सूखे में सहारा बनी पलाशः बनाया दोना-पत्तल

Submitted by Hindi on Thu, 04/11/2013 - 12:14
Source
गोरखपुर एनवायरन्मेंटल एक्शन ग्रुप, 2011
जाति-विशेष से संबंधित दोना, पत्तल बनाने को व्यवसाय के रूप में अब छोटी जोत के किसानों ने महंगी होती खेती लागत के विकल्प के तौर पर भी अपनाना प्रारम्भ कर दिया है।

परिचय


वैसे तो पूरा बुंदेलखंड ही सूखा प्रभावित क्षेत्र है। पर यह सूखा अब सुखाड़ बनती जा रही है, ऐसे में लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत खेती सर्वाधिक प्रभावित हो रही है। मीलों तक खेत खाली ही दिखते हैं, क्योंकि महंगी होती खेती लागत के साथ पानी की अनुपलब्धता ने लोगों को पंगु बना दिया। इसका सबसे अधिक प्रभाव ऐसे परिवारों पर पड़ा, जिनके पास खेती न्यून मात्रा में होती थी, अथवा नहीं होती थी। ऐसी स्थिति में लोगों ने आजीविका के अन्य साधनों पर अपना ध्यान केंद्रित किया और इसी के प्रतिफल के तौर पर पलाश के पत्ते से दोना-पत्तल बनाने की शुरुआत की। दोना-पत्तल तो परंपरा में शामिल है, पर पहले यह सिर्फ जाति विशेष से संबंधित थी। अन्य लोग शर्म, संकोच के कारण चोरी से पत्तल बनाते थे और बाहर के खरीददारों को ही बेचते थे, परंतु धीरे-धीरे लोगों ने इसे व्यवसाय के रूप में अपना लिया और अपनी आजीविका आपदा के दिनों में भी सुरक्षित की।

पलाश को ग्रामीण भाषा में “ढाक” या “छियूल” कहते हैं। इसके तीन पत्ते एक साथ निकलते हैं। इसलिए इसे “त्रिपत्रक” या “त्रिपर्णक” भी कहते हैं। इसका फूल लाल रंग का होने के कारण इसे “रक्तपुष्पक” की संज्ञा भी दी जाती है। पलाश का औषधीय महत्व अधिक है। इस पौध का प्रत्येक भाग किसी न किसी रूप में अन्यान्य बीमारियों के लिए औषधि का काम करता है। पलाश के पौधे से दोना-पत्तल बनाने के अतिरिक्त इसकी जड़ को कूटकर उसके रेशे से रस्सी, सिकहर, गुण्डी आदि वस्तुएं बनती हैं।

प्रक्रिया


कच्चा माल
1 नीम की सींक
2 पलाश का पत्ता

प्राप्यता


यह महोबा में ही नहीं वरन् बुंदेलखंड के कई जनपदों में आसानी से खेतों की मेड़ों पर, सड़क के किनारे एवं जंगल में आसानी से प्राप्त होता है। साल के ग्यारह महीने इसकी उपलब्धता रहती है। मात्र एक माह अप्रैल में यह नव पत्तों के आने की स्थिति में नहीं मिल पाता है।

नीम की सींक गर्मियों में मिलती है, जिसे गांव वाले एकत्र कर बोरियों में रखते हैं। फिर पूरे सीजन पलाश के पत्ते तोड़ कर दोना-पत्तल तैयार करते हैं।

कच्चा माल एकत्र करना


पलाश के पत्ते तोड़ने का काम अक्सर सुबह होता है। कभी-कभी लोग दोपहर को भी पत्ते तोड़ते हैं।

दोना-पत्तल तैयार करना


तत्पश्चात् एक पत्ते से दूसरे पत्ते को सींक के सहारे जोड़ते हुए थाली के आकार का पत्तल तथा कटोरी की शक्ल का दोना तैयार करते हैं। इस काम के लिए किसी विशेष तकनीक की आवश्यकता नहीं होती है। 6-7 साल के बच्चे से लेकर 60-70 साल तक का बुजुर्ग इस काम को बैठे-बैठे कर सकता है।

बाजार उपलब्धता


इसे बेचने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता है। खरीददार गांव से उत्पाद खरीदकर ले जाते हैं। दिसम्बर से जून तक इसकी मांग विशेष रूप से होती है। क्योंकि यही समय पर्व, त्यौहार एवं शादी-ब्याह अथवा मांगलिक कार्यों का उपयुक्त समय होता है और उस दौरान गांव-देहात में आगतों, अतिथियों को खाना खिलाने के लिए इन पत्तलों का उपयोग बहुतायत में किया जाता है।

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