स्वच्छ पानी : कोविड-19 से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार

Submitted by HindiWater on Sat, 04/11/2020 - 12:46
Source
Amita Bhaduri/ India Water Portal

फोटो - IWP Flikar Photos

इस महीने घातक कोरोना वायरस की महामारी के रूप में एक घातक दुनिया दिखाई दे रही है और ये महामारी तेजी से फैलती जा रही है। बड़ी संख्या में लोगों को संक्रमित कर रही है। साथ ही कई देशों बड़ी संख्या में मौत का कारण भी बन रही है, लेकिन फिलहाल मौत का आंकड़ा काफी तेजी से दुनिया भर में बढ़ रहा है। भारत में भी कोरोना वायरस तेजी से पैर पसारता जा रहा है, जहां अभी तक 7500से ज्यादा लोग इस महामारी से संक्रमित हो चुके हैं, जबकि 249 लोगों की मौत हो चुकी है। 

कोरोना वायरस का बढ़ता खतरा

कोरोना वायरस (सीओवी) का एक बड़ा परिवार है, जो हल्की सर्दी से लेकर गंभीर बीमारियों जैसे मध्य पूर्व रेस्पिरेटरी सिंड्रोम और सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम जैसे कई बीमारियों का कारण बनते हैं। कोरोना वायरस रोग (कोविड-19) एक संक्रामक रोग है, जो वायरस के एक नए तनाव के कारण होता है, जो पहले मनुष्यों में पहचाना नहीं गया था।

कोरोना वायरस से प्रभावित व्यक्ति में संक्रमण के सामान्य लक्षणों में श्वसन संबंधी लक्षण, बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ और सांस लेने में कठिनाई जैसे लक्षण शामिल हैं। ज्यादा गंभीर होने पर संक्रमण से निमोनिया, गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम, गुर्दे भी विफल हो सकते हैं। इससे मौत भी हो सकती है। 

कोेरोना वायरस के कई अनूठे पहलुओं के कारण ये चीन और इटली जैसे देशों में प्रकट हुआ और अब तेज गति से फैल रहा है, लेकिन यही पहलु रोग को नियंत्रित करने में सामाजिक, पर्यावरणीय और व्यवहारिक कारकों के महत्व को उजागर करते हैं।

कोविड-19 को रोकने के लिए हैंडवाशिंग

कोरोनो वायरस संक्रमण के प्रसार का मुख्य कारण छींकने या खाँसी के माध्यम से, नाक से लार या निर्वहन के माध्यम से ऊपरी श्वसन पथ से निष्कासित नमी की बूंदें हैं, जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचती है और संक्रमण की चेन बनती चली जाती है, लेकिन इस बीमारी को नियंत्रित करने में स्वच्छता और स्वच्छता उपायों का का काफी महत्व है। यही उपाय दुनिया भर के सामने उजागर भी हुए है, जिसने लोगों को स्वच्छता का महत्व भी बताया है। साफ पानी से हाथ धोने को कोरोना के संक्रमण को कम करने के सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक माना गया है। इसके अलावा भोजन और मांस उत्पादों को पानी से धोने और चेहरे और नाक को छूने से बचने के उपाय भी काफी कारगर हैं। 

कोरोना वायरस से निपटने के लिए साफ पानी की उपब्लधता को महत्वपूर्ण कारक माना गया है। साबुन और साफ पानी से उचित तरीके से हाथ धोना कोरोना वायरस रोग (कोविड-19) के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कारक है। हालाँकि, दुनिया भर में लाखों लोगों को आज भी साफ पानी नसीब नहीं होता है। दुनिया के 5 में से 3 ही लोगों के पास हाथ धोने के लिए बुनियादी सुविधाए हैं। यूनिसेफ के अनुसार, 

  • दुनिया की चालीस प्रतिशत आबादी के पास घर पर हैंडवाशिंग की सुविधा नहीं है, जिनमें से तीन चैथाई लोग निम्न विकसित देशों से आते हैं।
  • दुनिया भर में एक तिहाई स्कूलों और निम्न विकसित देशों में आधे स्कूलों में बच्चों के पास हाथ धोने के लिए कोई जगह नहीं है। 
  • 16 प्रतिशत स्वास्थ्य सुविधाओं में एक भी उपयोगयोग्य शौचालय या हैंडवाशिंग सुविधाएं नहीं हैं।

सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों, धार्मिक स्थलों/पूजा स्थलों और बाजारों में काफी भीड़ रहती है, इस भीड़ के कारण शहरी आबादी को श्वसन संक्रमण के कारण अधिक जोखिम का सामना कर सकती है। परिणामस्वरूप, हैंडवॉश करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, लेकिन मध्य और दक्षिण एशिया के शहरी क्षेत्रों में 22 प्रतिशत लोगों के पास हैंडवाशिंग की कमी है। बांग्लादेश के शहरी क्षेत्रों में लगभग 50 प्रतिशत और शहरों में रहने वाले 20 प्रतिशत भारतीयों के पास घर पर हाथ धोने की बुनियादी सुविधाए नहीं हैं। 

भारत में क्या है स्थिति

जबकि बीमारी को रोकने के लिए हाथ धोना एक महत्वपूर्ण और उपयोगी तरीका है, लेकिन पानी की उपलब्धता, शहरी और ग्रामीण भारत की पाइपलाइन से वर्तमान पहुंच और उपलब्ध जल संसाधनों की गुणवत्ता जैसी कई चुनौतियां हैं। इसलिए यदि भारत में हम कोरोना वायरस से निपटने के प्रयास कर रहे हैं, तो भविष्य में इस प्रकार की महामारी से निपटने के लिए हमारी तैयारियों के संबंध में कई सवाल भी उठते हैं। 

स्वच्छ जल तक पहुंच

हाल के एनएसएसओ सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारत में हर पाँच में से एक या 21.4 प्रतिशत घरों तक पेयजल लाइन नहीं पहुंच पाई है। शहरी भारत में भी केवल 41 प्रतिशत घरों में ही पेयजल लाइन से पानी पहुंचाया जा रहा है, यानी 59 प्रतिशत घरों तक आज भी पेयजल लाइन नहीं पहुंच पाई है। हाल ही में एनआरडीडब्ल्यूपी के आंकड़ों से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ 18 प्रतिशत घरों में ही पीने योग्य पानी आता है। लगभग 58.3 प्रतिशत घर अभी भी हैंडपंप, ट्यूबवेल, सार्वजनिक नल, पड़ोसी से पाइपयुक्त पानी, संरक्षित या असुरक्षित कुएं और उनके पानी के लिए निजी या सार्वजनिक नल पर निर्भर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में हैंड पंप का 42.9 प्रतिशत ही उपयोग किया जाता है और पीने के पानी का सबसे विश्वसनीय स्रोत बने हुए हैं। देश के 48.6 प्रतिशत ग्रामीण घरों और 28 प्रतिशत शहरी घरों में पूरे साल भर पीने के पानी के बेहतर स्रोत तक पहुंच नहीं है। इसके अलावा, 11.3 प्रतिशत परिवारों को पूरे साल जल के प्राथमिक स्रोतों से पीने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है। 

पाइप  पानी तक पहुंच पानी की आपूर्ति की गारंटी नहीं देता है

अधिक मात्रा में पानी होना भी कभी निरंतर पानी की आपूर्ति की गारंटी नहीं देता है। उदाहरण के तौर पर देखे तो, पाइप से जलापूर्ति करने वाले घरों को भी शुष्क नल सिंड्रोम जैसी समस्याओं से गुजरना पड़ता है। पानी की आपूर्ति करने वाले मुख्य स्रोत गर्मियों के मौसम में सूख जाते हैं, जिस कारण गर्मियो में नल भी सूख जाते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि देश में जल संसाधन पहले से ही दबाव में हैं। नीतीयोग द्वारा हाल ही में समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (सीडब्ल्यूएमआई) रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत में पानी की मांग वर्ष 2030 तक दोगुनी हो जाएगी। इससे देश की जीडीपी को 6 प्रतिशत का नुकसान हो सकता है। गर्मियों के मौसम में भारत में बारिश होने के साथ ही सूख पड़ने के मामलों में वृद्धि हो रही है। देश के बीस प्रमुख शहरों (दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और अन्य) गभूजल स्तर वर्ष 2020 तक शून्य तक पहुंचने की नीति आयोग की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है, इससे 100 मिलियन लोगों के प्रभावित होने की संभावना है। 

भारत में भूजल पर लोगों की निर्भरता भयावह स्तर पर पहुंच गई है। जिस कारण लगभग 250 क्यूबिक किलोमीटर प्रतिवर्ष के साथ भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है, जो अमेरिका द्वारा उपयोग किए जाने वाले जल का लगभग दोगुना है। केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा 2017 के आंकलन के अनुसार, भारत में हर वर्ष जमीन के निकालने योग्य भूजल 393 बीसीएम है। सभी प्रकार के उपयोगों के लिए वार्षिक भूजल निष्कर्षण 249 बीसीएम है, जिसमें से 221 बीसीएम (89 प्रतिशत) सिंचाई के लिए और 25 बीसीएम (10 प्रतिशत) घरेलू जरूतों को पूरा करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। 

2017 के आंकलन के अनुसार, देश में कुल 6881 मूल्यांकन इकाइयों (ब्लॉक/तालुक्स/मंडल/वाटरशेड/फिरकस) में से 17 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 1186 इकाइयों को ‘अति-शोषित’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जहां वार्षिक भूजल निष्कर्षण वार्षिक निकालने योग्य भूजल संसाधन से अधिक। देश में करीब 17.14 लाख बस्तियों में लगभग 85 प्रतिशत ग्रामीण पेयजल योजनाएँ स्रोत के रूप में भूजल पर आधारित हैं और आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु में बोतलबंद पानी बेचने वाले लगभग 7,426 संयंत्रों को लाइसेंस दिए गए हैं। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन 2.4 लाख लीटर पानी निकालने की अनुमति है, लेकिन लगभग 6.5-15 लाख लीटर भूजल खींचते हैं। देश में भूजल की सबसे ज्यादा गिरावट भी आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में है। 

उपलब्ध पानी की गुणवत्ता बिगड़ रही है

भूजल प्रदूषण ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में एक गंभीर समस्या के रूप में उभर रहा है। लवणता के अलावा, भूजल में फ्लोराइड, लोहा, आर्सेनिक और नाइट्रेट्स की उच्च सांद्रता भारत में एक बड़ी समस्या बन गई है। ये ऐसे लाखों लोगों के स्वास्थ्य को खतरा है, जो दैनिक पानी की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर हैं।

देश में सतही जल संसाधनों की स्थिति भी काफी चिंताजनक है। यह अनुमान है कि भारत में लगभग 80 प्रतिशत सतही पानी प्रदूषित है और खपत के लिए अयोग्य है। हर दिन, लगभग 40 मिलियन लीटर अपशिष्ट जल शोधित किए बिना नदियों और जल निकायों में बहाया जाता है। जल जनित रोग प्रतिवर्ष लगभग 37.7 मिलियन भारतीय प्रभावित होते हैं, जिनमें 1.5 मिलियन बच्चे डायरिया से मर जाते हैं और 73 मिलियन कार्यदिवस का नुकसान होता है, जिससे हर साल अर्थ व्यवस्था पर 600 मिलियन डॉलर का आर्थिक बोझ पड़ता है। स्वच्छता सुविधाओं में भी देश पिछड़ रहा है, जो जल के दूषित होने के खतरे को और ज्यादा बढ़ाता है। 

उपलब्ध पानी का प्रबंधन ठीक से नहीं किया जाता

भारत उपलब्ध पानी का अकुशल उपयोग करता है। उदाहरण के तौर पर देखे तो, हर साल होने वाली बारिश के 8 प्रतिशत जल का भी भारत उपयोग कर पाता है। भारत में पाइप्ड जल योजनाएं मौजूदा बुनियादी ढाँचे का उचित रखरखाव भी नहीं होता है, जिससे शहरी क्षेत्रों मं 40 प्रतिशत तक का नुकसान होता है। देश में ग्रे-वाटर का उपचार और पुनःउपयोग लगभग न के बराबर है। फिर भी भारत बहुत बेहतर कर सकता है और इजराइल जैसे देशों से सीख सकता है कि वे अपने उपयोग किए गए पानी का 100 प्रतिशत उपचार करें और देश की सिंचाई जरूरतों को पूरा करने के लिए इसका 94 प्रतिशत पुनर्चक्रण करें।

जल जीवन मिशन (जेजेएम), एक कदम आगे

जेजेएम जैसी सरकार की हालिया पहल प्रशंसनीय है क्योंकि यह भारत में स्वास्थ्य परिणामों में सुधार के लिए स्वच्छ जल तक पहुंच प्रदान करने की इस तत्काल आवश्यकता को मान्यता देती है।

हालाकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल बुनियादी ढांचा बनाने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाए, पहले समुदायों पर ध्यान केंद्रित करने और सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने, मौजूदा निर्माण के परिचालन और रखरखाव जैसे व्यापक मुद्दे पर अधिक ध्यान देते हुए सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करके चीजों को अलग तरीके से करने की आवश्यकता है।

वर्तमान कोविड-19 महामारी ने लोगों को स्वच्छता का महत्व समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें बीमारी से बचाव के लिए पानी और साबुन से हाथ धोना आदि शामिल हैं। यदि इस बीमारी से लड़ने के लिए देश का प्रत्येक नागरिक आगे आता है तो भविष्य में इस प्रकार की चुनौतियों से निपटने में हमारे एक एक सीख होगी कि जो कार्य दवाईयां नहीं कर सकती, वही कार्य स्वच्छ पानी, पर्यावरण और जिम्मेदार नागरिकों की सहभागिता से आसानी से किया जा सकता है। 

मूल लेख पढ़ने के लिए इंडिया वाॅटर पोर्टल की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाएं, जिसका लिंक नीचे दिया गया है:- 

Clean water, a crucial weapon to combat COVID -19


 

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