सूखे की त्रासदी से हौसले परास्त

Submitted by pankajbagwan on Wed, 01/29/2014 - 13:44
28 जनवरी 2014 बुन्देलखण्ड में बहुतेरे गांव के किसानों को सूखे की त्रासदी ने उनके हौसलों को परस्त करके रख दिया है। किसान सोंचे भी तो क्या जब भी कोई योजना अपनी खेती को संवारने की बनाता है तो पैसा आड़े आता है। बैंको की गिरफ्त में फंसे किसानों को कर्ज से उबरने का कोई जरिया ही नहीं दिख रहा।

इस इलाके के जिन किसानों के परिवार में बाहरी आमद का कोई मुकम्मिल श्रोत नहीं है। उनकी हालातें बद से बद्तर होती जा रही हैं। उन्हें यह तो भली-भांति पता है। कि उनकी खेती में पानी की जरूरत पूरी हो जाये तो वह भी फायदे की फसल उगा सकते हैं। पर पानी हो तो हो कैसे, पानी का प्रबन्ध तो पैसा मांगता है। वह भी अलग-अलग इलाकों में जल श्रोतों की विविधतायें भी अलग है। कई इलाके तो ऐसे है। जहां सिंचाई के लिए भूजल श्रोत की बात तो सेाचना ही ना समझी है। सैकड़ो मीटर गहराई नापकर भी चुल्लू भर पानी की आशा करना व्यर्थ है वहां ।

ऐसे ही कुछ इलाके बुन्देलखण्ड उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में मौजूद है। उनमें से विकासखण्ड कबरई का गांव बरबई है। बरबई के परिवार मूलतःसभी किसान है जिनकी पुस्तें इसी खेती से पलती-बढ़ती आई है। इसी किसानी के बल-बूते उनकी घर गृहस्थी शादी विवाह भी होते आये है। पर दो तीन दशक ऐसे गुजरे कि अपने को किसान बताने और कहलाने पर वह अच्छा महसूस नहीं करते । ऐसा नहीं है कि उनके पास जमीने नहीं बचीं,या उन जमीनों में खेती नहीं करते । यदि नहीं करते तो सिर्फ अपनी खेती में अब फायदे का भरोसा नहीं करते।

हौसला बढाया तो बन गया तालाब

बरबई के किसान देवेन्द्र शुक्ला के खेत पर हर साल लाखों गैलन पानी आता और बिना रोंक-टोंक के आगे कहीं सुदूर चला जाता । कभी कम कभी ज्यादा,आता जाता रहता, पर उसके आने का अपना समय होता था। इस पानी से कभी कुछ फायदा तो कभी कुछ नुकसान भी होता रहता । हां इस पानी के साथ खेत की बारीक मिट्टी तो हर साल लापता हो जाती रही है। जिसे देवेन्द्र कभी फिर अपने खेत पर वापस नहीं ला सके। खेत इतना कि यदि उ0प्र0 के पश्चिम में होता तो उनकी अपनी हैसियत होती पर इस बुन्देलखण्ड में दो एकड़ के किसान की हैसियत तो मजदूर से भी गई गुजरी है इसके पीछे की वजह जानना चाही तो पता चला - सिचाई के लिए पुख्ता प्रबन्ध नहीं होने से ये इज्जत बनी है।

किसान देवेन्द्र शुक्ला को अपने दो एकड़ खेत की जरूरत तालाब के अर्थशास्त्र का पता हुआ तो बदलाव शुरू हो गया। बदलाव इस मायने में कि देवेन्द्र अपनी खेती को बटाई और ठेके में देकर काम की तलाश में थे। खेती के भरोसे देवेन्द्र पालने की बात तो दूर-दूर तक नही सोचते थे । पर देवेन्द्र को जब अपना तालाब अभियान के सम्वाहाको ने तालाब बनाने का सहज तरीका बताया । और वर्षा के पानी से फायदे का ब्योरा,तो फिर किसान को अपना तालाब बनाने से कोई प्रबन्ध कर तालाब की खुदाई शुरू करवा दी । इसके पूर्व तालाब खुदाई के स्थान का चयन और भूमि पूजन अपना तालाब अभियान के अगुवा श्री अनुज कुमार झा जिलाधिकारी महोबा की उपस्थिति में 18 मई को सम्पन्न हुआ।

निर्माण के लिए लगाई गई मशीनों के चालकों के पारंगत नहीं होने से तालाब की पाल का आकार-प्रकार उपयुक्त नहीं बना। पर तालाब में दो एकड़ जमीन की फसलों के लिए पानी की जगह पर्याप्त बन गयी । किसान अपने 27×24×4मी0के तालाब में एकत्र जल से देा एकड़ की फसल को एक पानी दे चुका है। अभी भी तालाब में सात फुट गहरा पानी का भण्डार उपलब्ध हैं जिससे पूरी जमीन पर बोई गयी फसल को दूसरा पानी देने के बाद भी पानी बचेगा।

अपना तालाब निर्माण से निकली मिट्टी को किसान देवेन्द्र शुक्ला ने ग्रामीणों के आग्रह पर दिया तो तीस हजार की बचत भी कर ली । मिट्टी की ढुलाई का सारा खर्चा मिट्टी ले जाने वालों ने ही उठा लिया। जिस अपने खेत पर देवेन्द्र कभी कभार जाते हुए भी बेमन रहते थे। अब उसी खेत पर देवेन्द्र अपने परिवार के साथ कुछ न कुछ करते देखे जाते है। वहां बैठकर कई तरह की फायदे वाली योजनाएं भी बनाते है। उन पर आपस में विचार-विमर्श भी करते हैं। इस साल देवेन्द्र को खेत में कोई फसल का नुकसान अन्ना जानवरों से कतई नहीं हुआ जबकि गांव क्षेत्र में किसानों की फसलें अन्ना पशु चट कर रहे है। देवेन्द्र शुक्ला अब इसी खेत में अपना घर बनाने की योजना बना रहे है। देवेन्द्र मानते हैं कि पहले कोई इस तरह से तालाब बनाने का सस्ता तरीका बता सकता तो हमारी परिस्थिति पहले ही कुछ और बेहतर हो गयी होती ।

आया तालाब,हुआ सूखा परास्त

सूखे से त्रस्त गांव बरबई के किसान देवेन्द्र शुक्ला का अब सूखा का दंश नही सताता । और न ही असमय अति वर्षा का भय उन्हें भयभीत कर पर रहा है। इससे लड़ने और निपटने की ताकत जो आ गयी है, किसान में। जब कि ठीक आठ माह पहले तक सूखा देवेन्द्र के दिल दिमाग में रचा-बसा था। जो तालाब में वर्षा की बूंदो के सिमटते ही न जाने कहां सिमट कर बिलुप्त हो गया। जिस सूखे ने किसान के परिवार से हंसी ठहाके तीज त्योहार की खुशियां छीन ली थीं। वह सब फिर से घर के आंगन,खेत की मेड़ और तालाब की पाल पर दिखने लग गयी है।।

किसान देवेन्द्र शुक्ला से मिले तो उनके चेहरे में सूखे की सिनाख्त भी नहीं हो सकी। उनकी मुस्कराहट से ही अन्दाज लगाया जा सकता है कि अपना तालाब बनाकर सूखा परास्त करने का नायाब नुक्सा मिल गया है। देवेन्द्र अपने खेत पर अपने परिवार की जरूरत वाली फसलों की तैयारी कर रहे हैं। अपने तालाब में संचित वर्षा जल की एक-एक बूँद का उपयोग करना चाह रहे है देवेन्द्र ।तालाब के पानी भराव की क्षमता निर्माण के लिए काम करने की भी तैयारी है। जिससे अपने तालाब की गहराई,लम्बाई,चैडा़ई,को दुरूस्तकर पाल मजबूत कर सकेंगें किसान देवेन्द्र शुक्ला ।

किसान- श्री देवेन्द्र शुक्ला पुत्र श्री चन्द्रशेखर।
ग्राम- बरबई।
विकासखण्ड- कबरई ।
जनपद -महोबा।

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