सुनामी रक्षक पर खतरा

Submitted by Hindi on Mon, 10/06/2014 - 09:25
Source
द सी एक्सप्रेस, सितंबर 2013
आस्था और गौरव के प्रश्न को हम थोड़ी देर के लिए शिथिल भी कर दें, तो भी वैज्ञानिक ढंग से भी 'सेतु-समुद्रम' परियोजना पर सवाल उठे हैं। 'सेतु-समुद्रम' परियोजना की आयु व रख-रखाव पर अवैज्ञानिक दृष्टिकोण स्थापित करने की कोशिश हो रही है। आरके पचौरी कमेटी ने साफ तौर पर कहा है कि यह 'सेतु-समुद्रम' परियोजना तकनीकी और पर्यावरण की कसौटी पर भी हानिकारक है। रामसेतु का विध्वंस करने की जगह केंद्र सरकार को रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने की योजना बनानी चाहिए। 'सेतु-समुद्रम' परियोजना से कई लाख गुना आय रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने से होगी। अगर हम सभी आस्था व गौरव के प्रतीकों को विकास के प्रसंग से जोड़कर देखेंगे, तो देश के अंदर आस्था रखने या गर्व करने के लिए बचेगा क्या? कल कोई सरकार रामसेतु की तरह ही महात्मा गांधी के समाधि स्थल राजघाट, संसद भवन, लालकिला, हिमालय आदि का विध्वंस कर तरह-तरह के व्यापारिक प्रतिष्ठान व विकास योजनाओं की बात कर सकती है? केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नया हलफनामा देकर फिर 'सेतु-समुद्रम' परियोजना पर आगे बढ़ने यानी रामसेतु को तोड़ने का इरादा जाहिर किया है, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में पचौरी कमेटी की उस रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया है, जिसमें रामसेतु को पर्यावरणीय दृष्टिकोण से संरक्षित करने की बात थी और रामसेतु के विध्वंस से उत्पन्न होने वाली विकराल समस्या के प्रति सचेत करने की बात थी। केंद्र सरकार विकास और व्यापारिक लाभ के लिए हिंदुओं की आस्था के प्रतीक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण ही नहीं, बल्कि सामरिक तौर पर भी अतिमहत्वपूर्ण रामसेतु को तोड़ने के लिए अड़ी हुई है।

विकास और व्यापार के सैकड़ों, लाखों, करोड़ों, रास्ते हैं। हमें रामसेतु को विकास-व्यापार के ही केंद्र बिंदु में रखकर देखने तक सीमित क्यों होना चाहिए? केंद्र सरकार और कांग्रेस की यह विक्षिप्त नीति भाजपा की जड़ों में ऑक्सीजन का काम करेगी? दक्षिण में भाजपा और नरेन्द्र मोदी को नई जमीन तैयार करने का अवसर ही दिया जा रहा है? कथित विकास और पैसे कमाने के नाम पर क्या अपने गौरव-आस्था के प्रतीक चिह्नें-स्थानों को ध्वंस कर देना चाहिए? क्या एक सेतु -समुद्रम परियोजना स्थगित होने मात्र से देश के विकास का विध्वंस हो जायेगा? क्या हमें विकास के नाम पर देश की सुरक्षा, पर्यावरण को बलिबेदी पर चढ़ाना न्यायोचित है? क्या समुद्री संकट और समुद्री तूफान की समस्या को हम आमंत्रित नहीं कर रहे हैं।

'सेतु-समुद्रम' परियोजना से देश की समुद्री सुरक्षा और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को ध्यान में रखने की कोशिश क्यों नहीं हो रही है? आस्था, विज्ञान, सुरक्षा और पर्यावरण जैसे कई प्रश्न हैं, जिनसे हम न तो मुंह मोड़ सकते हैं और न ही इन प्रश्नों को खारिज कर सकते हैं। अगर हम सभी आस्था व गौरव के प्रतीकों को विकास के प्रसंग से जोड़कर देखेंगे तो देश के अंदर आस्था रखने या गर्व करने के लिए बचेगा क्या? कल कोई सरकार कहेगी कि राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि गैर जरूरी है, महात्मा गांधी की समाधि की वजह से दर्जनों एकड़ भूमि खाली पड़ी हुई है, महात्मा गांधी की समाधि को तोड़कर वहां एक आवासीय या फिर व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बना दिया जाना चाहिए? इससे एक तो विकास होगा और दूसरे, सरकार के खाते में करोड़ों-अरबों रुपये भी जमा होंगे।

कल कोई सरकार या समूह यह कह सकता है कि देश के संसद भवन को व्यापारिक कॉम्प्लेक्स बना दिया जाना चाहिए और संसद भवन में व्यापारिक प्रतिष्ठानों को किराये पर दे दिया जाना चाहिए, इससे सरकार को एक बड़ा राजस्व मिलेगा, जिससे विकास कार्यों को गति मिलेगी, कोई छोटी-मोटी जगह पर स्कूल जैसा भवन बना दिया जाए जहां पर बैठकर संसद की बहस करेंगे या कानून बनायेंगे और देश का भाग्य तय करेंगे? गंगा-यमुना जैसी तमाम नदियों को कोका कोला-पेप्सी जैसी कंपनियों को दे देना चाहिए वे व्यापार करेंगी और उनके व्यापार से देश को लाभांश मिलेगा? लाल किले पर प्रधानमंत्री द्वारा झंडा फहराने की क्या आवश्यकता है, लाल किले में बीयरबार खोल देना चाहिए, ताकि सरकार को राजस्व हासिल हो सके, हिमालय को तोड़कर करोड़ों हाउसिंग कॉलोनिया बसा देनी चाहिए, ताकि विकास का मार्ग संभव हो और सरकार को राजस्व की भी प्राप्ति हो। सहित ही देश के तमाम धर्मस्थलों और गौरव के चिह्नें व प्रतीकों को लेकर ऐसे ही प्रश्न खड़े हो सकते हैं?

आस्था और गौरव के प्रश्न को हम थोड़ी देर के लिए शिथिल भी कर दें तो भी वैज्ञानिक ढंग से भी 'सेतु-समुद्रम' परियोजना पर सवाल उठे हैं। 'सेतु-समुद्रम' परियोजना की आयु व रख-रखाव पर अवैज्ञानिक दृष्टिकोण स्थापित करने की कोशिश हो रही है। आरके पचौरी कमेटी ने साफतौर पर कहा है कि यह 'सेतु-समुद्रम' परियोजना तकनीकी और पर्यावरण की कसौटी पर भी हानिकारक है। थोड़े लाभ के लालच में ढेर-सारी समस्याओं की खतरनाक जमीन खड़ी करने की कोशिश हो रही है। 'सेतु-समुद्रम' परियोजना की लंबाई 167 किलोमीटर, चौड़ाई 30 मीटर और गहराई 12 मीटर रखी गई है। आर के पचौरी कमेटी ने कहा है कि यह परियोजना गले की फांस होगी, हमेशा जहाजों के फंसने की जड़ बनेगी, अबाध तौर पर पानी के जहाजों का आवागमन संभव नहीं हो सकता है। तेल और गैसों के रिसाव का खतरा हमेशा बना रहेगा।

तेल और गैसों के रिसाव से समुद्री जीवों के अस्तित्व पर भी खतरा कैसे नहीं होगा। समुद्र की पूरी पारिस्थितिकी संकट में खड़ी होगी, समुद्री पारिस्थितिकी असंतुलन का आमंत्रण देना भी आत्मघाती कदम कैसे नहीं माना जाना चाहिए? इतना ही नहीं, बल्कि समुद्र के आस-पास रहने वाली आबादी के जीवन को भी कई बीमारियों से ग्रसित करेगा। इस परियोजना की आयु भी कितनी होगी? इस पर सवाल है। निष्कर्ष यह भी है कि 'सेतु-समुद्रम' परियोजना की आयु कम होने से दिखाए जा रहे दिवास्वप्न का पूरा होना संभव नहीं है। सच तो यह है कि रामसेतु को तोड़ने विध्वंस करने के लिए विकास और उन्नति के ऐसे-ऐसे सपने दिखाए जा रहे हैं, दावे किये जा रहे हैं, जिनकी उम्मीद ही नहीं बनती है। भविष्य में ये सभी दावे और सपने झूठे साबित होंगे।

धार्मिक पर्यटन और परमाणु संपदा के रूप में विख्यात थोरियम की कसौटी को यहां देखते हैं। पहले धार्मिक पर्यटन पर विचार करते हैं। रामेश्वरम स्थित समुद्र तट पर प्रत्येक साल लाखों-करोड़ों लोग देश-विदेश से डुबकी लगाने आते हैं। रामसेतु के पास डुबकी लगाने और मुक्ति की आस्था है। सरकार अगर देश-विदेश में रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में प्रचारित करे और स्थापित करने की चाक-चौबंद कोशिश करे, तो निश्चित तौर पर यह आर्थिक प्रगति का एक बड़ा माध्यम हो सकता है। दुनिया भर में पर्यटन अर्थव्यस्वथा ख्याति अर्जित कर रही है। फिर हमें क्यों नहीं इस नई आर्थिक अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाले आधार पर सोचना चाहिए।

सरकारें रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में प्रचारित-प्रसारित करेंगी नहीं? यह तय है। क्योंकि अगर सरकारें रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में प्रचारित-प्रसारित करेंगी तो उन पर हिन्दू समर्थक होने या फिर हिन्दुत्व की महिमा मंडित करने के आरोप लगेंगे और उनकी तुष्टिकरण की नीति विध्वंस होगी, इस खतरे से कौन खेलना चाहेगा? यह भी हमें ध्यान रखना चाहिए कि रामसेतु के आस-पास समुद्री खनिज संपदाओं का ही खाजाना नहीं छिपा हुआ है, बल्कि थोरियम जैसी अति महत्वपूर्ण संपदा है। जानना यह भी जरूरी है कि थोरियम से परमाणु बम बनाने के साथ ही साथ ऊर्जा की नई जरूरतें पूरी हो सकती हैं। अगर रामसेतु तोड़ा जायेगा, तो थोरियम खनिज संपदा भी नष्ट हो सकती है। सबसे पहले तो किस प्रकार के हथकंडे अपनाये गये हैं, वह भी आप देख सकते हैं। यहां तक की राम के अस्तित्व को ही नकारने की कोशिश हुई। यह कोशिश कांग्रेस की सरकार ही नहीं, बल्कि तमिलनाडु की तत्कालीन करुणानिधि सरकार की भी थी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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