टके सेर टमाटर

Submitted by RuralWater on Sun, 04/10/2016 - 12:47

बुन्देलखण्ड व मराठवाड़ा-विदर्भ में किसान इस लिये आत्महत्या कर रहा है कि पानी की कमी के कारण उसके खेत में कुछ उगा नहीं, लेकिन इन स्थानों से कुछ सौ किलोमीटर दूर ही मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ इलाके के किसान की दिक्कत उसकी बम्पर फसल है। भोपाल की करोद मंडी में इस समय प्याज के दाम महज दो सौ से छह सौ रुपए क्विंटल है। आढ़तिये मात्र दो-तीन रुपए किलो के लाभ पर माल दिल्ली बेच रहे हैं। मध्य प्रदेश के धार जिले के अमझेरा के किसानों को जब टमाटर के सही दाम नहीं मिले तो उन्होंने इस बार टमाटर से ही रंगपंचमी मना ली। सनद रहे मालवा अंचल में होली पर रंग नहीं खेला जाता, रंगपंचमी पर ही अबीर-गुलाल उड़ता है। मंडी में टमाटर की एक क्रेट यानि लगभग 25 किलो के महज पचास रुपए मिल रहे थे, जबकि फसल को मंडी तक लाने का किराया प्रति क्रेट रु. 25, तुड़ाई रु. 10, हम्माली रु. 5 व दीगर खर्च मिलाकर कुल 48 रुपए का खर्च आ रहा था। अब दो रुपए के लिये वे क्या दिन भर मंडी में दिन खपाते। यही हाल गुजरात के साबरकांठा जिले के टमाटर उत्पादक गाँवों - ईडर, वडाली, हिम्मतनगर आदि का है।

जब किसानों ने टमाटर बोए थे तब उसके दाम तीन सौ रुपए प्रति बीस किलो थे। लेकिन पिछले पखवाड़े जब उनकी फसल आई तो मंडी में इसके तीस रुपए देने वाले भी नहीं थे। थक-हारकर किसानों ने फसल मवेशियों को खिला दी। गुजरात में गाँवों तक अच्छी सड़क है, मंडी में भी पारदर्शिता है लेकिन किसान को उसकी लागत का दाम भी नहीं।

जिन इलाकों में टमाटर का यह हाल हुआ, वे भीषण गर्मी की चपेट में आये हैं और वहाँ कोल्ड स्टोरेज की सुविधा है नहीं, सो फसल सड़े इससे बेहतर उसको मुफ्त में ही लोगों के बीच डाल दिया गया। सनद रहे इस समय दिल्ली एनसीआर में टमाटर के दाम चालीस रुपए किलो से कम नहीं है। यदि ये दाम और बढ़े तो सारा मीडिया व प्रशासन इस की चिन्ता करने लगेगा, लेकिन किसान की चार महीने की मेहनत व लागत मिट्टी में मिल गई तो कहीं चर्चा तक नहीं हुई।

बुन्देलखण्ड व मराठवाड़ा-विदर्भ में किसान इस लिये आत्महत्या कर रहा है कि पानी की कमी के कारण उसके खेत में कुछ उगा नहीं, लेकिन इन स्थानों से कुछ सौ किलोमीटर दूर ही मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ इलाके के किसान की दिक्कत उसकी बम्पर फसल है। भोपाल की करोद मंडी में इस समय प्याज के दाम महज दो सौ से छह सौ रुपए क्विंटल है। आढ़तिये मात्र दो-तीन रुपए किलो के लाभ पर माल दिल्ली बेच रहे हैं। यहाँ हर दिन कोई 1500 क्विंटल प्याज आ रहा है, वेयर हाउस वाले प्याज गीला होने के कारण उसे रखने को तैयार नहीं है, जबकि जबरदस्त फसल होने के कारण मंडी में इतना माल है कि किसान को उसकी लागत भी नहीं निकल रही है। याद करें यह वही प्याज है जो पिछले साल सौ रुपए किलो तक बिका था।

आज के हालात यह है कि किसान की प्याज उनके घर-खेत पर ही सड़ रहा है। कैसी विडम्बना है कि किसान अपनी खून-पसीने से कमाई-उगाई फसल लेकर मंडी पहुँचता है तो उसके ढेर सारे सपने और उम्मीदें अचानक ही ढह जाते हैं। कहाँ तो सपने देखे थे समृद्धि के, यहाँ तो खेत से मंडी तक की ढुलाई निकालना भी मुश्किल दिख रहा था।

असल में यह किसान के शोषण, सरकारी कुप्रबन्धन और दूरस्थ अंचलों में गोदाम की सुविधा या सूचना ना होने की मिली-जुली साजिश है, जिसे जानबूझ कर नजरअन्दाज किया जाता है। अभी छह महीने पहले पश्चिम बंगाल में यही हाल आलू के किसानों का हुआ था व हालात से हारकर 12 आलू किसानों ने आत्महत्या का मार्ग चुना था।

दुखद कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअन्दाज किया जाता रहा है। पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गम्भीरता से सोचा ही नहीं गया। फसल बीमा की कई योजनाएँ बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा, कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों।

किसान जब ‘केष क्राप’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्य भारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बमुश्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते-मंदे दामों में बिकेगा या फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।

हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक के कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिये मशहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फेंककर अपनी हताशा का प्रदर्शन करते हैं। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देखकर उपजी खुशी किसान के ओठों पर ज्यादा देर नहीं रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते।

उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की शादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फेंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिन्ता। मिर्ची की खेती के लिये बीज, खाद के लिये लिये गए कर्जे को कैसे उतारा जाये?

सियासतदाँ हजारों किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडम्बना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी-न-किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कम्पनियाँ सपने दिखाकर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।

देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूँगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताश करती हैं। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहाँ से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किये रहते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आये साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े, मवेशियों को चराने की घटनाएँ सुनाई देती हैं।

आश्चर्य इस बात का होता है कि जब हताश किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चौपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, और उप्र के कोई दर्जन भर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनाएँ हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब शुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काटकर खरीद केन्द्र तक ढोकर ले जाना, फिर घूस देकर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिये दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है।

अतः वह खड़ी फसल जलाकर अपने कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृषि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भण्डारण का हक, फसल-प्रबन्धन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्रॉप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुष्परिणाम दाल, तेल-बीजों (तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं।

आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फसल और कितनी उगाई जाये, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियाँ तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही ग्रामीण अंचल में किसानों की सहकारी संस्थाओं द्वारा संचालित प्रसंस्करण के कारखाने लगें।

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