टिहरी बांध : उजड़े पर गिनती में नहींं, भाग-2

Submitted by admin on Tue, 02/25/2014 - 13:22

2005 से केन्द्रीय जल आयोग की कोई रिपोर्ट नहीं आई जो बताती कि टिहरी बांध झील की जल गुणवत्ता क्या है? हर बरसात में मृत जानवर, लावारिस लाशें, कचरा आता है इसे हटाने के लिए कोई योजना नहीं है। 7 वर्षों में कोई सफाई नहीं हुई है। किनारे रहने वालों और नई टिहरी जहां झील से ही पीने का पानी की आपूर्ति होती है वहां पर पाचन, गैस व यूरिक एसिड की शिकायतें बढ़ी हैं। इन क्षेत्रों मे 80 प्रतिशत जलापूर्ति हैंडपम्प से होती है।

टिहरी बांध से विस्थापितों की दुर्दशा तो है ही पर जरा टिहरी बांध की झील के पास की स्थिति की बानगी भी देख लें। भिलगंना नदी में जहां टिहरी की झील 25 किलोमीटर तक अंदर गई है। वहां नंदगांव में 865 मी. के पास रहने वाले 20 परिवारों की खेती झील में समा गई है, घरों में दरारें आई हैं। लोग धरने करते जा रहे हैं। सरकार सुनती नहीं।

झील के किनारे के लगभग 80 के करीब गाँवों की जमीनें धसक-सरक रही हैं। हर बरसात में झील का पानी बढ़ता है और गर्मी में जब पानी नीचे उतरता है तो यह धसकना-सरकना शुरू हो जाता है। मदन नेगी सहित कितने ही गाँवों के मकान खत्म हो गए या होने के कगार पर है। राज्य व केन्द्र सरकारें झील के किनारे रहने वालों के लिए अलग नीति की बात करती रही है। सर्वोच्च अदालत के दबाव पर ही एक नई नीति बनाई गई है।

झील के कारण सामाजिक ताना-बाना टूटा है। सुख-दुख में लोग साथ नहीं हो पा रहे हैं। 9 वर्षों में भागीरथीगंगा में टिहरीबांध झील प्रभावित क्षेत्र में महज एक रिश्ता हुआ।

बात थोड़ी पुरानी है पर यह घटित होता ही रहता है। 14 दिसंबर, 2012 को एक बारात, जिसमें लगभग 150 लोग थे, नई टिहरी के बौराड़ी से रौकोट वापिस जानी थी। किंतु झील पार करने के लिए बोट उपलब्ध नहीं थी जबकि पहले बात की गई थी। शाम 4 बजे से रात 11 बजे तक ठंड में बैठना पड़ा। उच्चाधिकारियों से बहुत संपर्क करने के बाद रात को 11 बजे लोग झील पार कर पाए। 5 बच्चों की तबियत भी खराब हुई।

भागीरथी व भिलंगना में 10 पुल डूबे हैं। भागीरथी में छामबाजार के झूला पुल व भिलंगना में घोंटीबाजार के झूला पुल से 30-30 गांव का सम्पर्क था। भल्डियाणागांव वाले पुल से बस जाती थी अब नए बने पुल से मात्र जीप जा सकती है किंतु उसके रास्ते नहीं बने हैं इसलिए यातायात नहीं हो पाता हैै। पीपलडाली के पुल से भी मात्र जीप जाती है। अन्य 3 मोटरपुल अभी योजना स्तर पर है।

बांध की झील में पर्यटन की योजनाओं के अंबार लग गए हैं, पर्यटन मेले-कार्यक्रम भी हो गए पर कोई योजना सिरे अभी तक नहीं पहुंची है। दूसरी तरफ झील तक पहुंचने के संपर्क मार्ग है ही नहीं। ढलानों के विकट रास्तों के कारण मुश्किल से लोग बोट तक पहुंचते हैं। उदाहरण के लिए ओणम से 3 किमी., मल्ला से 2 किमी., बैलगांव से 3 किमी. कई गांवोें से 1-2 किमी. झील दूर है। कुमराडा, बलडोगी, खामली, मजीर, मडगांव आदि में रास्ते नहीं हैं। झील का जलस्तर घटता है तो समस्या और भी विकट हो जाती है। फिसलने का खतरा हमेशा बना रहता है। बीसीयों लोग व 70 से ज्यादा पशु मारे गए हैं।

2005 से केन्द्रीय जल आयोग की कोई रिपोर्ट नहीं आई जो बताती कि टिहरी बांध झील की जल गुणवत्ता क्या है? हर बरसात में मृत जानवर, लावारिस लाशें, कचरा आता है इसे हटाने के लिए कोई योजना नहीं है। 7 वर्षों में कोई सफाई नहीं हुई है। किनारे रहने वालों और नई टिहरी जहां झील से ही पीने का पानी की आपूर्ति होती है वहां पर पाचन, गैस व यूरिक एसिड की शिकायतें बढ़ी हैं। इन क्षेत्रों मे 80 प्रतिशत जलापूर्ति हैंडपम्प से होती है।

नई टिहरी में अभी लोग टिन शेडो में पड़े हैं। विस्थापितों के प्लाटों पर कब्जे हैं। नई टिहरी बार एशोशिएसन के अनुसार टिहरी देहरादून को मिलाकर 100 से ज्यादा फ्लैटों पर बांध कंपनी टीएचडीसी का कब्जा है। पुरानी सुविधाओं के स्थान पर विस्थापितों को नए शहर में सब वैसा ही मिलना चाहिए था उसके लिए विस्थापितों का नागरिक मंच कितने ही धरने-प्रर्दशन-भूख हड़ताले कर चुका। पर समस्याएं जस की तस। समाधान सब सरकारें करने को कहती है पर करता कोई नहीं।

प्रश्न यह है कि जब टिहरी बांध में लगे हर कण के बारे में योजना थी, हर कर्मचारी के भत्ते व परिवार के रहने तक की योजना व पैसे का इंतजाम था है और समय-समय पर उसके लिए व्यवस्थित रूप से सोचा और क्रियान्वित भी किया जाता है तो पुनर्वास की समस्याओं का अध्ययन क्यों नहीं किया गया। उसके लिए पूरे पैसे का इंतजाम क्यों नहीं किया गया। बांध विरोधी आंदोलन ने सरकार को योजना बनाने से नहीं रोका था। आंदोलन के बावजूद बांध संबंधी योजनाएं तो बनती ही रहीं और अब सरकारें पैसे का रोना रोकर काम नहीं करना चाहती हैं। पर यदि समाधान हो जाएगा तो मगरमच्छी आंसू बहाकर वोट कैसे बटोरे जाएंगे। टिहरी बांध मात्र एक उदाहरण है राज्य व देश के सभी चालू बांधों की स्थिति ऐसी ही है।

उत्तराखंड में बांध बनाने के लिए हल्ला मचाने वाला कोई इन बातों की चिंता नहीं करता ना बोलता है। नए बांधों के लिए देहरादून में कई धरने-जल से आयोजित किए गए। विश्वबैंक पोषित करोड़ों की सरकारी परियोजनाओं को चलाने वाले एनजीओ के मालिक जी ने राज्य के रूके बांध चालू ना होने की स्थिति में अपना पद्मविभूषण वापिस करने की घोषणा भी कई बार की। यूं वापिस नहीं किया।

जो लोग सिर्फ बांध बनाओं की माला जपते रहते हैं वे इस ओर ध्यान क्यों नहीं दे पाते की चालू बांधों की स्थिति क्या है। विस्थापितों का पुनर्वास क्यों नहीं हो पाया? पर्यावरण का कितना नुकसान हुआ, भरपाई हुई या नहीं? जलसंग्रहण क्षेत्र का उपचार हुआ या नहीं? क्या बांध उतनी बिजली भी पैदा कर रहे हैं जितने का दावा था? किसी बांध की कोई निगरानी नहीं। विकास का जो दावा किया जाता है क्या वो पूरा भी हुआ है।

बांध से विकास का लाभ किसको गया है? स्थायी रोजगार कितना मिला और आजीविका के स्थायी साधन कितने खत्म हुए? ऐसी की लंबी सूची है। जिस तरफ बांध समर्थकों का कोई ध्यान नहीं है चूंकि इन सबके स्वार्थ उन बांध कंपनियों और विश्वबैंक, एशियाई विकास बैंक जैसी बांध के लिए धन देने वाली संस्थाओं के साथ जुड़े है। जिनको ना विस्थापितों, ना पर्यावरण और ना ही इस बात मतलब है कि बस ऊर्जा प्रदेश का हल्ला मचाते रहो। नए बांधों से पहले पुराने बांधों की स्थिति को भी तो जान लिया जाए। उनके लिए कुछ कर दीजिए साहब!

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