतुलनीय है।

अनूप जैन को ग्लोबल सिटीजन के तौर पर उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए वर्ष 2014 के वेसलिट्ज ग्लोबल सिटीजन अवार्ड के लिए चुना गया है। सरकारी प्रयासों के अलावा निजी संस्थाएं भी इतना व्यापक कार्य कर सकती हैं, इसका भरोसा ह्यूमेन्यूर पॉवर ने दिलाया है। उम्मीद है, उनका हौसला कायम रहेगा अन्यथा बड़ी संख्या में गैर-सरकारी संस्थाएं महज फोटो खिंचाऊ अभियान में विश्‍वास रखती हैं और देश-विदेश से अनुदान पाने का सिलसिला जारी रखती हैं।

इनमें और सरकारी संस्थाओं में कोई फर्क नहीं होता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देश भर में सरकारी विभाग खानापूर्ति और कागजी औपचारिकता को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते ऐसे में ह्यूमेन्यूर पॉवर के कार्य की जितनी भी सराहना की जाए, कम है। अनूप जैन ने वर्ष 2011 में ह्यूमेन्यूर पॉवर नामक संस्था की स्थापना की थी, जो ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक स्वच्छता इकाइयां (टॉयलेट्स) बनाने का काम करती है। इनकी कीमत किफायती है इसलिए लाखों लोगों ने इसे अपनाया है। इसे निश्‍चित रूप से एक बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन कहा जाना चाहिए।

खुले में शौच करने की मजबूरी में गरीबी एक वजह हो सकती है, लेकिन सच तो यही है कि जब तक मानसिकता में बदलाव नहीं होता है तब तक कोई लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। अनूप जैन और उनके सहयोगियों ने इस काम को बखूबी किया है। इसलिए दुनियाभर के लोगों ने ह्यूमेन्यूर पॉवर के संस्थापक के पक्ष में मतदान कर विजेता उन्हें बनाया। अनूप जैन ने विभिन्न स्रोतों से धन इकट्ठा कर सामाजिक जिम्मेदारी की भावना से ये टॉयलेट्स बनाए और लोगों को समझाने में भी सफल हुए। दुनिया को बेहतर बनाने के लिए किए जाने वाले कार्य को सम्मानित किया जाता है।

इसी क्रम में अनूप और उनकी टीम को पुरस्कार के रूप में एक लाख अमेरिकी डॉलर दिए जाएंगे। आजादी के 70 सालों के बाद भी करोड़ों लोग (करीब आधी आबादी) खुले में शौच करने के लिए मजबूर है। न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि विभिन्न राज्यों की सरकारों ने समय-समय पर खुले में शौच करने जैसी मजबूरी को खत्म करने के लिए कितने ही अभियान चलाए और काफी हद तक सफलता भी पाई मगर लक्ष्य अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। अनुमान है कि हर साल खुले में शौच करने से फैलने वाली बीमारियों से करीब साढे। चार लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। इस आंकड़े की ओर प्राय: किसी का ध्यान नहीं जाता है, क्योंकि जिन लोगों का जीवन समाप्त हो जाता है उनकी आह आज भी सरकारों को कभी-कभार ही सुनाई पड़ती है!

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