स्वच्छ भारत अभियान

Submitted by RuralWater on Thu, 10/01/2015 - 10:01

स्वच्छता दिवस, 02 अक्टूबर 2015 पर विशेष


. प्रधानमंत्री ने पिछले साल गाँधी जयन्ती के पुनीत अवसर को स्वच्छ भारत अभियान से जोड़कर एक अभिनव शुरूआत की थी। यह, देशवासियों की सेहत से जुड़ी बेहद जरूरी आवश्यकता की शुरुआत थी। स्वच्छ भारत अभियान का सन्देश मार्मिक था। लोगों को जोड़ने का तरीका अत्यन्त आत्मीय और प्रेरक था। उस तरीके में कहीं-न-कहीं राष्ट्रभक्ति तथा राष्ट्रगौरव का भी भाव छुपा था।

उस दिन प्रधानमंत्री खुद इस अभियान के साथ खड़े थे इसलिये लग रहा था कि अभियान निश्चय ही लक्ष्य हासिल करेगा। पाँच साल बाद जब देश के सामने उपलब्धता का रिपोर्ट कार्ड पेश होगा तो वह पश्चिमी देशों की पंक्ति में खड़ा दिखाई देगा।

पिछले साल, कुछ दिन तक प्रधानमंत्री की अपील का असर दिखाई भी दिया पर धीरे-धीरे वह अपील हाशिए पर चली गई। प्रतिबद्धता की कमी तथा अभियानों के रस्मी इतिहास की परम्परा ने उसे धुँधला दिया। आत्मचिन्तन इंगित करता है कि अनेक जगह अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

2 अक्टूबर 2015 को स्वच्छ भारत अभियान की पहली वर्षगांठ है। पहली वर्षगांठ के दो सप्ताह पहले से जो संकेत मिल रहे हैं उनसे पता चलता है कि यह अभियान, सरकार की प्राथमिकता सूची में बहुत ऊँची पायदान पर है। अखबारों में छप रही खबरों से पता चलता है कि प्रधानमंत्री की पहल पर, केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने राज्य सरकारों से अपने-अपने राज्यों में 25 सितम्बर से 11 अक्टूबर तक गहन स्वच्छता अभियान संचालित करने को कहा है।

उम्मीद है, इस पहल के परिणामस्वरूप अभियान गति पकड़ेगा और महात्मा गाँधी की 150वीं पुण्यतिथि (2 अक्टूबर 2019) के लिये निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में अग्रसर होगा। यह निर्विवादित हकीकत है कि समग्र स्वच्छता ही स्वच्छ पर्यावरण है।

वही उसकी वास्तविक मंजिल है इसलिये उसके दायरे में देश की हवा, पानी, धरती, नदी नाले, जंगल और बसाहटें और वे सब चीजें सम्मिलित होंगी जिनका सम्बन्ध जीवधारियों और वनस्पतियों की सेहत और खुशहाली से है। स्वच्छ भारत अभियान के नतीजों को पाने के लिये निम्न क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा।

स्वच्छ भारत अभियान के कार्यक्रमों में हवा की शुद्धता को जोड़ना आवश्यक है। इसकी आवश्यकता उन भुक्तभोगियों से पूछी जा सकती है जो विकल्पों के अभाव में बदबूदार हवा में साँस लेने को मजबूर हैं। अनेक महानगरों, खनन क्षेत्रों, औद्योगिक इकाईयों और नगरीय कचरे के निपटान केन्द्रों की हवा में कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, हाईड्रोजन सल्फाइड जैसी हानिकारक गैसें; सीसा, जस्ता, लोहा इत्यादि जैसी धातुओं के महीन कण; उद्योगों द्वारा छोड़े घातक जटिल कार्बनिक प्रदूषक, कीटनाशकों से जहरीली हुई तथा बीमारी फैलाते हानिकारक अपशिष्ट, कालिख, धूल इत्यादि पाये जाते हैं।

उनका जीवधारियों की सेहत पर बहुत बुरा असर होता है। लाइलाज बीमारियाँ फैलती हैं। अतः स्वच्छ भारत अभियान में हवा की शुद्धता को सम्मिलित करना और उसे निरापद बनाना होगा। इस हेतु पर्याप्त कायदे-कानून मौजूद हैं। आवश्यकता केवल उन्हें लागू कराने की है।

पानी का प्रदूषण बहुत व्यापक है। उसका दायरा नदियों के पानी से लेकर ज़मीन के नीचे के पानी तक फैला है। घरेलू मल-मूत्र द्वारा प्रदूषित पानी के कारण अनेक बीमारियाँ (हैजा, टायफाइड, डायरिया, डिसेन्ट्री, पीलिया, हेपेटाइटिस इत्यादि) होती हैं। जमा पानी मलेरिया और डेंगू जैसी अनेक घातक बीमारियों का कारण बनता है।

स्वच्छता का पहला पाठ घर से शुरू होता है। उसे संस्कार बनाया जाता है। कायदे-कानून की पालना उसका दूसरा पाठ है। यह पाठ सबको पढ़ना पड़ता है। कोई वीआईपी छूट नहीं होती। उसके दायरे में, अनिवार्य रूप से, सभी नागरिकों, संस्थाओं, नगरीय निकायों, कल-कारखानों को लाना होता है। निगरानी करने वाली संस्थाओं को काम और कानून के प्रति उत्तरदायी होना पड़ता है। कायदे कानूनों का डर नागरिकों को उनके दायित्वों के प्रति पाबन्द रखता है। प्रदूषित जल फसलों, सब्जियों और फलों को जहरीला बना रहा है। ये जहरीले उत्पाद अनेक बीमारियों के सबब बनते हैं इसलिये स्वच्छ भारत अभियान में जल स्रोतों के पानी को प्रदूषण मुक्त करना होगा। देश की हर प्रदूषित नदी को स्वच्छ भारत अभियान का अंग बनाना होगा। हर नदी के कछार को सँवारना होगा और पानी की गुणवत्ता को भारत सरकार द्वारा निर्धारित निरापद मानकों के दायरे में लाना होगा।

स्वच्छ भारत अभियान के केन्द्र में देश का प्रत्येक नागरिक है। उसकी व्यक्तिगत स्वच्छता के लिये वांछित मात्रा में पानी की उपलब्धता आवश्यक है। यह पानी प्रत्येक नागरिक को उसके घर पर मिलना चाहिए पर बहुत सारे इलाके के लोगों को जरूरतपूर्ता पानी नहीं मिलता। पानी की कमी के कारण व्यक्तिगत स्वच्छता प्रभावित होती है।

यह हालत गाँवों में नदी, तालाब, कुओं और हैण्डपम्पों के सूखने के कारण तथा नगरों तथा महानगरों की घनी बस्तियों एवं स्लम एरिया में आम है। क्रयशक्ति के अभाव और स्टोरेज क्षमता की कमी के कारण टैंकरों पर निर्भर परिवारों को आधा-अधूरा पानी मिलता है। पानी की कमी के कारण शौचालयों में मल-मूत्र का सही निपटान नहीं हो पाता।

गर्मी के मौसम में जब चारों ओर पानी की किल्लत होती है तो सबसे अधिक खामयाजा व्यक्तिगत स्वच्छता और शौचालयों को भोगना पड़ता है। खुले में शौच को समाप्त करने के उद्देश्य से बनाये शौचालयों, स्लम इलाकों और पानी की कमी वाले इलाकों में पानी की माकूल उपलब्धता बढ़ाये बिना उपर्युक्त समस्याओं का हल कठिन है।

पिछले प्रयासों का यही सबक है इसलिये हर घर में पानी की उपलब्धता बढ़ाकर ही स्वच्छ भारत अभियान को अंजाम तक ले जाना सम्भव होगा। यही उसकी प्राथमिकता का बिन्दु होना चाहिए।

अनेक नगरीय इलाकों में जल निकासी की समस्या है। शहरों के बीच से बहने नाले संकरे कर दिये गए हैं। उनके कैचमेंट तथा जलमार्ग पर कब्जा है। वे गन्दगी, घरेलू कचरे तथा प्लास्टिक से अटे पड़े हैं। निपटान के अभाव में वे बदबू और संक्रमण के केन्द्र बन गए हैं।

बरसात में वही गन्दगी और कचरा मकानों और बस्ती में फैलकर गन्दगी फैलाता है। इसके अलावा, नगरों में घरों से निकलने वाले कचरे को भी संज्ञान में लेना होगा। उसकी लगातार बढ़ती मात्रा के कारण महानगरों में उसका निपटान गम्भीर समस्या है। वह, स्वच्छ भारत अभियान की राह में बहुत बड़ी बाधा है। उदाहरण के लिये मुम्बई की माहिम खाड़ी में हर दिन लगभग 33 करोड़ घरेलू कचरा तथा 2.2 करोड़ लीटर औद्योगिक प्रदूषित पानी मिलता है।

दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ बिजली घर से लगभग 3 लाख टन फ्लाई-एश निकलता है। यमुना में हर दिन लगभग 20 करोड़ लीटर मानव मल-मूत्र और 2 करोड़ लीटर औद्योगिक बाहिःप्रवाह मिलता है। यह किसी एक नगर या बसाहट की समस्या नहीं है। ऐसे हालात लगभग पूरे देश में हैं। अनेक कारणों से नगरीय निकाय स्वच्छता मानक पालन करवाने में बौने सिद्ध हो रहे हैं। इन वास्तविकताओं को संज्ञान में लेकर ही स्वच्छ भारत अभियान को अंजाम तक ले जाना सम्भव होगा।

स्वच्छता का पहला पाठ घर से शुरू होता है। उसे संस्कार बनाया जाता है। कायदे-कानून की पालना उसका दूसरा पाठ है। यह पाठ सबको पढ़ना पड़ता है। कोई वीआईपी छूट नहीं होती। उसके दायरे में, अनिवार्य रूप से, सभी नागरिकों, संस्थाओं, नगरीय निकायों, कल-कारखानों को लाना होता है।

निगरानी करने वाली संस्थाओं को काम और कानून के प्रति उत्तरदायी होना पड़ता है। कायदे कानूनों का डर नागरिकों को उनके दायित्वों के प्रति पाबन्द रखता है। नियमों की बाध्यता के कारण हर व्यक्ति गन्दगी फैलाने से परहेज करता है। स्वच्छ भारत अभियान को भी इसी राह पर चलाना होगा। रस्म अदायगी की राह को तिलांजली देना पहली और आखिरी शर्त है।

Disqus Comment